चूल्हे की आग से इंडक्शन हीट तक

कुछ हफ़्तों पहले एक शाम चाय बना रहा था कि एकाएक गैस ख़तम हो गई. खाना पकाने वाली गैस को हम लोग आग भाषा में गैस ही कहते हैं चाय तो खैर माइक्रोवेव ओवन में बन गई लेकिन फ़िक्र हुई कि रात को रोटी कैसे बनाई जाएगी?

दिन का समय होता तो बुक करते ही घंटे डेढ़ घंटे में गैस सिलिंडर पहुँच जाता लेकिन अब तो कल तक इंतज़ार करना पडेगा. सामने ही सिन्हा परिवार रहता है उनसे पतासाजी की कि कोई सिलिंडर पड़ा हो तो ले कर उनको बुकिंग से मिला हुआ लौटा दिया जाए.

लेकिन निराशा ही हाथ लगी. लेकिन उसी समय बताया गया कि एक हीटर है अगर उससे काम निकल सकेगा तो ले लीजिए. हीटर की लाल लाल तारों की कल्पना करते हुए, मरता क्या न करता की हालत में हामी भर दी.

लेकिन सामने आया इंडक्शन हीटर, जिसके बार में देखा सुना तो था लेकिन आजमाया कभी नहीं. मुझे समझाने की कोशिश की गई कि यह चलता कैसे है. अपने को तो सब आता है के अंदाज़ में ले तो आया लेकिन फंक्शन देख सकपका गया.

तब तक बाहर पुकार हुई कि इसमें खास तरह के बर्तन लगते हैं आपके पास होंगे नहीं ये एक तवा और पतीली ले लीजिए.

आधे घंटे के अंदर ही वह मुझे ऐसा भाया कि पास के बाज़ार जा एक नया इंडक्शन हीटर खरीद लाया. साथ मिला एक बड़ा सा बर्तन जिसमें मैक का खाना पकाया जा सकता है.

हालाँकि दूसरे दिन शाम को गैस सिलिंडर आ गया लेकिन तब तक मेरे सामने वह सभी साधन चलचित्र की तरह चले जो खाना पकाने के लिए आग का काम करते रहे.

चूल्हे की आग

जब होश संभाला तब सबसे पहले खाना पकाने के लिए चूल्हा ही दिखा. मिट्टी से बनी एक ऐसी आकृति जिसके नीचे जलाऊ लकड़ियाँ या सूखी टहनियां जलती रहती और ऊपर के मुहाने पर पतीला या तवा रख भोजन के लिए सारी चीजें तैयार कर ली जातीं.

माँ ने जो खुले आँगन में चूल्हा बनाया हुआ था वह कुछ अजीब सी गुफा जैसा दिखता. बहुत बाद में समझ आया कि ये तो मुख्य चूल्हे से साथ ही एक जुड़वां चूल्हा भी है. मुख्य चूल्हे में दहकती आग खाना पकाती थी तो वहाँ की गर्म हवा अप्रत्यक्ष रूप से साथ वाले चूल्हे के मुहाने पर रखे हुए बरतन का दूध या दाल या चाय गर्म बनाए रखती.

गाँव वाले घर की रसोई में जो चूल्हा था उसके धुएँ की निकासी के लिए एक पक्की चिमनी बनी हुई थी. चिमनी अभी भी है लेकिन चूल्हा गायब हो गया.

चूल्हे की आग

अब याद आता है कि उस समय कितनी दक्षता की ज़रूरत पड़ते थी चूल्हे की आग जलाए रखने के लिए. जलाई जाने वाली लकड़ी में नमी नहीं होनी चाहिए, आग की लपटों को बनाये रखने के लिए समयानुसार उन लकड़ियों को आगे की ओर खिसकाना भी है, धुएँ से भी बचना है और इस बात का भी ध्यान रखना है कि आँच ज्यादा ना हो जाए. गाँव में तो अधिकतर उपले ही इस्तेमाल किए जाते थे.

