नेपाल की मुर्गी, उसकी मुस्कान, मेरी नाराज़गी और लाखों का मुआवजा

आखिरकार परिकल्पना सम्मान 2012 में शामिल होने के लिए जब छत्तीसगढ़ से मारुति ईको चलाते हुए सड़क मार्ग द्वारा हम तीन हिंदी ब्लॉगर्स, सफ़र के पहले की दहशत निपटा कर, 11 सितंबर को  दही की तलाश में, 12 सितंबर को नागालैंड वालों द्वारा कार खींचने के बाद 13 सितंबर को  पीछा करते युवकों के रहमोकरम में गाड़ी चलाते नेपाल की राजधानी, काठमांडू के थमेल इलाके में, आयोजकों द्वारा बताये गए, नया बाज़ार क्षेत्र वाले होटल पहुंचे तो रात के 11 बज रहे थे.

16 घंटों में खाते पीते, रूकते रुकाते, उजाले अँधेरे में भले ही 425 किलोमीटर की दूरी नापी हो मैंने, लेकिन इस बीच गोरखपुर से काठमांडू की (समुद्र तल से) ऊँचाई लगभग 1.5 किलोमीटर बढ़ चुकी थी. जैसे जैसे हम दुर्गम पहाड़ों पर ऊपर जाते गए वैसे वैसे मेरे कानों में छोटे मोटे विस्फोट होते रहे. हर बार कानों के परदे भयंकर आवाजों के साथ कुछ यूं खुलते कि न जाने कौन कौन सी ध्वनियाँ सुनाई देने लगती. एक बार तो इतना दर्द उठा ‘विस्फोट’ संग कि मेरी चीख ही निकल गई. 🙁

होटल के पोर्च में गाड़ी खडी कर हम सीधे जा धमके स्वागत कक्ष में. वहां कुछ कह पाते इसके पहले ही सामने के रेस्टारेंट से किसी ने जोश भरे स्वर में मुझे पुकारा. देखा तो महफ़िल जमी हुई थी. मनोज पांडे तो पहचान में आ गए लेकिन तुरंत फुरंत बाकियों पर ध्यान नहीं दे पाया. सर चकरा रहा था इतनी लंबी यात्रा के कारण.

तभी अंतर सोहिल, अपनी कलेजा फूँक धूम्र दंडिका को धरा पर एक कुर्सी की ओर अन्यत्र पटक, चरणों में झुक गए. मैंने भी गले मिल कर चेतावनी दी कि भले ही उस सुलगती निकोटिन समाहित बेचारी के धुएं की महिमा न्यारी है लेकिन फिलहाल वह दिल जलाने की बजाय किसी की पैंट जलाने को आतुर हो रही.

तब तक नींद से उठ कर परिकल्पना के मुख्य आयोजक रविन्द्र प्रभात उनींदी आँखें लिए हाजिर हो गए. शैलेष भारत वासी, मनोज भावुक, सरोज सुमन के साथ हँसी ठठा थमे उससे पहले ही पता चला कि होटल का रसोईघर रात 11 बजे के बाद तालाबंद हो जाता है.

रविन्द्र जी असहाय से दिखे और आश्वासन दिया कि सुबह भरपेट नाश्ता है आलू परांठों का अभी चला लीजिये कैसे भी! हमने चला भी लिया अपने रिज़र्व स्टॉक से.

होटल के कमरे में नींद कब आई पता ही नहीं चला. दिन के काठमांडू भ्रमण की सूचना मिल चुकी थी और सुबह नौ बजे ही बस तैयार मिलेगी यह बता भी दिया गया. तरोताजा हो जब मैंने बैग खोल पहनने वाले कपडे चुनने चाहे तो निराश हो गया. अच्छे खासे इस्तरी करा कर लाये सारे ही कपड़ों में ढेरों सलवटें पड़ी हुई थीं.  डेढ़ हजार किलोमीटर के सफर में उछलती कूदती कार में रखे बैग के भीतर कपड़ों की ऎसी तैसी हो गई.

बुलावा बार बार आ रहा था. सो, सबसे कम सलवटों वाली कमीज पहनी और जींस चढ़ा कर नाश्ते के लिए पहुंचे. चने-पूरी-जलेबी का इंतज़ाम देख चौंक गया. यात्रा के दौरान चने जैसी चीजों से परहेज ही करता हूँ, सो औपचारिकता निभाई गई और जा पहुंचे बस के सामने

काठमांडू आने जाने के लिए हुई 3000 किलोमीटर की यात्रा वाले रोचक संस्मरणों का संक्षिप्त विवरण यहाँ क्लिक कर देखें »

 

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काठमांडू की सैर के लिए गिरीश पंकज जी संग

गहमागहमी, नाराज़गी, चीख पुकार, लताड़, आश्वासन, मनुहार पश्चात आखिर 14 सितंबर की सुबह बस चल ही पड़ी नेपाली समयानुसार 9 बजे.

