कोहरा होता हमारी मौत का ज़िम्मेदार

पिताजी के साथ, भिलाई से पंजाब की ओर अपनी मारुति ईको से जाते हुए हमारा पहला पड़ाव था मध्यप्रदेश का सागर शहर. सागर के सिविल लाइन्स-इंदिरा नगर चौराहे पर एक होटल में रजाई ओढ़ जो सोया मैं तो आँख खुली सुबह 5 बजे. वो भी मोबाईल के शोर मचाते अलार्म के कारण.

दरवाज़ा खोलते ही निगाह गई कोहरे से ढकी सड़क पर. रिसेप्शन पर पूछा तो पता चला कि रेस्टारेंट खुलेगा 7 बजे. चाय का कोई जुगाड़ नहीं. हालांकि चाय की तलब तड़प रहती नहीं, लेकिन मौसम का तकाज़ा था कि चाय की चुस्कियां ली जाएं.

सामने ही चौराहे पर एक गुमटी का रूख किया गया. दो दो घूँट समाने वाले ‘गिलास’ देख मैंने तो वहीँ चार गिलास चाय, बिस्कुट समेत गटक लिए. पिताजी के लिए पॉलीथिन में डाल दी उसने चाय.

गरम चाय को पॉलिथीन में देख मेरा मन ना किया कि उसे ले जाऊं. अपनी दुविधा मैंने चाय वाले को बताई से उसने एक कांच का बड़ा सा गिलास निकाला, चाय डाली और तकादा किया कि लौटा देना आ कर!

कोहरा

जैसे तैसे धीरे धीरे नहाते, तैयार होते, नाश्ता करते सुबह के 9 बज गए. कोहरा छंटने का नाम भी नहीं ले रहा था. जितनी देर होती हमें रवाना होने में, उतनी ही देर होती हमें दिल्ली पहुँचने में. करीब 650 किलोमीटर का सफर था, उस पर भी 200 थे यमुना एक्सप्रेस वे के. मेरी उम्मीद थी कि एक घंटे में 50 किलोमीटर भी नाप लें तो रात 10 बजे तक शाहदरा, अपनी बुआ के घर रहूँगा.

इस यात्रा के दौरान और इसके पहले से ही मुरैना निवासी भुवनेश शर्मा लगातार अपडेट ले रहे थे. उनकी कॉल के ज़वाब में जब मैंने बताया कि अभी सागर से निकल ही रहे हैं. तो उन्होंने बड़ी निश्चिंतता से कहा ‘ शाम हो जायेगी आपको मुरैना पहुंचते पहुंचते’ मैंने प्रतिकार किया कि बस, 350 किलोमीटर ही तो है, दोपहर ढाई तीन बजे तक आपके सामने होंगें. वे मुस्कुराये ही होंगे मेरा ज़वाब सुन कर.

कोहरा आने वाला है

और बात उनकी सही निकली. 6 जनवरी की सुबह सवा नौ बजे 2000 ₹ का पेट्रोल डलवा, सागर से चल कर सवा ग्यारह बजे हम थे टोल शुल्क 80 ₹ दे कर, मालथोने में और दोपहर बारह बजे ललितपुर बाईपास. फिर पौने बारह बजे विघाखेत टोल पर 55 ₹ देने पड़े. झांसी तक अच्छी रफ़्तार में दौड़ती मारुति ईको, भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स के सामने थी तो सवा एक बज चुका था.

अब मैं मुस्कुराया. मुरैना तो अब 125 किलोमीटर ही रह गया था जिसे हम दो घंटे में नाप सकते थे. लेकिन झांसी पहुंचते ही हमारी कन्या नेविगेटर जिस सड़क पर ले गई वह बाईपास ना हो कर शहर के बीच से हो कर गुजरने वाली सड़क थी. हर बड़े शहर की तरह बेतरतीब यातायात ने ऐसा उलझाया कि कैमरे का मेमोरी कार्ड खरीदना तो दूर उसकी याद भी ना आई.