यहाँ माँ चूल्हे की धुलाई पोछाई पीली मिट्टी से करती थी, जबकि गाँव में यही काम गोबर से किया जाता रहा.

अक्सर ही इन चूल्हों को कुछ इस तरह ‘स्टैंडबाई’ रखा जाता था कि ज़रूरत पड़ने पर झट से लकड़ी या उपले डाल आग भड़काई जा सके. इसके लिए कई बार एक डेढ़ फुट लंबे पाइप सरीखे बांस से राख में दबी चिंगारी को फूंक फूंक कर सुलगाया जाता.

मुझे याद है एक बार दादी ने पुकार लगाई कि ज़रा चूल्हे में फूंक मार आग सुलगा दे. अपने राम दौड़ पड़े एक नए रोमांच की कल्पना में. लोहे की फुंकनी उठाई, राख में धंसाई और सारी ताकत लगा कर फेफड़ों की हवा तक फूँक मारे. धंसी हुई फुंकनी ने राख का तूफ़ान खड़ा कर दिया. तब तक हमने बाहर निकाली हवा की पूर्ति के लिए फुंकनी के सहारे वापस साँस ले ली और फिर क्या हुआ आप समझ सकते हैं

एक रहस्य हम भाई बहनों को बहुत परेशान करता था कि चूल्हे में जो बड़ी सी लकड़ी है वह जल तो आगे से रही है लेकिन उसके पीछे के हिस्से से अलादीन के चिराग जैसा लहराता धुआं कैसे आ रहा

इसमें मैंने लोहे के तवे के अलावा अधिकतर पीतल या मिट्टी के बरतन इस्तेमाल ही होते देखे.

अंगीठी की आग

जलाऊ लकड़ी का चूल्हा लगभग स्थायी होता है. जब बारिश होती तो माँ उसे छोटे से तिरपाल से ढक देती, जिससे उस ढांचे को कम से कम नुकसान हो. लेकिन फिर खाना कैसे पकाएं? तब काम आती थी अंगीठी. जिसे सिगड़ी भी कहते हैं.

उस समय कंपनी कर्मचारी को रियायती दरों पर हर माह एक मन कोक मिलता था. कोयले का परिष्कृत रूप कोक. एक मन मतलब चालीस किलो और कीमत थी 4 रूपए. अन्य साधनों के साथ इसे अंगीठी में इस्तेमाल करते तो भी महीने भर में खत्म नहीं होता था.

अंगीठी की आग

पीले बल्ब की हलकी सी रौशनी वाले आंगन में अंगीठी की आग से जब रोटी सेंकी जाती तो हम बच्चों का घेरा कौतूहल से उसे फुटबॉल जैसे फूलते देख आँखें चौड़ी कर लेता. मुझे तो वो किसी UFO सरीखी लगती. पिता जी की तो हमेशा फरमाईश रहती कि भुट्टे इसी में भूने जाएँ.

अंगीठी के कोयलों से आँच कम होती तो लोहे के चिमटे से कोयले अलट पलट ऐसी व्यवस्था की जाती कि आँच फिर तेज़ हो जाए.

इसमें भी मैंने लोहे के तवे के अलावा अधिकतर पीतल या मिट्टी के बरतन इस्तेमाल ही होते देखे.

हीटर की आग

इन साधनों के साथ उस समय पिता जी बिजली से चलने वाला हीटर ले आये थे. एस्बेस्टस की अजीब सी नालियों वाले खांचों की प्लेट में एक घुंघराली सी धातु की तार घुमा फिर कर लगाई जाती जिसके सिरों को  घरेलू बिजली से जोड़ते ही वह तार धीरे धीरे दहकने लगती.