माइक-स्पीकर वाली बस के सामने हिस्से में टूटी फूटी हिंदी सहित एक सज्जन रोचक भाषा में अपना परिचय दे कर राह में आते जा रहे दर्शनीय स्थलों की जानकारी देते जा रहे थे. बीच बीच में मोर्चा संभाल लेते थे राजीवशंकर मिश्रा जी.

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वह डीलक्स एयरकंडिशन्ड बस किन किन स्थानों से गुजरी याद नहीं.  राजीवशंकर जी द्वारा स्थानों की जानकारी देते चुटीली व्यवहारिक भाषा का प्रयोग  बखूबी किया जाता रहा.

मैं तो बस कैमरा बस के बाहर की ओर कर, चित्र पर चित्र लिए जा रहा था.

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शहर के विभिन्न हिस्सों से होती हुई हमारी बस जा पहुंची थी विश्वप्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर.

पांचवीं सदी में पगोडा स्थापत्य शैली वाला यह शिव मंदिर हिन्दू धर्म के आठ सबसे पवित्र स्थलों में से एक माना जाता है तथा यूनेस्को विश्व सांस्कृतिक विरासत स्थल की सूची में सूचीबद्ध है.

मैंने पढ़ रखा था कि पशुपतिनाथ में आस्थावानों (मुख्य रूप से हिंदुओं) को मंदिर परिसर में प्रवेश करने की अनुमति है। गैर हिंदू आगंतुकों को बागमती नदी के दूसरे किनारे से इसे बाहर से देखने की अनुमति है, लेकिन ऐसा कुछ आभास नहीं हुया.

तभी याद आया कि कुछ अरसा पहले मंदिर के पुजारियों के साथ दुर्व्यवहार करते हुए नेपाल के ही माओवादियों ने हिंसक हमला किया था. दरअसल सदियों पुरानी परंपरा के तहत सिर्फ दक्षिण भारतीय ब्राह्मण ही यहां स्थित पशुपतिनाथ मंदिर में पूजा कराते आए थे और यह बात नेपाल की माओवादी सरकार को पसंद नहीं आई लिहाजा सरकार ने इस मंदिर के लिए पुजारियों के रूप में स्थानीय भट्ट ब्राह्मणों की नियुक्ति की।

यह मामला अदालत में ले जाने के बाद पूर्वस्थिति बहाल की गई लेकिन हमारे नेपाल से लौट आने के बाद की खबर है कि मंदिर प्रशासन द्वारा नियुक्त मुख्य पुजारी ने अपना कार्यभर इस्तीफा देने के बाद छोड़ दिया है.

अपनी अपनी सुविधानुसार सभी साथी, दूर खड़ी बस से उतर कर, मंदिर प्रांगण की ओर चल पड़े. थोड़ी देर पहले से, एक हादसे में टूट चुकी मेरी दाहिनी एड़ी का पुराना दर्द इतनी जोरों से उभरा हुया था कि आँसू टपक पड़ते तो हैरानी ना होती. बस से नीचे खड़े ललित जी ने साथ चलने का इशारा किया कि मैंने भी इशारा किया -आप चलो, मैं आता हूँ.

धीरे धीरे चल तो पड़ा लेकिन हर कदम, दर्द की लहर छोड़ जाता था. मुख्य द्वार से पहले सड़क के दोनों ओर दुकानें सजी थीं पूजा सामग्री सहित पर्यटकों को लुभाने वाली अन्य वस्तुयों सहित. नज़र उठा कर जायजा लेने की इच्छा को दर्द बर्दाश्त करने की हिम्मत सर उठाने नहीं दे रही थी.

आहिस्ता आहिस्ता मुख्य बाहरी द्वार के सामने पहुंचते सोच रहा था कि सारी दुनिया आती होगी यहाँ दर्शनों के लिए. मुझे भी हिम्मत करनी चाहिए भीतर जाने की. तभी पास से एक युवती रोती हुई गुजरी कि मंदिर के भीतर ही भीड़ में उसका पर्स चोरी हो गया. इधर मेरी निगाह पड़ी मंदिर की चारदीवारी के भीतर, तो लोगों का हुजूम उमड़ता दिखा.