कोहरा कथा

झांसी शहर से निकल कर जब हम सिमरधा के पास, कानपुर बाईपास तिराहे पर थे तो घड़ी में समय हो चुका था सवा दो का. महज 18 किलोमीटर एक घंटे में. लेकिन उसके बाद जब हम मुरैना की ओर बढे तो सारी योजना धरी रह गई. हाईवे पर चल रहे निर्माण कार्यो के कारण वास्तविकता से पाला पड़ा तो 25 किलोमीटर चल कर दतिया शहर के बाईपास पर गवर्नमेंट पीजी कॉलेज दिखा साढ़े तीन बजे.

शायद छह बजे होंगे शाम के जब महरा टोल के 60 ₹ देते हुए 50 किलोमीटर के फासले में गाड़ी ‘रेंगते’ हुए ग्वालियर बाईपास से होते बामौर के आसपास डेल्ही पब्लिक स्कूल के करीब पहुंची तब तक तो शाम के साढ़े छह बज गए थे. तीन घंटे में 50 किलोमीटर! भुवनेश जी हर दस पंद्रह मिनट बाद कॉल करते पूछते ‘कहाँ पहुंचे?’ अंधेरा तो कब का छा चुका था. मैं नेविगेटर में झाँक कर अंदाज़न बता देता जगह का नाम.

कोहरा

मुरैना तो बस अब 23 किलोमीटर ही बच गया था. ग्वालियर मुरैना एन एच 3 पर शाम 7 बजे, चौंधा टोल प्लाज़ा पर 25 ₹ पटाते हुए, अँधेरे और ट्रैफिक के कारण हमें लग गया आधा घंटा. भुवनेश जी, अपने मित्र बिनय कुमार पाण्डेय के साथ, अंबेडकर स्टेडियम से सटे, शहर के हृदयस्थल वाले व्यस्त चौराहे पर प्रतीक्षारत मिले. वैसे, उनसे एक छोटी सी मुलाक़ात तो पहले भी हो चुकी थी.

कुछ पारिवारिक, कुछ ब्लॉग जगत की, कुछ इधर उधर की बातें परवान चढ़ती, उससे पहले ही समय का अभाव बताते एकाएक मैंने अनुमति माँग ली. कैमरे में मेमोरी कार्ड था नहीं और मोबाईल से हम सबकी फोटो लेना टेढ़ी खीर ही था.

उन्होंने बहुत आग्रह किया वहीं रात्रि विश्राम का. लेकिन कुछ तो पिताजी की आदतों का ख्याल और कुछ मुझे जल्दी थी दिल्ली पहुँच जाने की. आखिरकार वे इस बात पर राज़ी हुए कि लौटते हुए इनके साथ अछा खासा समय बितायेंगे और फिर स्नेहपूर्वक, क्षेत्र की मशहूर गज़क पिताजी को भेंट कर विदा ली. हमारी रवानगी के समय घड़ी पर समय था 07:20

अगला बड़ा शहर था 80 किलोमीटर दूर आगरा. 9 बज ही जाएंगे शायद. लेकिन अभी मुरैना से बाहर निकले ही थे कि घने कोहरे भरी सड़क शुरू हो गई. चंबल नदी के पहले तो कोहरा और घना हो गया. महज़ 27 किलोमीटर दूर धौलपुर पहुँचना हुआ साढ़े आठ बजे. कोहरा गहराते जा रहा था.

sagar-jhansi

कोहरा

मैंने, विशेष रूप से लगवाईं सारी लाइट्स जला लीं. लेकिन कोहरा इतना घना था कि 10 फुट दूर की भी कोई चीज, आँखें फाड़ फाड़ कर देखने के बावजूद बड़ी मुश्किल से दिख रही थी. दूसरे गियर में अपनी मारुती ईको को खिसकाते हुए, सड़क का अंदाज़ा केवल उन सफ़ेद डिवाईडर पट्टियों से लग रहा था जो सड़क के बीचों बीच खींची गई थीं.

