सुबह सुबह तोड़-फोड़, माओवादियों से टकराव, जलते टायरों की बदबू और मौत से सामना

नेपाल की राजधानी काठमांडू में इकलौता दिन बिता कर रात को जब मैं बिस्तर पर लेटा तो मेरे दोनों साथी, ललित शर्मागिरीश पंकज खर्राटे मार कर सो रहे थे. लेकिन इससे पहले, दो घंटे तक हम तीनों पर जी भर प्यार लुटाया राजीवशंकर मिश्रा जी ने. मुझ पर तो कुछ अधिक ही.

हालांकि उनकी निश्छल आत्मीयता मन को भिगोये दे रही थी, लेकिन मैं इस प्रवास में यह साफ़ महसूस कर चुका कि गुरूप्रीत को खो देने के बाद कुछ ज़्यादा ही अंतर्मुखी हो गया हूँ और अस्थिर मन:स्थिति के चलते सामूहिक वार्तालाप में पहले जैसी तारतम्यता नहीं रख पाता. ऐसे ही कारणों से राजीवशंकर जी के स्नेह का उचित प्रतिसाद भी नहीं दे पाया.

मैं तब और ज़्यादा अशांत हो उठा था, जब भावुकता में निकले चंद शब्दों पर राजीव जी को चुपके से आँखों से आँसू पोंछते देख लिया. उपमा भले ही किसी को खटक जाए लेकिन यह कहने से रोक नहीं पा रहा कि अपने ढेरों प्रशंसकों के बीच ‘रामभक्त हनुमान’ मिलना विरलों को ही नसीब होता है.

मैंने उनसे वादा किया है कि ख़ास तौर पर उनसे ही मिलने एक बार और काठमांडू आऊँगा. देखें, कब निभा पाता हूँ यह वादा

काठमांडू आने जाने के लिए हुई 3000 किलोमीटर की यात्रा वाले रोचक संस्मरणों का संक्षिप्त विवरण यहाँ क्लिक कर देखें »

 

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लाख मना करने के बावजूद ‘चरणों’ में बैठ कर ही फोटो खिंचवाई राजीवशंकर मिश्रा जी ने

उस रात बातों का सिलसिला जबरन समाप्त कर जब हमने राजीव जी को विदा किया तो उन्होंने आग्रह किया कि दरवाज़ा खुला रखियेगा ताकि सुबह 4 बजे रवाना होने के लिए समय पर आपको जगा सकूँ. मैंने हँसते हुए उन्हें कहा कि मुझे आप समय पर तैयार पायेंगे.

सोने के पहले मेरी और ललित जी के बीच हलकी झड़प हो गई. दरअसल उस कमरे में एक ही इलेक्ट्रिकल सॉकेट ऐसा था जो काम कर रहा था. इधर मेरे कैमरे की बैटरी ज़वाब दे चुकी थी उधर ललित जी के कैमरे का भी वही हाल था. उन्होंने पहले से चार्जर लगा रखा था. मैंने कहा कि अभी 4 घंटे बाक़ी हैं इस बीच दो घंटे मेरे कैमरे की बैटरी चार्ज हो जायेगी और दो घंटे बाद आपके कैमरे के सेल लगा दूँगा. वे यह मानने को तैयार नहीं थे कि रात दो बजे उठ कर मैं यह काम कर सकूंगा.

लेकिन हुआ वही. दो बजे उठ कर मैंने अपना चार्जर निकाल उनका चार्जर लगाया और दोनों ही कैमरे हमारे भिलाई पहुंचते तक चले.

सुबह सवा तीन बजे जब मैं बिस्तर से उठा तो बाहर बारिश का शोर था. हालांकि वह बूंदाबांदी ही थी लेकिन आसपास के टीन वाली इमारतों पर पड़ती बूँदें नाहक ही हल्ला-गुल्ला कर रहीं. मेरे स्नान कर निकलते तक राजीव जी आ चुके थे और गिरीश पंकज, ललित शर्मा आँखे मलते बैठे थे अपने अपने बिस्तरों पर.

हम तीनों जब स्वागत कक्ष में पहुंचे तो वहाँ चाय का इंतज़ाम मिला. अंतर सोहिल, सुनीता यादव, मुकेश सिन्हा, रमा द्विवेदी जैसे साथी इकट्ठा हो चुके थे काठमांडू से 30 किलोमीटर दूर नगरकोट नामक स्थान पर सूर्योदय देखने जाने के लिए.