एस्बेस्टस की वह प्लेट भी छोटी बड़ी कई आकारों में मिलती और उसमें फिट होने वाली तार भी अलग अलग क्षमता की होती.आग जैसा हीटर

तब तक घरेलू रसोई में मिट्टी के बर्तनों का प्रचलन ख़त्म ही हो गया था. लोहे, पीतल, एल्यूमिनियम के बरतन जब इस हीटर पर रखे जाते तो सावधानी यही बरतनी पड़ती कि कहीं यह बरतन उस दहकती तार से छू ना जाए.

ऐसे हीटर में अक्सर ही तार में किसी खास हिस्से के अत्यधिक गरम हो जाने से वह पिघल जाता था. उसे ठीक करने के लिए बिजली का प्लग निकल कर सावधानी पूर्वक  उस जगह तारों के सिरों को एक दूसरे में फंसाया  जाता.

मुझे याद है सत्तर के दशक में जब मेरी चाची ऐसे ही एक हीटर पर खाना पका रही थी तो अचानक ही तार गल कर टूट गया और आँच आनी बंद हो गई. चाची ने चिमटा उठाया और अंगीठी के कोयलों समान तार को छेड़ने लगी. फिर क्या था! बिजली का ऐसा झटका लगा कि चिमटा उछल कर छत से टकराया, चाची पीठ के बल फर्श पर गिरी और हाथ में पकड़ा हुआ पतीला जा गिरा 5 फुट दूर

स्टोव की आग

सत्तर के दशक में ही हमारे घर प्रेशर स्टोव आ गया जो मिट्टी तेल से चलता था. निचले हिस्से में मिट्टी तेल भरा जाता और पंप कर उसे एक प्रेशर स्टोव की आगखास तरह के बर्नर से बारीक से फव्वारे जैसे निकाला जाता. चूँकि बर्नर को पहले ही उसी मिट्टी तेल से या एक खास ब्रशनुमा पकड़ से गरम कर दिया जाता था इसलिए वह फव्वारा सा मिट्टी तेल वाष्पीकृत हो कर सीधे आग फेंकता.

कई बार जब बर्नर ठीक से गरम ना हुआ होता तो बहता तरल मिट्टी तेल स्टोव के आसपास आग लगा जाता. जलता स्टोव बंद करना हो निचली टंकी का छोटा सा ढक्कन धीरे से खोल दो.

इसकी आँच काफी तेज़ होती और शोरगुल भी बहुत होता. अचानक ही कभी मिट्टी तेल निकलने वाले छेद में किसी तरह के कचरे का विध्न आ आने पर लौ धीमी हो जाती या बुझ जाती तो बाल सरीखी बारीक पिन से उस छेद में हलचल की जाती तो लपट फिर वापस.

फिर जब मैं रायपुर पढ़ने गया कॉलेज में, तो कमरे में ही चाय वगैरह बनाने के लिए जो स्टोव लिया वह कहलाता था Wick Stove.बत्ती वाले स्टोव की आग

निचली मिट्टी तेल की टंकी से ऊपर की ओर जुड़े बेलनाकार जाली  के चारो ओर आधे आधे इंच की कपडे की पट्टियां तेल में डूबी रहतीं. एक ख़ास तरीके से उन्हें ऊपर खिसका कर उन सिरों में माचिस से आग लगाते और चाय बनाते.

आग बुझानी हो तो धीरे से उन पट्टियों को नीचे की ओर खिसका दो. जब वह जालियों के बीच खिसकती दबती तो ऑक्सीजन ना मिलाने पर आग भी बुझ जाती.

इसमें एक ही बात मुझे अखरती कि बरतन का बाहरी हिस्सा बहुत काला हो जाता जिन्हें मांजना बड़ा ही मुश्किल होता. हाँ, यहाँ ज़रूर था कि जलाते समय इसकी आवाज़ बिलकुल नहीं होती थी.

