भविष्य की दुनिया बदल देंगी यह उभरती तकनीकें

एक अरसा ही हो गया अपनी वेबसाइट पर कल की दुनिया श्रेणी में कुछ लिखे हुए. पिछले दिनों जब एक मित्र – समूह के बीच, भविष्य की दुनिया केंद्रित चर्चा छिड़ी तो मन किया कि एक बार फिर लेखन की शुरूआत की जाए इस विषय पर.

आखिर, कल फुरसत मिली तो वास्तविक जीवन में आने वाली कुछ तकनीकों के बारे में लिख ही डाला. आईए, आभासी दुनिया में गोता लगाने के लिए तैयार हो जाएँ.

हम जहां खड़े हैं आज, वहाँ आसपास देखें तो महसूस करेंगे कि पिछले पांच – सात वर्षों में हमने प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में खासा परिवर्तन देखा है. स्मार्टफोन, क्लाउड कंप्यूटिंग जैसी तकनीक ने हमारे रहने, काम करने के तरीकों में क्रांतिकारी बदलाव ला दिया है.

कोई माने या ना माने, यह तो केवल एक शुरूआत है. भविष्य की तकनीक के सहारे, आने वाले समय में हम उसी तरह जीवन बिताएंगे जैसा कि विज्ञान गल्प कथाओं, फिल्मों में देखते है.

गूगल ग्लास

गूगल ग्लास के नाम से जाने वाला चश्मा अपने आप में एक कंप्यूटर, स्क्रीन और माइक्रोफोन को समाहित किये हुए है. यह आपकी आंखों के सामने एक कंप्यूटर स्क्रीन होने की तरह है. गूगल ग्लास, भविष्य में पहनने योग्य तकनीक का पहला जीवंत उदाहरण है.

गूगल ग्लास क्या कुछ कर सकता है यह एक अलग बहस का मुद्दा है लेकिन यह उपकरण हाथ में पकड़े जाने वाले, जेब में रखने निकालने वाले मोबाइल से बढ़ कर है, उसका उन्नत स्वरूप है.

गूगल ग्लास -भविष्य की दुनिया

गूगल ग्लास के बारे में पहले ही लिख चुका हूँ. जिसे यहां क्लिक कर पढ़ा जा सकता है.

1946 -47 में, 700 वर्ग फीट में समाने वाले 25 टन के ENIAC कंप्यूटर से लाखों गुना अधिक क्षमता वाला मोबाईल अब हमारे पास है जो हथेली में समा जाता है. आने वाले कल में भविष्य की तकनीक द्वारा हम आँखों की पुतली सरीखा एक कंप्यूटर, गूगल ग्लास के रूप में पाने जा रहे हैं.

बिना ड्राईवर की गूगल कार

दुनियाभर में गूगल अपनी उच्च तकनीकी खोजों के लिए प्रसिद्ध है। कुछ समय पहले गूगल ने ड्राइवररहित कारों पर काम करना शुरू किया था. अब गूगल ने एक ऐसी कार बनाकर तहलका मचा दिया है जिसमें न स्टीयरिंग है, न एक्सीलेटर और न ही ब्रेक पैडल है।

इस प्रोजैक्ट के पीछे गूगल की सोच यह है कि दुनिया भर में होने वाले सड़क हादसों की मुख्य वजह ड्राइवर की लापरवाही होती है और इस लापरवाही को दूर करने का सबसे स्वभाविक तरीका यही है कि ड्राइवर को ही कार से हटा दिया जाए। ड्राइवर रहित यह कार बुजुर्गों, शराबियों, अंधों, विकलांगों, बच्चों और महिलाओं के लिए वरदान साबित हो सकती है।

अब अगर मैं अपनी मारुति ईको की कल्पना करूँ तो वह कुछ यूँ होगी.

गूगल कार -भविष्य की दुनिया

यह स्वचलित वाहन इस तरह तैयार किए जाएंगे कि सुरक्षापूर्वक चल सकें और इन वाहनों में मानव का दखल नाममात्र हो। इनमें सॉफ्टवेयर और सेंसर सारा काम करते हैं। यह बात सड़क सुरक्षा बढ़ाने की ओर एक बड़ा कदम है।

इनमें लेज़र और रडार सेंसर लगे हुए हैं, आंकड़े लेने के लिए एक कैमरा भी लगा हुआ है जो खतरनाक रास्तों को सुरक्षापूर्वक पार करने में मददगार साबित होते हैं। अभी इन वाहनों की रफ्तार 25 किलोमीटर प्रति घंटा रखी गई है। वाहन के अंदर दो सीटें हैं, सामान रखने के लिए जगह है, वाहन चलाने और बंद करने के लिए बटन है और रूट दिखाने वाली स्क्रीन है।

गूगल के अनुसार कार के कंप्यूटर में करीब 700,000 दुर्घटनाओं का ब्यौरा दिया गया है, जिसकी वजह से गूगल की ये कार सबसे सुरक्षित मानी जाती है।

ये निश्चित है कि गूगल की यह रोबोट कार आने वाले समय में जमीनी यातायात की समस्यायों का हल होगी,

अंतरिक्ष आधारित सौर ऊर्जा

नदियों में पानी नहीं… बिजली ना बन पायेगी,  कोयला नहीं … बिजली ना बन पायेगी, गैस नहीं… बिजली ना बन पायेगी. परमाणु ऊर्जा का उत्पादन भी नहीं हो पायेगा! ऐसे संकट के सामने तो सरकारें भी बेबस ही होंगी.