सुबह सुबह ठीक 4:30 पर जब मैंने अपनी मारूति ईको का इंजिन स्टार्ट किया तो होटल के गेट से पहले, एक बड़ी सी SUV खडी दिखी.उसके मालिक का किसी को पता ना था. बेहद तंग जगह में चार-छह बार अपनी गाड़ी आगे पीछे कर बाहर निकलने की कोशिश में आखिरी बार जब रिवर्स गियर लगा पीछे ली ईको तो पहले एकाएक आवाज़ आई कुछ टकराने की और दूसरे ही क्षण कार के पीछे का कांच फूटने का शोर हुआ.

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निगाह गई तो पता चला, एक खिड़की के खुले पल्ले से पिछला हिस्सा टकराया और उसके कारण कांच के बीचोंबीच छेद हो चुका. एक झटके से कार आगे बढ़ाई तो बचा खुचा सारा कांच भरभरा कर गिर गया. मैंने बिना उतरे ललित जी, गिरीश जी को अंदर बैठने को कहा और हम बढ़ गए काठमांडू से बाहर निकलने की राह पर, रिंग रोड से होते हुए 6 किलोमीटर बाद कलंकी चौक, फिर त्रिभुवन मार्ग पर

बारिश रूक चुकी थी जब हमने बजे काठमांडू के बाहरी इलाके में नागधुंगा चेक पोस्ट के पास पेट्रोल डलवाया. आगे थी समुद्र तल से 1500 मीटर ऊँचे पहाड़ों से नीचे उतरती राह.

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पीने का पानी हम साथ ले कर चलना भूल गए थे. पहाड़ी रास्तों के किनारे बने अस्थाई होटलों पर भटकते एक स्थान पर सुबह 6 बजे रुके तो सूर्योदय के नयनाभिराभ दृश्य दिखे.

कैमरे के ज़ूम का प्रयोग करते निगाह डाली तो दूर कहीं स्कूल जैसी इमारत और कोई निर्माण होता दिखा.

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7:15 पर बैरेनी सैनिक बैरेक के पास से मिली त्रिशूली नदी, जो आगे जा कर नारायणी नदी में मिलती है. इसी नारायणी को भारत में गंडक कहा जाता है.

जहाँ से त्रिशूली नदी का साथ मिला वहाँ पानी का बहाव डेढ़ सौ मीटर से चौड़ा तो रहा होगा. डेढ़ सौ मीटर से ज़्यादा याने कि 500 फुट!

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त्रिशूली नदी के पास, पृथ्वी राजमार्ग पर
नदी का बहाव मामूली दिख रहा लेकिन पानी है 500 फुट की चौड़ाई में
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सुबह 9 बजे मुग्लिंग में प्रवेश करते ही हमें वाहनों की लंबी कतार मिली अपने आगे. जैसा कि ट्रैफिक अनुशासन हमें नेपाल में देखने को मिला था उसको ध्यान में रखते हुए मेरी हिम्मत नहीं हुई कि दाहिनी और खाली पड़े लेन से गाड़ी दौडाते आगे चल कर माज़रा क्या है ये देखूं.

पता चला, कोई धरना प्रदर्शन है माओवादियों का. सलाह मिली कि आगे मत जाईयेगा, गाड़ी को तोड़ा फोड़ा जा सकता है. मैं बाहर निकल टहलने लगा. गिरीश जी भी उतर आये. थोड़ी ही देर में एक नौजवान पुलिस वाला हमारे पास आया और कहा कि आप निकल जाईये कतार से बाहर और आगे चले जाईये, वे इंडिया की गाड़ी को छोड़ रहे हैं..

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मैंने संशय में प्रश्न किया कि कोई तोड़ फोड़ तो नहीं करेंगे? वह भी असमंजस में दिखा! आँsss .. हो सकती है, लेकिन आप निकल जाईये, शायद कुछ ना करें. मैंने निर्णयात्मक प्रश्न किया -जाएँ कि नहीं? उसका भी उत्तर आया -जाईये, लेकिन थोड़ा बच कर.

तब तक गिरीश जी का धैर्य ज़वाब दे गया.  नाराज़गी जतलाती ऊँची आवाज़ में वे उस पुलिस वाले पर बरस पड़े. अरे! कोई एक बात बोलो, दोनों बातें क्यों कर रहे? इधर बोलते हो जायो उधर बोलते हो बच कर जाना, कुछ हो सकता है. क्या है ये सब?

पुलिस वाले का चेहरा गुस्से से लाल होते देख मेरी सिट्टी पिट्टी गुम. अनजाना देश, भारतीयों के लिए नफरत, अकेले सड़क पर ! कहीं इसने कुछ जलवा दिखाया तो भारी मुसीबत हो जायेगी.

