प्लेटफार्म पर जिसकी बातें हुयीं, वो कौन थी!?

अनिता जी के बारे में इतनी तारीफें सुन चुका था कि न मिल पाने के कारण, मुझे अपनी बेबसी पर झल्लाहट होने लगी थी.जब मैंने कहा कि कल तो शाम की ट्रेन से वापसी है तो बिंदास अंदाज में उन्होने कहा कि हालाँकि क्लासेस शाम तक हैं, लेकिन आप आ जाईये दोपहर एक बजे, नवरत्न होटल में साथ-साथ लंच कर लेंगे, फिर आप चल दीजियेगा, बस दो घटों की ही तो बात है, आपकी ट्रेन तो रात 8:35 की है। मैंने एक बार फिर हामी भर दी।

आप भी जानते ही हैं कि जो सोचा जाए, वह कभी हो पाता है क्या? देर रात तक परिवारजनों के साथ यादें ताजा करते कब नींद ने आ घेरा, पता ही नहीं चला। अगले दिन सुबह (अगर उसे सुबह कहा जाए तो!) जब नींद खुली तो 10:25 हो रहे थे। नाश्ते में, मूली के पराँठे, घी-दही-लस्सी (A perfect Punjabi breakfast!) के साथ आए तो निश्चित तौर पर ग्रहण क्षमता बढ़ गई। नाश्ते के बीच ही संदेश आया कि सबसे छोटे ममेरे भाई, जो मर्चेंट नेवी में हैं, सपरिवार आ रहे हैं और दोपहर-भोजन इनके साथ ही होगा।

अब मैं सोच में पड़ गया। अनिता जी को फोन करने ही जा रहा था कि मोबाइल की घंटी बजी ‘ कोई आया…’। देखा तो अनिता जी थीं। घड़ी की ओर नज़र गई, ठीक 1 बजा था। अनिता जी की चहकती हुयी आवाज आई ‘बलबिन्दर जी, मैं घर पहुँच गई हूँ, आप कब तक पहुँच रहे हैं?’ मैं सकपकाया हुया था। वस्तुस्थिति बताते हुए, कुछ समय माँगा। मामाजी से बात की तो समझाइश आई ‘देख पुत्तर! एक बज चुका है, कोपरखैरणे जाकर सही पते तक पहुँचने में काफी समय लग जायेगा। अब कोई इतने प्रेम से बुला रहा है, तो क्या खो-खो के अंदाज में दरवाजा छू कर लौट आयोगे? आख़िर घंटे-दो घंटे बैठोगे ना? मुंबई के ट्रैफिक का ठिकाना नहीं है, फिर लौटकर पाँच बजे के आसपास लोकल पकड़नी है, छत्रपति शिवाजी टर्मिनस के लिए। हो पायेगा?’ मैं निरुत्तर हो गया। अनिता जी को कॉल कर उदास मन से इतना ही कह पाया कि मैं नहीं आ पाउँगा।

परिवार के बीच देखते ही देखते समय बीत गया। समूह चित्र भी Canon के A 470 कैमरे की बदौलत लिए गए। लोकल, खारघर रेलवे स्टेशन पर अल्प समय तक रुकती है अत: माता पिता की शारीरिक अशक्तता को देखते हुए, बेलापुर रेलवे स्टेशन से ही रवाना होने का निर्णय लिया गया।

डबल डेकर का आभास हुया, बेलापुर स्टेशन को देखकर। तैनात पुलिस वालों का व्यवहार प्रशंसनीय था। ऊपर प्लेटफार्म तक जाने के लिए कोई किसी लिफ्ट का नज़र ना आ पाना थोडा आश्चर्यजनक लगा। माता-पिता जैसे तैसे सीढियां चढ़ पहुंचे। अच्छा खासा स्टेशन था वह। पौने छः के आसपास चली वह लोकल, जब छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (मैं अब भी उसे VT के नाम से ज़्यादा पुकारता हूँ) पहुँची, तब शायद सात बज ही रहे थे। भारी गहमागहमी और चौंधियाती रोशनी के बीच, जगमगाते बोर्डों ने जानकारी दी कि हमारी हावड़ा मेल (2809) प्लेटफार्म नंबर 16 से चलेगी। मंथर गति से चलते हुए प्लेटफार्म 16 पर प्रवेश हुया ही था कि मोबाइल महाराज बोल पड़े ‘कोई आया …’ नज़र डाली, तो द्विवेदी जी थे!