परम्परागत साधनों पर दिख रहे दबाव का असर हो या ऊँची लागत या फिर पर्यावरण की चिंता!  अब बिजली के लिये लीक से हटकर उपाय तलाशे जा रहे. पवन ऊर्जा, सौर ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा जैसे स्रोतों का बड़े पैमाने पर अनुसंधान जारी हैं.

इनमें से सौर ऊर्जा की जाए तो तो इसके उपकरण बहुत महंगे हैं और सूर्य केवल दिन में सिर्फ बारह घंटे ही चमकता है. मतलब रात को केवल अंधेरा. एक सवाल और भी है! बारिश, सर्दी के मौसम के समय कई इलाकों में तो सूरज कई-कई दिन तक नहीं उगता !!  फिर !?

अंतरिक्ष आधारित सौर ऊर्जा -भविष्य की दुनिया

इन्हीं सब मुद्दों से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने इस समस्या का हल निकालना शुरू कर दिया है. बढ़िया विकल्प यह देखा गया कि अंतरिक्ष में सूरज की गर्मी का दोहन किया जाये और धरती पर भेज दिया जाए. कोशिश इतनी कामयाब रही कि र॓डियो तरंगों की तरह बिजली को वायरलैस की तरह एक जगह से दूसरी जगह भेजा जा सका.

यह तकनीक संचार उपग्रहों की तकनीक पर आधारित है इसलिए काफी विकसित है। अंतरिक्ष में चक्कर लगा रहे उपग्रह, सोलर पैनलों के सहारे  सूर्य की रोशनी से बिजली बनाकर उसे र॓डियो आवृत्ति में बदल कर  संचार तरंगों से धरती पर स्थापित रिसीवर तक पहुंचाते हैं.

अनुसंधानों से यह तो साबित हो गया है कि र॓डियो तरंगों को बिजली तरंगों में बदलने में 90 प्रतिशत तक सफलता मिल सकती है जबकि ताप विद्युत या परमाणु ऊर्जा संयंत्र में ईंधन के केवल 33 प्रतिशत ऊर्जा को ही बिजली में बदला जा सकता है. इस तकनीक से ही मिलती-जुलती तकनीक, डीटीएच की है.

इस तरह की तकनीक विकसित की जायेगी, ताकि सूर्य की ऊर्जा को फोटोवोल्टिक पैनल के जरिये माइक्रोवेव्स में परिवर्तित कर सके. इन माइक्रोवेव्स को धरती पर स्थापित पावर स्टेशनों को भेजा जायेगा.

पावर स्टेशनों तक पहुंचनेवाली ऊर्जा को उपभोक्ताओं तक भेजा जायेगा. इस प्रणाली से हासिल होनेवाली ऊर्जा धरती पर पैदा की जानेवाली किसी भी अन्य ऊर्जा की तुलना में ज्यादा सस्ती होगी. यदि यह परियोजना सफल होती है तो अंतरिक्ष में इसके लिए छोटे तत्वों के हजारों प्लेटफॉर्म बनाये जा सकते हैं, ताकि वायरलेस पावर ट्रांसमिशन के जरिये 10 से 1,000 मेगावॉट तक ऊर्जा धरती पर भेजी जा सके.


इस तकनीक में सक्रिय सहभागिता के लिए भारत ने अमेरिका की एक शीर्ष विज्ञान संस्था के साथ मिल कर अंतरराष्टीय संगठन बनाया है जो अंतरिक्ष सौर ऊर्जा पौद्योगिकी का विकास करेगा और सूर्य की ऊर्जा को फोटोवोल्टिक पैनल के जरिये माइक्रोवेव्स में परिवर्तित कर धरती पर स्थापित पावर स्टेशनों को भेजा जायेगा. चीन  भी इस भविष्य की तकनीक के लिए भारत को सहयोग का प्रस्ताव दे चुका है.

इस प्रणाली से हासिल होने वाली ऊर्जा धरती पर पैदा की जानेवाली किसी भी अन्य ऊर्जा की तुलना में 6 गुणा ज्यादा सस्ती होगी. फिर तो निकट भविष्य में तेल-गैस आदि की कीमतें गिर जाएंगी 😀

मैं कल्पना कर रहा हूँ जिस दिन बिना कोयले, पानी और परमाणु वाली बिजली हमारी अगली पीढ़ियाँ उपयोग करेंगी, उस दिन हमारी धरती का पर्यावरण कितना स्वच्छ होगा.

