सोने चांदी नहीं, एल्यूमिनियम के बर्तन में खाना दो मुझे

पिछले दिनों मित्र काजल कुमार का बनाया एक कार्टून दिखा जिसमें मध्यपूर्व की वेशभूषा वाला व्यक्ति भीख मांगता दिख रहा. सीधा सा कटाक्ष, कच्चे तेल की कम होती जा रही कीमतों से पनपने वाली स्थिति की कल्पना पर था.

तेल आधारित अर्थव्यवस्था में निश्चित ही मध्यपूर्व के देशों की अहमियत बनाए रखी है. भले इस अर्थव्यवस्था के तत्काल खत्म होने के आसार नहीं हैं लेकिन कभी ऐसा हुआ तो निश्चित ही वह नौबत आ जायेगी जैसी कार्टून में दिखाई गई.

अर्श से फर्श पर आने के इस चित्रण को देखते हुए ज़हन में वो किस्सा याद आ गया जिसे मैंने शायद  70 के दशक में किसी पत्रिका में पढ़ा था.

बात अठारहवीं सदी की है जब महान योद्धा माने जाने वाले नेपोलियन बोनापार्ट ने एक जीत की खुशी में अपनी प्रजा को सामूहिक भोज पर आमंत्रित किया. हर खास व आम को खबर दी. शामियाने सजे, देगें चढ़ीं, संगीत बजा, धूम मची.

नेपोलियन स्वयं समारोह की व्यक्तिगत मॉनिटरिंग रहा था.  कहीं कोई कमी ना रह जाए, कहीं कोई उलाहना ना दे दे. आखिर आसपास के देश वाले भी तो निगाह रख रहे थे इस ओर.

भोजन के समय पर नेपोलियन ने अपनी प्रजा को प्राथमिकता दी. खास मेहमानों को बता दिया गया कि जब तक प्रजा भोजन नहीं कर लेगी तब तक दीवान-ए-ख़ास में रौनक नहीं होगी.

आखिर नेपोलियन की पार्टी थी भई. एक महान योद्धा की पार्टी. सारी जनता को सोने चाँदी के बर्तनों में भोजन परोसा गया. हर व्यक्ति को लौटते हुए उपहार भी दिए गए. प्रजा निहाल थी ऐसा राजा पा कर.

दुआएं देती जनता खुशी खुशी लौट गई अपने अपने घर. रात भर लोग आपस में नेपोलियन राजा की तारीफ़ करते रहे.

लेकिन दूसरे दिन वह हुआ जिसकी कल्पना नेपोलियन ने ना की होगी. सुबह होते होते सारे लोग महल के सामने इकठ्ठा होने लगे. धीरे धीरे भीड़ का गुस्सा बढ़ने लगा.  कानाफूसी करती जनता ने नेपोलियन के खिलाफ अपने गुस्से का इज़हार करते हुए नारे लगाने शुरू कर दिए.

नेपोलियन तक खबर पहुंची. वह भी हैरान हुआ कि आखिर माज़रा क्या है? कल सब कुछ तो ठीक ठाक निपट गया था, अब क्या हुआ? झटपट वह तैयार जनता के आगे पहुँच गया मामले को समझने के लिए.

चार लोगों को आगे आ कर अपनी बात कहने के लिए कहा गया. मुट्ठियाँ भींचे लोग सामने आये और गुस्से से नेपोलियन को कहा कि आपने हमारी बेइज्जती की है कल के भोजन में. नेपोलियन हक्का बक्का रह गया. हकला कर इतना ही पूछ सका कि हुआ क्या है? मैंने तो कोई  कसर नहीं छोड़ी आवभगत में!

सारी भीड़ ने चिल्लाते हुए कहा कि आपने सोने चांदी के बर्तनों में खाना परोस कर हमारी बेइज्जती की  अगर हमें सोने चांदी के बर्तनों में खाना खिलाया तो अपने खास मेहमानों को भी सोने चांदी के बर्तनों में भोजन करवाना था, उन्हें एल्यूमिनियम के बर्तनों में क्यों परोसे गए पकवान! हमें भी एल्यूमिनियम के बर्तनों में खाना चाहिए था. ये सस्ते से सोने चांदी के बर्तनों से हमारी तौहीन हुई है.

चौंक गए ना! दरअसल उस समय एल्यूमिनियम की ताज़ा ताज़ा खोज हुई थी और इसे दुर्लभ धातु माना जाता था. तब एल्यूमिनियम की कीमत सोने से भी ज़्यादा थी.

