एक किस्सा जिस पर कोई विश्वास ना करे!

ज़िंदगी के मेले

कई बार ऐसी सच्ची बातें सामने आती हैं जिस पर कोई एकाएक विश्वास ना करे. अस्सी के दशक में जब मैंने पत्रकारिता का कोर्स करना चाहा तो पहला ही सबक था ‘समाचार वह नहीं होता कि कुत्ते ने आदमी को काट लिया, बल्कि समाचार वह होता है जिसमें बताया गया हो –आदमी ने कुत्ते को काटा!’

बाद के वर्षों में मैंने कई ऎसी खबरें पढ़ीं अखबारों में जो वाकई में इस सबक पर मुहर लगाती थीं. कई तो ऐसी थीं जिन पर किसी भी हालत में विश्वास नहीं किया जा सकता..इनमें एक खबर आज तक ज़हन में हैं.

पिछले दिनों ऎसी ही एक खबर सामने आई तो याद आया वो वाक्या जो बीस पच्चीस वर्ष पुराना है.

संपादकीय पृष्ठ के बाद वाला पन्ना ही था वो. अब याद तो नहीं लेकिन संभवत: नवभारत या देशबन्धु होगा अखबार. उस पन्ने पर जाते ही दो कॉलम में तस्वीर सहित छपी एक खबर के शीर्षक पर नज़रे टिक गईं. शीर्षक देखते ही एक बार में ही सारी खबर पढ़ गया. रोंगटे खड़े हो गए, हाथों से अखबार छूटते छूटते बचा.

खबर थी ही ऎसी.

अपने नन्हें शिशु को उसकी माँ, अपने घर के फर्श पर खिलौने से खेलता छोड़ कर रोज़मर्रा के कामों में व्यस्त हो गई. घर भी कैसा! गोबर लिपा आँगन, मिट्टी की दीवारें, खुला आसमान.

काम के बीच आ आ कर वह अपने नन्हें मुन्ने को खेलते देख मुस्कराते हुए नज़र मार लेती थी. इस बार जब आई तो उसकी चीखें ही निकल गई, जोरों से चिल्लाते बेहोश हो कर, जहां खड़ी थी वहीं गिर गई.

चिल्लाहट सुन कर आस-पास के लोग दौड़े आए. जिसने भी देखा वहीं खड़ा रहा गया. किसी की हिम्मत ना हुई कि बच्चे के पास भी जा सके. लोग हैरान परेशान उस खिलखिलाते बच्चे को देखते रह गए. वह तो अपनी रौ में मगन हो खेल रहा था लेकिन देखने वालों के छक्के छूट चुके.

खबर में आगे बताया गया कि खिलौनों से खेलते उस बच्चे के पास कहीं से एक साँप आया होगा. हिलता डुलता वह सरीसृप उस अबोध शिशु को कोई खिलौना ही लगा. पलक झपकते ही वह खतरनाक जीव, बच्चे की मुट्ठी में था. उस बच्चे की मुट्ठी में, जिसके दांत निकल रहे थे. और ऎसी परिस्थिति में होने वाली स्वाभाविक कुलबुलाहट से वशीभूत हो उस नन्हें ने उसे दांतों से चबा लिया.

अप्रत्याशित ‘हमले’ से घबरा कर वह जीव जितना उल्टा पुलटा लहराया छटपटाया, बच्चे को उतना ही आनंद आया एक खिलौने से खेलने सरीखा.

जब तक उस अबोध की माँ ने देखा तब तक तो वह शिशु दांतों की सनसनाहट में मज़े लेता टुकड़े टुकड़े कर चुका था अपने ‘खिलौने’ के. चारों ओर खून बिखरा हुआ था और बच्चा दिखा किसी दूसरे खिलौने से उलझा हुआ.

अखबार की उस खबर में मौके पर ली गई एक अस्पष्ट तस्वीर भी थी.

अब आप उस खबर की कतरन देख सकते हैं जो मैंने पिछले दिनों देखी पढ़ीं. जिसको देख याद आया वह पुराना किस्सा  क्लिक कीजिए यहाँ»

हो सकता है किसी और ने भी देखी हो वह खबर. कोशिश की जाए तो आर्काइव से निकाला जा सकता है इस रोंगटे खड़ी कर खबर वाला अखबार.

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एक किस्सा जिस पर कोई विश्वास ना करे!
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15 thoughts on “एक किस्सा जिस पर कोई विश्वास ना करे!

  1. ऐसी कई कहानी है सच्ची…हाल ही में एक बच्चे के पास रहते नाग की खबर सुर्खियों में थी

      1. बड़े भैय्या पाब्ला जी,
        आप खबर लिखें और खबर सच्ची न हो ऐसा हो ही नहीं सकता. बहरहाल खबर के लिए शुक्रिया.

  2. बच्चो के प्रति माता को सतर्क रहना पड़ता है। ओर जरा सी भी असावधानी ,किसी दुर्घटना में परिवर्तित हो सकती है।
    फ्लोरिडा (अमेरिका)- का किस्सा है। अध्यापिका को अपने स्कूल पहुचना था,ओर देर हो रही थी। समस्या यह भी थी की उसे अपनी छोटी बच्ची को प्ले ग्रुप स्कूल छोड़ना था। बच्ची को साथ लिए पहले वोह अपने स्कूल पहुची,बच्ची को कार में छोड़ दिया। जैसे ही वोह क्लास रूम पहुची ,प्रधान अध्यापिका उसका इंतजार कर रही थी,उसने अध्यापिका को किसी कार्य में व्यस्त कर दिया। इस बीच वोह भूल गई बच्ची को कार में छोड़ा है। जब उसे इस बात का ख्याल आया – वोह कार की तरफ बोखलाते दौड़ी ,परन्तु तब तक बच्ची घुटन से मर चुकी थी। अमेरिका एक ऐसी जगह जहाँ जीवन अनेका-नेक सुविधाओ के होते हुवे भी बच्चो की देख भाल के प्रति सूरक्षित नहीं है। मुझे अपनी नानी,दादी की याद आई , ओर फिर अपने भाग्य की सहारना करते न बनी।

    1. Daze
      बदन में झुरझुरी होने लगती है ऎसी घटनाओं से

    1. Smile
      जब भी याद आती है ये खबर,
      हैरानी होती है

  3. “समाचार वह नहीं होता कि कुत्ते ने आदमी को काट लिया, बल्कि समाचार वह होता है जिसमें बताया गया हो -आदमी ने कुत्ते को काटा!” एकदम सही है पाबला साहब !
    टिप्पणीकर्ता Tushar Bhambare ने हाल ही में लिखा है: धिक्कार असो अशा षंढ नेत्यांचा…!My Profile

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