जिज्ञासुओं के लिए ये दो दस्तावेज़ बहुत अच्छे हैं. Space-Based Solar Power System तथा Solar Power in Space

सुपरफास्ट ब्रॉडबैंड

मुझे वह जमाना याद है जब 56k डायलअप मोडेम के जरिए मैं इंटरनेट की रंगीन दुनिया में घूमने निकला था. कंप्यूटर एक नंबर डायल करता था. फिर दूर कहीं किसी सर्वर-मॉडेम ‘हैंड शेक’ करते समय शू शां शू शां की आवाज़ें निकालते स्पीकर संग हर्षमिश्रित तनाव तब गायब होता जब जगमग करते कंप्यूटर आइकॉन चमकते टास्क बार पर.

फिर धीरे-धीरे वेबसाइट खुलती। हम तो उसी में खुश रहते. अब तो ब्रॉडबैंड की गति नाकाफी मालूम होती है. इंटरनेट टेलीविजन, यूटय़ूब, वीडियो चैट, टेली कांफ्रेंस जैसे इंटरनेट के सैकड़ों नए एप्लीकेशन बेहद तेज गति के इंटरनेट की मांग करते हैं. 5 वर्ष पहले मैंने सोचा नहीं था कि मोबाइल पर सरपट दौड़ता इंटरनेट चौबीसों घंटे चलाऊँगा और बीस वर्ष पहले तो इंटरनेट नाम की चिड़िया भी नहीं जानता था.

तेज़ इंटरनेट -भविष्य की दुनिया

इंटरनेट के मामले में दुनिया भर की अभी औसत गति है 3.8 Mbit/s, दक्षिण कोरिया की 21.9 Mbit/s और भारत की 1.5 Mbit/s ! लेकिन भविष्य की तकनीक में फाइबर से कहीं आगे बिना किसी भौतिक सर्वर के लेज़र, माइक्रो चिप्स के सहारे आने वाले तेज़ गति के इंटरनेट की गति कितनी होगी? इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकी हे अभी तक!

लेकिन इसी वर्ष वैज्ञानिकों ने 1.4 Terabits की गति हासिल कर ली है जो उत्तरोत्तर बढ़ती ही जानी है. इतना जानना रोचक है कि एक Gigabit में 1,024 Megabits होते हैं और एक Terabit में 1,024 Gigabits.

मेरे दोस्त पूछते हैं कि होगा क्या तेज़ स्पीड वाले ब्रॉडबैंड से? ज़्यादा बहस ना करते, मुस्कुराते हुए यही कहता हूँ कि ये तो ज़माना देखेगा.

कृत्रिम बुद्धि

मानव अब सोचने, विश्लेषण करने, याद रखने, निर्णय करने का काम भी अपने दिमाग की जगह मशीनों और सॉफ्टवेयर की सहायता से कराना चाहता है। 1955 में एक कंप्यूटर वैज्ञानिक जॉन मकार्ति ने इस काम को कृत्रिम बुद्धि का नाम दिया और आज, यह प्रौद्योगिकी उद्योग का सबसे महत्वपूर्ण और अनिवार्य हिस्सा बन गया है.

कृत्रिम बुद्धि की चर्चा वर्ष 1968 में परवान चढ़ी, जब एक खिलाड़ी ने शर्त लगाई कि वर्ष 1978 तक कोई भी कंप्यूटर उनको शतरंज में मात नहीं दे सकेगा और पहली शर्त जीतने के बाद उन्होंने दूसरी बार पांच सालों के लिए शर्त लगाई, लेकिन इसके बाद उन्होंने शर्त लगाना छोड़ दिया क्योंकि उस वक्त उनको आभास हो गया कि आगे क्या होने वाला है.

साल 1997 में दुनिया के सबसे बेहतर शतरंज खिलाड़ी गैरी कास्परोव को एक विवादित सीरीज़ में आईबीएम के कंप्यूटर डीप ब्लू ने हरा दिया था. आज की तारीख़ में अगर ऐसी कोई शर्त लगाई जाए तो कृत्रिम बुद्धि के आगे सभी को नतमस्तक होना पड़ सकता है. इस दिशा में कंप्यूटर ने जिस तरह से प्रगति की है उससे कृत्रिम बुद्धि जैसी भविष्य की तकनीक के बारे में सोचने पर मजबूर होना लाज़िमी है.

कृत्रिम बुद्धि से लैस आजकल ऐसी मशीनें बन गई हैं जो शेयर बाज़ारों में बड़े बड़े बुद्धिमान लोगों को भी मात दे सकती हैं, युद्ध के मैदान में हावी हो सकती है, इंटरनेट को अपने अधीन कर सकती है, वित्तीय प्रवाह नियंत्रित कर सकती है. मशीनों के भीतर इंसानी दिमाग फिट हुआ तो फिर इन मशीनें को चलाने के लिए इंसान की जरूरत नहीं होगी. पटरियों पर दौड़ती ट्रेन के इंजन में कोई ड्राइवर नहीं होगा ना ही सड़क पर दौड़ती टैक्सी में. सोचने वाली मशीन न केवल सभी प्रणालियों पर नियंत्रण कर सकती है बल्कि अपने ही जैसी नई मशीनें भी बना सकती है. इस दिशा में काफ़ी सफल प्रयोग चल रहे हैं.