हड़बड़ा कर मैंने गिरीश जी का कंधा थामा, चुपचाप रहने का आग्रह किया. इधर अंदर बैठे ललित जी ने भी स्थिति भांप उनको पुकार लिया. मैंने उस पुलिस वाले को सॉरी कहते भरोसा दिलाया कि हम उसके निर्देशानुसार आगे जा रहे हैं. उसके सहमति में हिलते सर को देख झट से ड्राइविंग सीट पर बैठा और दौड़ा दी गाड़ी खाली पड़ी आधी सड़क पर. ललित शर्मा, गिरीश जी से पूछ रहे थे -आप तो कभी ऐसा करते नहीं, आज क्या हो गया?

हम अभी उन झंडे, बैनर थामे प्रदर्शनकारियों से कुछ दूर ही थे कि एक दुबला पतला युवक गाड़ी के साथ साथ दौड़ने लगा. मैंने चुपचाप अपनी मारुति ईको धीमे की, कांच तो खुला ही हुया था. युवक ने चिल्लाते हुए इशारा किया कि आप जायो, कोई नहीं रोकेगा. मैंने भी कहा हमारे साथ चलो सामने तक. उसने स्थानीय भाषा में ना जाने क्या कहा, सड़क पर फैला हुजूम,  तालाब में तैरती काई सरीखे तितर बितर हो गया.

चैन की सांस लेते अभी मैंने गाड़ी को रफ़्तार दी ही थी कि युवकों एक दूसरा समूह शोर करते पीछे दौड़ा. आशंकित हो मैंने फिर रोक ली गाड़ी. वे युवक, एक ओर इशारा करते हुए स्थानीय भाषा में कुछ बोल रहे थे. कुल मिला कर समझ आया कि आज नेपाल बंद का आव्हान किया गया है, सार्वजनिक वाहन, बसें नहीं चल रहीं, एक बुज़ुर्ग रोगी को आगे किसी शहर में आकस्मिक चिकित्सा जाँच में जाना है, ले जायेंगे क्या?

अब मना करने की स्थिति में थे ही नही, अस्पताल के कागज़ पत्तर भी वे दिखा चुके थे. बुज़ुर्ग बैठे तो एक और युवक अंदर घुसने लगा. मैंने विरोध किया तो बताया गया कि यह उसका पोता है जो साथ जाएगा.

वहां से आगे बढ़ते मुझे आभास हुया कि ये वो राह नहीं जिससे होते हुए हम दो दिन पहले आये ही, क्योंकि नदी का पुल पार करते मिले दो स्पीड ब्रेकर जो कि काठमांडू जाती सड़क पर तो एक भी स्पीड ब्रेकर नहीं था. और जब मिला मर्स्यांग्दी जलविद्दुत गृह, तो शक गहरा गया. भले ही जाते वक्त अँधेरा था लेकिन ये जलविद्दुत गृह तो कतई नहीं मिला था.

हम वापस लौटे. राहगीरों से पूछताछ की तो समझ आया कि पोखरा जाने वाली सड़क पर आ गए हैं. ज़्यादा दूर नहीं जा पाए थे, इसलिए अखरा नहीं. लेकिन ललित जी को रोबोट कन्या नेवीगेटर की बहुत याद आई.

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त्रिशूली नदी पर एक पक्का पैदल यात्री पुल
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त्रिशूली नदी पर एक अस्थाई पुल

राह में आने वाले नयनाभिराभ दृश्य मुझे बार बार गाड़ी रोक कर उनका जी भर नज़ारा करने और फोटो ले लेने के लिए बरबस विवश करते थे.  काठामांडू जाते हुए तो हड़बड़ी थी ज़ल्दी पहुँचने की. लेकिन लौटते हुए तो ऐसा नहीं था.

हाँ, ये ज़रूर है कि 17 सितबर को अपने संयंत्र में हाजिरी देनी अत्यावश्यक थी. इस दिन होती है विश्वकर्मा जयंती, जिसे सारे औद्योगिक प्रतिष्ठानों में बिना किसी धार्मिक भेदभाव के धूमधाम से मनाया जाता है. काठमांडू के लिए अवकाश स्वीकृत करते, अधिकारियों द्वारा  इस बारे में ध्यान भी दिलवाया गया था.