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बाहरी गेट के सामने, सड़क के पार मैं खड़ा हो गया एक रेलिंग का सहारा ले कर. गेट के ऊपर ही लगे मंदिर के बोर्ड पर निगाह गई तो उखड़े, भद्दे पेंट ने मंदिर की अरबों-खरबों की संपत्ति का स्मरण करा दिया. तभी पास से गुजरता एक परिवार, दुबारा ना आने की कसमें खाता, गालियाँ बकता निकल गया. मुद्दा वही -मंदिर में पर्स चोरी और अव्यवस्था.

तभी हमारे साथ आईं डॉ रमा द्विवेदी से जानकारी मिली कि मंदिर के भीतर की भीड़ में उनके पर्स के अंदर, सुनीता यादव जी द्वारा सुरक्षा की दृष्टि से रखवाए पर्स को किसी ने निकाल लिया और फिर उसका कोई पता ना चला.

बस, उसी क्षण मैंने निर्णय ले लिया कि मंदिर नहीं जाना है.

एड़ी के दर्द से ध्यान हटाने को मैंने इधर उधर के फोटो लेने शुरू कर दिए और काफी समय बाद धीमी चाल से लौट आया बस के पास.

जब एक एक कर सब लौट आये तो सवा ग्यारह बजे हमारी बस रवाना हुई अगले पड़ाव की ओर. राह में काठमांडू के विभिन्न इमारतों, स्थलों की जानकारी, राजीवशंकर  जी बड़े रोचक अंदाज़ में देते जा रहे थे.

नेपाल की संसद, महाधिवक्ता कार्यालय, ब्रिटिश गुरखा कॉलेज, जामा मस्जिद, बस स्टैंड और भी ना जाने कौन कौन सी जगहों के पास से बस गुजरती रही, मेरा कैमरा क्लिक पर क्लिक करता रहा.

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नेपाल की संसद का प्रवेश द्वार

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सर्वोच्च न्यायालय

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महाधिवक्ता कार्यालय
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काठमांडू में जैसा देखा उससे ऐसा लगता है कि सारे नेपाल में टैक्सी के रूप में टोयोटा कंपनी की ट्रेवलर गाड़ी  ही चलती होंगी. यह भी देखा कि अधिकतर लोग, ऑपरेशन करने वाले डॉक्टरों सरीखे मास्क पहने घूम रहे है, अनदेखे प्रदूषण से बचने के लिए.

इन्हें देखा तो मुझे वो अजीब सी दाढी वाला सरकारी मुलाजिम याद आया जिसने धूल भरी सड़क पर नेपाल सीमा से रवाना होते हमारी तलाशी ली थी! उसने तो नाक भी ढक रखा था.

एक बात जिसने विशेष तौर पर मेरा ध्यान खींचा, वह थी किसी भी दुपहिया सवार का हेलमेट पहन कर ही चलना. चाहे वह ज़वान हो या बूढा, पुरुष हो या महिला, खूबसूरती की मिसाल देता चेहरा हो या झुर्रियों वाला! सबके सब हेलमेट लगा कर ही चला रहे हैं गाड़ियाँ.

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लगभग साढ़े बारह बजे हमारी बस जहाँ रोकी गई, वहाँ इरादा रहा होगा किसी संग्रहालय को देखे जाने का. कई साथी बार बार अपनी चाहत जाहिर कर रहे थे कि इन सब के बजाए प्राकृतिक सौंदर्य दर्शन ज़्यादा अच्छा रहता.

लेकिन जो होना था वही हुया. मैंने तो साफ़ इनकार कर दिया जाने से कि चल ही नहीं पाऊंगा. डॉ रमा द्विवदी जी भी चिकित्सकीय कारणों से नहीं गईं.  बस में बैठे बैठे गरमी लगाने लगी तो मैं नीचे उतर लंगडाते हुए हलकी फुलकी चहलकदमी करते रहा.

भूख लगी तो पास ही के जूस सेंटर पर तीन गिलास अनार का जूस पी गया. वापस लौटा तो रमा जी से गपशप करते पता चला कि उन्हें भी भूख सता रही और वे मधुमेह पीड़िता हैं.  जब उनके लिए कुछ लेने के लिए मुड़ा तो उन्होंने मना किया कि पर्स में कुछ खाने का सामान है उसी से काम चला लेंगी

संग्रहालय देखने गए साथी लौट ही नहीं रहे थे. मैंने अपने नेपाली मोबाईल नंबर से मनोज पांडे जी को फोन लगा पूछा कि कितनी देर लगेगी अब? ज़वाब मिला -बस, थोड़ी देर और!

