यमुना एक्सप्रेस वे पर फर्राटे भरे हमारी गाड़ी ने

भिलाई से पंजाब की ओर अपनी मारुति ईको से जाते हुए हमारा पहला पड़ाव था मध्यप्रदेश का सागर शहर और दूसरा शहर था आगरा, जहाँ कोहरे के कारण रूकना पड़ा. अब अगला सफर था यमुना एक्सप्रेस वे का. बहुत तारीफें सुनी थीं इसकी.

सुना तो मैंने बहुत था कि मुम्बई – पुणे एक्सप्रेस से भी बेहतर है यह यमुना एक्सप्रेस वे. चार वर्ष पहले हमने मुम्बई-पुणे एक्सप्रेस हाईवे पर भी दौडाई थी गाड़ी. अब मन था इस यमुना एक्सप्रेस वे से गुजरने का.

7 जनवरी की सुबह 9 बजे, आगरा के होटल से जब हम रवाना हुए तब भी कोहरा अच्छा खासा था. शहर के ट्रैफिक ने हमें ऐसा रोका कि यमुना एक्सप्रेस वे पर पहुंचते पौने ग्यारह बज गए.

बड़ी उत्सुकता थी इस राह से गुजरने की. अंदाज़े के लिए मैंने पहले ही इसका मैप देख रखा था गूगल के सहारे. एक बार जब हमारी मारुती ईको ने घुमावदार ओवरब्रिज पर होते हुए रफ़्तार पकड़ी तो मन शांत हुआ.

आगरा शहर से बाहर निकल यमुना नदी के साथ साथ चलने वाले यमुना एक्सप्रेस तक पहुंचते हमें पौने ग्यारह बज गए. अभी चंद मिनट ही हुए थे कि सामने आ गया टोल प्लाज़ा. 100 ₹ का भुगतान कर हमने दौड़ा दी अपनी गाड़ी.

यमुना एक्सप्रेस वे

यमुना एक्सप्रेस वे प्रवेश

अमेरिका और जर्मनी की आधुनिक तकनीक से बना 6 लेन वाला, आगरा से नॉएडा तक बना 165 किलोमीटर लंबा, सौ मीटर चौड़ा, बिना किसी सिग्नल वाला यह मार्ग 33,00,000 घन मीटर सीमेंट कंक्रीट का बना है और इसकी बुनियाद तत्कालीन भारतीय जनता पार्टी के राज्य में मुख्यमंत्री रहे राजनाथ सिंह के कार्यकाल में पड़ी थी. बहुजन समाज पार्टी की मायावती सरकार में यह योजना परवान चढी और फिर उदघाटन हुआ समाजवादी पार्टी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा.

निर्माणकर्ता कंपनी जेपी इंफ़्राटेक द्वारा. कहा जाता है कि इसको 50 साल तक मरम्मत की जरूरत नहीं होगी। इसके लिए किसानों की जो जमीन अधिग्रहित की गई, आंकड़ों के मुताबिक़ उनको दी गई मुआवज़े की दर 570 ₹ प्रतिवर्ग मीटर थी.

ग्रेटर नोएडा को नोएडा, बुलंदशहर, अलीगढ़, मथुरा से होते हुए आगरा से जोड़ते, पीपीपी मॉडल (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) पर  बने इस यमुना एक्सप्रेस वे पर आने जाने के लिए शुल्क वसूलने के लिए जो ‘टोल प्लाज़ा’ बनाए गए हैं उनके द्वारा 36 वर्षों तक वसूली का करार किया गया है