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लगभग 10 बजे हम उस स्थान पर पहुंचे जहाँ जाते वक्त भी दिखा था कि एक जेसीबी उस गहरी नदी में गिरी हुई है. पता लगा कि एक ट्रेलर पर लदी इस जेसीबी को, असंतुलित हो गिरे हुए दो महीने हो चुके हैं. अभी भी इसे 15 दिन तो लग ही जायेंगे

अब तक धूप चमकने लगी थी. पिछला काँच फूटा हुया है, कार का एसी चलाने की बात बेमानी थी. डर यह था कि पीछे से हाथ डाल कर, कोई कुछ सामान निकाल ना ले. गिरीश जी द्वारा लाई गई चादर को दोहरा कर पिछली तरफ कुछ यूँ लगाया गया कि कुछ आड़ बनी रहे.

अभी हम 10:20 पर जगेड़ी पहुंचे ही थे कि एक वर्दीधारी ने हमें इशारा कर रोक दिया कि आगे जाना मना है, उग्र माओवादी प्रदर्शनकारी किसी गाड़ी को जाने नहीं दे रहे.

हमारे साथ चल रहे रोगी बुज़ुर्ग के पोते ने दिलासा दी कि मैं बात करता हूँ, सब ठीक हो जाएगा. लेकिन उसकी लाख कोशिशों के बाद, अस्पताल के कागजात दिखाने के बाद भी उस चौकी के प्रभारी ने आगे घने जंगलों में जाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया.

यह भी कह दिया कि आपको अगर जाना ही है तो अपने जोखिम पर जाईये, इसके बाद होने वाली किसी भी घटना के लिए आप स्वयं उत्तरदायी होंगे.

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जगेड़ी स्थित प्रहरी चौकी

आखिरकार वह युवक, हमें यहाँ तक ले आने के लिए धन्यवाद देते अपने दादा को ले उतर गया और हम पास ही के एक रेस्टारेंट में जा धमके.

वहाँ जा कर पता चला कि शाम 5 बजे के पहले रास्ता नहीं खुलेगा! ललित जी ने घड़ी देखी. अरे! अभी सवा दस ही हुए हैं!! समय बिताने के लिए करना है कुछ काम… की तर्ज़ पर  खमीर उठे जौ का रस आता गया, आता गया.  करते ना करते खाना भी खा लिया गया. बीसियों चुटकुले सुना दिए गए. खुमारी चढ़ने लगी तो ललित जी वहीँ बेंच पर लेट  खर्राटे मारने लगे, गिरीश जी ऊंघ रहे थे, मैं भी आँखें बंद किये दीवार से टिका रहा.

दोपहर 2:15 के आसपास शोर हुया –रास्ता खुल गया, रास्ता खुल गया! वहाँ एकत्रित हो चुके सभी लोग दौड़े अपनी अपनी गाड़ियों की ओर. सोते हुए ललित जी कूद कर भागे बाहर हमारे साथ साथ. मैंने गाड़ी स्टार्ट की और सैकड़ों गाड़ियों से आगे निकलने के लिए लपक लिया सड़क पर.

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लेकिन अभी 300 मीटर ही रेंगी थी मारुति ईको, कि पता चला यातायात तो अभी भी रूका हुआ है. ललित जी ने अब पीछे जाने से इनकार कर दिया और थोड़ी देर में ही सीट पर ही खर्राटे मारते सो गए. गिरीश जी भी बैठे रहे पिछली सीट पर. मैं स्थानीय युवकों से बात करते, सड़क पर टहलने लगा.

तीखी धूप से सारा बदन पसीने पसीने हो चुका. आगे पीछे लंबी कतार लग चुकी वाहनों की. खबरें आनी शुरू हो गईं थी कि जबरन ले जाई गाड़ी का शीशा फोड़ दिया गया या फिर ड्राईवर को पीटा गया.

हमारे सामने परेशानी यह थी कि नेपाल-भारत सीमा से वाहनों को रात 9 बजे के बाद निकलने नहीं दिया जाता, भले ही पैदल यात्री आते जाते हों 24 घंटे. अब अगर समय पर न पहुँच पाए तो रात कहाँ बितायेंगे? इरादा तो बन चुका था गोरखपुर के पिछले होटल में रूकने का.

लेकिन दोपहर तीन बजे से पहले, सामने की कतार में वाहनों की कुछ हलचल हुई. दुविधा में था कि यह भी पिछले  शोर जैसा तो नहीं. दूर ही यातायात पुलिस वाले इशारा करते दिख गए बढ़ने का. मैंने भी रेंगते वाहनों के बीच अपनी गाड़ी चलाये रखी और आखिरकार शाम पौने चार बजे हम नारायणघाट में थे.

अब हमारे पास एक ही ध्येय था, समय पर सीमा पार कर जाना. कुदरती नजारों को जी भर देखना, चहलकदमी करना, फोटो लेना सब भूल गया मैं. गाड़ी दौड़ते जा रही थी. लेकिन इंसान का शरीर तो मशीन नहीं है ना, थकान महसूस हुई और तलब लगी चाय की.