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कहा यह भी जाता है एल्यूमिनियम की खोज तो 2000 साल पहले ही प्राचीन रोमन साम्राज्य में हो चुकी थी. एक सुनार ने इसे बॉक्साईट की चट्टानों की मिट्टी से पाई धातु की एक चमकदार प्लेट बनाई और यह बात चारों ओर आग की तरह फ़ैल गई. राजा तक खबर पहुंची तो वह डर गया कि अगर यह नई धातु लोगों को पसंद आ गई तो उसके राज्य में सोने चांदी के अकूत भण्डार की कोई कीमत ना रहेगी. उसने उस सुनार के कत्ल का हुक्म दे दिया, जिससे वह नई धातु, एल्यूमिनियम प्रचलन में नहीं आ पाई.

जिस समय नेपोलियन ने पार्टी दी थी उस समय के बाद भी 1853 में अमेरिका की खदानों से महज 93 किलो एल्यूमिनियम का उत्पादन हो पाया, जबकि सोने की खदानों ने 93,000 किलो सोने का उत्पादन हुआ.

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एल्यूमिनियम इतना कीमती माना जाता था कि राजा महाराजा इसके बने मुकुट पहन इतराते थे. महारानियाँ इसके गहने पहन मुदित होती थी, ऊँचे लोग इसके बने बटन अपने कोट में लगवा संतुष्ट हो जाते थे.

लेकिन 1886-88 आते आते सारा परिदृश्य ही बदल गया. खदानों से बॉक्साईट खनन और उत्पादन के नये तरीके अपनाए जाने बाद इसकी कीमतें नाक के बल गिरीं. जहाँ 1852 में जिस एक किलो एल्यूमिनियम की कीमत 1200 डॉलर होती थी, उसी एक किलो एल्यूमिनियम की कीमत बीसवीं सदी शुरू होते होते आधे डॉलर से भी कम हो गई.

आज हालत क्या है बता सकते हैं?

सोने चांदी नहीं, एल्यूमिनियम के बर्तन में खाना दो मुझे
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9 Thoughts to “सोने चांदी नहीं, एल्यूमिनियम के बर्तन में खाना दो मुझे”

  1. कहा कहा से और क्या क्या ढुंढ लाते है पाबला साहब!
    टिप्पणीकर्ता shekhar patil ने हाल ही में लिखा है: पत्रकार दिन आणि कोरडे पाषाण !My Profile

  2. हंसराज सुज्ञ

    आज २०० ₹ किलो 🙂

  3. और आज इस एल्युमिनियम से लोग दुखी है !
    टिप्पणीकर्ता Ratan Singh ने हाल ही में लिखा है: एक छोटा सा विचार अभिनव राजस्थान बनाने की औरMy Profile

  4. आदरणीय पाबलाजी , बहुत ही रोचक जानकारी प्रकाशित की है। शैली भी प्रभावशाली है। धन्यवाद।
    टिप्पणीकर्ता Sampat Kumari ने हाल ही में लिखा है: Depression and anxiety-Symptoms, how to deal, how dangerous they areMy Profile

  5. क्या शानदार लेख है , यह जानकार अचम्भा हुआ की कभी एल्मुनियम सोने-चाँदी से ज्यादा महँगा था… अच्छी जानकारी और अच्छी कहानी … लेकिन एक बात तो है उस समय अगर एल्मुनियम सोने-चाँदी से ज्यादा महँगा था तो सच में नेपोलियन बोनापार्ट ने अपनी जनता को उस बर्तन में खाना न खिला कर उनकी बेइज्जती की थी. … Thinking
    टिप्पणीकर्ता नवज्योत कुमार ने हाल ही में लिखा है: Google ChromeCast लीजिये अपने इन्टरनेट विडियो का मजा अपने Smart-Hd-Tv पर ..My Profile

  6. Rajesh kumar

    पाबला जी नमस्कार, कायल हो गये हम आपके तकनीक प्रेम समझ के

  7. रायपुर से प्रकाशित होने वाले क्रॉनिकल अख़बार में दो माह पहले एल्यूमिनियम पर मेरा एक लेख प्रकाशित हुआ था । यह टॉप 200 हैवी टॉक्ज़िक मैटल्स में से एक है । यदि हमारे ब्रेन में इसका मात्र 1 माइक्रोग्राम पहुँच जाय ( जिसे ब्रेन में एकत्र होने में लगभग 20 साल लगते हैं) तो अल्ज़ाइमर्स रोग होना तय है । यह ब्रेन टिश्यूज़ को डैमेज़ करने के लिये कुख्यात है ।

  8. बी एस पाबला

    Smile
    निश्चित तौर पर आपके द्वारा दी गई जानकारी सही है
    लेकिन anodized एल्यूमिनियम और non-anodized एल्यूमिनियम बर्तनों में फर्क है

  9. Shiv Kumar Dewangan

    बहुत अच्छी जानकारी आपने दी है. बड़ा आश्चर्य हुआ यह जानकर की किसी समय अल्युमिनियम धातु सोने चांदी से भी अधिक महंगा था; जिसने नेपोलियन जैसे राजा की भी किरकिरी करवा दी थी. इतनी अच्छी रोचक जानकारी के लिए धन्यवाद.

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