पंजाब से भिलाई की वो राह जिस पर दुबारा नहीं जाना मैंने!

जब भी किसी नए यात्रा संस्मरण को लिखने की सोचता हूँ तो सामने आ जाती है हकीकत कि अभी तो पिछला ही नहीं लिख पाया तो हालिया बातें कैसे लिखूं? इस बार भी वही हो रहा.

पिछले वर्ष 2014 में  भिलाई से पंजाब जाने के लिए यात्रा हुई थी पिताजी के साथ. इसमें अपनी ही चौपहिया गाड़ी दौड़ाते हुए सागर शहर से होते हुए आगरा में रात बिता कर दिल्ली होते हुए पंजाब के किन्नू और ठण्ड के मज़े लेता हुया अपनी बेटी और पिताजी संग जा पहुंचा था अपने गाँव.

जाने के बारे में इतना सब तो लिख चुका लेकिन वापसी के बारे में आलस कर गया. अब जब याद आया तो लिखना पड़ेगा ही.

हुआ कुछ यूं था कि जिस काम के लिए गया था गाँव, उसके लिए मुझे अकेले ही कई बार कोहरे भरे दिनों में लुधियाना-फिल्लौर-नवांशहर मार्ग के चक्कर लगाने पड़े.

लुधियाना के सराभा नगर वाले लक्मे के उस ब्यूटी पार्लर भी गया जहाँ एक भावी दुल्हन पर महीना भर पहले ही एक सिरफिरे युवक ने तेजाब फेंक दिया था. नवांशहर के रामसन्स के मशहूर लड्डू की खेप भी उठाई. अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में माथा भी टेका.

पंजाब यात्रा के अंतिम चरण में अमृतसर से लौटते हुए जालंधर-फगवाड़ा राजमार्ग पर हवेली में हम पिता-पुत्री ने शाम का नाश्ता किया और फिर धुंधला चुके अँधेरे में स्मार्ट कार की कन्या नेविगेटर ने गाँव जाने के लिए राह पकड़ा दी फगवाड़ा-नवांशहर की, जो कि हमारे रूट में नहीं था.

पंजाब से भिलाई और फगवाड़ा की हवेली

पंजाब से भिलाई और कोहरे भरी राहें

19 जनवरी को हम गाँव से लौट पड़े वापस दिल्ली. राह थी माछीवाड़ा-खन्ना-करनाल-दिल्ली. जब तक पहुंचा शाम को, तब तक थकान हावी हो चुकी. दूसरे दिन बिटिया की रवानगी थी निज़ामुद्दीन स्टेशन से पुणे दुरंतो एक्सप्रेस से.

पहले तो मैंने सोचा कि बिटिया को हज़रत निज़ामुद्दीन स्टेशन पर छोड़ते हुए आगरा रवाना हो जायेंगे. लेकिन बुखार जैसा महसूस हो रहा था तो यह इरादा त्याग ही दिया मैंने.

20 जनवरी की सुबह 11 बजे ट्रेन की रवानगी थी. बिटिया को ले कर मैं पहुँच गया 10 बजे ही. सराय काले खां की तरफ से जब स्टेशन की ओर अपनी मारुति ईको मोड़ी, तो हैरान रह गया बेतरतीब ट्रैफिक देख कर. कोशिश की आगे बढ़ने की लेकिन सामने दिखे सड़क पर गड़े ऐसे खंभे, जिनके बीच से दो-पहिया वाहन ही निकल सकते थे.

पास ही के पार्किंग क्षेत्र की ओर इशारा करते एक लड़का हमें ले गया अंदर तक. कार खड़ी की तो पार्किंग टिकट थमाते बंदे ने आदेश दिया कि गाड़ी की चाबी उसे दे दी जाए. मैं उलझन में कि इसमें तो नेविगेटर, ब्लैक बॉक्स, ट्रैकर लगे हैं. कैमरा भी पड़ा है और कई दूसरे सामान भी!

पार्किंग वाले ने बड़ी रूखी आवाज़ में फिर मुझसे चाबी माँगी और अपना एक हाथ उठाते हुए कम से कम पचास चाबियाँ समेटे एक लोहे की तार का गोला दिखाया कि ये सब चाबियाँ दे गए हैं गाड़ियां खड़ी करने वाले.

उधर बड़ा सा ट्राली सूटकेस ले जाती बिटिया की आवाज़ आने लगी कि जल्दी आओ. हार कर दर्शनशास्त्र याद किया कि कोई कुछ भी ले जाएगा… किस्मत तो नहीं ले जाएगा ना!… चाबियाँ दी उसे और चल पड़ा स्टेशन की तरफ.

लौट कर बुआ के घर पहुंचा तब तक बुखार तपाने लग गया था. दवा ले कर शाम तक सोया रहा. रात तक यही इरादा रहा कि एक दिन और रूका जाए. लेकिन सुबह होने के पहले ही मन बदला और फिर मैं नहा कर, चाय पी कर बुआ के परिवार से विदा ले पिताजी संग चल पड़ा भिलाई की ओर 21 जनवरी को.

