बीयर की दीवानगी, मोटरसाइकिल का बिगड़ना और रात का वह नज़ारा

भारत से रवानगी के बाद विदेशी धरती पर पहला कदम और मिस्त्र, इटली, ऑस्ट्रिया होते हुए मोटरसाइकिल पर विश्व भ्रमण का कीर्तिमान बनाने वाले भिलाई के दो नवयुवक रवाना हो गए तत्कालीन पश्चिमी जर्मनी की ओर।

पुनर्निर्माण के बाद बने सुपर हाईवे (Autobahns) पर 100 किलोमीटर से अधिक की रफ़्तार से मोटरसाइकिल दौड़ाते हुए 8 जुलाई को जा पहुँचे म्यूनिख। रूकना हुआ गेरेस्ट्राईड (Gerestried) में कपूर परिवार के साथ, जिनका परिचय, भिलाई में सुनील थवानी के पड़ोसी, चोपड़ा परिवार से था।

9 जुलाई को स्टुटगार्ट (Stuttgart) होते हुए 11 जुलाई को दस्तक दी गई फ़्रैंकफर्ट (Frankfurt) में। जहाँ महेन्दर सिंह सामी के घर रूकना हुआ। बर्लिन से 35 किलोमीटर उत्तर स्थित नाज़ी कैम्प वाले शैक्सन्होज़ेन (Saxenhausen) का भ्रमण कर वापस लौटे तो फ़्रैंकफर्ट में इनकी मुलाकात हुई भारत सरकार के पर्यटन कार्यालय के निदेशक श्री बी एस ददलानी से।

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साप्ताहिक हिन्दुस्तान के 8-14 जुलाई 1984 अंक में इस अभियान को मिली जगह

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एक स्थानीय समाचारपत्र Bild Frankfurt में इस अभियान की खबर

14 जुलाई से 17 जुलाई के मध्य बॉन (Bonn) औद्योगिक पट्टी, रूहर (Ruhr) घाटी, Dusseldorf. Duisburg, Hannover जैसी जगहों का भ्रमण हुआ। ठहरना हो रहा था एम एन दस्तूर वाले संजीव सिन्हा जी के घर।

17 जुलाई को पदार्पण हुआ एक दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण बंदरगाहों में से एक हैम्बर्ग (Hamburg) में। यहीं मोटरसाइकिल के स्पोक बदले गए, चक्कों का संतुलन ठीक किया गया।

राह चलते एक स्थान पर देखा कि किसी फिल्म की शूटिंग चल रही है। लपक कर दोनों जा पहुँचे वहाँ तो पता चला किसी विज्ञापन फिल्म की शूटिंग है। अनिरूद्ध ने झट से मॉडल के साथ एक फोटो खिंचवा लिया।

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हैम्बर्ग में एक मॉडल के साथ, अनिरुद्ध

जो भी जर्मनी को देख पाता होगा उसके दिलो-दिमाग पर, बीयर की दीवानगी के बावज़ूद, इस देश की साफ-सुथरी, व्यवस्थित और अनुशासित छवि ज़रूर अंकित होती होगी। सुनील व अनिरूद्ध का कहना है कि इन्होंने वहाँ के युवा काफी फैशनेबल मिले। बेशक वे अपनी कारों और इलेक्ट्रॉनिक सामान पर गर्व से बातें करते हों लेकिन साथ ही साथ परमाणु हथियारों के बारे में चिंतित दिखे।

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हैम्बर्ग में छतवानी परिवार के साथ अनिरुद्ध

हैम्बर्ग में ठहरना हो रहा था दिलीप छतवानी परिवार के साथ. अब तक वे राजमार्गों पर नियमित रूप से सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा कर चुके थे। राह में मिलने वाले हाथ लहरा कर इनका स्वागत करते थे।

जब भी ये दोनों कभी रूक कर बातें करने लगते तो उन अज़नबियों की आश्चर्यमिश्रित प्रतिक्रिया मिलती। इनमें से कईयों ने तो अपने शहर, घर आने का आग्रह भी किया।

 पुत्तर्गार्टन (Puttgarten) से होते हुए वे 21 जुलाई को जा पहुँचे डेनमार्क के रोड्बी (Rodby)। जैसे जैसे वे आगे बढ़ रहे थे, ठंडक बढ़ने लगी थी। डेनमार्क में कोपेनहेगन (Copenhagen) की ओर जैसे जैसे बढ़ रहे थे यातायात बस सरकता सा लगा।

हेलसिंगर (Helsinger) से फ़ेरी द्वारा जब स्वीडन की ओर 23 जुलाई को रवानगी हुई तो अधिकारियों ने इनके पासपोर्ट तक जाँचने की जहमत नहीं उठाई। यहीं मुलाकात हुई पियरे बर्ज़ियर से, जो बाद में बुसेल्स में मेज़बान थे।