कृत्रिम बुद्धि -भविष्य की दुनिया

नैनो-तकनीक विकसित होते ही कृत्रिम बुद्धि, खुद ही नैनो-रोबटों का निर्माण कर सकेगी. ऐसा माना जाता है कि इसकी शुरूआत आज से 10 साल बाद शुरू हो जायेगी और यह सब 2050 में अपनी चरम सीमा पर होगा

मनुष्य की बुद्धि का विकल्प भले ही कृत्रिम बुद्धि वाली मशीन हो लेकिन निश्चित तौर पर मनुष्य किसी भी मशीन से कहीं अधिक ख़तरनाक है. मनुष्य ही सबसे भयानक तकनीकी आपदाओं के लिए ज़िम्मेदार है. इस संबंघ में जापान के फुकुशिमा परमाणु बिज़ली संयंत्र दुर्घटना के समय सभी उपकरण इस बात का संकेत दे रहे थे कि इस बिजलीघर को बंद कर दिया जाए. लेकिन लोग अपने अधिकारियों को फोन करने लगे, और अधिकारी अपनी सीट पर मौजूद ही नहीं थे. किसी न किसी को तो फैसला लेना था. फैसला नहीं लिया गया क्योंकि किसी भी परमाणु बिजली संयंत्र को बंद करने का काम बहुत महंगा पड़ता है। केवल कंप्यूटर, यानी कृत्रिम बुद्धि ही यह कह रही थी कि परमाणु बिजलीघर को बंद कर देना चाहिए, लेकिन मानव ने ऐसा नहीं किया.

मेरा मानना है कि इस मामले में जीतेगा कृत्रिम बुद्धि वाला कंप्यूटर ही. वह तो शराब नहीं पीता, किसी नशीले पदार्थ का सेवन भी नहीं करता, परेशान नहीं होता, नाराज़ नहीं होता, आत्महत्या भी नहीं करता, क्रोधित नहीं होता, जान बूझ कर कोई दुर्घटना नहीं करता, किसी का अपहरण नहीं करता! कोई भी मशीन अपने आप ऐसा नहीं कर सकती है. उम्मीद है कि तमाम क्षमताओं के बावजूद, कृत्रिम बुद्धि भविष्य में भी ऐसा नहीं करे

डॉक्टर नहीं! डाटा डॉक्टर

जब मैंने पहली बार अपने एंड्राइड आधारित मोबाइल पर दिल की धड़कने नापने वाला एप्प इस्तेमाल किया तो हैरान रह गया था. ना किसी डॉक्टर की ज़रूरत ना किसी ख़ास जगह या उपकरण की! फिर मैंने पाया अनुमानित रक्तचाप बताने वाला एप्प. एक इमरजेंसी डॉक्टर मेरी जेब में था.

अब तो नागपुर निवासी मेरे बचपन के मित्र के मोबाइल पर उनका सारा मेडिकल रिकॉर्ड दर्ज़ होता रहता है और मोबाइल उन सभी डाटा को खंगाल कर उनको किसी ख़ास दवाई को सही समय लेने के बारे में याद दिलाता है. दवा खा लेने के बाद उसको बताया भी जाता है कि भई डाटा डॉक्टर! मैंने दवा खा ली ही तो मोबाइल फिर याद कराता है कि अगली दवा कब खानी है. 🙂

मोबाइल डॉक्टर -भविष्य की दुनिया

जब यह तकनीक अपने शबाब पर होगी तो इसके फायदे तो बहुत होंगे. हाथो हाथ मिलती रिपोर्ट्स, चौबीसो घंटे की उपलब्धता, विस्तृत रिपोर्ट, पलक झपकते ही दसियों हजार संभावनाओं पर आधारित परिणाम, ना कहीं जाना, ना मिलने का इंतज़ार, सस्ता, सटीक निर्णय. सबसे बड़ी बात उन डॉक्टरों से छुटकारा जो किसी कमीशन, किसी लालच या स्वार्थ के वशीभूत मरीज के हित से हट कर सलाह देते हैं.

हालांकि अभी मंजिल बहुत दूर है. अभी तो डॉक्टर के बिना काम नहीं चलता. कोई दुर्घटना हो, हाथ पैर टूट जाएँ,नई बीमारी हो, हाथ का स्पर्श हो, ताज़ा शोध परिणाम हो, काम का अनुभव हो. इसके लिए तो कोई इंसानी डॉक्टर ही बेहतर है.

फिर भी विस्तृत डाटा की उपलब्धता और कंप्यूटिंग गणना के चलते भविष्य की यह मेडिकल-कंप्यूटर तकनीक ना सिर्फ सस्ती होगी बल्कि डॉक्टर्स का 80 % से अधिक काम संभाल लेगी.