नॉएडा आते ही कोहरे ने घेर लिया. जब मैंने यमुना एक्सप्रेस वे पर जेवर टोल प्लाज़ा पर आगरा के लिए 320 रूपये का भुगतान किया तब सुबह के साढ़े सात बज चुके थे.

पंजाब से भिलाई और आगरा में फोटो

ढाई घंटे बाद, 10 बजे के आसपास, आगरा से निकलते निकलते याद आया कि भिलाई से रवानगी के समय कैमरा में मेमोरी कार्ड डालना भूल गया था तो पंजाब से लिए मेमोरी कार्ड से भी तो अभी तक कोई फोटो ली नहीं! तब, छोटी सी स्कूटी में बड़ा सा हेलमेट और नंबर प्लेट पर बड़ा सा Police लिखा देख एक फोटो ले ली.

तब तक बारिश शुरू हो चुकी. रफ़्तार काबू में रखते, टोल टैक्स पटाते बढ़ ही रहा था कि भूख लग आई. एक जगह सैकड़ों ट्रकों का जमावड़ा देख अपनी मारुती ईको किनारे की. तिरपाल की छत वाले, चारों ओर से खुले ढाबानुमा दूकान में आलू के परांठों का आर्डर दिया. पिताजी को तो गाड़ी में ही दे दिया गया और मैंने अंदर जलते अलाव के पास बैठ कर चाय के साथ आनंद लिया.

दोपहर हम जा पहुंचे मुरैना. भुवनेश शर्मा जी से वायदा तो किया था लौटते हुए मिलने, रूकने का लेकिन लगातार होती बरसात और लबालब सडकों को देख मैंने उन्हें कॉल ही नहीं किया, चुपचाप आगे बढ़ गया.

ग्वालियर के बाद झांसी पार कर एक ऐसी सड़क मिली जो किसी बनते ओवरब्रिज का कारण राह परिवर्तित कर किसी गाँव से निकाली गई थी. ऊबड़खाबड़ कच्ची पक्की सड़क, आड़ा तिरछा एक रेलवे क्रासिंग, फिसलन भरे मोड़ों से निकल वापस मुख्य मार्ग तक आते एक घंटे से ज़्यादा का समय लग गया.

यहीं आ कर गड़बड़ हो गई. मन में तो पहले से ही था कि लौटते हुए किसी दूसरी राह से लौटा जाए, टीकमगढ़ – जबलपुर – मंडला हो कर चला जाए. सो रुख कर लिया झांसी से ओरछा की ओर.

पंजाब से भिलाई की राह में ओरछा
ओरछा के मंदिर की यह तस्वीर, इष्ट देव सांकृत्यायन जी के ब्लॉग से ‘उड़ा’ लाये हैं

ओरछा का नाम सामने आते ही याद आये यहाँ आबकारी विभाग में पदस्थ  मुकेश पाण्डेय चंदन जी! उनका मोबाइल नंबर तो था मेरे पास लेकिन अंधेरा घिरने लगा और मंजिल दूर थी. सो बढ़ लिए चुपचाप. ओरछा भ्रमण पर इष्ट देव सांकृत्यायन जी और संदीप पंवार जी के संस्मरणों का ख्याल भी आया लेकिन समय किधर था!

हम अभी भगवंतपुरा के पास ही थे कि एक पुलिस का सिपाही, हाथ से रूकने का इशारा करता दिखा. उसे आज़ाद्पुरा जाना था, बैठा लिया.

बेतवा नदी पार करते तो अंधेरा घना हो चुका. अगला बड़ा शहर टीकमगढ़ बताया गया. भूख लग आई तो पृथ्वीपुर में सड़क किनारे के ढाबे में बढ़िया अंडे की भुर्जी और परांठे डकारे.

सुनसान अंधेरी ठंडी रातों में अनजान राहों पर धीरे धीरे मारुति ईको चलाते टीकमगढ़ पहुँचना हुआ रात 10 बजे. सामने ही होटल दिखा. अब नाम भूल गया उसका 🙁 नीचे ही है रेस्टारेंट. पिता जी ने मेनू से फ्रूट रायता पसंद किया और मैं पहुँच गया रेस्टारेंट में. मनपसंद कुछ ना मिला तो सांबर डोसा संग नूडल्स ही गटके.

इस बीच बातचीत करते मुझे बता दिया गया कि जिस रास्ते पर जाने का इरादा है वह ठीक नहीं, ललितपुर हो कर जाना ठीक रहेगा. मैं असमंजस में पड़ गया. अब क्या किया जाए? जबलपुर के मित्रों से बात की तो उन्होंने भी समय प्रबंधन के लिए ललितपुर की एशियाई हाईवे वाली राह की सलाह दी.

