उस नन्हीं सी जान पर हम दो लोगों ने बड़ा जुल्म किया

लेखों का शीर्षक लिखने के मामले में मुझे कई बार आपत्तियों का सामना करना पड़ा है। लेकिन मजे की बात यह रह्ती है कि यह आपत्ति तब तक ही बनी रहती है जब तक उस लेख को पढ़ ना लिया जाए। यह सब मेरे पत्रकारिता में हाथ आजमाने का नतीजा हो सकता है।

संजीत त्रिपाठी जी ने एक बार लिखा भी था कि जर्नलिस्ट होने के बावज़ूद शीर्षक लिखने की कला आपसे सीखनी पड़ेगी 🙂

अब इस लेख का शीर्षक मैंने गलत लिखा हो तो पूरा पढ़ने के बाद बताईएगा

बात उस समय की है जब पिछले वर्ष हमारे सुपुत्र का एक्सीडेंट हो चुका था और कुछ ही दिनों के भीतर मेरी माता जी पंचतत्व में विलीन हो गई। उस समय मुम्बई निवासी मेरे बड़े मामाजी किसी कार्यवश पंजाब में थे और किसी तरह भिलाई आए।

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रवानगी के समय मामाजी के साथ अर्धचेतनावस्था में गुरूप्रीत

तमाम कार्यक्रमों के बीच उनका मुम्बई में 5 दिसंबर को उपस्थित रहना बहुत ज़रूरी था। उनकी पोती को एक असाध्य रोग Aplastic Anemia है। उस सिलसिले में मुख्यमंत्री से उनकी मुलाकात का दिन निश्चित हो चुका था। उच्च स्तर पर किए गए प्रयासों से किसी तरह मुंबई का रेल आरक्षण मिल सका। टिकट हाथ में आया तो पता चला कि यह तो गोंदिया से चलने वाली विदर्भ एक्सप्रेस का टिकट है।

गोंदिया, दुर्ग स्टेशन से 150 किलोमीटर दूर है। और कोई चारा न देख यह तय किया गया कि दुर्ग से दोपहर 11:30 पर चलने वाली जनशताब्दी से गोंदिया पहुँचा जाए जहाँ से 14:55 पर मुंबई जाने वाली एक्सप्रेस छूटती है।

मैंने मामाजी को आश्वस्त किया कि गोंदिया तक मैं चलूँगा उनके साथ। लेकिन लगातार हो रही भागदौड़ से इतना पस्त हो गया उस दिन कि 10 बजते बजते थकान मिटाने की नीयत से बिस्तर पर जा लेटा और फिर आँख लग गई।

उधर बुज़ुर्गों ने फैसला लिया कि बच्चे को आराम करने दिया जाए, मामाजी को दुर्ग स्टेशन तक ही छोड़ देंगे, गोंदिया से वे खुद-ब-खुद चले जाएँगे। एक वाक्य में मुझे इसकी जानकारी दी गई और मैं निश्चिंत हो कर सो गया।

कुछ ही देर बाद सिरहाने लगे टेलीफोन से मशीनगन की गोलियों जैसी आवाज़ करते कर्कश घंटी बजने लगी। उधर से मामाजी की उत्तेजक आवाज़ सुनाई पड़ी कि दुर्ग से 11:30 पर चलने वाली जनशताब्दी एक्सप्रेस रद्द कर दी गई है और उस ओर जाने वाली अगली ट्रेन 17:30 के पहले नहीं है। साथ ही यह बात भी दोहरा दी कि उनका मुम्बई में उपस्थित रहना बहुत ज़रूरी है।

मैंने लगभग फोन पटकते हुए उनसे कहा कि आप स्टेशन के बाहर इंतज़ार कीजिए, मैं वहीं मिलता हूँ। भागते भागते ही सामने खुले पड़े कम्प्यूटर पर दुर्ग से गोंदिया की दूरी जानी और सामने खड़ी प्लेटिना ले भागा। राह में 300 रूपए का पेट्रोल डलवा जा पहुँचा स्टेशन्। मामाजी ने जानकारी दी कि टैक्सी वाला 3000 रूपए मांग रहा गोंदिया ले जाने के। मैंने अपना इरादा पक्का करते हुए उन्हें प्लेटिना पर पीछे बैठने का इशारा किया और दौड़ पड़ा शहर से बाहर की ओर। शहर के व्यस्तम मार्ग पर होटल शीला के ठीक सामने मेरे मोबाईल ने घंटा बजा कर सूचित किया कि 12 बज गए!


