बैंगलोर पैलेस की भव्यता और माल्या के मॉल का तिलिस्म

बैंगलोर पैलेस का सुझाव एक दिन पहले ही दिया बिटिया ने, जो कई महीनों से इंतज़ार में थी कि कब मैं बैंगलोर आऊँ और कब वह मेरे साथ वहाँ जाए.

मैं और ललित शर्मा जी दो दिन पहले ही 6 मार्च को  भिलाई से सड़क मार्ग द्वारा हैदराबाद में रूक गोलकोंडा किला देख, अनंतपुर होते 7 मार्च को  बैंगलोर की इलेक्ट्रॉनिक सिटी के होटल पहुंचे थे और 8 मार्च को आशीष श्रीवास्तव जी के निवास पर ब्लॉगर मंडली ने रात्रिभोज का आनंद भी ले चुके.

अब 9 मार्च का सारा दिन बिटिया के नाम! सुबह ही उसने फोन कर बता दिया कि साढ़े नौ बजे तैयार रहना, आते ही चल पड़ेंगे बैंगलोर पैलेस के लिए.

इसी बीच विवेक रस्तोगी जी से व्हाट्सएप्प पर बातचीत में याद दिलाया घर आने का आमंत्रण. मैंने उनसे घर की जीपीएस लोकेशन माँगी जो उन्होंने तुरंत भेज दी.

होटल से 26 किलोमीटर की दूरी मतलब बैंगलोर ट्रैफिक में डेढ़ पौने दो घंटा! मैंने विवेक जी को शाम 7 बजे का समय दे दिया पहुंच जाने का.

आज इस डिजिटल युग में घर, ऑफिस या किसी भी जगह का एड्रेस कोई मायने नहीं रखता. डाक पता अब धीरे धीरे विलुप्त होते चले जाएगा. अब तो बस जीपीएस लोकेशन के सहारे अक्षांश देशांश (Longitude Latitude) मिल जाए फिर तो वहां पहुँचाने के लिए मोबाइल पर मैप्स एप्प या कार में लगा जीपीएस नेवीगेटर अपनी पूरी कोशिश करेंगे.

बैंगलोर पैलेस
हिंदी भाषा वाले कन्या स्वर में रास्ता बताने वाला जीपीएस यंत्र

मैं और ललित जी फटाफट नहा कर, नाश्ता कर रेडी हो गए. बिटिया के आने पर शुरू हुआ मंथन कि ये बैंगलोर पैलेस है कहाँ और कितनी दूर है.

मैंने अपनी स्कूल की पढाई के हिसाब से गूगल मैप पर तलाश लिया टीपू सुल्तान का महल और टीपू सुल्तान का किला. पास पास मौजूद दोनों ही होटल से लगभग 18 किलोमीटर दूर.

गूगल और भी कई स्थान सुझा रहा था. लालबाग बोटैनिकल गार्डन, विश्वेस्वरयिया इंडस्ट्रियल एंड टेक्नोलॉजिकल म्यूजियम, पिरामिड वैली, इस्कॉन मंदिर, कब्बन पार्क वगैरह वगैरह. लेकिन सहमति बनी कि किला और महल देख लेंगे फिर समय बचा तो और कुछ. मैंने नीचे जा कार में कन्या नेविगेटर को टीपू सुल्तान के किले चलने का निर्देश दिया और रवानगी ली साढ़े दस बजे.

bengaluru-bike-toll
इलेक्ट्रोनिक सिटी से एलिवेटेड एक्सप्रेस वे के लिए बाईक वालों से 15 रूपये लिए जाते हैं

45 रूपये टोल टैक्स देने के बाद हमारी स्मार्ट कार कहाँ कहाँ से गुज़री ये पता नहीं लेकिन ट्रैफिक के कारण खूब परेशानी हुई. मैंने, सामने विंडस्क्रीन पर लगे मोबाइल Waze पर भी टीपू किले का कमांड दे रखा था, बिटिया ने भी नेविगेशन चालू रखा था और हमारे कन्या नेवीगेटर तो मुस्तैद थी ही.