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समय गुजारते ध्यान गया विभिन्न वाहनों में लगी अलग अलग तरह की नंबर प्लेट्स पर. पूछताछ किये जाने पर जानकारी दी गई कि लाल रंग की प्लेट पर सफ़ेद अंक-अक्षर गैर-व्यवसायिक निजी वाहनों के लिए, काली प्लेट पर सफ़ेद अंक-अक्षर निजी व्यवसायिक वाहनों के लिए, सरकारी वाहनों के लिए सफ़ेद प्लेट पर लाल अंक-अक्षर, विभिन्न सरकारी निगमों के वाहनों के लिए पीली प्लेट पर नीले अक्षर! सबसे महत्वपूर्ण बात लगी कि पर्यटक वाहनों के लिए भी अलग नंबर प्लेट जारी की जाती हैं! हरी प्लेट पर सफ़ेद अंक-अक्षर.

इन सबसे ऊपर एक बात. सारे अंक अक्षर देवनागरी में. नो इंग्लिश ऐट आल 🙂

जब हमारे साथी लौट आये तो मैंने भूख लगे होने की शिकायत की और बता भी दिया कि आसपास कुछ मिला नहीं वरना कुछ खा ही लिया होता. आयोजन के कर्ता- धर्ता  रविन्द्र प्रभात जी ने जानकारी साझा की कि उन्हें मालूम नहीं था यहाँ दोपहर एक बजे के बाद लंच नहीं मिलता होटलों में

बस जा पहुंची थी विश्‍व धरोहर में शामिल स्वयंभू मंदिर के पश्चिमी प्रवेश द्वार के सामने. यह मंदिर है विश्‍व के सबसे भव्य बौद्ध स्थलों में से एक.  वहीं पास के एक रेस्टारेंट में आयोजकों द्वारा किया गया इंतज़ाम खाने का. जानकारी मिली कि खाने में केवल फ्राइड राईस और चाऊमीन ही हैं तो मेरा पारा चढ़ने लगा. लेकिन कुछ खाना तो था ही सो मैंने. आखिर 24 घंटे से ज़्यादा हो चुके थे भोजन किये हुए. पिछले दिन दोपहर को वो मुर्गा ही तो खाया था रोटियों संग, रात को कुछ हासिल ना हुआ था और सुबह वह नापसंद आई चना-पूरी थी. सो, सामूहिक आर्डर में चाऊमीन चुना मैंने, चाय तो आनी ही थी.

समय गुजरता गया, चाऊमीन ना आया चाय आ गई ! मेरा गुस्सा भड़का और नज़ला गिरा उस बेचारे उस साथी पर जिसने हम सबसे पूछ पूछ कर सामूहिक आर्डर दिया था.  और जब चाऊमीन आया, चाय ठंडी हो चुकी थी 🙁

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इन सबके बीच फोटोग्राफी होते रही. पास ही बैठी एक बौद्ध भिक्षुणी अपनी भाषा में मुझसे ना जाने क्या कहे जा रही थी. ज़वाब में मैं बस मुस्कुराता ही रहा. फिर उसने इशारा किया कि मेरे साथ एक फोटो खिंचवाना चाहती है.

वहीं लिया गया एक सामूहिक चित्र जिसमें कोशिश रही कि अधिकतम साथी आ ही जाएँ फिर भी लगता है कोई ना कोई तो छूट गया होगा.

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बाएं से दाहिनी ओर दिखते चेहरे:ललित शर्मा, राजीवशंकर मिश्रा, सुशीला पुरी, .?., .?., मनोज पांडे, मुकेश कुमार तिवारी, रवीन्द्र प्रभात, अपूर्वा यादव-अक्षिता यादव, कृष्ण कुमार यादव, आकांक्षा यादव, नमिता राकेश, गिरीश पंकज, शैलेश भारतवासी, सुनीता प्रेम यादव, मनोज भावुक, अंतर सोहिल, डॉ रमा द्विवेदी, सरोज सुमन, .?., विनय प्रजापति, संपत देवी मुरारका, मुकेश कुमार तिवारी की धर्मपत्नी, बी एस पाबला

जब सभी तत्पर हुए वापस जाने के लिए तो पता चला कि कुछ साथियों का समूह स्वयंभू मंदिर दर्शन के लिए जा रहा है अभी. जबकि पहले ही एक-दो समूह जा कर वापस आ चुके थे. मैंने नाराज़गी ज़ाहिर करते ही प्रश्न किया कि जब यह सामूहिक भ्रमण है तो सब के सब एक साथ क्यों नहीं गए? जब किसी ने सम्मान नहीं किया समूह में बने रहने का तो ऐसे में मैं भी मुंह उठा कर कहीं भी जा सकता हूँ! एक आवाज़ उभरी -जाईये, आपको किसी ने रोका है क्या?