पिछले चक्के के 2-3 स्पोक रोज़ाना टूट रहे थे। तकलीफ़ बढ़ने लगी थी। उस रात जोन्कोपिंग (Jonkopping) में साढ़े ग्यारह बज़े सोने जा रहे थे तो दूर गगन में सूर्य अपनी लालिमा बिखराते हुए अस्त हो ही रहा था।

सुबह जब भोर की पहली किरण फूटी तो चलने की तैयारी की जाने लगी। घड़ी पर निगाहें पड़ी तो हैरानगी की हद ना रही, अभी तो सुबह के 3 ही बज़े थे!

 

24 जुलाई को वे चले स्टॉकहोम (Stockholm) की ओर। 70 किलोमीटर पहले ही पिछला चक्का बुरी तरह डगमगाने लगा। 12 स्पोक जो टूट गए थे!

आखिरकार सुनील पूरे सामान के साथ उतरे और एक ट्रेलर पर लिफ़्ट ली। डरते डरते, मन ही मन चक्के के सलामत रहने की दुआ करते, धीरे धीरे चलते अनिरुद्ध पहुँच गए मंज़िल तक।

stockholm-guha-thawaniस्टॉकहोम पहुँचते ही राह की सारी दिक्कतें बेमानी सी लगीं। खूबसूरत झीलों से घिरा यह शहर और उस पर आकर्षक प्राचीन शहर गमला स्टान (Gamla Stan) अद्वितीय! तबीयत हरी हो गई।

मोटरसाइकिल को ले कर धुकधुकी बनी हुई थी क्योंकि अभी 650 किलोमीटर वापस भी लौटना था कोपेनहेगन। बारिश शुरू हो चुकी थी। बुरी तरह भीग चुके थे दोनों।

28 जुलाई की शाम अंधेरा होने पर पता चला कि मोटरसाइकिल की हेडलाईट और पीछे की बत्तियाँ काम नहीं कर रहीं। ऐसे वक्त पर उस तीव्रगामी राजमार्ग पर चलना बेहद जोखिम वाला काम था।

यहाँ भारत का अनुभव काम आया! बेहद किनारे चले हुए, टॉर्च की रोशनी में दिशा-सूचना पटल पढ़ते हुए जब रात 11 बज़े कोपेनहेगन पहुँचे तो एक मुफ़्त रॉक शो इंतज़ार कर रहा था!

29 जुलाई को हैम्बर्ग (Hamburg) वापस आ कर मोटरसाइकिल की मरम्मत की और चल पड़े ब्रेमन (Bremen) होते हुए हॉलेंड के शहर एम्सटर्डम (Amsterdam)। हरे-भरे मैदानों में चरते पशु, राजमार्गों के किनारे साइकिलों के लिए अलग सड़क! दरअसल यहाँ साइकल के लिए दीवानगी सी है।

एम्सटर्डम में वे रूके, पतरास की फ़ेरी में सहयात्री रहे विलियम टेयून व निन्नी क्रान के घर, जो खुद यात्रायों में रुचि रखते हैं। उन्होंने अपने यात्रा संस्मरणों से चकित ही किया। एमस्टर्डम कुछ कुछ वेनिस जैसा ही था, पक्की नहरों से पटा हुआ।

यूरोप का डैम चौराहा, संगीत, नृत्य जैसी कला में रूचि रखने वालों के लिए एक जीवंत स्थल है। यहाँ, ऐसी किसी भी विधा वाले अपना हुनर दिखा कर कुछ धन कमा सकते हैं।

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हेग में भारतीय दूतावास का पत्र)

 

4 अगस्त को जुलाई बेल्जियम (Belgium) की ओर बढ़ते हुए हेग (Hague) व रोटरडाम (Rotterdam) देखने का भी मौका मिला। हॉग में भारतीय दूत श्रीमती कोचर से सौजन्य भेंट हुई।

मोटरसाइकिल से किये गए विश्व भ्रमण के संस्मरणों को कुल 10 आलेखों में संजोया गया है. सारे आलेखों की सूची के लिए यहाँ क्लिक करें»

 

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हॉलेंड के एक समाचार पत्र Holland Motor News का पृष्ठ

 

बेल्ज़ियम पहुँच कर भिलाई के इन नौज़वानों ने किस तरह एक मोटर बाईक रैली में हिस्सा ले कर दूसरा स्थान प्राप्त करने का रोमांच हासिल किया। यह अगली पोस्ट में।

लेकिन आप रोमांचित हो रहे हैं या नहीं? आइये चलें अगले सफर पर जहाँ है बाईक रैली के पुरस्कार, जर्मन युवती और बुल फाईट