तीनों ही हल्ला मचाये जा रहे थे दांयें बाएं मुड़ने के लिए. कोई पूर्व की ओर जाने को कहता कोई पश्चिम की ओर जाने का इशारा करता.

बैंगलोर पैलेस नहीं है यह

आख़िरकार वह टीपू सुल्तान का किला आ ही गया. लेकिन जैसे ही मैंने कार धीमी की तो दिखा गेट के सामने पार्किंग की कोई जगह नहीं, बल्कि किसी हॉस्पिटल जाने का बोर्ड लगा है. मैंने गाड़ी आगे बढ़ा दी कि ‘उधर’ से कोई दरवाजा होगा.

लेकिन  इस कोशिश में हम बढ़ गए बाल गंगाधर फ्लाईओवर के नीचे होते आजाद नगर की ओर. बिटिया ने तब तक कह दिया था कि वहां किले में कुछ नहीं है एक स्कूल का बोर्ड लगा है ऊपर, आप बस अब बैंगलोर पैलेस चलो.

मैं वापस उसी फ्लाईओवर के नीचे ले आया कार और फिर रूक कर पैलेस रोड लिख कर, तलाश कर अपनी कन्या नेवीगेटर को सेट किया. वह ना जाने कहाँ कहाँ से होते हुए हमें ले गई बैंगलोर पैलेस की ओर. यह जरूर याद है कि राह में कर्नाटक विधान सभा की इमारत दिखी थी हमें.

कन्या नेवीगेटर ने जिस गेट के सामने कार रूकवाई वहाँ वह गेट मिला बंद. किसी स्कूल का बोर्ड भी लगा था उस पर. जब तक कोई प्रतिक्रिया होती हमारी, तब तक वहां मौजूद सुरक्षा कर्मी ने इशारा किया पास ही के दूसरे गेट की ओर जाने का.

… और फिर हरे भरे पेड़ों से घिरी एक शांत सी सडक से होती हमारी कार जा पहुंची बैंगलोर पैलेस के सामने.

बैंगलोर पैलेस

पास ही के खुले मैदान पर कुछ गाड़ियाँ खड़ी थीं. मैंने भी वहां एक पेड़ की छाया में कार खड़ी की और हम तीनों चल पड़े बैंगलोर पैलेस के भीतर जाने के लिए.

परिसर के शुरू में ही नंदी की मूर्ति के पास एक अस्थायी सुरक्षा चौकी से आवाज आई कि सामने जा कर टिकट ले लीजिये. घुसते ही सामने एक महिला टेबल कुर्सी लगाए बैठी थी. वहीँ दिखा पर्यटकों को सूचित करता, अलग अलग कामों के लिए रेट वाला चिपका हुआ एक कागज.

बैंगलोर पैलेस रेट

रेट देखते ही मैं हैरान हुया, लेकिन अब इतनी दूर से आए हैं और वह भी बिटिया की चाहत के चलते, तो तीन टिकट  खरीदे मैंने और फोटोग्राफी वगैरह के लिए असहमति जता दी.  बिटिया ने झट एक टिकट लिया कैमरे से फोटो लेने का, कि आए हैं तो फोटो लेनी ही है. मैं तो लूंगी.

फिर तो सारे परिसर में जितनी फ़ोटो ली गईं उसी टिकट के भरोसे ली गई. ध्यान यही रखा गया कि एक समय में किसी एक के हाथ में ही दिखे कैमरा.

टिकट लेते ही महिला ने सामने की ओर इशारा किया ऑडियो हैंडसेट लेने का. मेरा ड्राइविंग लाईसेंस बतौर जमानत रख, भाषा पूछ कर हमें पुराने नोकिया  मोबाइल सरीखे तीन हैंडसेट पकड़ा दिए गए. साथ में कानों पर टिकाये जाने योग्य बड़े बड़े हेडसेट भी. इसका हिसाब टिकट में ही जोड़ा जा चुका था.

बताया गया कि महल के परिसर में जहाँ जहाँ आप जायेंगे वहाँ वहाँ दीवारों पर कुछ नंबर लिखे होंगे. उन नंबरों वाले बटन दबा देने भर से उस जगह का इतिहास और संबंधित जरूरी बातें सुनी जा सकती हैं.