फिर क्या था. पैर के दर्द के बावजूद मैं चल पडा सड़क पर और उतर गया एक शॉर्टकट राह की सीढियों से नीचे. लेकिन ज़्यादा दूर जा ना पाया, निचली सीढियों पर ही बैठ गया और आसपास के नजारों को कैद करने लगा कैमरे में. तब तक फोटो लीं जब तक कैमरे की बैटरी ख़तम ना हुई

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मैंने बहुत इंतज़ार किया कि इसी राह से बस नीचे आनी है और वह अब आई अब आई लेकिन वह नहीं आई. मैं चल पड़ा उसी पक्की राह पर नीचे की ओर.

सोचते जा रहा था कि जब इस दिन के बारे में लिखूंगा तो दिखाऊंगा कि मैंने किस किस तरह के चित्र लिए हैं काठमांडू में व्यक्तियों के.

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फिर मैं अकेले ही चलते हुए एक बार हँस दिया कि काठमांडू शहर की खूबसूरती दिखाते फोटोग्राफ्स को छोड़ दूंगा क्या?

भले ही थकान और पैर के दर्द के कारण ढंग से सर उठा कर नहीं देखा लेकिन मेरे कैमरे ने जो कुछ धडाधड देखा है उंमें से कुछ फोटो तो ऐसे होंगे जो दिखा सकेंगे सौंदर्य वादियों के बीच का.

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शाम का अंधेरा गहरा चुका था जब मैं स्वयंभू मंदिर के पूर्वी प्रवेश द्वार के पास पहुंचा. बार बार फोन आने शुरू हो गए थे -आप कहाँ हो? कब आओगे बस पर सवार होने? मेरा हर बार ज़वाब रहा बस नीचे लाते जाईए मिल जाऊंगा राह में. लेकिन किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि मेरे कहे का मतलब क्या है. लगातार आती कॉल्स से झल्ला कर मैंने ललित शर्मा जी से बात करवा देने की गुजारिश की तब कहीं जा कर मेरे कारण रूकी हुई बस वालों को समझ आया कि करना क्या है 🙂

लौट कर होटल में हलकी फुल्की चाय के दौर बीच यह बता दिया गया कि बीते दिन के मुख्य कार्यक्रम में सम्मानित होने से जो छूट गए थे उन्हें आज सम्मान दिया जाएगा.

सवा सात बजे मैं हॉल में पहुँच गया. अतिथियों के आपसी औपचारिक परिचय और संक्षिप्त सम्मान प्रक्रिया के बाद विभिन्न साथियों के उद्बोधन, कवितायों आदि का दौर शुरू हो गया.

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काठमांडू आने जाने के लिए हुई 3000 किलोमीटर की यात्रा वाले रोचक संस्मरणों का संक्षिप्त विवरण यहाँ क्लिक कर देखें »

 

कुछ समय पहले लगी भूख, गहराती रात के बीच 10 बजते बजते इतनी बढ़ गई कि बर्दाश्त से बाहर हो गया मेरे लिए. इधर कवितायों का दौर ख़तम ही नहीं हो रहा था. मैं एक झटके से उठा और मंचासीन अतिथियों को सॉरी कह बाहर निकल गया.

सीधे पहुंचा सुनसान पड़े रेस्टारेंट. बफे प्रणाली अनुसार खाने का सारा सामान सजा हुया था लेकिन स्टाफ ने कह दिया कि जब सभी आयेंगे तभी आपको भी मिलेगा. और तब वहां भगदड़ मच गई जब मैं ऊंची आवाज़ में गरजा कि दो मिनट में मेरे सामने खाने की थाली होनी चाहिए, नहीं तो किसी को खाना खाने नहीं दूंगा. 🙂

भले ही वह खाना स्वादिष्ट था लेकिन मैं एकाएक खा नहीं पाया मन-मुताबिक़. चाय मंगा कर बाहर खडी मारुति ईको से बिस्कुट निकाल लाया. तब तक एक एक कर सब पहुँच चुके थे. जिसने भी पूछा उसको मैंने बता दिया कि भूख लगी थी इसलिए उठ आया. राजीवशंकर मिश्रा जी मेरी नाराज़गी भांप गए लेकिन कुछ कह नहीं पा रहे थे.

उस रात जब मैं बिस्तर में नींद के लिए गया उससे पहले, कमरे में राजीवशंकर मिश्रा जी ने स्नेहपूर्वक, भोजन का विशेष ठोस तरल प्रबंध करवाया लेकिन मैंने साफ़ मना कर दिया कि भोजन समय पर और भूख लगने पर ही किया जाए तो बेहतर होता है.मुझे भूख नहीं है और समय आधी रात का हो चुका है.