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संध्या 6 बजे दुमकीबास में पूर्व-पश्चिम राजमार्ग के किनारे जहाँ मैंने गाड़ी रोकी वहाँ चाय की दुकान पर मिल गए एक सज्जन, जो अपने आप को मालिक बता रहे थे उस जगह का. फौज़ से रिटायर हो कर, पंजाब के किसी बैंक में नौकरी कर चुके नेपाली मूल के ये सज्जन मुझे देखते ही चहके, टूटी फूटी पंजाबी जुबां में बातें शुरू कर दीं.

मैंने भी राह के तनाव से बिगड़े मिज़ाज़ को तरोताजा करने के इरादे से ऊलजुलूल चुहलबाजी शुरू कर दी. बढ़िया सी चाय के साथ, नशे में धुत उनकी रोचक बातों ने हमें किसी हद तक सामान्य बना दिया और फिर उनके साथ एक फोटो ले,  शुरू हुया सफ़र नेपाल-भारत की सीमा की ओर.

अंधेरी सडकों पर सरपट भागती मारुति ईको को परासी रोड पर पुलिस वालों के इशारे पर शाम 7:30 पर रोकना पड़ा.  एक पुलिस वाला, एक पुलिस वाली ने हमारी गाड़ी को घेर लिया. एक सामानों की जांच करने लग गया, एक ने मोर्चा संभाला, नेपाल आते समय जारी हुए कागजातों को देखने का. पिछला कांच फूट देख कई तरह की पूछताछ भी की गई. संतुष्ट हो कर, उनके द्वारा हमें जाने की अनुमति दे दी गई.

लेकिन कुछ मिनट बाद ही एक और पुलिस वाले ने रोक लिया. ललित जी ने गुस्से से बुदबुदाने के बाद विनम्रता से उसे सूचित किया कि कागज़ की जांच हो गई है, कल तक का परमिट है, हम तो एक दिन पहले निकल रहे.  वो पुलिस वाला भी मुस्कुराया -मैं तो यह देख रहा कि सीट बेल्ट नहीं बांधी है! है नहीं क्या गाड़ी में? मैंने अपनी छोटी ऊंगली दिखा कर कहा कि अभी दो मिनट पहले उतरा था, सीट बेल्ट लगा ही नहीं पाया कि आप आ गए. अब लगा लेता हूँ.

बेल्हिया कस्टम कार्यालय के कुछ पहले ही हमें रोका गया. नेपाल प्रवेश पर जारी दो कागजात ले लिए गए और फिर हम 7 मिनट बाद सीमा पार कर भारत की धरती पर थे.

मैंने एक लंबी सांस ली और चहका -चलो! अब कोई पूछेगा तो हम भी कह सकेंगे कि इतना लंबा ड्राइव कर सकता हूँ कि भिलाई से काठमांडू जाया जा सके. ललित जी की आवाज़ आई -आपने अकेले थोड़े ही ड्राइव किया, हमने भी ड्राइव किया आपके साथ! मैंने हैरानी भरा चेहरा उनकी ओर घुमाया, वो कैसे?

तब वे मुस्कुराते हुए बोले -अरे! स्टेअरिंग आप घुमाते थे, एक्सीलेटर आप दबाते थे लेकिन ब्रेक तो मैं दबाता था, बाजू में बैठे. तब मुझे याद आया कि सड़क पर विपरीत परिस्थितियों पर उनका शरीर सीट पर ही क्यों तन जाता था! आखिर वहीं बैठे बैठे आभासी ब्रेक लगाने लिए पैरों का दबाव बढ़ जो जाता होगा 🙂 फिर तो हम तीनों के ठहाके गूँज उठे उस सुनसान सड़क पर.

जिसके दीवाने हो चुके थे ललित जी, हमारी वो कन्या नेविगेटर सक्रिय हो चुकी थी. रात आठ बजे, नौतनवा के बाईपास से निकल हम चल पड़े गोरखपुर जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग 29 पर. इस बीच यह निश्चय किया जा चुका था कि अब उस राह से नहीं लौटेंगे, जिससे आये थे, सड़कें बहुत खराब हैं. अब तो इलाहाबाद – रीवां – जबलपुर हो कर जायेंगे, ज़ल्दी पहुँच भी जायेंगे.