सड़क मार्ग से गोंदिया, नक्शे पर तो 170 किलोमीटर है लेकिन व्यवहारिकता देखी जाए तो 3 घंटो के भीतर हमें पहुँचना था और फोरलेन में परिवर्तित होती कच्ची-पक्की सड़क, राह में पड़ने वाला गांवों शहरों का अव्यवस्थित ट्रैफ़िक, पहाड़ों पर घुमावदार ‘घाट’, हम दो हट्टे कट्टे नौजवान, पीठ पर भारी भरकम बैग और पिद्दी सी 97 सीसी की मोटरसाईकिल 😀

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अधिकतम गति से मोटरसाइकिल दौड़ाते हुए हम चुपचाप बढ़ते चले गए. हालांकि मामाजी बीच बीच में समय बता कर मेरा भी तनाव बढ़ा रहे थे. महाराष्ट्र के देवरी पार करते ही मैंने घोषणा की कि अब केवल 70 किलोमीटर बच गए हैं. मामाजी खुश 🙂 क्योंकि अभी तो  पौने दो ही बजे थे. 100 मिनट में 100 किलोमीटर आ गए थे हम और अभी पूरे 70 मिनट बाक़ी थे अगले 70 किलोमीटर के लिए.

लेकिन हाईवे से जहाँ मुड़ना था वहाँ पहुच कर मैं भ्रम में पड़ गया क्योंकि एक डुग्गीपार की गुमटीनुमा दुकान में लोगों से सही रास्ता सुनिश्चित करते हुए उनकी सलाह मिली कि दो बज चुके है गोंदिया की ओर जाने वाला 50-55 किलोमीटर लंबा संकरा रास्ता उतना बढ़िया नहीं है जितना यह हाईवे है, राह में एक डायवर्सन भी है और साथ ही साथ यह दावा भी कर दिया कि तीन बजे तक तो पहुँच ही नहीं पाओगे आप लोग.


मैंने मामाजी से वह सूची निकालने को कहा जो मैंने खेल खेल में एक बढ़िया सी रेल वेबसाईट का पता बताते हुए प्रिंट कर दे दी थी. ज्ञात हुआ कि विदर्भ एक्सप्रेस का अगला स्टेशन है 15:50 पर तुमसर रोड जो कि हमारे खड़े होने वाले स्थान से लगभग 90 किलोमीटर है. समय हमारे पास है डेढ़ घंटे से भी अधिक. ज्यादातर रास्ता बन चुके फोरलेन पर ही है. मैंने सरपट उस नन्ही साथिन को गति दी  और जा पहुंचा भंडारा. पतासाजी में बताया गया कि थोड़ी दूर ही है स्टेशन बस 12-15 किलोमीटर

संकरी सी दोनों किनारों पर टूटी फूटी सी सड़क पर अपनी पूरी क्षमता और कौशल से मैं और मेरी नन्ही सी मोटरसाइकिल  अंधाधुंध भागे जा रहे थे. मामाजी अपनी उत्तेजक आवाज़ में काउंटडाऊन की घोषणा में लगे थे. अब  11 मिनट बाक़ी है ट्रेन आने में अब 8 मिनट है और अब  7 मिनट है पलट कर यही कहता था मैं  कि बस आ ही गया स्टेशन, आ ही गया. लेकिन जिसको भी पूछो कहता था कि अभी दूर है स्टेशन.

चार बजने में 10 मिनट रह गए तो मामाजी की निराशा भरी आवाज़ आई कि अब  नहीं मिलेगी ट्रेन! मैंने दिलासा दी कि भारतीय रेलें तो आधा पौन घंटा देर से ही चलती हैं मिल ही जाएगी.

