जब हमने ममता जी से मुलाकात करने से इंकार कर दिया

स्पूल रिकॉर्डर, रिकॉर्ड प्लेयर, सीडी प्लेयर, कंप्यूटर, विविध एनालॉग -डिजीटल उपकरणों का उपयोग एक साथ होते देख मुझे अपने इस्पात संयंत्र की याद हो आई। मैं सोचता था कि ऐसा तकनीकी संगम हमारे ही यहाँ होता है। कितना गलत था मैं। यूनुस जी द्वारा जसवंत सिंह जी के, रिकॉर्ड संबंधित एक पोस्ट का जिक्र इसके पहले किया जा चुका है। जब तक यूनुस जी कार्यक्रम पेश कर वापस आते, तब तक मोदी जी अपने पिछले कर्त्तव्य स्थलों से संबंधित दिलचस्प जानकारियाँ देते रहे।

परिसर में ही, विविधभारती परिवार के एक सदस्य ने जब हमारा परिचय जानना चाहा, तो मैंने बड़ी सहजता से जवाब दिया था कि हम भिलाई से आये हैं और यूनुस जी से मिलने आये हैं, तो उनकी प्रतिक्रिया थी ‘अच्छा, अपनी बेटी के लिए आये हैं!?’ जब मैने प्रतिकार करते हुए अपने शब्द दोहराये, तो उनका रवैया ही बदल गया ‘कितनी खुशी होती है न?, जब इतनी दूर से कोई सिर्फ हमारे सहकर्मी से मिलने आता है।’

इस बीच जब यूनुस जी लौटे और HAM Radio पर चर्चा के बीच, एक इंटरव्यूनुमा बातचीत रिकॉर्ड करने की इच्छा जाहिर की तो मुझे लगा कि एक गलतफहमी को दूर करने का इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा। मैंने विनम्रतापूर्वक उन्हें यह सूचित किया कि मैं कोई सक्रिय हैम नहीं हूँ, एक साधारण सा मानव हूँ जो शौकिया तौर पर शौकिया रेडियो की जानकारी रखता है। कभी कोशिश की थी सन 1975-76 में।

नागपुर जा कर मोर्स कोड की परीक्षा देने की बात, पिता जी को कतई पसंद नहीं आयी थी और मेरा शौक धरा का धरा रह गया था। अब जैसे कोई डॉक्टर, वायलिन वादन की बारीकियां जानता है, कोई वकील बागवानी के गुर, बेहतर तरीके से बता सकता है, तो मैं हैम रेडियो के बारे में क्यों नहीं जान सकता और जानकारी बांट सकता? तब यूनुस जी ने भी अपनी यादें ताजा की, अपने पिता के द्वारा संगीत और रेडियो के प्रति उनके रूझान को देखकर दी जाने वाली प्रतिक्रिया की।

बातें चलती रहीं, रेडियो की, संगीत की, भाटापारा की (संदर्भ: बचकामल), झुमरीतलैया की। इस बीच सरकारी कामकाज भी निपटता रहा। जब मैने इजाजत मांगी, काफी समय गुजर चुका था। ग्राऊँड फ्लोर तक आते-आते, करिश्मा कपूर की फैन, MBA में अध्ययन्रत हमारी बिटिया के फिल्मी ज्ञान की झलक दिखने लगी, जब यूनुस जी और मोदी जी से बातचीत में उसने, करिश्मा संबधी जानकारियों का पिटारा खोल दिया। मैं खुद हैरान था उसकी धाराप्रवाह जानकारियों से!

यूनुस जी ने पहले तो हमें अपने निवास चलने का आमंत्रण दिया। फिर, समयाभाव का वास्ता दिये जाने पर, हमें बोरिवली स्टेशन तक छोड़ने का प्रस्ताव रखा और हमने उनके साथ कुछ और समय बिताने के लालच में, उसे तुरंत मान लिया। रास्ते में उन्होंने एक कॉफी शॉप पर अपनी कार रोकी। फिर एक और दौर शुरू हुया बातों का।

उस कॉफी शॉप में कई स्टीकर लगे थे, जिनका संदेश यही था कि ‘अपनी आवाज धीमी रखिये, दूसरों को तकलीफ हो सकती है’। लेकिन वहाँ तो हर व्यक्ति दूसरों को तकलीफ पहुँचाने में जुटा था! नतीजतन, न चाहते हुये, हमें भी दूसरों को दुख पहुँचाने की प्रक्रिया में शामिल होना पड़ा।

