द्विवेदी जी की भिलाई यात्रा: अंतिम दिन, अभिनंदन, मुलाकातें तथा रवानगी

ज़िंदगी के मेले

द्विवेदी जी, समय पाते ही हमारे उस ‘कारखाने’ की युवती ‘रोज़’ के साथ काम पर लग जाते थे। उधर ब्लॉगर साथी चकित थे कि अगले दस दिनों तक कोटा से बाहर रहने की बात कर द्विवेदी जी एकाएक कैसे प्रकट हो जाते हैं। कई साथियों ने छेड़ा भी कि कहीं झूठ-मूठ की बातें तो नहीं कर रहे थे!? उस दिन 30 जनवरी की सुबह द्विवेदी जी ने बताया कि उनके एक परिचित, भिलाई इस्पात संयंत्र में कार्यरत हैं। यदि उनसे मुलाकात हो पाये तो बढ़िया। अपने विभाग से टेलीफोन पर की गयी एक सामान्य सी पूछताछ में, उस गौत्र के दो अधिकारी मिले मुझे, संयंत्र में। उन दोनों से बात की गयी। परिचय दिया गया। आखिर पता चल गया कि कौन हैं उन दोनों में से। बात हुयी तो मुझे यह चिंता हो रही थी कि यदि उनसे मिलने संयंत्र में जाना पड़ा तो प्रवेश पत्र की औपचारिकतायों में बहुत समय लग जायेगा। किंतु विभागीय मोबाईल पर बात किये जाने पर पता चला कि उन अधिकारी का कार्यालय, औद्योगिक सुरक्षा की औपचारिकतायों की सीमा के बाहर है।

हम तीनों वैन में सवार हो कर, विस्तार कार्यालय जा पहुँचे। गर्मजोशी के माहौल में जब पारिवारिक बातें होने लगीं तो मैं बाहर आ गया तथा बहुत दिनों बाद उस इमारत में जाने पर पूरी तरह घूम कर देखा। जब हम वापस लौट रहे थे तो बारी-बारी से शकील अहमद सिद्दीकी व संजीव तिवारी जी का फोन आया और ताकीद की गयी कि दोपहर 2 बजे तक आ ही जायें जिला अदालत की इमारत में। फिर अवनींद्र जी का फोन आ गया। आपसी सहमति से यह तय किया गया कि बार एसोशिएशन के कार्यक्रम से लौट कर आते समय हो जायेगा। फिर सामान लेकर वापस दुर्ग रेल्वे स्टेशन जाने में हड़बड़ी होगी। अत: सामान लेकर ही रवाना हुया जाये, कार्यक्रम के बाद सीधे रेल्वे स्टेशन चला जाये।

द्विवेदी जी, रायपुर में, एक विलक्षण व्यक्तित्व से न मिल पाने की निराशा व्यक्त कर चुके थे। उन्होंने कहा कि अगर बात ही हो जाये तो कुछ तसल्ली हो। दरअसल वे कह रहे थे पंकज अवधिया जी के बारे में। जो राज्य से बाहर थे और आज-कल में लौटने वाले थे। मैंने जब उन्हें संपर्क किया तो जगजीत सिंह जी की आवाज़ में कॉलर ट्यून गूँज उठी ‘…ये दौलत भी ले लो…ये शोहरत भी ले लो…’। पंकज जी से बात हुयी। उन्होंने बताया कि वे अभी-अभी ही पहुँचे हैं। द्विवेदी जी ने भी लंबी बातचीत की। पंकज जी ने शाम को दुर्ग स्टेशन पर पहुँचने की कोशिश करने की बात भी कही।

घर से रवाना होते समय दिवेदी जी ने बताया कि डेज़ी उनके आगे-पीछे सुबह से घूम रही है, शायद उसे आभास हो चुका था उनके जाने का। बाहरी गेट पर तो वह द्विवेदी जी के सामने अपनी चिर-परिचित मुद्रा में पिछले दोनों पैरों पर खड़ी हो गयी, जैसे नमस्कार कर रही हो! द्विवेदी जी ने स्नेहपूर्वक आवाज में दुबारा आने की बात की तो उसने पुन: चारों पैरों पर आ कर संतोष की एक गहरी सी सांस ली।

(दुर्ग बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित अभिनन्दन समारोह में द्विवेदी जी का स्वागत)


जब हम जिला अदालत परिसर पहुँचे तो 2 नहीं बज पाये थे। संजीव तिवारी जी को फोन लगाया गया। वे तथा सिद्दीकी जी दो मिनट में ही पहुँच गये। अधिवक्‍ता मित्रों के साथ उपस्थित उन्होंने द्विवेदी जी को न्‍यायालय भवन व पुस्‍तकालय आदि का भ्रमण करवाया। चलते चलते न्‍यायालय, न्‍यायाधीशों एवं अधिवक्‍ताओं की संख्‍या आदि के संबंध में चर

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11 thoughts on “द्विवेदी जी की भिलाई यात्रा: अंतिम दिन, अभिनंदन, मुलाकातें तथा रवानगी

  1. आपने यात्रा का रोचक विवरण प्रस्तुत किया.. जीवंत प्रस्तुती..

  2. पाब्ला जी बहुत कम लोगो से मै प्रभावित होता हूं,दिनेश जी उनमे से एक हैं।औरहां आपसे भी थोड़ा बहुत प्रभावित हुआ हूं हा हा हा हा हा।

  3. दिनेशजी की शानदार यात्रा का वृतांत पढ़कर अच्छा लगा। इच्छा हो रही है कि भिलाई-दुर्ग घूम ही लिया जाए।

  4. हर्षवर्धन जी, आपका भिलाई में स्वागत है

  5. बढ़िया जी! जबरदस्त मेल-मिलाप का माहौल है आपके यहां।

  6. बहुत बढ़िया मिलन और प्रवास रहा है माननीय द्विवेदी जी का. आनन्द आ गया.

    विडियो में हल्ला बहुत होने से आवाज साफ सुनाई नहीं दे पाई मगर मेक आउट कर लिया. 🙂

  7. भारत मे और कहीं “अतिथी देवो भव्” की परम्परा का निर्वाह होता हो ना होता हो लेकिन दुर्ग- भिलाई मे पाबला जी और संजीव तिवारी जी जैसे लोगों की वज़ह से यह सम्भव है आप पधारो तो महाराज..

  8. द्विवेदी जी की यात्रा का वृतांत पढ़ कर ही इतना मजा आया कि मुझे लगता है भिलाई का आतिथ्य का मजा लूटने के लिए हिन्दी ब्लोगजगत के सभी सद्स्य एक न एक दिन वहां आने वाले हैं । बहुत ही रोचक लगा इस यात्रा के बारे में पढ़ना

  9. आज आप की बिटिया और बेटे का जन्म दिन है, मेरी तरफ़ से उन दोनों को ढेर सारी शुभकामनाएं

  10. पाबला जी,
    दिनेश जी से न मिल पाने का हमें अफसोस है। काश.. हम भी उस समय ब्लागिंग बिरादरी में रहते या फिर उनकी यात्रा के बारे में हमें मालूम होता तो हम उनसे जरूर मिलते। अब अगली बार उनका छत्तीसगढ़ आना हुआ तो हम मौका चूकने वाले नहीं हैं। वैसे आपने उनकी यात्रा को जिस तरह से पेश किया है उसके लिए आप बधाई और साधुवाद के पात्र हैं। उनके बारे में और जानकारियां देनी थी लगता है आपने बहुत जल्द उनके प्रसंग समाप्त कर दिए, संभव हो तो कुछ और जानकारी दें।

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