तभी दिखा वह छोटा सा स्टेशन और वहाँ खडी बड़ी सी ट्रेन. मामाजी ने दूर से एक डब्बे पर लिखा हुआ पढ़ लिया कि यही है विदर्भ एक्सप्रेस. एक मिनट ही रूकती  थी वह और खडी तो थी ही. मोटरसाइकिल रोकते ही चिल्लाया मैं कि भागो आप, मेरी चिंता ना करो. वे अपना बैग संभालते गिरते पड़ते चल दिए और मैं चाबी निकाल कर बिना स्टैंड लगाए गाड़ी को बाहर छोड़ भागा पीछे पीछे उनके. पार्किंग  वाले को चिल्ला चुका था  कि उठा लेना और जितना पैसा चाहिए ले लेना

अन्दर पहुंचा तो ट्रेन रेंगना प्रारंभ कर चुकी थी. मामाजी कहीं नज़र नहीं आए. कहीं बाहर ही तो नहीं रह गए 70 वर्ष के मेरे मामाजी? अब जो होगा देखा जाएगा के ख्याल के साथ ही लंबी साँसे भरता वहीँ एक बेंच पर ढेर हो गया.

5- 7 मिनट में कुछ ठीक लगा तो मामाजी को मोबाईल पर संपर्क किया. उनकी हांफती हुई आवाज़ आई कि चिंता मत कर, तेरा फौजी मामा ट्रेन में है!

एक गहरी उच्छ्वास के साथ धीमे कदमों से मैं बाहर निकला. अपनी नाजुक सी मोटरसाइकिल ली और सामने दिख रहे एक खपरों वाले ‘होटल’ में दाखिल हो गया. सुबह से कुछ खाया पीया नहीं था सो एक एक कर पांच दही समोसे खा गया.

वापिस लौटते हुए नज़र पड़ी तो दिखा ‘नागपुर 55 किलोमीटर’

दिसंबर माह का अंधेरा होने लगा था हलकी सी टी शर्ट में पहाड़ी रास्तों में ठण्ड भी लग रही थी . साढ़े चार बजे रवाना हो जब मैं घर पहुंचा तो घड़ी दस बजा रही थी.

अब किसी को यह किस्सा सुनाता, बताता हूँ तो पहला वाक्य यही होता है कि उस नन्ही सी जान पर हम दो लोगों ने बड़ा जुल्म किया

आप होते तो क्या कहते?

उस नन्हीं सी जान पर हम दो लोगों ने बड़ा जुल्म किया
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46 Thoughts to “उस नन्हीं सी जान पर हम दो लोगों ने बड़ा जुल्म किया”

  1. रुचिकर किस्सा, वाकयी जुल्म तो बहुत किया पर वह इम्तहान में पास हो ही गयी।
    टिप्पणीकर्ता ePandit ने हाल ही में लिखा है: इण्डिक आइऍमई लाइट – इण्डिक आइऍमई का नो झंझट सटासट इंस्टालर [ई-पण्डित लैब्स]My Profile

    1. सही है
      इम्तिहान भी होना चाहिए ना 🙂

  2. कहेंगे क्या वो तो दिख रहा है दो बॉडी बिल्डर,भारी भरकम लगेज और बेचारी पिद्दी सी 97 सीसी की मोटरसाईकिल १७० मिनट और १७० किलोमीटर का सफर….. जान लेते क्या उसका ? बोल पाती तो कहती -‘अरे निर्दयियो ! बोझा लाड दिया सो तो ठीक.दौडाओ तो मत मुझे.हद करते हो तुम इंसान.मशीनों के साथ यह व्यवहार तो इंसानों के साथ????? हा हा हा

    1. जब मौक़ा ही अटपटा हो तो सब कुछ कर गुजरता है इंसान
      फिर सामने चाहे इंसान हो या मशीन

    1. पसंद अपनी अपनी ख्याल अपना अपना 🙂

  3. हिम्मते मर्दां मददे खुदा, फ़िर वो मदद चाहे छोटी सी जान के रूप में ही क्यों न हो। आज मजा आ गया पढ़कर और हैप्पी एंडिंग देखकर।

    1. सही बात है
      डूबते को तिनके का सहारा

  4. मुझे तो शीर्षक में कोई दिक्कत नहीं दिखी … और यह भी सत्य ही है कि आपने कोई कोर कसर छोड़ी भी नहीं ‘उस’ पर जुल्म करने में … पर जो भी हो मान गए आपको … जय हो सर जी !