 

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इसी राह पर चाय के लिए हम बहुत भटके. जहाँ भी रूकते, ज़वाब मिलता दूध नहीं है. एक जगह पूछा कि दूध क्यों नहीं है? तो ज़वाब मिला आज इस इलाके में कहीं दूध नहीं मिलेगा क्योंकि (कोई स्थानीय) त्यौहार है. सारा दूध उधर ही खपा गया.

बिना दूध की चाय पी कर रात 9:15 पर हम रुके कैंपियरगंज से पहले. जहां से हम गोरखपुर जाने की बजाए अयोध्या-फैजाबाद जाने के लिए आ चुके थे  राष्ट्रीय राजमार्ग 730 पर.  वहीं सुनसान सी सड़क पर लंबे चौड़ी जगह पर बने आधुनिक ढाबे में खाना खाया गया.

एक बात तो शिद्दत से नोट की गई कि कहीं भी बिजली का प्रकाश नहीं. या तो लोग डीज़ल जनरेटर का प्रयोग कर रहे या फिर सोलर लैंप्स लगे हैं कहीं कहीं.

खाना खा कर निकले ही थे अयोध्या वाली सड़क पर. सीटों पर व्यवस्थित होने की कोशिश और आगे का कार्यक्रम बनाते रफ्तार ज़्यादा नहीं थी गाड़ी की. सामने से अपनी राह पर चले आ रहा था कोई भारी वाहन. एकाएक रीअर व्यू मिरर में उभरी एक जोडी चमकीली हेडलाइट्स. एक सामान्य सी घटना मान मैं सुरक्षित अपनी राह पर बढ़ता गया.

सामने से आ रहा भारी वाहन, बड़ा सा ट्रक था जो हमारे पास से दूरी बनाते गुजरने ही वाला था. हमारी बातचीत चल ही रही थी कि एक जोरदार तीखा शोर सुनाई पड़ा. कानों ने पहचाना कि ये तो सड़क पर ब्रेक लगे टायरों के घिसटते चले जाने का शोर है. आहिस्ता से मैंने गाड़ी को अपनी बाईँ ओर लेते हुए रफ्तार कम की. तब तक हमारी मारुति, सड़क के साथ बने कच्चे फुटपाथ तक खिसक गई थी.

गाड़ी रूकते ही हेडलाइट्स की रौशनी में सामने ही स्कूली पोशाक में दो बच्चे, सहमे हुए, सायकिल थामे सड़क की ओर देख रहे थे. तब मेरा भी ध्यान गया कि हमारे पीछे से आती बेहद तेज़ रफ्तार वाली बड़ी सी कार का ड्राईवर, हमारी ईको और आते ट्रक के बीच बचे सड़क के हिस्से से निकलने की कोशिश में हमारे समांतर आ चुका था लेकिन तभी उसे लगा कि कार नहीं निकल पायेगी और उसने जोरों से ब्रेक दबा दिए

हमारी मारुती ईको और विपरीत दिशा से आता ट्रक, दोनों ही खड़े हो गए थे अपनी अपनी जगह. फिर एक झटके में ही वह कार भागी और ये जा वो जा. टायर घिसटने से उत्पन्न रबर जलने की भयंकर बदबू हमारे नथुनों में काफी लंबे समय तक टकराती रही. एक संभावित घातक दुर्घटना और मौत से सामना होने के अहसास से मेरा गला ही सूख गया था.

इस तरह जब उस 15 सितंबर की आधी रात का घंटा कहीं बजा होगा तो उस वक्त महज 400 किलोमीटर का सफ़र 20 घंटे में तय कर हम थे बस्ती की ओर जाती सड़क पर. जहां एक और आश्चर्य भरा रोमांच हमारी राह देख रहा था.

लेकिन, आप देख रहे हैं ना हमारा यह दुस्साहस भरा सफर?

अगली कड़ी में क्लिक कर पढ़िए खौफनाक राह, घूरती निगाहें, कमबख्त कार और इलाहाबाद की दास्ताँ

सुबह सुबह तोड़-फोड़, माओवादियों से टकराव, जलते टायरों की बदबू और मौत से सामना
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7 दिनों में, भिलाई से सड़क मार्ग द्वारा
काठमांडू आने जाने के लिए हुई 3000 किलोमीटर की यात्रा वाले प्रतिदिन के रोचक संस्मरण 8 हिस्सों में में लिखे गए हैं. जिन्हें रुचि अनुसार पढ़ा जा सकता है इन कड़ियों पर क्लिक कर