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टोल प्लाज़ा -मथुरा

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टोल प्लाज़ा -जेवर

दोपहर लगभग पौने बारह बजे मिला मथुरा के पास एक टोल प्लाज़ा. देने पड़े 120 ₹.  मुझे याद आया कि 9 अगस्त 2012 से शुरू हुए इस यमुना एक्सप्रेस वे की निर्माणकर्ता जेपी ग्रुप की कंपनी जेपी इंफ्राटेक प्राइवेट लिमिटेड ने अनुमान लगाया था कि 13,000 करोड़ ₹ की लागत से बने इस यमुना एक्सप्रेस वे से रोज एक लाख वाहन गुजरेंगे।  शुरूआती दौर में कार -जीप से सफर करने के लिए 320 ₹ का टोल टैक्स वसूला जाएगा,. मिनी बस के लिए 500 और बस और ट्रक के लिए टोल टैक्स 1050 ₹. इस लिहाज़ से रोजाना टोल टैक्स के रुप में जेपी ग्रुप को लगभग 10 करोड़ ₹ मिलेंगे!! इस हिसाब से एक वर्ष में 3600 करोड़ ₹ !!

अगर टोल टैक्स में बढ़ोत्तरी महज सात प्रतिशत मान कर चले तो इस हिसाब से छह-सात साल में यह आकंड़ा 50 हजार करोड़ तक पहुंच सकता है। जाहिर है इस लिहाज से टोल टैक्स का यह धंधा देश के सारे धंधों पर भारी ही पड़ेगा.

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मैं देखते जा रहा था कि हर 5 किलोमीटर में सीसीटीवी कैमरे हैं. बाद में पता चला कि यमुना एक्सप्रेस वे अथॉरिटी के कण्ट्रोल रूम में इनसे मिले परिणाम बड़ी सी स्क्रीन पर देखे जाते हैं और  गति सीमा पर नज़र रखने के लिए राडार भी लगाए गए हैं. हादसे तो होते ही रहते हैं इस तेज रफ्तार के लिए बने एक्सप्रेस वे पर. सहायता के लिए हर 2 किलोमीटर पर कंट्रोल रूम से संपर्क करने के लिए टेलीफोन बॉक्स भी लगे दिखे

हालांकि अब ज़्यादा दूर नहीं दिल्ली, लेकिन तब तक हल्की भूख लग आई. कुछ तो लगातार एक ही मुद्रा में बैठे रहने से छुटकारे का मन, कुछ धूप का लालच और कुछ राह में दिख रहे थे जन सुविधायों सहित रेस्टोरेंट के बोर्ड्स का असर.

आखिरकार दौड़ती हुई मारुति ईको को जब मैंने आहिस्ता आहिस्ता पार्किंग में रोका तो लोगों की भीड़ देख हैरान हो गया. उम्मीद नहीं थी कि सुनसान दिख रहे यमुना एक्सप्रेस वे पर इतनी गाड़ियाँ और लोग मिल जायेंगे.

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ज़ल्दी से मैं काउंटर तक गया. नजर पड़ी तो दो पैटीज़ और दो कॉफ़ी का आर्डर किया. बंदे ने कूपन कटाने के लिए इशारा कर दिया. मैं वहां भी यही दोहरा दिया. झट उसने मशीन से प्रिंट निकालते कहा – 160 ₹ 🙂 मैं चौंका ज़रूर लेकिन कहा कुछ नहीं.

काउंटर पर प्रतीक्षा करते दीवार पर जगमगाती मूल्य तालिका पर निगाह गई तो दिखाना शुरू हुआ -डोसा 100 ₹ , कॉफ़ी 50 ₹ , पैटीज़ 30 ₹ ……….. सिवाय मुस्कुराने के अब कर भी क्या सकता था मैं.

खाते पीते हुए एक महिला पर निगाह पड़ी जो ‘ग्रेजी’ में गिटपिट करती अपने बच्चे को खाने पीने के गंवई तरीके को लताड़ते  हुए, आधुनिक कॉन्टिनेंटल रिवाज़ सिखा रही थी.  लेकिन अपनी दुनिया में मस्त हिंदुस्तानी बच्चे को कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा था माँ की बातों का. दादा – दादी की सिखाई आदतों को कोसते हुए वह बीच बीच में धमकाते भी जा रही थी कि घर चलो तुम्हारे पापा को सब बताऊँगी, तब तुम्हारी अक्ल ठिकाने आएगी. मैंने कल्पना की, बेचारा बाप खुद ऐसे ही खाता पीता रहा होगा वो क्या बोलेगा 😀