    1. मानव मशीन गठजोड़ की जय हो !

  5. उस नन्ही सी जान ने आप दोनों पे बड़ा उपकार किया 🙂

    1. यह भी सही है
      उपकार ही किया उसने

  6. पिछली बार जब भी प्रयास किया आपकी साइट खुल ही नहीं पाई…
    आप शीर्षक के माध्‍यम से सस्‍पेंस पैदा करने में माहिर हैं…
    प्‍लेटीना को छोड़कर कोई ज्‍यादा दमदार बाइक खरीदिये वैसे भी आपकी काया पर तो वो साइकल से ज्‍यादा नहीं लगती होगी 🙂
    टिप्पणीकर्ता भुवनेश शर्मा ने हाल ही में लिखा है: Now Tweet in HindiMy Profile

    1. वेबसाईट के सर्वर बदले जा रहे थे, शायद उस अंतराल में आपने प्रयास किया होगा

      काया की बात!?
      लोग फुसफुसाते हैं कि सर्कस में भालू को साइकिल चलाने जैसा दृश्य लगता है यह 😀

  7. छोटी सी जान और इतने सारे जुल्म।
    टिप्पणीकर्ता प्रवीण पाण्डेय ने हाल ही में लिखा है: प्रयोग की वस्तुMy Profile

    1. इत्ते सारे?
      एक ही तो हुआ है प्रवीण जी 🙂

  8. अच्छा हुआ आपने बता दिया कि वो प्लेटिना थी । इससे भी नन्ही जान आपके यहाँ है , वो बैटरी से चलने वाली गाड़ी । जिस पर बैठकर हमने कहा था इसे स्टार्ट तो कीजिये और आपने कहा था .. शरद भाई यह पहले से ही स्टार्ट है । हाहाहा । वैसे भंडारा से तुमसर जाते हुए आप मेरे पैतृक घर के आधे किलोमीटर करीब से हे गुजरे । मैं वहाँ होता तो आपको दही समोसा नही खाना पडता . कुछ चिकन – विकन .. ।
    टिप्पणीकर्ता शरद कोकास ने हाल ही में लिखा है: आज जगमोहन कोकास की पुण्यतिथि है ….My Profile

    1. शरद जी चिकन वगैरह के लिए इतनी दूर क्या जाना?
      आप आदेश करें तो आज शाम ही….
      पास पड़ोस में ही तो हैं आप 😀

  9. बहुत रोचक किस्सा है। उस नन्ही सी जान ने आप दोनों पे बड़ा उपकार किया 🙂
    टिप्पणीकर्ता paramjitbali ने हाल ही में लिखा है: मेरे देश को एक और मोहनदास करमचंद गाँधी चाहिए…My Profile

  10. रोचक किस्‍सा।
    आपकी हिम्‍मत की दाद देनी पडेगी कि मोटर सायकल में आपने इतनी लंबी दूरी तय कर ली।
    सच में नन्‍ही सी जान पर बडा जुल्‍म हुआ पर वह नन्‍ही सी जान परीक्षा में सफल हो गई……

    1. मरता क्या ना करता अतुल जी 🙂

  11. ब्रेवो ….
    शुभकामनायें !
    टिप्पणीकर्ता सतीश सक्सेना ने हाल ही में लिखा है: घायल सिक्किम – सतीश सक्सेनाMy Profile

    1. शुभकामनाओं हेतु आभार सतीश जी

  12. वाकई जुल्म तो किया नन्हीं सी जान पर…बहुत वो हो आप…
    टिप्पणीकर्ता समीर लाल ने हाल ही में लिखा है: पावन मकड़जाल ….My Profile

    1. अगली बार हम दोनों होंगे सवार
      फिर कहेंगे हम, तुम और वो 😀

  13. बजाज वालों को पता लग जाये तो इसका विज्ञापन बना डालें, दाद देनी होगी आपके चालन क्षमता की, पर वापिस कब पहुँचे यह तो बताया ही नहीं ?