  1. काठमांडू सफ़र के पहले की दहशत
  2. काठमांडू की ओर दही की तलाश में तीन तिलंगे
  3. काठमांडू जाती कार को नागालैंड वाले खींच ले गए
  4. भैंसा भोजन, खिलखिलाती युवती, पीछा करते युवक और आधी रात का काठमांडू
  5. नेपाल की मुर्गी, उसकी मुस्कान, मेरी नाराज़गी और लाखों का मुआवजा
  6. सुबह सुबह तोड़-फोड़, माओवादियों से टकराव, जलते टायरों की बदबू और मौत से सामना
  7. खौफनाक राह, घूरती निगाहें, कमबख्त कार और इलाहाबाद की दास्ताँ
  8. धुआंधार बारिश, दिमाग का फ्यूज़ और सुनसान सड़कों पर चीखती कन्या को प्रणाम
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7 दिनों में, भिलाई से सड़क मार्ग द्वारा
काठमांडू आने जाने के लिए हुई 3000 किलोमीटर की यात्रा वाले प्रतिदिन के रोचक संस्मरण 8 हिस्सों में में लिखे गए हैं. जिन्हें रुचि अनुसार पढ़ा जा सकता है इन कड़ियों पर क्लिक कर

  1. काठमांडू सफ़र के पहले की दहशत
  2. काठमांडू की ओर दही की तलाश में तीन तिलंगे
  3. काठमांडू जाती कार को नागालैंड वाले खींच ले गए
  4. भैंसा भोजन, खिलखिलाती युवती, पीछा करते युवक और आधी रात का काठमांडू
  5. नेपाल की मुर्गी, उसकी मुस्कान, मेरी नाराज़गी और लाखों का मुआवजा
  6. सुबह सुबह तोड़-फोड़, माओवादियों से टकराव, जलते टायरों की बदबू और मौत से सामना
  7. खौफनाक राह, घूरती निगाहें, कमबख्त कार और इलाहाबाद की दास्ताँ
  8. धुआंधार बारिश, दिमाग का फ्यूज़ और सुनसान सड़कों पर चीखती कन्या को प्रणाम
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44 Thoughts to “सुबह सुबह तोड़-फोड़, माओवादियों से टकराव, जलते टायरों की बदबू और मौत से सामना”

  1. जय हो आप की। काठमांडू तक ड्राइव कर ही लिया।

    1. बी एस पाबला

      Smile
      जहाँ चाह, वहाँ राह

  2. अगर एक्सीडेंट होता तो बहुत बुरा होता, कार वालों के चिथड़े उड़ जाते। टोटा-टोटा चुगना पड़ता।
    टिप्पणीकर्ता चलत मुसाफ़िर ने हाल ही में लिखा है: बूढ़ा नीलकंठ में सूतल विष्णु : काठमांडूMy Profile

    1. बी एस पाबला

      I-see-stars
      सच में भयावह था वह क्षण

  3. साँस रोककर देख रहे हैं आपका सफ़र, सरजी!!

    1. बी एस पाबला

      Heart
      चलते रहिये संग संग

  4. Rajeev

    आज मेरा सौभाग्य रहा इस ब्लाग को पड़ने के बाद.. शायद मै पावला जी के दिल के धड़कन गुरप्रीत को याद कराने में सहायक रहा.. आज वो दिन मुझे याद आ गया जब मुझे पावला जी जानते भी नहीं थे पर मै बराबर उनके पीछे लगा रहता था .. पता नहीं उसदिन मैंने क्यों अपनी वो वाली फेसबुक की आईडी पर लॉग इन किया था .. जिसके २७ मिनट पहले ही मुझे ये खबर मिली थी की .. मै उस दिन को भूलना चाहता हु.. वो मेरी .. मै पावला सर का गुरप्रीत तो नहीं बन सकता पर गुरप्रीत की ख़ुशी पाना चाहता हु ..
    Weary

    1. बी एस पाबला

      Angel
      दूर कहीं देस से देख रहा होगा वो …

  5. आपके सारे पाठक कोडवर्ड नहीं जानते …मुझे किसी से पूछना पड़ा “जौ का रस क्या होता है ?’ और जबाब मिला…jau to anaaz hai na
    barley
    usse beer aur wine banti hai …तब जाकर समझ आया..:)
    सफ़र तो वाकई दुस्साहस भरा है .