3 D प्रिंटिंग

बचपन की मासूमियत और किशोरावस्था की कल्पनाओं के दौरान कई बार मन में आता था कि मेरे मष्तिष्क में उमड़ती घुमड़ती अजीबोगरीब आकृतियाँ अगर आकार ले पातीं तो कितना बढ़िया होता. उस लाल रंग खिलौने की दो और टाँगे होती, गिफ्ट में मिले अकेले कॉफ़ी मग सरीखा दूसरा बन जाता तो जोड़ी हो जाती या फिर बबलू के ऑफिस में देखा गया शानदार फोटो फ्रेम बना लेता! मज़ा आ जाता!!

कई बार दिमाग में अजीब चीजों की आकृतियों बन जाती हैं. उन चीज़ों को हकीकत में बना पाना संभव नहीं होता, लेकिन अब भविष्य की तकनीक -थ्रीडी प्रिंटिंग से, जो भी दिमाग में चल रहा होता है, उसे बनाया जा सकता है. अब कल्पनाशीलता, मशीनों के ज़रिये साकार हो रही हैं.

3 डी प्रिंटिंग -भविष्य की दुनिया

हमने तो कंप्यूटर में लिखे दस्तावेज़, चित्र का प्रिंट हजारों बार लिया है. गिलास का प्रिंट, प्रिंटर से लिया तो गिलास की फोटो दिखी. लेकिन ऐसा प्रिंटर, जिससे निकला हुआ गिलास का ‘प्रिंट’ वास्तव में पानी या चाय पीने के उपयोग किया जा सके !! यह संभव है 3D प्रिंटिंग से.

अब अगर घर के वैक्यूम क्लीनर का कोई पुर्जा ख़राब हो गया. मैकेनिक को बुलाया तो पता चला कि पुर्जा लाना पडेगा. वो पुर्जा लाया जाएगा कंपनी से. कंपनी किसी कारखाने से बनवाती होगी. कारखाने वाले उस पुर्जे को बनाने के लिए बड़ी बड़ी मशीनें लगा कर धंधा कर रहे होंगे..मतलब कि समय की बर्बादी और करोड़ों अरबों खर्चे के बाद बना महंगा पुर्जा

अगर 3D प्रिंटिंग हो तो उस पुर्जे को 3D प्रिंटिंग के सहारे उसी समय घर पर ही बना लिया जाएगा. आप तो बस पुर्जे की CAD फाइल इंटरनेट ठिकाने से लीजिए और फिर 3D प्रिंटर से थोड़ी देर में वह पुर्जा तैयार और वैक्यूम क्लीनर चालू. कोई लेथ मशीन नहीं कोई घिसाई, रगड़ाई नहीं 🙂

अब तो डॉक्टरों ने प्लास्टिक सर्जरी की बजाए आदमी का चेहरा ही बना डाला है और चीन में तो इस तकनीक से 200 वर्गमीटर इलाके में 24 घंटे के भीतर 12 घर बना डाले हैं. कॉर्नेल विश्वविद्यालय में थ्रीडी प्रिंटिंग का इस्तेमाल कर जो (रेडियो के) स्पीकर बनाए वे प्रिंटर से बाहर आते ही काम करना शुरू कर देते हैं.

ये तो एक तरह से अपने घर में एक ऐसे कारखाने की तरह है जिससे हर सदस्य अपनी पसंद का कुछ भी सामान ‘प्रिंट’ कर सकता है. भले ही इस 3D प्रिंटिंग का प्रयोग, उपयोगी वस्तुओ के निर्माण में एक बड़ा शानदार कदम है वहीं इसका प्रयोग कर हथियार निर्माण भी तो बेहद आसानी से किया जा सकता है.

अगर शुरुआत ही ऐसी है तो फिर भविष्य में क्या होगा?

स्मार्ट ग्रिड

कंप्यूटर आधारित रिमोट कंट्रोल और स्वचालन का उपयोग कर गठित की गई बिजली वितरण प्रणाली को आम तौर पर स्मार्ट ग्रिड के नाम से जाना जाता ही. हालांकि दो तरफ़ा संचार प्रणाली और कंप्यूटर प्रोसेसिंग से संभव होने वाली यह पद्धतियों अन्य उद्योगों में दशकों से इस्तेमाल की जा रही हैं. अब इसका पदार्पण ऊर्जा संयंत्रों और पवन चक्कियों से उत्त्पन्न बिजली के प्रबंधन में हो रहा.

तमाम तरह की विद्युत उत्पादन इकाईयों के संजाल वाली इस प्रणाली की खास बात यह भी है कि मांग और आपूर्ति के बीच में यह आटोमैटिक रूप से प्रबंधन करने में सक्षम है.