उत्तरप्रदेश के तेहरा इलाके में मैंने आधे सेकंड के लिए ही उन सफ़ेद डिवाईडर पट्टियों पर निगाह डाल कर जब सामने की ओर नज़रें जमाने की कोशिश की तो आँखें ही फ़ैल गई, चीखते चीखते बचा. ठीक सामने ही बिना किसी लाइट्स के एक ट्रक का पिछला हिस्सा था. दहशत के मारे ब्रेक पर पूरी ताकत से पैर दबाया तो इंजन के दहाड़ने पर समझ आया कि ब्रेक के बदले एक्सीलेटर दबा बैठा हूँ.

वो तो गनीमत थी कि हिन्दुस्तानी आदत के कारण क्लच भी दबा चुका था तब तक. पलक झपकते दिमाग ने काम किया और झटके से कार को दाईं ओर घुमा दिया. यह भी नहीं सोचा कि पीछे से कोई गाड़ी आ रही होगी. लेकिन उस घने कोहरे में तो सभी एक दूसरे की गाड़ी के पीछे की बत्तियों के सहारे ही खिसक रहे थे. बाल बाल बचना किसे कहते हैं यह बाद में याद आया.

Fog

फिर तो गाड़ी की रफ़्तार और भी कम कर ली. धौलपुर आगरा रोड के बरेठा टोल पर रात सवा नौ बजे 25 ₹ दे कर आहिस्ता आहिस्ता बढ़ते आगरा का आभास दिया नेविगेटर ने तो मैंने उसे होटल की तलाश में लगा दिया. धुंधली विंडस्क्रीन, गीली सड़क, घने कोहरे के बीच मुझे ना तो कुछ दिखा, ना ही कुछ समझ आया लेकिन उस कन्या नेविगेटर ने जहाँ गाड़ी रुकवाई वह कोई भव्य सी इमारत थी. उतर कर देखा तो सचमुच बढ़िया सा एक होटल, ओम साई पैलेस था.

रात के दस बज गए थे. ‘नॉन-एसी कमरे नहीं हैं’ बता कर एसी कमरे का 1800 ₹ बताया बंदे ने, तो मैं पलटा बाहर की ओर निकलने के लिए. पीछे से आवाज़ आई ‘एसी बंद रहेगा 1400 ₹ दे दीजिएगा’. चार पांच घंटे ही रुकना है बताते हुए, सौदेबाजी के बाद मामला खत्म हुआ 800 ₹ पर. अगले ने इशारा किया बॉय को और वह हमें ले गया शानदार कमरे तक. सामान सारा गाड़ी में ही था. मस्त गरम पानी से तरोताज़ा होते तक भोजन भी आ गया था.


नींद जब तक आई तब तक आधी रात हो चुकी थी. दिल्ली में बुआ जी को बता चुका था कि अब घर पहुँच पाऊँगा अगले दिन, 7 जनवरी की दोपहर होते तक.

लेकिन मालूम है क्या हुआ!? फिर यमुना एक्सप्रेस वे पर फर्राटे भरे हमारी गाड़ी ने

© बी एस पाबला.

कोहरा होता हमारी मौत का ज़िम्मेदार
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21 Thoughts to “कोहरा होता हमारी मौत का ज़िम्मेदार”

  1. आपकी इस पोस्ट को ब्लॉग बुलेटिन की आज कि बुलेटिन वास्तविकता और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर …. आभार।।

    1. बी एस पाबला

      THANK-YOU
      शुक्रिया हर्षवर्धन जी

  2. आखिर यहाँ भी गुगल वाली बाई ने भटका दिया। कोहरे में गाड़ी चलाना बहुत ही कठिन काम है, भगवान का शुक्र है जो टकराए नहीं। खैर इतने लम्बे सफ़र में छोटी-मोटी घटनाएँ होती रहती है।
    टिप्पणीकर्ता चलत मुसाफ़िर ने हाल ही में लिखा है: यात्री सुविधाओं पर भी ध्यान दीजिए मंत्री जीMy Profile