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  5. बीयर की दीवानगी, मोटरसाइकिल का बिगड़ना और रात का वह नज़ारा
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बीयर की दीवानगी, मोटरसाइकिल का बिगड़ना और रात का वह नज़ारा” पर 21 टिप्पणियाँ

  1. अविश्वसनीय किन्तु सच जैसा रोमांचपूर्ण वर्णन

  2. इस बार आप की रफ्तार पकड़ पाए हम। अब लगता है कि इस यात्रा में काश हम भी होते।

  3. बहुत अच्छा चल रहा है , यात्रा का वर्णन।
    मोडल बहुत खूबसूरत है जी ।

  4. सुपठनीय, रोचक-रोमांचक यात्रा वृत्तांत

  5. बहुत उपयोगी जानकारी!

  6. पढ़ कर मजा आ गया
    आख़री फोटो देख कर मजा दोगुना हो गया 🙂

  7. जुनून है
    यदि किसी ने ठान लिया कुछ कर दिखाने का
    तो कुछ भी असम्भव नही
    बढिया
    अतके लिख सकथौ
    मै आँव छत्तिसगढिया

  8. दोनों युवकों ने विश्व कीर्तिमान स्थापित किया.कितनी मेहनत ,जीवन्तता,जीवटता के साथ यात्रा पूरी की होगी.उनके साहस के आगे नतमस्तक हूँ.
    हमे तों फ्री में विश्व भ्रमण करने को मिल रहा है.
    ये बताईये इस कीर्तिमान के लिए राज्य और केन्द्रीय सरकार ने क्या क्या सम्मानऔर लाभ दिए ?क्या डिपार्टमेंट ने उन्हें पदोन्नति दी?
    क्रिकेटर्स को इतना कुछ प्राप्त होता है,सिमित साधनों में इन दोनों जवानों ने जो किया वो अकल्पनीय है.
    प्लीज़ बताइये क्योंकि ये हमारे देश का दुर्भाग्य है हम सेलिब्र्तीज़ को पलकों पर बिठा लेते हैं .
    नेता अभिनेता को दस्त भी लग जाए तों आपात,गम्भीर,राष्ट्रीय-समस्या का रूप ले लेती है.यहाँ इस कीर्तिमान को पच्चीस साल हो गए आप ना बताते तों शायद हम जान भी ना पाते.
    आपके इस प्रयास कि जितना सराहना कि जाये कम है.दोनों के क्लोज उप फोटो भी दे.

  9. दोनों युवकों ने विश्व कीर्तिमान स्थापित किया.कितनी मेहनत ,जीवन्तता,जीवटता के साथ यात्रा पूरी की होगी.उनके साहस के आगे नतमस्तक हूँ.
    हमे तों फ्री में विश्व भ्रमण करने को मिल रहा है.
    ये बताईये इस कीर्तिमान के लिए राज्य और केन्द्रीय सरकार ने क्या क्या सम्मानऔर लाभ दिए ?क्या डिपार्टमेंट ने उन्हें पदोन्नति दी?
    क्रिकेटर्स को इतना कुछ प्राप्त होता है,सिमित साधनों में इन दोनों जवानों ने जो किया वो अकल्पनीय है.
    प्लीज़ बताइये क्योंकि ये हमारे देश का दुर्भाग्य है हम सेलिब्र्तीज़ को पलकों पर बिठा लेते हैं .
    नेता अभिनेता को दस्त भी लग जाए तों आपात,गम्भीर,राष्ट्रीय-समस्या का रूप ले लेती है.यहाँ इस कीर्तिमान को पच्चीस साल हो गए आप ना बताते तों शायद हम जान भी ना पाते.
    आपके इस प्रयास कि जितना सराहना कि जाये कम है.दोनों के क्लोज उप फोटो भी दे.

  10. दोनों युवकों ने विश्व कीर्तिमान स्थापित किया.कितनी मेहनत ,जीवन्तता,जीवटता के साथ यात्रा पूरी की होगी.उनके साहस के आगे नतमस्तक हूँ.
    हमे तों फ्री में विश्व भ्रमण करने को मिल रहा है.
    ये बताईये इस कीर्तिमान के लिए राज्य और केन्द्रीय सरकार ने क्या क्या सम्मानऔर लाभ दिए ?क्या डिपार्टमेंट ने उन्हें पदोन्नति दी?
    क्रिकेटर्स को इतना कुछ प्राप्त होता है,सिमित साधनों में इन दोनों जवानों ने जो किया वो अकल्पनीय है.
    प्लीज़ बताइये क्योंकि ये हमारे देश का दुर्भाग्य है हम सेलिब्र्तीज़ को पलकों पर बिठा लेते हैं .
    नेता अभिनेता को दस्त भी लग जाए तों आपात,गम्भीर,राष्ट्रीय-समस्या का रूप ले लेती है.यहाँ इस कीर्तिमान को पच्चीस साल हो गए आप ना बताते तों शायद हम जान भी ना पाते.
    आपके इस प्रयास कि जितना सराहना कि जाये कम है.दोनों के क्लोज उप फोटो भी दे.