बैंगलोर पैलेस में ऑडियो टूर
हाथी के काटे गए पांवों से बने स्टूल के पास ऑडियो सिस्टम धारक बिटिया, रंजीत कौर

उसके बाद हम तीनों ने अपने अपने मिजाज और मस्ती के हिसाब से कानों में हेडसेट टिकाये सारा परिसर घूमा. नंबर लिखी दीवारों से उस जगह की जानकारी सुनी. फोटो खींची और खिंचवाई. उन सारे चित्रों में से कुछ का एल्बम यहाँ क्लिक कर देखा जा सकता है

यहीं सुनी जानकारियों से पता चला कि इस भव्य महल का निर्माण बैंगलोर स्थित सेंट्रल कॉलेज के पहले प्राचार्य ने करवाया था. 1862 में इसका निर्माण शुरू हुआ जो 1944 में जा कर पूर्ण हो पाया. 450 एकड़ की जमीन पर 45000 वर्ग फुट में बनी 35 कमरों की इस इमारत को वाडियर राजघराने द्वारा 1870 के आसपास तब के शिक्षा प्रभारी युवा राजकुमार ने 40000 रूपये में खरीदा.

अगर अफवाहों पर यकीन किया जाए तो कहा जाता है कि जब जयचामराजा वाडियार ब्रिटेन की यात्रा पर गए तो विंडसर पैलेस ने उन्हें बहुत मोहित किया और वापस भारत आ उन्होंने उसी की नक़ल वाला यह महल बनवाया.

कर्नाटक सरकार ने कई बार कानूनी तौर तरीकों से आसपास फैली जमीन सहित इस महल का अधिग्रहण करने की कोशिश की. लेकिन असफलता हाथ लगी. सुप्रीम कोर्ट में अभी भी इस मामले से संबंधित मुकद्दमा लंबित है.

बैंगलोर पैलेस
कुर्सी पर बैठ कर वजन लिए जाने की प्रणाली
बैंगलोर पैलेस
दरबार हॉल में रंजीत कौर, बी एस पाबला, ललित शर्मा

टुडोर – गोथिक शैली में बने इस महल की अंदरूनी साज सज्जा में ग्रेनाईट, कांच और लकड़ी का भरपूर इस्तेमाल हुआ है. अधिकतर सामान आयातित है.

वाडियार घराना शिकार के लिए भी जाना जाता था. जयचामराजा वाडियार के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने 300 शेर और दसियों हाथियों का शिकार किया था. इस बात की पुष्टि महल में घुमते हुए सहज ही की जा सकती है.

इस वक्त यह बैंगलोर पैलेस एक व्यक्तिगत संपत्ति है और टिकटों की राशि के सहारे इसका रखरखाव किया जाता है. इसके अलावा बड़े आयोजनों, पार्टी आदि के लिए भी इससे लगी जमीन को किराये पर दिया जाता है.

बैंगलोर पैलेस
शिकार कर किसी जंगली प्राणी की टांगों के सहारे बनाये गए स्टूल

बैंगलोर पैलेस

बैंगलोर पैलेस

बैंगलोर पैलेस
बैंगलोर पैलेस में किसी कार्यक्रम की तैयारी
बैंगलोर पैलेस
बैंगलोर पैलेस का बाहरी विहंगम दृश्य

फिर पता लगा कि इस बैंगलोर पैलेस में और इसके आसपास कई फिल्मों की शूटिंग हुई है.

जीनत  अमान, शम्मी कपूर, धर्मेन्द्र अभिनीत अपने समय की शाहाकार फ़िल्म ‘शालीमार’ में जिस महल को हिन्द महासागर के किसी टापू पर दिखाया गया वह असल में बैंगलोर पैलेस ही है

बैंगलोर पैलेस
शालीमार फ़िल्म के एलपी रिकॉर्ड पर फ़िल्म के एक दृश में बैंगलोर पैलेस

अमिताभ बच्चन, दारा सिंह अभिनीत फ़िल्म ‘मर्द’ के क्लाइमेक्स में एक दूसरे की पहचान से अनभिज्ञ बाप बेटा जिस जगह लड़ाई करते हैं, वह बैंगलोर पैलेस ही है.