    1. 🙂
      टिप्पणीकर्ता चलत मुसाफ़िर ने हाल ही में लिखा है: पाटन दरबार चौक में ब्लॉगर्स जमावड़ाMy Profile

    2. बी एस पाबला

      Beer
      हा हा हा
      आपने बूझ ही लिया

  6. आप बिंदास यात्रा करने वाले हैं जनाब..बस ये समझ नहीं आता कि इंसान बिंदास बनाने के साथ ही दुख क्यों देता है…आखिर वो अपने ही दिए गुण को परखना क्यों चाहता है ये समझ नहीं आता मुझे। जाइएगा जरुर वादा पूरा करने।

    1. बी एस पाबला

      Yes-Sir
      आप भी चलिएगा साथ

  7. chander kumar soni

    आपका रिस्क लेना मुझे कई बार डरा देता हैं.
    खैर, आपकी यात्राएं दिलचस्प और रोमांचक होती हैं.
    बहुत कुछ सीखने को मिलता हैं, आपके यात्रा वृत्तांत पढ़कर.
    हम सबका ज्ञान बढाने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.
    चन्द्र कुमार सोनी
    http://www.chanderksoni.com

    1. बी एस पाबला

      Smile
      तीन साल पहले पड़ी आपकी एक डांट मुझे आज भी याद है

  8. बहुत सुन्दर प्रस्तुति…!

    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (21-10-2013)
    पिया से गुज़ारिश :चर्चामंच 1405 में “मयंक का कोना”
    पर भी होगी!

    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।

    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर…!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

    1. बी एस पाबला

      THANK-YOU

  9. बि‍ना डि‍वाइडर वाले हाइवे वाकई भयावह होते हैं…

    1. बी एस पाबला

      Approve
      सही है जी

  10. बहुत ही रोमांचक सफ़र !

    1. बी एस पाबला

      Pleasure

  11. बहुत ही साहस भरी रोमांचक यात्रा |

    1. बी एस पाबला

      Happy

  12. रोमांचक ! साहस पूर्ण यात्रा …!

    RECENT POST -: हमने कितना प्यार किया था.
    टिप्पणीकर्ता dheerendra singh bhadauriya ने हाल ही में लिखा है: हमने कितना प्यार किया था.My Profile

    1. बी एस पाबला

      .THANK-YOU

  13. सतीश सक्सेना

    मनोरंजक यात्रा मोहक विवरण . . .

    1. बी एस पाबला

      THANK-YOU.

  14. यह भी वाकई आप सबके लिए ही नहीं हमारे लिए भी सुखद व मनोरंजक यात्रा रही, काठमांडू यदि दिन में पहुँच गए होते तो बात ही कुछ और होती।

    1. बी एस पाबला

      Smile
      बहुतेरी बातें अपने वश में नहीं होतीं

  15. Deepak Panwar

    आप को हार्दिक बधाई …..

    1. बी एस पाबला

      `THANK-YOU

  16. रोमांचक सफ़र और दिलचस्प यात्रा वृत्तांत. बधाई हो ! पाबला जी.

    1. बी एस पाबला

      Heart
      शुक्रिया राजीव जी

  17. इस पोस्ट की चर्चा, मंगलवार, दिनांक :-22/10/2013 को “हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच}” चर्चा अंक -32 पर.
    आप भी पधारें, सादर ….राजीव कुमार झा

    1. बी एस पाबला

      THANK-YOU`

  18. चलो जी कोई न … अंत भला तो सब भला … Happy

    ललित दादा की तरह ‘ब्रेक लगाने’ की मेरी भी आदत है … यह और बात है कि वैसे गाडी चलानी नहीं आती … Wink
    टिप्पणीकर्ता Shivam Misra ने हाल ही में लिखा है: आर्ज़ी हुक़ूमत-ए-आज़ाद हिन्द का ७० वां स्थापना दिवसMy Profile

    1. बी एस पाबला

      Overjoy
      आप तो ऐसे ना थे!

  19. t s daral

    काफी रिस्क लेकर यात्रा की है आपने ! लेकिन अन्त भला तो सब भला !

    1. बी एस पाबला

      Yes-Sir`

  20. इतनी लम्बी यात्रा, अनजान जगह, अनजाने लोग, “हेक्टिक शैड्यूल” सब मिला कर टेंशन ही टेंशन, फिर भी ऊपर वाले की कृपा दृष्टी से तबियत और माहौल अनुकूल बने रहे, उसका शुक्रिया.

  21. इस ऐडवेंचर जर्नी में मेरा न होना एक संयोग था -और यह सुसंयोग था या दुर्संयोग ? 🙂

  22. प्रवीण पाण्डेय

    बड़ा ही हिम्मतभरा यात्राक्रम, रोचकता से परिपूर्ण..

  23. हम तो आखिरी कड़ी पढ़ने के बाद इधर आ पाये, अब पता चला कि गाड़ी का काँच क्यों फ़ूट गया था..
    टिप्पणीकर्ता विवेक रस्तोगी ने हाल ही में लिखा है: ब्लॉगिंग की शुरूआत के अनुभव (भाग १)My Profile

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