… और फिर वह क्षण आया जब हमने फिर, ममता सिंह जी से न मिल पाने के बारे में, अपनी व्यथा यूनुस जी से साझा की। पहले तो वह मुस्कुराये, फिर धीरे से रहस्योद्घाटन किया (भई, मेरे लिए तो वह रहस्योद्घाटन से कम नहीं था) ‘ममता जी मेरी जीवन साथी हैं’।

सच कहूँ तो मुझे एकाएक गुस्से का उबाल सा आते आते रह गया या कहूँ तो उस गुस्से को रोक लिया। उस दबाव को नाराज़गी से बदलने में देर नहीं लगी। कोई काम होना ही नहीं, दिखना भी चाहिए के दर्शनशास्त्र का पालन करते हुए, हमने भी नाराज़गी दिखाई और साफ-साफ कह दिया कि ‘यदि पहले ही आपने बताया होता तो आपके घर जाये बिना तो हम लौटते नहीं। यह आपने ठीक नहीं किया।’

नाराज़गी के स्तर को देखते हुये उन्होंने मोबाईल की ओर हाथ बढ़ाया, यह कहते हुये कि ‘भोजन के बाद ममता जी आराम कर रही होंगी, लेकिन आपकी मुलाकात करवा ही देता हूँ’। मेरा माथा ठनका, जब इसी बात के साथ-साथ वे लगभग गाने के अंदाज में एक-दो-तीन करने लगे! पहले तो मैने सोचा कि ‘तेज़ाब’ के गाने की शुरूआती पंक्तियाँ हैं, लेकिन फिर समझ आया कि ये तो ‘अमर अकबर एंथोनी’ के गाने की अंदरूनी पंक्तियाँ हैं! इतना समझ में आते ही मैंने उन्हें रोका कि रहने दीजिए, अब तो हम खास तौर पर तब मुम्बई आकर ममता जी सहित आपसे तब मिलेंगे, जब आपकी गिनती, ममता जी के साथ वास्तविकता में दिखेगी।

बोरिवली स्टेशन पर, अंधेरी के लिए टिकट लेकर पहुँचते वक्त 5:15 हो चुके थे। पहले ही बात हो चुकी थी, हमारे सुपुत्र के एक क्लाइंट, सरदार हरजीत सिंह से मिलने की। जिन्होंने अंधेरी के शेरे पंजाब सोसायटी में अपना कार्यालय बना रखा था। अंधेरी स्टेशन से जब आटो-रिक्शा से हम गंतव्य की ओर जा रहे थे तो ऐसा लग रहा था जैसे वह इलाका कभी पहाड़ रहा होगा! सड़कों का उतार-चढ़ाव ऐसा ही आभास दे रहा था।

हरजीत सिंह जी अपनी एक वेबसाईट के द्वारा मिस्टर सिंघ (इंडिया) 2009 और मिस कौर (इंडिया) 2009 का आयोजन और प्रचार कर रहे हैं। इसी सिलसिले में बातें करते हुए समय बीत गया। वापस लौटते वक्त उनकी सलाह थीकिकुर्ला चले जाइए, वहाँ से खारघर नज़दीक पड़ेगा, लेकिन रात होते देख जाने पहचाने रूट को ही तवज्जो दी गई।बांद्रा से 505 की बस पर सवार हो, रात की जगमगाहट देखते हुए, CBD से बस बदल कर जब घर पहुंचे तो साढ़े दस बज रहे थे। लोहड़ी का पारंपरिक कार्यक्रम अपने अन्तिम चरण में था। मामी की नाराज़गी छुपी ना रह सकी। मामी के दो पैराग्राफ सुनने के बाद ही कार्यक्रम में शामिल हो सके। टॉफियों के डीलर अपनी पूरी मस्ती में थे, आखिर कार्यक्रम उन्हीं के लिए तो था! रात को सोते समय, अगले दिन की योजना में, अनिता जी से मुलाकात की प्राथमिकता तय कर ली गयी।

 अब अगले दिन, 13 जनवरी का हाल, अगली पोस्ट में।

जब हमने ममता जी से मुलाकात करने से इंकार कर दिया
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13 Thoughts to “जब हमने ममता जी से मुलाकात करने से इंकार कर दिया”

  1. रोचक है पाबलाजी। वर्णन से लगता है कि आप ‘सूने गांव में सात दिन’ रह सकते हैं। दोस्‍तों से मिलने के लालच मे जो आदमी, भिलाई से मुम्‍बई आने के खास मकसद को ही पीछे धकेल दे वह ‘श्रेष्‍ठ अड्डेबाज’ के सिवाय और कुछ हो ही नहीं सकता।
    ऐसे लोगों के दम पर ही दुनिया टिकी हुई है।