जब मैंने बताया कि प्लेटफार्म पर हूँ तो वे बोले ‘मुझे भी अंदेशा था कि आप प्लेटफार्म पर ही होंगे। … और सुनाइये, अनिता जी से मिल पाये?’ मैंने उन्हें संक्षेप में बताया कि क्या हुया था। वे भी बोले ‘हाँ, मैडम भी कुछ निराश लग रही थीं’ द्विवेदी जी ने विषयांतर करते हुए पूछा ‘अच्छा, आप भिलाई कब पहुंचेंगे?’ मैंने बताया कि ट्रेन का समय तो दोपहर 3:30 को पहुँचने का है। वे कह रहे थे ‘दरअसल एक समस्या आ गई है, जिसका समाधान आप ही को करना है, बल्कि आपके सुपुत्र को करना है।’ मैंने सोचा, द्विवेदी जी समस्या का समाधान मुझसे चाह रहे हैं? अहोभाग्य!! द्विवेदी जी आगे बढे ‘आप भिलाई पहुँचिये , फिर बताता हूँ।’ अब मुझसे रहा नहीं जा रहा था। मैंने कहा कि कुछ तो बताइये।

तब द्विवेदी जी ने बताया कि यहीं, मुंबई की एक प्रोफेसर को, उनके अपने कॉलेज की वेबसाईट बनवाने की जिम्मेदारी दी गई है। वे दो बार, अलग अलग व्यक्तियों को यह कार्य सौंप चुकी हैं, लेकिन कार्य हो ही नहीं पा रहा। 26 जनवरी को वेबसाईट का उदघाटन करने का निर्णय लिया जा चुका है, जबकि वेबसाईट का दूर-दूर तक कुछ पता नहीं और वे प्रिंसिपल महाशय को कह चुकीं हैं कि 26 जनवरी तक वेबसाईट आपको मिल जायेगी!’ मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि निश्चिंत रहें, काम हो जायेगा। लेकिन पूरी बात तो पता चले कि कितना काम इस सम्बन्ध में हो चुका, कितना करना है। द्विवेदी जी ने भी बात ख़तम करते हुए कहा ‘मैंने, उन्हें आपकी ईमेल आईडी दे दी है, आप जब तक पहुंचेंगे, आपको ईमेल में विस्तृत जानकारी मिल जायेगी।’

अपनी बर्थ तक पहुंचकर सबसे पहले भोजनयान के बारे में पता किया गया। ट्रेन चलने में देर थी, एसी अभी तक शुरू नहीं हुए थे। पूरी कोच में बेतहाशा गर्मी थी। नीचे उतर भोजनयान कर्मी से जानकारी ली कि ठाणे तक भोजन मिल जायेगा, तब तक चाय-काफ़ी मिल सकेगी। मुम्बई आते वक्त हुए हावड़ा-मुंबई 8030 एक्सप्रेस अनुभव के मुकाबले इस ट्रेन में साफ-सफाई भी बढिया थी और भोजन भी परिपूर्ण मिला। सोने के पहले मैंने एक SMS लिखा कि आपकी मेल का इंतज़ार करूंगा और भेज दिया उन प्रोफेसर साहिबा को।

यह तो थी मेरी मुंबई यात्रा। अब अगली पोस्ट में बताउंगा कि प्लेटफार्म पर हुई बातों के सन्दर्भ में, द्विवेदी जी के सौजन्य से, अब जिनसे अक्सर घंटों बात होती है, वो कौन थी!

प्लेटफार्म पर जिसकी बातें हुयीं, वो कौन थी!?
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6 Thoughts to “प्लेटफार्म पर जिसकी बातें हुयीं, वो कौन थी!?”

  1. चलिये, अनिता जी अगली ट्रिप में मिल लिजियेगा. वृतांत दिलचस्प लिख रहे हैं. आगे इन्तजार है.

  2. वृत्तान्त बहुत सुंदर बन पड़ा है। ये महानगर का जीवन ऐसा ही है। एक व्यक्ति से मिलने में पूरा दिन हो जाता है। मैं चाहते हुए भी बहुत लोगों से नहीं मिल सका। निश्चित ही मुंबई के लिए कम से कम एक सप्ताह का समय निकालना पड़ेगा।

  3. बधिया जी बौउजी,बधिया।टाप गियर मे चल रही है गाड़ी।

  4. आप के मामा जी को कोपरखैरणे की सैर करानी पड़ेगी, ये दिखाने के लिए कि कोपरखैरणे से खारघर का रास्ता सिर्फ़ बीस मिनिट का है और उस पे बोनस ये कि ये रास्ता एकदम ट्रेफ़िक फ़्री है।
    वृतांत बहुत अच्छा लिखा है, आगे का इंतजार है

  5. रोचक वर्णन है। बातों वाली के बारे में जानने की जिज्ञासा आपने जगा दी है। जल्‍दी पूरी कीजिएगा।

  6. मुझे तो यह फैमिली फोटोग्राफ बहुत पसन्द आया। आजकल ऐसे अवसर आते ही कितने हैं जब कुटुम्ब के १५-२० लोग इकठ्ठा हों।

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