  11. वाह जी मजा आ गया, वैसे ये बाइक भ्रमण बहुत ही जीवटता वाला काम है। हमारी भी बड़ी इच्छा है कि बाइक से राजस्थान नाप लें।

  12. जीवन चलने का नाम,
    चलते रहो सुबह-शाम…

    डॉ दराल सर, आज पता चला कि आप सिर्फ नब्ज़ के ही नहीं सुंदरता के भी अच्छे पारखी हैं…

    जय हिंद…

  13. कमाल का विवरण्। ये नक्शे कैसे बनाए आअप्ने। अपनी पस्न्द के निशान और मोट्रसायकिल भी। ये कैसे बनाते हैन किसि पोस्त में बताने का कस्ट करें

  14. निश्चय ही इन तसवीरों को सँजोने और इस साहासिक यात्रा से जुड़ी जानकारियों को पाठकों के सामने प्रस्तुत कर बड़ी मेहनत का काम किया है आपने.

  15. पत्नी को फिजियोथरेपी के ले जाने के कारण समय नही
    मिल पा रहा है,आज रविवार होने के कारण में आपकी
    यह पोस्ट पड़ पाया हूँ,अच्छी साहसिक यात्रा का वर्णण पड़ कर अच्छा लगा ।

  16. अब देखिये ललित भैया वाली पोस्ट पर हमें तों कमेन्ट बॉक्स मिला नही तों हमने सोचा क्यों न विश्व रिकोर्ड वाली पोस्ट के माध्यम से हम अपनी बात अपने दोनों शेरोन तक पहुंचा दी जाए.
    हम भी डायरेक्ट बिना सीडी(sidhee नही छप रहा तो हम क्या करें?)के उपर चढ़ गए और पहुँच गए ललित जी के पास.और बोले -'' बहुत नही जानते हम आपको,पर..हम भी डिफेन्स वालों की फेमिली से ही है चाचा,बड़े पापा(३),उनके तीन बेटे हमारे अपने पापा सभी इंडियनएयर फ़ोर्स,आनमि और नेवी मे थे और अभी भी है.दादी सीहोर राज घराने के दीवान की बेटी थी .बोल्डनेस,कोंफिडेस और डेअरिंग नेचर हमने उन्ही से विरासत में पाया है.डरना तों सिखाईच नही .खुद से डरते हैं या ईश्वर से.
    जैसा सुना ,पाया कि ललितजी भी बहुत कुछ हमारे जैसे ही है,फिर??????
    यहाँ ब्लॉग की दुनियां में राजनीती,दाव पेच ,उठापटक खूब चलती है ये भी सुना और पढा.
    किन्तु हम उनसे डर जाएँ ?
    हम तों एक बात जानते एक अच्छा व्यक्ति डर कर अच्छाई छोड़ता है तों उसकी बिरादरी कम होती है.यूँ ही तों बुरे या बिना अच्छाई वालों की संख्या बढती जाती है.क्या आप भी वही चाहेंगे.हर फील्ड में गंदगी बढने का एक मात्र कारण मुझे यही दिखा कि अच्छे लोगों ने आगे आना ही नही चाह या वे पीछे हट गए.मुझे नही मालुम आपने ये फैसला क्यों लिया,पर आप जैसा व्यक्ति ????
    अरे!हमें कौन बचायेगा आप जैसे लोगों के कारण तों हम खुद को अकेला नही समझते आपकी इस दुनिया मे कि हाँ हैं कुछ लोग जो हमें उसी तरह सुरक्षा देंगे जैसे आज सेना के कारण देश की जनता सुख चैन से सो पाती है क्योंकि 'वो' जग रहे हैं .
    ऐसा ना करो भैया जी .नही तों टंकी पर चढना हमें भी आता है और हमें तों किसी सिढ+ई की भी जरूरत नही,समीर दादा,पाबला भैया पद्मसिंहजीऔर आप जैसे मित्र,वीरजी के कंधो पर पैर रखा और फुदक कर टंकी पर .वैसे पाबला भैया है ना.फिकर नोट उतार लाएं है पेन भी पकड़ा देंगे.अरे सिपाही हथियार से और लेखक कलम से कितने दिन रह सकते हैं?आजाइए वापस प्लीज़ ललितजी /दादा/ भैया/मेरे बाप
    हा हा हा से

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