स्मार्ट ग्रिड -भविष्य की दुनिया

भारत में, इस विकसित हो रही तकनीक के द्वारा पावर कट की नौबत आने पर उपभोक्ताओं को कम से कम 72 घंटे पहले ही एसएमएस के माध्यम से इसकी सूचना दे दिए जाने की तैयारी हो रही है. अगर स्मार्ट ग्रिड से काम लिया जाए तो यह वितरणकर्ता कंपनी और उपभोक्ता दोनों के लिए काफी फायदेमंद है. लेकिन इसकी स्थापना अपने आप में चुनौतीपूर्ण हैं.

वर्तमान में स्मार्ट ग्रिड शुरुआती चरण में है क्योंकि यह तकनीकी और वाणिज्यिक रूप से फायदेमंद नहीं है. इसका क्रियान्वयन इतना आसान नहीं है. देश में बिजली के ढाँचे में 19वीं सदी के अंत से अब तक कोई बदलाव नहीं आया है जबकि दूसरे देशों में काफी बदलाव आ चुके हैं. अब समय आ गया है कि इस क्षेत्र में नई तकनीक का प्रयोग किया जाए.

तकनीक की बात की जाए तो यह सारा तामझाम किसी दिमाग वाले कंप्यूटर सरीखा है जो तमाम तरह की सूचनाओं के आधार पर मांग और वितरण के मध्य संतुलन बनाए रखता है.

स्मार्ट ग्रिड का परिचय देखना हो तो इस पीडीएफ फाइल के लिए क्लिक किया जा सकता है या फिर स्मार्ट ग्रिड के आर्थिक लाभ पता कर लीजिये. भारत में भी स्मार्ट ग्रिड संबंधित एक वेबसाइट India Smart Grid Knowledge Portal सैम पित्रोदा ने उद्घाटित की है जिसे यहाँ क्लिक कर देखा जा सकता है.

ब्रेन कंप्यूटर इंटरफ़ेस

बिना कुछ बताये एक माँ जैसे जान जाती है अपने बच्चों के बारे में या एकाएक लगता है कि किसी ने मुझे पुकारा. इसी आभास को वास्तविकता में बदला जा रहा है ब्रेन कंप्यूटर इंटरफ़ेस कहते हुए

अभी तक आम जीवन में इस तकनीक को हम टेलीपैथी के नाम से पुकारते आये हैं. टेलीपैथी मतलब, बिना किसी भौतिक माध्यम की सहायता के एक इंसान का दूसरे व्यक्ति के मस्तिष्क को पढ़ने अथवा उसे अपने विचारों से अवगत कराने में कामयाब होना. ऐसा अनुभव होता देखा भी गया है.

विज्ञान के अनुसार मृत्यु तो दिमाग की होती है और जब दिमाग ही किसी सुपर कंप्यूटर में उतार लिया गया तो अमर होने की कल्पना कितनी दूर रह जाएगी. जिस दिन इंसानी दिमाग कंप्यूटरों में अवतरित होने लगेगा, उस दिन मानव और मशीन के बीच की दूरी मिट जाएगी. समझदार कंप्यूटरों के आने बाद मशीनें अच्छी बुरी भावनाओं का भी इजहार करने लगेंगी. भले ही इंसानी दिमाग की डाउनलोडिंग अभी कुछ ही वर्ष दूर है लेकिन इन सबसे लिए ज़रूरी है इंसानी दिमाग और कंप्यूटर के बीच संबंध स्थापित करने की तकनीक. वो इंटरफ़ेस जो कम्प्यूटरों को मानवों से ‘बात’ करना आसान करायेगा..

टेलीपैथी -भविष्य की दुनिया

इस विधा के लिए जो एजेंसी अरबों खरबों खर्च कर रही उसी एजेंसी को इंटरनेट की खोज करने का श्रेय प्राप्त है. इस तकनीक के जरिये ही अभी अपंग और लकवाग्रस्त लोग, रोबोटिक बाँह और कंप्यूटर के कर्सर जैसी चीजें हिला पाते हैं. दिमाग को सीधे कंप्यूटर से जोड़ दिए जाने से उन लोगों को काफी मदद मिल सकती है जिनका दिमाग पूरी तरह सक्रिय है लेकिन किसी दुर्घटना या बीमारी के कारण अपने हाथ-पैरों पर नियंत्रण नहीं रख सकते. ये लोग शरीर पर नियंत्रण इसलिए नहीं रख पाते क्योंकि उनके मस्तिष्क से निकले आदेश शरीर के विभिन्न अंगो तक नहीं पहुँचते.

इस तकनीक को एक आर्गेनिक कंप्यूटर भी कहा जा रहा है जो दुनिया के कई कंप्यूटर मस्तिष्कों को जोड़ कर एक ऐसा जैविक कंप्यूटर बनाएगी जो उन समस्याओं को भी चुटकियों में हल लेगा जिन्हे एक मानव मस्तिष्क हल कर पाने में संभव नहीं.