बातचीत में ही उन्होंने सलाह दी कि अगर सुबह 4 बजे रवाना होंगे तो राह में यातायात ज़्यादा नहीं मिलेगा. अगर पांच बजे निकले तो भारी वाहनों को रात रोक दिए जाने के बाद सुबह काठमांडू में प्रवेश की अनुमति के कारण यातायात दबाव से दिक्कत हो सकती है.

सलाह तो यह भी मिली कि गाड़ी के सामने आने वाली किसी मुर्गी से बचना वरना भारी मुसीबतों में पड़ सकते हो. यहाँ सैकड़ों भारतीय गाड़ियां जब्ती में सड़ रही हैं. बताया उन्होंने कि नेपाल के क़ानून में एक मुर्गी की मौत पर उसके मालिक को यह गणना कर मुआवजा दिया जाता है कि इस मुर्गी के अण्डों से कितने चूजे होंगे और फिर उन अण्डों से निकले चूजों के व्यस्क होने पर उनसे कितने चूजे होंगे और उन चूजों के कितने ………… और उन चूजों के चूजों के चूजों के कितने …. 😀

रहा ना हैरान कर देने वाला यह एक दिन काठमांडू में?

अगली कड़ी में क्लिक कर पढ़िए सुबह सुबह तोड़-फोड़, माओवादियों से टकराव, जलते टायरों की बदबू और मौत से सामना

नेपाल की मुर्गी, उसकी मुस्कान, मेरी नाराज़गी और लाखों का मुआवजा
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7 दिनों में, भिलाई से सड़क मार्ग द्वारा
काठमांडू आने जाने के लिए हुई 3000 किलोमीटर की यात्रा वाले प्रतिदिन के रोचक संस्मरण 8 हिस्सों में में लिखे गए हैं. जिन्हें रुचि अनुसार पढ़ा जा सकता है इन कड़ियों पर क्लिक कर

  1. काठमांडू सफ़र के पहले की दहशत
  2. काठमांडू की ओर दही की तलाश में तीन तिलंगे
  3. काठमांडू जाती कार को नागालैंड वाले खींच ले गए
  4. भैंसा भोजन, खिलखिलाती युवती, पीछा करते युवक और आधी रात का काठमांडू
  5. नेपाल की मुर्गी, उसकी मुस्कान, मेरी नाराज़गी और लाखों का मुआवजा
  6. सुबह सुबह तोड़-फोड़, माओवादियों से टकराव, जलते टायरों की बदबू और मौत से सामना
  7. खौफनाक राह, घूरती निगाहें, कमबख्त कार और इलाहाबाद की दास्ताँ
  8. धुआंधार बारिश, दिमाग का फ्यूज़ और सुनसान सड़कों पर चीखती कन्या को प्रणाम
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7 दिनों में, भिलाई से सड़क मार्ग द्वारा
काठमांडू आने जाने के लिए हुई 3000 किलोमीटर की यात्रा वाले प्रतिदिन के रोचक संस्मरण 8 हिस्सों में में लिखे गए हैं. जिन्हें रुचि अनुसार पढ़ा जा सकता है इन कड़ियों पर क्लिक कर

  1. काठमांडू सफ़र के पहले की दहशत
  2. काठमांडू की ओर दही की तलाश में तीन तिलंगे
  3. काठमांडू जाती कार को नागालैंड वाले खींच ले गए
  4. भैंसा भोजन, खिलखिलाती युवती, पीछा करते युवक और आधी रात का काठमांडू
  5. नेपाल की मुर्गी, उसकी मुस्कान, मेरी नाराज़गी और लाखों का मुआवजा
  6. सुबह सुबह तोड़-फोड़, माओवादियों से टकराव, जलते टायरों की बदबू और मौत से सामना
  7. खौफनाक राह, घूरती निगाहें, कमबख्त कार और इलाहाबाद की दास्ताँ
  8. धुआंधार बारिश, दिमाग का फ्यूज़ और सुनसान सड़कों पर चीखती कन्या को प्रणाम
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46 Thoughts to “नेपाल की मुर्गी, उसकी मुस्कान, मेरी नाराज़गी और लाखों का मुआवजा”

  1. मुझे तो अधिक डर मुर्गी का ही लगा, इसलिए मुर्गी को पहले निपटाया 🙂
    टिप्पणीकर्ता चलत मुसाफ़िर ने हाल ही में लिखा है: उसके बिन यात्रा अधूरी : काठमांडूMy Profile

    1. बी एस पाबला

      Approve
      जिससे डरो , उसे पहले निपटाओ

      1. R.K.Bafna

        पाबला जी , नेपाल की मुर्गिया शीर्षक से ब्लॉग तो लिखा पर जो फ़ोटो छपी उसमे मुर्गिया तो कही दिखाई नहीं दी जो आपके उदर में जा सके , पर दो बड़ी (मुर्गिया) स्कूटर चलाती जरूर दिखा दी , कही वही तो नहीं ?