बैंगलोर पैलेस
फ़िल्म मर्द के क्लाइमेक्स की पृष्ठभूमि में बैंगलोर पैलेस

अमृता सिंह, सनी देओल अभिनीत फ़िल्म ‘बेताब’ में डिंगी का जो टीकमगढ़ फार्म बताया गया है वह दरअसल बैंगलोर पैलेस है.

फ़िल्म के जिस दृश्य में अमृता, सन्नी को एक बिगडैल घोड़े पर काबू करने की चुनौती देती है, वह दृश्य बैंगलोर पैलेस के सामने फिल्माया गया है.

बैंगलोर पैलेस
फ़िल्म बेताब में बैंगलोर पैलेस

बैंगलोर पैलेस

इसके अलावा भी गोविंदा – करिश्मा वाली कुली नंबर वन के गाने ‘मैं तो रस्ते से जा रहा था…’, बॉबी देओल – ट्विंकल खन्ना वाली बरसात के गाने ‘इक हसीं लड़की से…’, गोविंदा – शिल्पा शेट्टी वाली गैंबलर के गाने ‘हम उनसे मोहब्बत करके…’ और गोविंदा – उर्मिला मांतोडकर वाली कुंवारा के गाने ‘मेरी छम्मकछल्लो मान  भी जा…’ की शूटिंग भी इसी बैंगलोर पैलेस परिसर में हुई है.

भूख लगने लगी थी. जितना कुछ देख पाए उससे संतुष्ट हो ऑडियो यंत्र वापस कर, अपना लाइसेंस ले जब हम अपनी गाड़ी के पास वापस पहुंचे तो दोपहर के सवा दो बज चुके थे. भूख जम कर लगी थी. अम्बेडकर रोड पर एक बेहद व्यस्त रेस्टारेंट में हमने दक्षिण भारतीय व्यंजनों का आनंद लिया और तैयार हो गए अगली मंजिल की ओर.

अब बिटिया का मन था मशहूर उद्योगपति विजय माल्या की कम्पनी द्वारा संचालित यू बी सिटी मॉल जाने का. उसने इतनी तारीफें कीं उस मॉल की, कि हम चल पड़े उस ओर.

इस बीच उसने सूचना दी कि वो हमें विप्रो परिसर घुमाने की जो योजना बना रही थी उसमें कुछ मुश्किल आ गई है. इस तरह अतिथियों के लिए विप्रो परिसर केवल शनिवार को ही जाया जा सकता है.

अब मैं दुविधा में पड़ गया. हम भिलाई से चले थे तो यह योजना बनी कि दो दिन बैंगलोर रुकेंगे और फिर लौटते हुए अपनी राह से 15 किलोमीटर दूर ही एकाध घंटे के लिए उस लेपाक्षी मंदिर जायेंगे जहाँ के बारे में प्रसिद्द है कि मंदिर के भीतर लगे स्तंभ वास्तव में नीचे फर्श से जुड़े नहीं हैं बल्कि लटक रहे. फर्श से इतना बारीक अंतर है कि महीन साड़ी निकाली जा सकती है आर-पार. मन्दिर देख आगे बढ़ भिलाई. इधर नागपुर के बाद ललित जी ने हंपी जाने की बात सुझाई जिसके लिए भी एक दिन अतिरिक्त जोड़ लिया गया.

अब आज 9 मार्च को है बुधवार! अपनी योजनानुसार बैंगलोर से अगले दिन विदाई और गुरूवार का दिन रात लेपाक्षी – हंपी के नाम. फिर शनिवार 12 मार्च तक भिलाई लेकिन बदली परिस्थितियों में रविवार को रवानगी ले हंपी – लेपाक्षी होते बुधवार 16 मार्च को भिलाई? बात बनी नहीं.

ललित जी से विमर्श कर योजना बदली गई. शनिवार तक तो रूकना ही पडेगा. आखिर जिस बिटिया के लिए यहाँ तक आये, उसके चेहरे पर उदासी कैसे देखता. तो बीच के बचे दो दिनों में अपनी हंपी – लेपाक्षी  यात्रा कर वापस बैंगलोर आया जाए. फिर विप्रो घूम वापसी.