इस से कई नैतिक सवाल भी खड़े हो गए हैं. इसके जरिये किसी दिन कोई भी रिमोट तकनीक से संचालित होने वाले जानवरों अथवा इंसानों की विशाल सेना तैयार कर सकता है. ऐसे में संभावना है कि तकनीक से लैस मशीनें, इंसानों के खिलाफ विद्रोह कर दें. भले ही इलेक्ट्रॉनिक सर्किटों का मशीनी समाज अभी हमारे हाथ में है लेकिन दस-बीस साल बाद हमें यह नियंत्रण हासिल हों जरूरी नहीं. अरे! तब मशीनों की दुनिया के भी अपने कुछ कायदे-कानून नहीं हो सकते क्या? हो सकता है उनमें दखल की इजाजत हम नाकारा हो चुके इंसानों को मिले ही नहीं !!

आभासी मानव

हम भारतीयों के लिए आभासी मानव का सबसे बढ़िया उदाहरण है हालिया लोकसभा चुनाव.  मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने देश भर में अपने त्रिआयामी होलोग्राफिक  चलते फिरते चित्र के सहारे एक साथ कई कई जगह चुनाव प्रचार किया. भले ही वे सशरीर उपस्थित नहीं थे लेकिन दर्शकों को वे बोलते दिख रहे थे.

यह केवल एक वास्तविक मानव के सशरीर होने का आभास देता ‘प्रसारण’ था. जबकि आभासी मानव या डिजीटल प्रतिरूप, कंप्यूटर जनित ध्वनि और कल्पना का मिश्रण है. किसी चरित्र या मानव का आभास देती, वास्तविक सी लगती काया कंप्यूटर पर बनाई जाती है और फिर उसमें कृत्रिम बुद्धि का मसाला उड़ेला जाता है. जो परिणाम सामने आता है वह ऐसा लगता है जैसे कोई वास्तविक रूप में हमसे बतिया रहा हो वीडियो चैट पर.

आभासी मानव -भविष्य की दुनिया

इस तकनीक का फ़ायदा एक उदाहरण से समझा जाए. यदि कोई आभासी डॉक्टर रूप अपने शर्मीले मरीज़ से उसकी बीमारी के बारे में पूछ रहा हो, परामर्श कर रहा हो तो मरीज खुल कर अपनी बात बता सकता है. जबकि एक वास्तविक,  इंसान डॉक्टर के सामने कोई रहस्य खुल जाने के डर से या स्वाभाविक झिझक के कारण जैसे मानवीय भावनाओं से शायद मरीज खुल ना सके.

ऐसा ही कुछ आभासी टीचर, आभासी इंटरव्यूकर्ता या आभासी बॉस के सामने होने से होगा. मालूम है कि ना तो कोई उठ कर थप्पड़ मारेगा, ना ही कोई चिल्ला कर बदला लेने का डर दिखाएगा. यह कुछ कुछ उस मशीन सरीखा है जो हवाई जहाज के पायलट्स को सचमुच के जहाज उड़ाने के पहले आभासी कॉकपिट में प्रशिक्षित करती है.

आइये स्वागत करें

हम एक बेहतरीन मोड़ पर खडे हैं जहां अलग-अलग तरह की तकनीकें विकसित हो रही हैं जब इस सभी चीज़ों को जोड़ दिया जाएगा तो पांच साल बाद, हम इस वक्त कंप्यूटर का किस तरह इस्तेमाल करते हैं वो पूरी तरह से बदल जाएगा.

पहले दुनिया बदल देने वाली तकनीकों को जड़ पकड़ने में बरसों लग जाते हैं. जब बिजली आई तो लोगों ने घरों में इसे इसलिए अपनाया कि यह तेल से जलने वाले दियों की अपेक्षा अधिक सुविधाजनक थी. उस समय किसी ने भी नहीं सोचा होगा कि आने वाले समय में बिजली का प्रयोग व्यापार और मानव जाति को किस तरह से बदल देगा. अब तो हम इंटरनेट युग में जी रहे हैं जहां 10 साल आम जीवन के 100 साल के बराबर है.

मेरा मानना रहा है कि तकनीक नाम की चीज उन लोगों के लिए है जो इसके लिए धन व्यय करने में समर्थ हैं. वरना आज भी ऐसे मानव हैं जिन्हें जीने, खुश रहने के लिए किसी तकनीक या उपकरणों की ज़रुरत नहीं.

© बी एस पाबला

भविष्य की दुनिया बदल देंगी यह उभरती तकनीकें
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21 Thoughts to “भविष्य की दुनिया बदल देंगी यह उभरती तकनीकें”

  1. पाबला साहब सही मे हम लोग उस मोडपर खडे है जहा चारो ओर इतने कुछ होता हुआ दिख रहा है की हम खुद के अल्पज्ञान पर इतराना छोड देते है| सर आपने करीबन सभी क्षेत्र का परिचय दिया| विनम्रता के साथ कुछ आपसे अपेक्षाये भी रखता हू|

    एक तो गुगलने ‘स्मार्ट होम’ पर काफी कुछ काम शुरू किया है| इस बारे मे एक स्वतंत्र लेख हो सकता है|