  2. आपके धैर्य को प्रणाम करना पड़ेगा, जो टिका रहा।

    1. बी एस पाबला

      Pleasure
      भारी भरकम होने का ये फ़ायदा है , टिके रहने में दिक्कत नहीं होती

  3. Sudhakar Mishra

    बहुत दिन से आपको पढ़ रहा हूँ… आज तो हद हो गयी… टिप्पड़ी करनी ही पड़ी… दल का सम्मान न करने वालो के साथ यात्रा कभी न करनी चाहिए…

    1. बी एस पाबला

      Worry
      किया भी क्या जा सकता है जब साथ हों

  4. कुल मिलाकर आप दुखी और नाराज़ बने रहे !

    1. बी एस पाबला

      Sad
      कुल मिला कर तो नाराज़ हुया कभी कभी
      दुखी होने वाली तो कोई बात ना थी

  5. रोचक ,सभी चित्र अच्छे लगे !
    नेपाल के क़ानून में एक मुर्गी की मौत पर,अजीब क़ानून लगा,,,?
    विजयादशमी की शुभकामनाए…!

    RECENT POST : – एक जबाब माँगा था.
    टिप्पणीकर्ता dheerendra singh bhadauriya ने हाल ही में लिखा है: एक जबाब माँगा था.My Profile

    1. बी एस पाबला

      Heart
      शुभकामनाएं आपको भी

  6. … …. ….. बोलो कितने चूजे?

    1. बी एस पाबला

      Daze
      हिसाब लगाना पडेगा

  7. ” नेपाल के क़ानून में एक मुर्गी की मौत पर उसके मालिक को यह गणना कर मुआवजा दिया जाता है कि इस मुर्गी के अण्डों से कितने चूजे होंगे और फिर उन अण्डों से निकले चूजों के व्यस्क होने पर उनसे कितने चूजे होंगे और उन चूजों के कितने ………… और उन चूजों के चूजों के चूजों के कितने …. ”
    Amazed

    फिर होटल में मिलने वाले मुर्गो का हिसाब कैसे लगाया जाता होगा ???

    Thinking

    आप के धर्य को नमन ! Angel
    टिप्पणीकर्ता Shivam Misra ने हाल ही में लिखा है: दुर्गा भाभी की १४ वीं पुण्यतिथिMy Profile

    1. बी एस पाबला

      Tired
      हिसाब लगाने लगूंगा तो थक जाऊंगा

  8. बाप रे बाप , ये एक दिन तो एक युग सरीखा बीता सर , इतनी सारी बातें एक साथ , कमाल है सर और मुर्गी के चूज़ों का मुआवजा तो हैरान कर देने वाला लगा 🙂
    टिप्पणीकर्ता अजय कुमार झा ने हाल ही में लिखा है: जागृति ….तुम्हारा सरनेम क्या था (इश्कनामा-I)My Profile

    1. बी एस पाबला

      Amazed
      हैरानगी तो मुझे भी हुई थी

  9. Prashant PD

    हम उत्तर बिहार के रहने वालों को नेपाल अपने घर जैसा ही लगता है. खासतौर से बिहार की सीमा से सटे वाले नेपाल के हिस्सों में. कारण यह की वहां दूसरी भाषा के तौर पर मैथिलि बोली जाती है.
    पढता जा रहा हूँ, आप लिखते जाईये. 🙂

    1. बी एस पाबला

      Smile
      अपनी बोली से अपनापन तो लगता ही है

  10. विकट यात्रा और अनुभव

    1. बी एस पाबला

      Wink
      काश! आप साथ होते

  11. Shikha Varshney

    हम्म…. भोजन प्रबंध ने दुखी और नाराज किआ …

    1. बी एस पाबला

      Censored

  12. बेहद सुन्दर काठमांडू यात्रा विवरण. मुझे हैरानी हो रही है कि इतनी लम्बी दूरी आप लोगों ने सड़क मार्ग से की. आप लोगों की हिम्मत की दाद देता हूँ.
    टिप्पणीकर्ता PN Subramanian ने हाल ही में लिखा है: ब्रेड फ्रुट ट्री – हमारा कल्प वृक्षMy Profile

    1. बी एस पाबला

      THANK-YOU

  13. मनीष सेठ

    आप की नाराज़गी ……..कुछ सयंम रखना चाहिए था ……….खैर …..यह भी अनुभव है ….:)

    1. बी एस पाबला

      Ssshh
      गलत बात पर संयम!