गैस की आग

अस्सी का दशक शुरू होते होते हमारे शहर में एलपीजी की एजेंसी खुल गई. घर में लाल रंग का बड़ा सा गैस सिलिंडर आया जो रबर की पाइप गैस की आगद्वारा बर्नर से जुड़ा था. लाइटर क्लिक करते ही शांत नीली-पीली लपटें झट से खाना बनाने लगीं. न कोई धुयाँ न कोई शोर. न बरतन काले होते न समय ज्यादा लगता. बस इतना सावधान रहने की ज़रूरत थी कि सिलिंडर की गैस, बिना जले बाहर ना निकलती रह जाए.

तब कई लोगों को यह नया उपाय नहीं भाया. अजीब सी शिकायत होती कि इस गैस वाले चूल्हे से बनी रोटी खाने से पेट में गैस बनने लगती है. लेकिन आज यह आग का चूल्हा सबकी चाहत बन चुकी.

उस समय पिता जी जो बर्नर लाये थे उसमें ग्रिल की भी सुविधा थी और भुट्टे भूने जाने के लिए लंबा सा बर्नर भी था. बर्तन सारे वही लोहे, पीतल, एल्यूमिनियम के इस्तेमाल होते.

माइक्रोवेव में नहीं दिखी आग

जब मैं भिलाई आया तो पहले से ही गैस चूल्हा ले चुका था. नब्बे का दशक शुरू हुया तो माइक्रोवेव ओवन के बारे में खबरें आईं. तकनीक पसंद स्वभाव है ही. बाज़ार में पहली बार माइक्रोवेव ओवन आई तो झट से अपन ले आए सैमसंग का 30 लीटर वाला कन्वेक्शन माइक्रोवेव ओवन.

बिजली से चलता यह डब्बेनुमा उपकरण, खाना बनाने के काम आने वाले आग उगलते अब तक के सारे साधनों से अलग था. पारंपरिक धातु आग का विकल्प माइक्रोवेव के बर्तनों को तो बिलकुल इस्तेमाल नहीं करना है. यहाँ तक कि एक आलपिन भी अंदर रह गई तो आग की लपटें भड़क जायेंगी. एक खास तरह के प्लास्टिक या विशिष्ट काँच से बने बर्तनों में ही खाना पकता है.

बंद पारदर्शी ढक्कन से गोल गोल घूमते बरतन में उबलती दाल को देख रोमांच होता कि कैसे बिना किसी आग की आँच के यह सब हो रहा.

आम भारतीय घरों में बनने वाले लगभग हर तरह के खाद्य पदार्थ इसमें बन जाते हैं. आलू पोहा, बैंगन का भरता, इडली, ढोकला जैसी चीजें भी बढ़िया बनती हैं. मनाही एक ही चीज की है कि अंडा न ‘उबालें’ और तवे का उपयोग करने वाली चीजें, जैसे कि रोटी इसमें बनती नहीं.

पारम्परिक तरीके से बनाए जाने भोजन से उलट इसका तरीका समय बचाने वाला भी लगा और सुविधाजनक भी. चाहो तो खाने की टेबल पर ही रख लो चाहे रसोई में ही इस्तेमाल करें. डिजिटल पैनल पर पकने का समय वगैरह प्रोग्राम कर आप भले ही पिक्चर देखने चल दें वापस आते वह गर्मागर्म मिलेगा.

माँ जब भी आती, साफ निर्देश दे देती कि माइक्रोवेव में पका खाना मत देना. कारण पूछने पर बताया उन्होंने कि सब्जियां ढंग से पकती नहीं और तेल तो डालते ही नहीं हो तुम लोग. बात सही भी लगी माइक्रोवेव में पकी हरी भिन्डी का रंग हरा ही रहता और सफेद गोभी का सफेद ही. हम भारतीयों को तो जब तक बढ़िया भुनी तली हुई लाल-भूरी सब्जी ना दिखे तब तक वह उबली हुई ही लगती है. तब फिर मैं सब्जियों को लाल भूरा दिखाने के लिए ब्राउनिंग एजेंट ले आया.