    दुसरी बात आज पुरी दुनिया मे ड्रोन्स की धुम है| भिलाई मे रहने की वजहसे (गव्हर्नमेंट रेग्युलेशन्स!) इसपर आप खुद प्रयोग नही कर सकते लेकिन हिंदी भाषियो को इसकी विस्मयकारी दुनियाकी सैर अवश्य करा सकते है| धन्यवाद

    1. बी एस पाबला

      Approve
      आभार शेखर जी

      ड्रोन उड़ाते हैं कुछ दिनों में

      1. shiv kumar dewangan

        बड़े भैय्या पाब्ला जी,
        सचमुच ही आने वाली दुनिया तकनीक के माध्यम से बड़ी तेजी से बदलने वाली है. पर आप हमें ऐसे ही पूर्वानुमान से अवगत कराते रहेंगे, तो ज़िंदगी कैसे काट जायेगी पता ही नहीं चलेगा. आपके नए ब्लॉग के इंतज़ार में.
        शिव कुमार देवांगन

  2. एक बात मै और कहना चाहूंगा की आजकल ‘स्मार्ट कार’ शब्द सुनाई देने लगा है| लेकीन आपने इस बारेमे कई महिने पहले न केवल इसपर आर्टीकल लिखा बल्की आपकी खुद की ‘मारूती इको’ भी स्मार्ट कर ली|

    1. बी एस पाबला

      Smile
      उसी स्मार्ट कार में आएंगे आपसे मिलने

  3. आप ने तो भविष्य का ऐसा खाका खींचा है कि पढ़ने के बाद वर्तमान में रहने का मन ही न करे।

    1. बी एस पाबला

      Heart
      मन बड़ा चंचल होता है

    2. kashav kaushik

      Afcos hum na honga
      Pabla g bada dukh ke baat hai

  4. भविष्य बदलने वाली उभरती तकनीकी में खो गए हम तो पढ़ते-पढ़ते …सच में टेक्नोलॉजी के बदलते कमाल को आँखों से देखना विस्मय भरा होगा ..अभी तो हमारे लिए सपने जैसा है …
    बहुत रोचक और उलेखनीय प्रस्तुति के लिए आभार

    1. बी एस पाबला

      Angel
      सपनों को पंख लगें तो हकीकत रोमांचकारी हो जाएगी

  5. टाइम मशीन और स्टारट्रेक सीरीज़ में आवागमन का तरीका भी कभी हकीकत में होगा .
    विज्ञान के चमत्कार देखने के उत्सुक है हम
    टिप्पणीकर्ता dhirusingh ने हाल ही में लिखा है: क्या चिटठा जगत और ब्लोगवाणी की कमी खल रही है हिन्दी ब्लॉगिंग को ?My Profile

    1. बी एस पाबला

      Yes-Sir
      हम भी आपके साथ रहेंगे

  6. शरद कोकास

    बूढ़े , बच्चे , अन्धे , शराबी , विकलांग .. यह सब किसी एक शब्द के पर्यायवाची नहीं लगते ? बहरहाल आपके लेख से विनोद कुमार शुक्ल का उपन्यास याद आ गया ” खिलेगा तो देखेंगे ” .. तो अपन भी ऐसा ही कुछ सोच लेते हैं ज़िन्दा रहे तो यह सब देखेंगे ।

    1. बी एस पाबला

      Optimus Prime
      ज़रूर, तब तक हम आप भी तकनीक में ढल चुके होंगे

  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (01-09-2014) को “भूल गए” (चर्चा अंक:1723) पर भी होगी।

    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर…!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

    1. बी एस पाबला

      Heart
      आभार रूपचन्द्र जी

  8. आप की तकनिकी पर जानकारी विस्तृत है, ऐसी जानकारी पा कर लगता है सतयुग आने वाला है. जब हम एक दुसरे की मन की बात जान जाये गे,तो एक दुसरे के प्रति निष्ठावान /वफादार बन जायेगे.एक दुसरे के प्रति हमारी,ग्लानी,द्वेष ख़त्म हो जायेंगे.प्यार ही प्यार बेशुमार हो जायेगा.
    भविष्य की दुनिया सच में बदल देगी तकनिकी.
    टिप्पणीकर्ता harivansh sharma ने हाल ही में लिखा है: इबादतMy Profile

    1. बी एस पाबला

      I-Wish
      काश ऐसा होता

  9. बहुत ही रोचक …
    टिप्पणीकर्ता सु-मन ने हाल ही में लिखा है: शब्द से ख़ामोशी तक ..अनकहा ‘मन’ काMy Profile

    1. बी एस पाबला

      Happy
      आभार सु-मन जी

  10. चकित करती जबरदस्त जानकारियां

    पढ़कर दिमगवा ही घूम गया जी

    दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गयी ….

    आभार
    टिप्पणीकर्ता Prakash Govind ने हाल ही में लिखा है: कैसे-कैसे दिलचस्प साइनबोर्ड 🙂My Profile

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