अब अगर विवेक रस्तोगी जी के निवास जाना हो तो आने जाने के ही दो-तीन घंटे लग जाने हैं अगर आना जाना किया गया तो अगली सुबह देर हो जानी है बैंगलोर से बाहर निकलते. विवेक जी का घर उसी दिशा में था जिधर से हमने हंपी जाने की सोची.

विवेक जी को फोन कर उन्हें बता दिया गया कि आज आयेंगे और रात रुकेंगे भी वहीँ, फिर घर से ही सुबह सुबह हंपी की ओर! विवेक जी ने हामी भरी तो मैं भी निश्चिन्त हो गया.

बैंगलोर पैलेस के बाद

अब हमें जाना था यूबी सिटी मॉल. नाम सुनते ही सबसे पहला ख़याल आया उद्योगपति विजय माल्या की यूनाइटेड ब्रेवरीज का. हमारे भिलाई से रवाना होने के बाद विजय माल्या पर सरकारी बैंकों का 9000 करोड़ रूपये ना लौटाने का आरोप लगा और वे भारत से लंदन जा पहुंचे. यह यूबी सिटी मॉल भी उन्हीं की संपत्ति है.

मॉल पहुँचने के उपक्रम में हमारी कन्या नेवीगेटर गच्चा खा गई. वह बार बार हमें कारपोरेशन सर्किल पर लाये और बड़ा सा एक चक्कर लगा कर कार को फिर वहीँ पहुंचा दे. कई बार कार को अलग अलग सडकों पर ले गया लेकिन घूम फिर कर फिर कारपोरेशन सर्किल आ जाता. मुझे लगाने लगा कि जरूर कोई तिलिस्मी रास्ता होगा वहां पहुँचने का

पौन घंटे तक चकरघिन्नी की तरह घूमने के बाद आखिरकार राह किनारे लोगों से पूछते जा ही पहुंचे मॉल के सामने

बैंगलोर पैलेस से लौटते हुए

गाडी पार्क की, टोकन लिया और बेसमेंट से हम आ गए ऊपरी मंजिलों पर. अब या तो हमारी अरूचि रही या फिर वाकई में हमें कुछ ख़ास नजर ना आया बड़े बड़े ब्रांड्स के शोरूम और फूं फां के अलावा. बिटिया जरूर इधर से उधर आती जाती रही.

शाम का समय था भूख उतनी थी नहीं, सो तीनों ने वहीँ फ़ूड कोर्ट के एक फ्रेंच रेस्टारेंट में मॉकटेल्स लीं और चल पड़े वापस इलेक्ट्रौनिक सिटी की मंजिल तरफ.

बिटिया को उसके पीजी छोड़  मैं और ललित शर्मा जी आ गए साढ़े पांच बजे अपने होटल. दिन भर के थके थे ही. एसी की ठंडी ठंडी हवा मिली तो नींद ने आ घेरा.

7 मार्च की रात पौने दस बजे जिस होटल कमरे में रुके, 9 मार्च की शाम हमने वह होटल छोड़ा साढ़े सात बजे. लक्ज़री टैक्स, सर्विस टैक्स सहित कुल भुगतान किया गया 3585 रूपयों का.

भिलाई से नकद ले कर चले 20,000 रूपये ख़त्म होने की कगार पर थे. अतिरिक्त नकदी पास रहनी चाहिए, यह सोच दोपहर ही अपने बिना एटीएम कार्ड वाले, केवल नेट बैंकिंग पर चलने वाले खाते से एटीएम कार्ड वाले खाते में NEFT द्वारा 10,000 ट्रांसफर कर दिए थे.

विवेक जी के घर की ओर रवाना होने के पहले इलेक्ट्रोनिक सिटी में ही कार का पेट्रोल टैंक फुल करवाया गया. 2000 रूपये में 34.29 लीटर पेट्रोल! फिर हमारी कन्या नेवीगेटर चकाचौंध भरी सडकों में कहाँ कहाँ से ले गई पता नहीं. लेकिन विवेक जी के घर के सामने जब उसने ले जा खडा किया तो रात के सवा नौ बज रहे थे.