चूँकि इसकी तकनीक रेडियो तरंगों द्वारा पानी के अणुओं को गर्म कर खाना पकाने की है इसलिए इसमें आलू उबालने, सब्जी पकाने वगैरह के लिए अलग से पानी की ज़रूरत नहीं होती. उनके अंदर की नमी ही खुद उसे पका देती है.

इंडक्शन चूल्हे की आग

अब यह आया है इंडक्शन चूल्हा! इससे ना तो धुआं निकलता है और न ही आग निकलती है. हल्का और छोटा इतना कि एक हाथ से पकड़ कर कहीं भी रख दो. बिजली का प्लग लगाओ, चूल्हा तैयार है खाना पकाने को.

हैरानी यह कि खाने का बर्तन गरम होगा लेकिन यह दो किलो मिठाई के डब्बे जैसा प्लास्टिक का बना दिखने वाला चूल्हा गरम नहीं होगा. चुंबकीय ऊष्मा की तकनीक से चलने वाले इस चूल्हे पर गलती से कोई खाली बर्तन रख दिया जाए या फिर कोई भी बर्तन न रखा हो, तो इसका ‘आटो शट आफ’ इसे बंद कर देगा. इसकी स्मार्ट टाइमर की सुविधा मुझे बहुत भाती है.

आँच है पर आग नहीं

लेकिन इस पर केवल लोहे, स्टील के बर्तन ही इस्तेमाल में लाए जा सकते हैं एल्यूमिनियम के नहीं. वो भी ऐसे बर्तन जिसका आधार चपटा हो, उथला नहीं.

पारंपरिक भारतीय भोजन पकाए जाने के लिए यह सीधे सीधे आग का सटीक विकल्प है. गैस सिलिंडर की मारामारी के बीच 1500 – 3500 रूपयों के बीच मिल जाने वाले इस इंडक्शन चूल्हे की आजकल धूम मची पड़ी है.

कभी कभी बैठ कर सोचता हूँ कि कैसे दुनिया धीरे धीरे चुपके से चूल्हे की आग से इंडक्शन चूल्हे तक आ गई है. अब आगे क्या होगा?

चूल्हे की आग से इंडक्शन हीट तक
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27 Thoughts to “चूल्हे की आग से इंडक्शन हीट तक”

  1. ‘चूल्हे की आग से इंडक्शन हीट तक
    ‘बहुत ही सुन्दर आलेख
    पढ़कर बचपन की यादों में खो गया …..
    बदलते उपकरण भी हमें अतीत में ले जाते हैं


    आजकल तो इंडक्शन चूल्हा ही सबसे बड़ा सहारा है
    इसके रहते चिंता नहीं रहती …..मेरी सुबह ही इसके साथ होती है 🙂
    टिप्पणीकर्ता prakash govind ने हाल ही में लिखा है: आई सी यू में अलौकिक शक्ति का रहस्य 🙂My Profile

    1. बी एस पाबला

      Heart
      शुक्रिया प्रकाश जी

  2. ajay arya

    खाना पकाने के उपकरणों का पूरा सफरनामा लेख में दिखा । सारी पिछली यादें आखरी वक़्त की माफिक ताज़ा हो गयी । आपका धन्यवाद पाबलाजी

    1. प्रस्तुति भी बेजोड़ ! मन कर रहा है चुरा लूँ 🙂

      1. बी एस पाबला

        बता कर चुराया तो क्या चुराया
        Heart

        शुक्रिया अरविन्द जी

    2. बी एस पाबला

      Smile
      शुक्रिया अजय जी

  3. वाणी गीत

    पूरा सफ़र खाना पकाने का साकार हुआ.
    कहाँ से कहाँ पहुंचे!!