  2. पता होता तो हम विविध भारती के दफ़्तर में ही ब्लोगर मीट कर लेते। ममता जी बहुत प्यारी हैं देखने में जितनी सुंदर हैं उतनी ही प्यारी इंसान भी है। अगली बार आये तो जरूर मिलिएगा, बल्कि यूनुस जी से पूछते है कि कोई कार्यक्रम बना लें एक बार फ़िर दोस्तों को विविध भारती में जमा करने का। आशा है मोदी जी भी इसे पढ़ेगें और हिन्ट ले ही लेगें । फ़ोटो थोड़ी और बड़ी कर के लगानी थी न आप की शख्सियत इतनी कददावर है कि बिटिया को ठीक से देख नहीं पाये…:) अब एक और फ़ोटो हो जाए। भाई ये तो कमाल है लोड़ी के लिए आये और उसे ही ठेंगा दिखा गये, मामी जी का दो पेराग्राफ़ सुनाना लाजमी था। शुक्र है दो में ही छूट गये। अगली पोस्ट का इंतजार

  3. पाबला साहब जी, बहुत सुंदर लगा. आप का यात्रा विवरण,मन तो आप के साथ साथ सारी जगह घुमता रहा, उस काफ़ी हाऊस मे जहां धीरे बोले के बावजुद लोग जोर से बोल रहे थे, फ़िर बस ना० ५०५, सच मै बहुत मजा आ रहा है, फ़िर आप के लिखने का ढंग भी बहुत प्यारा है, चलिये जल्दी से अनिता जी से मिलिये, ओर बताईये, मेरी एक दो बार बात तो हुयी है, लेकिन मिलना कब होगा पता नही, चलिये आप के बहाने हम भी मिल लेते है अनिता जी से.
    बहुत बहुत धन्यवाद

  4. पाबला जी ने कुछ न बताया, उन के साथ तीन दिन रहे। बस इसी सिरीज का इंतजार था जो हमारे प्रवास के बीच ही शुरू हो गया। आज एक साथ चार पोस्टें पढ़ कर ऐसा लगा पाबला जी के साथ मैं भी मुंबई में ही था।
    हाँ यूनुस जी किसी ब्लागर मीट का प्रोग्राम बनाएं तो जल्दबाजी में न बनाएँ। हम भी तो ऐसी ब्लागर मीट में होना चाहेंगे।

  5. ओये…….तो ऐ गल्ल सी युनुस जी नाल नाराज होण दी । हुण अगली पोस्ट छेती लिक्खो ।

  6. अगली कड़ी का इंतज़ार शु्रू।

  7. ओए होय होय । लगता है कि अब कोई आयोजन करना ही पड़ेगा । वैसे आप किससे मिलके आए पाब्‍ला जी । ये तस्‍वीर में कौन है आपके साथ । क्‍या ये हम ही हैं । ओह हम ही तो हैं ।

  8. ममता जी को आपका कमाल का ब्‍यौरा पढ़कर मज़ा आ गया । इसे कहते हैं ऐसे अपनी बात कहना कि कह भी दिया जाए और ना भी कहा जाए


  9. पढ़ रहा हूँ,
    आप लिखते चलिये..
    प्रतिक्रिया लम्बित है ।

  10. तुसी घबराओ ना भ्राजी…अगली वारि सान्नू मिलो फेर असी दोनों ममता जी ते अनीता जी नाल मिलन लयी चलांगे…अनीता जी खाना बहुत लाजवाब बनादे ने…जिन्हाने खाया है हुन तक उँगलियाँ चट रहे ने…
    बड़ी दिल नाल मुंबई दास्तान लिख रहे हो तुस्सी…बड़ा ही मजा आ रेया है…
    नीरज

  11. भई वाह… मैं तो यूंही चला आया था ये सोच कर कि देख लूं सरदार जी कैसे ब्लागिंग करते हैं…. पर पा’जी अ तै मजाइ आग्या.. अस्सी वी त्वाडे नाल मुंबई होइयाए… आजो बादशाऒ किसे दिन्न पाणीपत दा मदान विखाइये…

  12. शानदार यात्रा वर्णन है….पाबला जी का जिक्र दिनेशजी से सुना था…क्या करें, हमारा ब्लाग भ्रमण बहुत सीमित दायरे में है…
    आज यहां आकर अच्छा लगा…
    मुंबई यात्रा कराने के लिए शुक्रिया…

  13. बैरागी जी ने सटीक कमेन्ट किया है …आपने भी दिलचस्प अंदाज में किस्सा ब्यान किया है ..उनकी एक बात से सहमत हूँ .

    ऐसे लोगों के दम पर ही दुनिया टिकी हुई है।

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