ब्लॉगर मंडली खिलखिला उठी बैंगलोर में

ब्लॉगर चाहे अंग्रेजी भाषा का हो चाहे हिंदी वाला, आपस में मिल बैठने का कोई मौक़ा वह हाथ से जाने नहीं देना चाहता.

हिंदी ब्लॉगिंग ने वह दौर भी देखा है जब मेल मुलाकातों के भव्य आयोजन होते थे, उस पर सारे सक्रिय ब्लॉगरों की निगाहें रहतीं,  इन आयोजनों के औचित्य पर पक्ष विपक्ष में हंगामाखेज बहसें होतीं और यह सब अखबारों की सुर्खियाँ भी बनता.

जैसा कि हर विधा, हर गतिविधि के साथ होता है, शनै शनै यह जोशोखरोश धीमा पड़ता चला गया. अब तो फेसबुक जैसे लोकप्रिय सोशल मीडिया से जुड़े मित्र आपस में कोई आयोजन करते भी हैं तो वह खबर  भी  महज उन्हीं मित्रों के बीच सीमित रह जाती है.

इस बार जब विचार बना सड़क मार्ग से अपनी स्मार्ट कार चलाते भिलाई से बैंगलोर जाने का तो कुछ परिचित ब्लॉगरों से मुलाकात का इरादा हुआ. ये सभी मित्र ऐसे थे जिनसे फोन द्वारा वर्षों पहले से सतत संपर्क बना रहा.

राह में जब हैदराबाद पहुँच कर, राह के हाईवे से लगा गोलकोंडा किला घूमना हुआ तब फोन कर विजय सप्पति जी ने अपने निवास पर आमत्रित किया. लेकिन जैसा कि हमने सोच रखा था, उन्हें वापसी में मिलने का वादा किया.

बैंगलोर में तीन ब्लॉगर तो थे मेरी सूची में. विज्ञान विश्व वाले आशीष श्रीवास्तव जी, मेरी छोटी सी दुनिया वाले प्रशांत प्रियदर्शी जी और कल्पतरू वाले विवेक रस्तोगी जी. इधर सुबह ही पौने ग्यारह बजे शिवलोक वाले  शिव रतन गुप्ता जी ने भी मुलाकात की इच्छा जताई.

ब्लॉगर धमाल

आशीष जी के निवास पर: बाएं से दांयें बी एस पाबला, ललित शर्मा, प्रशांत प्रियदर्शी, आशीष श्रीवास्तव

विवेक रस्तोगी जी से एक बार पहले मिलते मिलते रह गए थे जब 2010 में हमारा जाना हुया था मुम्बई. मैं और बिटिया, अपनी गाडी में विविध भारती वाले यूनुस खान जी और उनकी जीवनसंगिनी ममता सिंह जी के निवास पर डिनर कर लौट रहे थे और राह में ही विवेक जी का घर पड़ता था.

हालांकि पहले ही बात हो चुकी थी मिलने की लेकिन आधी रात हो चुकी थी! ऐसे वक्त पहली बार किसी के घर भेंट के लिए जाना!? गाड़ी रोक मैंने विवेक जी को फोन किया अपना संकोच जाहिर करते हुए क्षमा मांगी.

अब 6 वर्ष बाद उनसे मिलने का मौक़ा है.

प्रशांत प्रियदर्शी जी को अधिकतर PD कह ही पुकारा जाता है, क्योंकि अरसे तक उन्होंने यही संकेताक्षर अपनी प्रोफाईल में लगा रखे थे.  2005 में  हिंदी  ब्लॉगिंग की शुरुआत से जुड़े प्रशांत हम सबसे कम उमर के रहे. वर्षों पहले से फोन पर हमारी लंबी लंबी बातें होती आईं. इनका श्वान-प्रेम भी हमारी मित्रता का एक कारक रहा.

अब कहीं जा कर उनसे मुलाकात का योग बना.

ब्लॉगर सपत्नीक

आशीष जी के निवास पर अनुजा संग प्रशांत

आशीष श्रीवास्तव जी से यूं तो परिचय ब्लॉगिंग के समय से ही रहा. लेकिन फोन पर बातचीत तब शुरू हुई जब हमारी बिटिया रंजीत कौर पुणे से अपनी नौकरी छोड़, बैंगलोर में विप्रो से जुड़ने जा रही थी.

पिता होने के नाते एक स्वाभाविक तनाव था इस बात को ले कर. हालाँकि पुणे में भी उसने खुद ही सारी भागदौड़,  व्यवस्था की थी, लेकिन तब परिस्थितियाँ अलग थीं. गुरुप्रीत था, माँ थी, पिता जी थे. अब तो वह इकलौती ही सदस्य है परिवार में मेरे साथ और पिताजी की हालत ठीक नहीं. उन्हें छोड़ कर जाना बहुत मुश्किल.

तनाव के उन दिनों में मुझे याद आया कि आशीष जी अरसा पहले से जुड़े हुए हैं विप्रो से. बात कर देखता हूँ कि वे बिटिया के लिए अनजान शहर में क्या कुछ आसान कर सकें.

ब्लॉगर परिवार

आशीष जी का परिवार

फेसबुक मैसेंजर पर बातचीत हुई तो उनकी सलाह से एक ई-मेल पर विप्रो की ओर से होटल लॉर्ड  प्लाजा में ठहरने की व्यवस्था करवा दी गई. बैंगलोर के जिस इलेक्ट्रॉनिक सिटी में विप्रो कैंपस है वहीँ आशीष जी का घर होने की बात पता चली.