    1. बी एस पाबला

      Approve
      सफर तकनीक के विकास का

  4. सुन्दर संकलन. यादें ताज़ी हो गईं

    1. बी एस पाबला

      Heart
      शुक्रिया सर जी

  5. dilbag

    आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 15-01-2015 को चर्चा मंच पर दोगलापन सबसे बुरा है ( चर्चा – 1859 ) में दिया गया है ।
    धन्यवाद

    1. बी एस पाबला

      THANK-YOU
      शुक्रिया दिलबाग जी

  6. बहुत दिलचस्प अंदाज में आपने चूल्हों के साथ हमारे सफर को रेखांकित किया है। यह एक अनमोल आळेख है।
    टिप्पणीकर्ता दिनेशराय द्विवेदी ने हाल ही में लिखा है: प्रतिवादी को उस के नियोजक के माध्यम से समन की तामील कराई जा सकती है।My Profile

    1. बी एस पाबला

      Smile
      शुक्रिया दिनेशराय जी

  7. लिखमाराम ज्याणी

    आपने चूल्हे की यात्रा का वर्णन इतना सजीव किया है कि ५०-६० वर्ष पहले का घर का आंगन साकार हो गया। बहुत बधाई और धन्यवाद सरदार पाबला जी।

    1. बी एस पाबला

      Pleasure
      शुक्रिया लिखमाराम जी

  8. वाह! बहुत सुन्दर क्रमबद्ध काम की जानकारी पढ़ने को मिली ..आभार आपका!
    मकर सक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं!

    1. बी एस पाबला

      Heart
      शुक्रिया कविता जी
      मकर संक्रांति की आपको भी शुभकामनाएं

  9. माइक्रोवेव ओवन के electromagnetic effects के बारे में एक बार नेट पर देख लीजियेगा । इसके कार्सीनोज़ेनिक इफ़ेक्ट के कारण 1976 में रूस ने प्रतिबन्धित कर दिया था ।

    1. बी एस पाबला

      Smile
      अति होने पर हर चीज के अपने अपने नफे नुकसान हैं कौशलेन्द्र जी

  10. काश आने वाले वक्त में कोई ऐसी तकनीक निकल जाये जो सूरज की रौशनी से गैस में परिवर्तित हो जाये जिससे खाना बनाया जा सके . हालाकि सोलर कूकर तो है लेकिन इसमें रोटिया नहीं बन पाती है और खाना भी देरी से बनता है .
    मेरा कहने का मतलब यह था की ऐसी तकनीक जो सूर्य उर्जा को किसी गैस में तब्दील करे … काश ऐसा हो सकता …

    1. बी एस पाबला

      Sad
      काश

  11. Shiv Kumar Dewangan

    सचमुच तकनीक का विकास इतनी तेजी से हो रहा है की खाना पकाने से लेकर अंतरिक्ष की सैर तक क्या-क्या नए नए आविष्कार होने वाले हैं इसकी हम सिर्फ कल्पना कर सकते हैं, भले ही इन कल्पनाओ के सहारे आविष्कारों का कार्य वैज्ञानिक करते हों. हमें तो सिर्फ तैयार रहना है की तेज़ी से होती तकनिकी क्रांति का मज़ा लेने और लाभ उठाने का. भले ही हम इन तकनीकों के कारण दिनों-दिन आलसी होते जाएँ. पर पुराने समय की धुवेंदार याद को सहेज कर लाने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया. धन्यवाद

    1. बी एस पाबला

      Heart
      आभार, शिव कुमार जी

  12. आपका ब्लॉग मुझे बहुत अच्छा लगा, और यहाँ आकर मुझे एक अच्छे ब्लॉग को फॉलो करने का अवसर मिला. मैं भी ब्लॉग लिखता हूँ, और हमेशा अच्छा लिखने की कोशिस करता हूँ. कृपया मेरे ब्लॉग पर भी आये और मेरा मार्गदर्शन करें.

  13. asn

    bhut accha likhte ho g if u wana start a dear chulhe to aaj bhi hain gaon meim best blog site than visit us
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  14. बहुत ही शानदार आलेख. आपकी भाषा शैली बहुत मनमोहक है. सरल भाषा में आपने चूल्हे का इतिहास कितनी खूबसूरती से बयान कर दिया.
    अनिल साहू

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