सुबह देर हो गई उठने में. ठन्डे मौसम में गर्म पानी से नहाना पड़ा और ब्रेड आमलेट के नाश्ते बाद 22 जनवरी को अपनी गाड़ी वापस चल पड़ी जबलपुर का इरादा छोड़ पुरानी राह, ललितपुर होते हुए.

टीकमगढ़ से निकलते ही मिली शानदार मलाई जैसी सड़क. अंतर्राष्ट्रीय मापदंडों पर बनी सड़क लगी मुझे तो ये. बस स्टॉप, लेन मार्किंग, साफ़ सफाई सब कुछ व्यवस्थित. मैं हैरान हो रहा था कि इस स्टेट हाईवे 10 का ऐसा कायाकल्प इस वीरान इलाके में कैसे! वो भी बिना किसी टोल के!

बानपुर के गुजरते जैसे कि मति मारी गई हो, शॉर्ट-कट के चक्कर में मैंने कार मोड़ दी महरौनी की तरफ और फिर सामना हुआ गाँवों से गुजरती एक ऐसी सड़क का, जो बड़े बड़े बोल्डर डाल कर बनाई ही जा रही. दो बार तो लगा कि वापस मुड़ा जाए लेकिन जगह भी तो मिले गाड़ी घुमाने की.

इस सबका नतीजा यह यह हुया कि मालथौन के टोल प्लाज़ा पर जब 30 रूपये की पर्ची कटाई तो सुबह के दस बज चुके. और फिर खाते पीते, सुस्ताते हुए हम पिता-पुत्र सागर, नरसिंहपुर, लखनादौन, सिवनी, बालाघाट होते जब गोंदिया पहुंचे तो रात के आठ बज चुके थे.

रात ग्यारह बजे मैंने भिलाई पहुँच घर के गेट का ताला खोला तो मन ही मन तौबा कर रहा था कि ऐसी राहों पर जानबूझ कर दुबारा नहीं जाना मैंने.

ठीक सोचा ना मैंने?

पंजाब से भिलाई की वो राह जिस पर दुबारा नहीं जाना मैंने!
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11 Thoughts to “पंजाब से भिलाई की वो राह जिस पर दुबारा नहीं जाना मैंने!”

  1. सोचा तो ठीक ही, पर न जाएंगे ऐसा हो सकता है क्या?

    1. बी एस पाबला

      Smile
      ये तो है!

  2. स्वादिष्ट यात्रा 🙂
    टिप्पणीकर्ता ARVIND PANDEY ने हाल ही में लिखा है: दही की 25 बेहतरीन खूबियाँ और प्रयोग से होने वाले लाभMy Profile

  3. बी एस पाबला

    Who-s-the-man
    सुन्दर बातें

  4. हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल बुधवार (08-04-2015) को “सहमा हुआ समाज” { चर्चा – 1941 } पर भी होगी!

    सादर…!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

    1. बी एस पाबला

      THANK-YOU
      शुक्रिया रूपचन्द्र जी

  5. Shiv Kumar Dewangan

    बड़े भैय्या पाब्ला जी,
    चुनौतियों से जूझने का आपका एक अलग ही अंदाज़ है. आप कहीं जाएँ और रास्ते में मुसीबतें न आये, ऐसा हो ही नहीं सकता, पर उससे निपटने का आपका तरीका भी अलहदा रहता है. इसलिए आप यात्रा करते रहें, और हमें घर बैठे-बैठे नयी-नयी जगहों पर घुमाते रहें.
    धन्यवाद.

    1. बी एस पाबला

      Happy
      कभी चलिए हमारे संग

  6. Imran Jamal

    पाबला जी रायपुर से अजमेर और आगरा से बरेली औऱ बरेली लखनऊ जबलपुर से रायपुर तक यात्रा मैने बाईक से सन २००७ मे की है और अभी मार्च २०१५ मे इसी रूट से मारूति आल्टो से यात्रा की है कभी रूट बनाओ तो इस घुमक्कड को याद करना मेरा मो. ९८२७१६२९१५ है

    1. बी एस पाबला

      Heart
      अरे वाह! आप तो हमारे हमख्याल निकले इमरान जी

      कोई मौका लगा तो ज़रूर साथ रहेंगे

  7. Imran Jamal

    जी हां मै भी आप ही की तरह घुमक्कड़ ख्यालो वाला आदमी हू छत्तीसगढ़ की कोई सड़क शायद नही होगी जिसे मैने बाईक से नापा न हो चाहे दिन हो या रात हर मौसम के ड्राइव की है रही कार की बात तो एक रात मे लखनऊ से मंडला तक लगातार चलाई जब कभी मूड होता है तो रात हो या दिन बस कार मे निकल जाता हू बहुत खराब और बूरे से बूरे रास्तो मे चलने अनुभव है जनाब कभी वक्त मिला तो अपना अनुभव आप से शेयर करूंगा वैसे भी मै रायपुर मे रहता हू कभी मिला तो जरूर

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