  14. होटल में रात ११ बजे के बाद खाना नहीं मिलता…

    होटल में दोपहर १ बजे के बाद खाना नहीं मिलता…

    रात को बफे में अकेले पहुंच जाओ तो खाना नहीं मिलता…

    या इलाही, ये कैसी जगह है भाई…

    जय हिंद…

    1. बी एस पाबला

      Whistling
      आप संग होते तो जान जाते

  15. मोती बाफना

    आपके गुस्से के बारे पढ़कर.. प्यार आया आप पर. बेहद रोचक

    1. बी एस पाबला

      In Love
      पल भर के लिए ही सही

  16. आपकी फोटो ने काठमांडू की असली यात्रा करा दी है…सड़कें…ट्रैफिक…घर…चलते-फिरते लोग…खुला आसामान और धरती..ये चीजें एक साथ देखने को मिले तब ही सही मायने में किसी शहर के दर्शन होते हैं….। फिलहाल तो यात्रा पढ़ने के बाद तय कर लिया है कि अगर काठमांडू जाना हुआ तो एक ही दिन में वापसी करने में भलाई है। पशुपतिनाथ के दर्शन ही कापी होंगे वहां…यात्रा वृतांत जैसे-जैसे आगे बढ़ता जा रहा है जाने का ग़म कम होता जा रहा है..

    1. बी एस पाबला

      `THANK-YOU

  17. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज मंगलवार (15-10-2013) “रावण जिंदा रह गया..!” (मंगलवासरीय चर्चाःअंक1399) में “मयंक का कोना” पर भी है!

    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का उपयोग किसी पत्रिका में किया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।

    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर…!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

    1. बी एस पाबला

      Heart
      आभार आपका

  18. अरे वाह !!! यहाँ की मुर्गियां दाल बराबर नहीं होतीं. बिलकुल नयी जानकारी.
    पुरानी हिन्दी फिल्मों के इनसे सम्बन्धित हलके-फुल्के सीन कहीं इन्हीं से प्रेरित तो नहीं 🙂

  19. girish pankaj

    अभी-अभी यात्रा-वृत्तांत पर नज़र गई। और मै आनंद में डूब गया। इस वृत्तांत में तो कमाल ही हो गया। आपकी दो आँखों से से ज़्यादा व्यापक है आपकी कैमरा-नज़र . वो कहाँ-कहाँ नहीं देखती . नेपाल को बारीकी से पकड़ती है . वहां की संस्कृति , कानून व्यवस्था, और भी बहुत कुछ . आपका व्यक्तित्व भी उभर कर सामने आता है। खान-पान, रहन-सहन, उदारता, सहजता, सक्रियता, आत्म-प्रचार से परे हो कर दूसरों को महत्व देना। ‘बनारसी’ जैसे बेहद पवित्र व्यक्ति का भी जिक्र सबके सामने आना ज़रूरी था. कुल जमा यह कि नेपाल-यात्रा संस्मरण पर लिखा गया हर अध्याय ऐतिहासिक बन गया है।

  20. बड़ा खतरनाक जुरमाना ,
    रोचक लेखन |
    टिप्पणीकर्ता डॉ अजय कुमार ने हाल ही में लिखा है: हर संडे डॉ.सिन्हा के संग-५My Profile

  21. पैर ठीक होता तो अधिक मजा आता आपको। पर्स चुराने और मुआवजे वाली बात मजेदार रही। मुर्गी सोने के अंडे देने वाली निकली तो और बुरा…

  22. एक फ़ोटो तो सबसे सुंदर है 🙂

  23. अप्रितम .. शानदार डिटेल के साथ पूरा काठमांडू घुमा दिया … पर साथ हम भी थे 🙂
    और आपका साथ किसको न भाये ……….:)

  24. रोचक संस्मरण …तस्वीरें बहुत सुन्दर हैं .

  25. archana

    आपके साथ यात्रा करने का मन हो आया है …

  26. खूबसूरत रचना

  27. pradeep

    अरे, इंडियन लोग, त्यों क्यों आते हो नेपाल में,? इंडिया में घुमो, इंडिया में भी साइज साइज का मुर्गी मिलती हे, नेपाल को हंसी मजाक में उड़ाते हो ? जैसा भी हे , हमारा देस नेपाल प्यारा हे .अगर में परेसानी जे तो नेपाल मत आओ और दुसरो को भी मत भेजो

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