    1. बी एस पाबला

      Heart
      सही है
      ….और यही तो रोमांच है सफर का

  3. सच घने कोहरे में गाड़ी चलना बहुत रिस्क का काम है। चलिए 1800 ₹ का रूम 800 में मिला, सुनकर अच्छा लगा। हमारे भारत में मोल भाव की बड़ी गुंजाईश है..
    बढ़िया प्रस्तुति

    1. बी एस पाबला

      Smile
      आभार आपका

  4. आपका यात्रा वृतान्त हमेशा की तरह रोचक है । कोहरे मे तो हम भी कई बार फँस चुके है ।

    1. बी एस पाबला

      Happy उत्तर भारत का कोहरा भयावह होता है

  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (01-07-2014) को “”चेहरे पर वक्त की खरोंच लिए” (चर्चा मंच 1661) पर भी होगी।

    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर…!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

    1. बी एस पाबला

      THANK-YOU
      आभार आपका

  6. nitesh

    यात्रा वृतांत पढ़ कर हर बार दिल करने लगता है की जिंदगी में एक बार तो लम्बी यात्रा करनी चाहिए…
    हर बार के तरह इस बार भी एक ही लय में पढ़ गया सब..

  7. nitesh

    यात्रा वृतांत पढ़ कर हर बार दिल करने लगता है की जिंदगी में एक बार तो लम्बी यात्रा करनी चाहिए…
    हर बार के तरह इस बार भी एक ही लय में पढ़ गया सब..
    वाह

    1. बी एस पाबला

      Approve
      लंबी यात्राएं जीवन के बहुत से पाठ पढ़ा जाती हैं

  8. Harivansh Sharma

    रात के सफ़र में सामने से आती रौशनी में आँखे चुधिया जाती है।
    ओर कोहरे में हम आँखे फाड़ फाड़ कर आगे देखते है,फिर भी धुंद में
    धुन्दला ही दिखाई पदता है। नजर हटी दुर्घटना घटी। ऐसे में जल्द बाज़ी
    हमें मौत के मुह में धाकेल सकती है। बेहतर है कही निश्चिंतता से कही विश्राम
    कर लिया जाये। कहना ना पड़े हम बाल बाल बचे।

    1. बी एस पाबला

      Sad
      सहमत
      लेकिन कई बार परिस्थितियाँ अपने नियंत्रण में नहीं रहतीं

  9. कोहरे मेँ तो जितनी सावधानी होगी उतनी हि दुर्घटना कम होगी।
    HCT- Hindi Computer Tips

    1. बी एस पाबला

      Approve

  10. ‘…..अब घर पहुँच पाऊँगा अगले दिन, 7 जनवरी की दोपहर होते तक.’ हम्म्म्म यानी ६ जनवरी के सफर की बात है. पूरा यात्रा-वृत्तांत पढ़ने के बाद सोचा ………अभी इतना कोहरा??? ओह याद आया आप तो यूँ भी दो चार महीने बाद ही बताते हो की किस रास्ते से कब और कैसे गुजरे थे.
    अच्छा लगा पढ़कर.
    अगला एपिसोड Tounge-Out कितने महीने बाद लिखोगे ????

  11. बी एस पाबला

    iPad
    लिख दिया 😀

  12. आपके लिखने का अंदाज बहुत दिलचस्प है ,,,,
    घटना पिक्चर की तरह सामने दिखने लगती है
    🙂

    यात्रा वृतांत पर किताब ही लिख डालिए

    सादर
    टिप्पणीकर्ता prakash govind ने हाल ही में लिखा है: लेडीज को सीट ऑफर 🙂My Profile

    1. बी एस पाबला

      Thinking
      कुछ करना ही पड़ेगा

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