    1. विवेक जी लगता है आपने देखा नहीं ध्यान से
      वापसी का समय तो लिखा हुआ है 🙂

  14. एक बार फिर छक्का मारा और सीधे बाउंड्री पार। क्या शैली है। बड़ी ईर्ष्या होती है। ऐसी घटनाएँ आपके साथ ही होती हैं। वह बेज़ुबान क्या करती? पर है बड़ी हिम्मत वाली और वफ़ादार।

    1. सर जी, ऐसी घटनाएँ होती तो होंगी सभी के साथ लेकिन लिखता बताता कौन है 😀

  15. ajit gupta

    अरे बाप रे इतना दुस्‍साहस? वाकयी सरदार हो आप। यहां तो कोई कल्‍पना भी नहीं करता।

    1. क्या करें!
      कंट्रोल ही नहीं होता 🙂

  16. पूरी यात्रा में हम लोग भी जुड़ गए थे, गाड़ी पर बोझ और बढ़ गया होगा, आप सही नहीं कह रहे हैं ऐसी घटनाएँ सभी के साथ नहीं होती, जब आप जिंदगी में दिलचस्पी लेने लगते हैं और उसे दिलचस्प बनाने की कोशिश करते हैं तभी ऐसे वाकये हो पाते हैं।

    1. आपकी बातों से मेरा जोश नई ऊर्जा के साथ हिलोरें लेने लगा है
      आभार आपका

  17. ajit gupta

    हां एक बात तो रह ही गयी कि शीर्षक गजब का है, एकदम पत्रकारों जैसा।

    1. मैं तो डर रहा था कि कोई डाँट ना दे 🙂

  18. पावला जी
    वाहन से ज्यादा चालक की हिम्मत माननी चाहिए जो इसपर तय समय में भारी दिमागी परेशानी में भी ठीक समय पर ले गया, मैं तो अपनी घरवाली के साथ अपनी पुरानी बाइक हौंडा की 98.7 सी.सी की पैसन पर दिल्ली से गंगौत्री व यमुनौत्री के कठिन पहाडी मार्गों से होकर आया था, वैसे आपके डीलडौल के सामने तो 150 सी.सी से कम का वाहन पीद्धी सा ही नजर आयेगा। उस हिसाब से सही शीर्षक रहा है।

  19. पावला जी
    मैं तो में रहता हूँ गाजियाबाद में,

    लेकिन यहाँ तो जयपुर राजस्थान दिख रहा है आखिर क्या माजरा है?

    1. संदीप जी,
      जहाँ तक मैं देख रहा हूँ, आप मोबाईल 3G/ GPRS इंटरनेट से जुड़े हैं और यह सेवा भी संपूर्ण उत्तर भारत के लिए नज़र आ रही। हो सकता है इस मकड़जाल की दुनिया में इस वक्त आपके मोबाईल का सर्वर जयपुर वालों की सेवा ले रहा हो।

  20. dr t s daral

    जांबाज़ सफ़र की दिलचस्प दास्ताँ ।
    लेकिन पाबला जी , दो क्यों –ज़ुल्म करने के लिए तो आप अकेले ही काफी थे । 🙂

    1. बात तो पते की है दराल सा’ब
      लेकिन न उस दिन की बात ही कुछ और हो गई 🙂

  21. रोमांचक !!!!
    टिप्पणीकर्ता Chandra Mouleshwer ने हाल ही में लिखा है: हिंदी की दयनीय स्थितिMy Profile

  22. बहुत जुलम किया जी 😀
    टिप्पणीकर्ता ललित शर्मा ने हाल ही में लिखा है: रायफ़ल शुटिंग में श्रेयांसि ने जीता गोल्ड मेडल — ललित शर्माMy Profile

  23. शीर्षक लिखने की कला आपसे सीखनी पड़ेगी। बड़ा धांसू किस्म का शीर्षक है और पोस्ट तो शानदार है ही।

    1. शुक्रिया सागर जी

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