बैंगलोर पैलेस वाली शाम

शांत माहौल में बनी उस कॉलोनी के वे दो मंजिला फ्लैट ही थे. अनौपचारिक घर जैसे माहौल में स्वादिष्ट भोजन के पहले और बाद में कई पारिवारिक, राजनैतिक, सामाजिक, ब्लॉगिंग, वजन कम करने के तरीकों की  बातें हुईं. विदिशा में जन्में विवेक जी ने अपनी पोस्टिंग वाले शहरों की बातें की तो हमने इस यात्रा के कई संस्मरण साझा किये.

उनके किशोर पुत्र ने हमारी कुछ फोटो लीं तो ललित्त जी ने उसे टिप्स भी दिए.

मुझे चिंता थी कि अगर जल्दी ना सोये तो सुबह भी देर हो जानी है. विवेक जी ने बातें करते करते हमारा कमरा इक्का दुक्का मच्छरों से सुरक्षित कर गुड नाईट कहा तो आधी रात होने को आई.

अगली सुबह की यात्रा का मनन करते नींद ने कब आ घेरा पता नहीं चला.

हमें रवाना होना था अब केवल खंडहरों के रूप में बची, तुंगभद्रा नदी के तट पर स्थित मध्यकालीन हिंदू राज्य विजयनगर साम्राज्य की राजधानी  हंपी. जिसका जायजा अगले आलेख में

© बी एस पाबला

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बैंगलोर पैलेस की भव्यता और माल्या के मॉल का तिलिस्म
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13 thoughts on “बैंगलोर पैलेस की भव्यता और माल्या के मॉल का तिलिस्म

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (16-04-2016) को अति राजनीति वर्जयेत् (चर्चा अंक-2314) पर भी होगी।

    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।

    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।

    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर…!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

  2. बहुत ही रोचक यात्रा विवरण ! आपके साथ ही हम भी बंगलौर पैलेस घूम लिए । हम्पी यात्रा की प्रतीक्षा रहेगी ।

    1. बी एस पाबला

      Pleasure
      आभार मुकेश जी

  3. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, ” भगवान खो गए – ब्लॉग बुलेटिन ” , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है … सादर आभार !
    टिप्पणीकर्ता ब्लॉग बुलेटिन ने हाल ही में लिखा है: भगवान खो गए – ब्लॉग बुलेटिनMy Profile

    1. बी एस पाबला

      THANK-YOU
      थैंक्यू ब्लॉग बुलेटिन

  4. सजीव वर्णन

    1. बी एस पाबला

      Smile
      शुक्रिया ओंकार जी

  5. बहुत ही रोमांचक यात्रा चल रही हैं, आगे की कड़ी का इंतज़ार रहेगा…..
    टिप्पणीकर्ता Kabir ने हाल ही में लिखा है: Online Shopping ke fayde aur nuksaan.My Profile

    1. बी एस पाबला

      Heart
      शुक्रिया कबीर जी

  6. रोचक विवरण व बहुत सुंदर तस्वीरें… शुभकामनाएं

  7. Kishan Bahety

    बंगलोर पैलेस बाकई में बहुत सूंदर है , पर इसके अंदर जाने खर्च ज्यादा ही महंगा है ।शायद साधारण लोग तो बाहर से ही दुबक कर निकल जाते होंगे ।
    माल्या जी को जब हमारी सरकार नहीं ढूंढ प् रही तो नेविगेटर कन्या उनके माल को कैसे ढूंढ पायेगी ।
    हमारे गोविन्दा जी की लगता है बेंगलोर पैलेस पसंदीदा जगह है ।
    आपकी लेपाछी की यात्रा का इंतजार रहेगा ।
    भारत माता की जय

  8. Mahendra madhu

    हमने भी देख लिया आपकी शब्द-आँखों से पेलेसको,
    जैसे 3d वर्णन,,

  9. बंगलौर पैलेस के सैर कराने के लिए धन्यवाद!

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