बात ख़त्म होते होते उन्होंने अपनी जीवनसंगिनी निवेदिता जी का भी नंबर दिया और भरोसा दिलाया कि चिंता ना करे जी, हम सब देख लेंगे! मैं कृतज्ञ सा इतना ही कह पाया –बच्चे कितने भी बड़े हो जायें, होशियार हो जाएँ बच्चे ही रहेंगे पेरेंट्स के लिए

बहुत से मित्र नहीं जानते होंगे कि सुप्रसिद्ध हिंदी ब्लॉगर रविशंकर श्रीवास्तव उर्फ़ रवि रतलामी जी आशीष के मामा ससुर हैं. आशीष जी का ननिहाल हमारे जुड़वां शहर दुर्ग में हैं, ससुराल पड़ोसी शहर राजनांदगांव में और वे खुद गोंदिया के हैं.

8 मार्च की शाम जब बिटिया पहुंची हमारे होटल तो 5 बजने ही वाले थे. नीचे रेस्टारेंट में नाश्ता कर  बिटिया संग मैं और ललित जी चल पड़े आशीष जी के घर की ओर अपनी कार में. ना इलाके का पता था ना रास्ते का. जैसे जैसे बिटिया बताते गई मैं गाड़ी चलाते रहा.

घर पहुँचते ही आशीष जी ने निवेदिता जी को हँसते हुए कहा –मायके वाले आ गए! फिर तो जो ठहाके लगे उनसे सारी औपचारिकता ख़त्म हो गई. उनकी बेटी गार्गी की चंचलता को देख मैंने गोद लेने की कोशिश की लेकिन असफल रहा.

बातें अभी शुरू ही हुई कि निवेदिता जी ने कहीं फोन लगा पूछा कि कहाँ रह गए हो , अभी तक पहुंचे नहीं! तभी दरवाजा खुला और कोई अंदर आया. मैंने ध्यान नहीं दिया लेकिन आशीष जी के अंदाज देख गरदन घुमाई  -सामने थे PD सपत्नीक! एक सरप्राईज ही रहा यह.

थोड़ी ही देर हुई कि विवेक रस्तोगी जी की कॉल आ गई मेरे मोबाइल पर. आशीष जी ने आमत्रित किया है इससे ज्यादा अब कुछ कह नहीं सकते थे. मैंने बताया कि अगली शाम उनके निवास आने की योजना है.

इधर स्वादिष्ट भोजन ख़त्म होते तक मोटापा कम करने के उपाय, गार्गी की शरारतें,  खान-पान के उपाय, बैंगलोर के ट्रैफिक, आसपास के दर्शनीय स्थलों के साथ साथ ब्लॉगिंग के तमाम अच्छे-बुरे विषयों और साथी ब्लॉगरों पर जम कर चर्चा होती रही. इधर निवेदिता – अनुँजा – रंजीत की गपशप चलती रही.

बीच बीच में मेरी उँगलियाँ भी कैमरे का शटर दबाती रहीं.

ब्लॉगर पुत्री

कैमरे की पकड़ में आई गार्गी

हम चार ब्लॉगर जब पहली बार एक दूसरे से मिले तो लगा ही नहीं पहली बार आमना सामना हो रहा. क्योंकि लगभग एक दशक से हम आपस की कई पारिवारिक बाते जानते हैं, कई आदतें जानते हैं, कई सुख दुख पता है, खान-पान जानते हैं. स्वभाव जानते हैं, बातें करते रहे हैं.

ऐसे खुशनुमा मौके पर बातें परवान चढ़ते चली जाती हैं, अंतहीन समय तक चलने वालीं. रात काफी हो चली थी. बिटिया को भी नींद आने लगी. फिर मिलने का वादा कर आशीष जी ने सपरिवार हमें विदा किया और फिर बिटिया को उसके पीजी तक छोड़ हम लौटे अपने होटल.

खुशनुमा यादें लिए हम भी चले गए नींद के आगोश में, अगले दिन बैंगलोर के पर्यटक स्थल देखने की योजना बनाते. जिसका विवरण होगा अगली पोस्ट में.

आप कभी बैंगलोर आये हैं?

© बी एस पाबला

ब्लॉगर मंडली खिलखिला उठी बैंगलोर में
3.91 (78.18%) 11 votes

ब्लॉगर मंडली खिलखिला उठी बैंगलोर में” पर 14 टिप्पणियाँ

  1. बहुत ही रोमांचक यात्रा चल रही हैं, बेंगलोर शहर के पर्यटन की अगली कड़ी का इंतज़ार रहेगा. धन्यवाद पाब्ला जी….

  2. बहुत सी बातें हमें इसी पोस्ट से पता चलीं, और बात सही है कि हम लोग अब १० वर्षों से ज्यादा समय से आपस में जानते हैं, परंतु मिलना कम ही हो पाता है, और जब मिलते हैं तो ऐसा नहीं लगता है कि पहली बार मिले हैं।

    • Heart
      आपसे भी जब मिले हम तो औपचारिकता की जरूरत ही नहीं पडी

  3. आप जिन जिन से मिले पाबला जी इन नामों से तो हम भी वाकिफ हैं। आपकी यात्रा से लगा हम भी मिल लिये। धन्यवाद, अगलीकडी बैंगलोर दर्शन का इंतज़ार।

  4. आप जब भी वर्णन करते है अपनी यात्रा का तो ऐसा लगता है जैसे हम भी वहीँ मौजूद है,
    आपकी लेखनी को सलाम

इस लेख पर कुछ टिप्पणी करें, प्रतिक्रिया दें

Your email address will not be published. Required fields are marked *

टिप्पणीकर्ता की ताज़ा ब्लॉग पोस्ट दिखाएँ
Enable Google Transliteration.(To type in English, press Ctrl+g)

[+] Zaazu Emoticons