दोपहर 1 बजे मिला इस राह का अंतिम, जेवर टोल प्लाज़ा. शुल्क था 100 ₹ . फिर मैंने गुणा भाग किया कि देश की सबसे बड़ी कंपनी रिलायंस है जिसका मुनाफा करीब 20 हजार करोड़ ₹ . ओएनजीसी 18 हजार करोड़ ₹ के साथ दूसरे स्थान पर है। पांच साल बाद रिलायंस का आंकड़ा 30 हजार करोड़  ₹ के आस-पास रहेगा, जबकि एक्सप्रेस वे का धंधा 40 – 50 हजार करोड़ ₹ के पास पहुंच सकता है।

दोपहर पौने दो बजे हमारी मारुती ईको, शफीपुर के पास यमुना एक्सप्रेस वे छोड़ कर ग्रेटर नॉएडा में प्रवेश कर चुकी थी. नॉएडा माने New Okhla Industrial Development Authority वैसे है तो यह औद्योगिक विकास के लिए विकसित किया गया था इलाका लेकिन गगनचुंबी रिहायशी इमारते देख ऐसा कुछ महसूस नहीं हुआ.

नॉएडा के पास यमुना एक्सप्रेस वे

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यमुना एक्सप्रेस वे नॉएडा

नॉएडा के कालिंदी बर्ड सेंचुरी के पास जब हम थे तो दोपहर के दो बज चुके. मतलब, तीन घंटे लगे हमें यमुना एक्सप्रेस वे के एक सिरे से दूसरे सिरे तक पहुँचने में. इसमें भी एक घंटा निकाल ही दिया जाए नाश्ते पानी और बाक़ी चीजों के लिए रूकने के. इधर बुआ जी दो बार पूछ चुकी थी कि कब तक आओगे? मैं दिलासा ही देता कि बस थोड़ी देर और.

और फिर कोहरे भरी लंबी राहों के बाद 7 जनवरी की दोपहर, धूल भरी सड़कों और भारी भरकम ट्रैफिक के बीच रेंगते हुए घर के सामने जब गाडी रुकी तो मेरा मोबाईल चिल्ला रहा था ‘द टाइम इज़ थ्री पी एम’

आपने कभी सफ़र किया है इस यमुना एक्सप्रेस वे पर?

© बी एस पाबला.

यमुना एक्सप्रेस वे पर फर्राटे भरे हमारी गाड़ी ने
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14 Thoughts to “यमुना एक्सप्रेस वे पर फर्राटे भरे हमारी गाड़ी ने”

  1. कमाई का चोखा धंधा है ये पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप !
    गांवों तक की सड़कें इसी तर्ज पर टोल रोड़ बन रही है, विकास ही विकास दीखता है पर ये विकास गरीब के किस काम का, वह तो इन चमकती सड़कों को दूर से देख सकता है चढ़ने के लिए तो जेब में दाम चाहिये और वो गरीब के पास होते नहीं, गलती से चढ़ा गया तो टोल प्लाज़ा के बाउंसर दो चार हड्डी जरुर तोड़ देंगे !!
    टिप्पणीकर्ता Ratan Singh Shekhawat ने हाल ही में लिखा है: गाय का मांस नहीं, दूध ज्यादा ताकतवर होता है : महात्मा लटूरसिंहMy Profile

    1. बी एस पाबला

      Tears
      सही है

      विकास, चंद लोगों का

  2. यात्रा वृत्तांत अच्छा लगा. कुछ कुछ ऐसा ही एक फ्लाईओवर चेन्नई के पास है “कथीरिपारा”
    टिप्पणीकर्ता PN Subramanian ने हाल ही में लिखा है: टिन्डिस (Tyndis) जिसे पोन्नानि कहते हैंMy Profile

    1. बी एस पाबला

      Heart
      आजकल ऐसे फ्लाईओवर की संख्या बढ़ते जा रही है

  3. जेब काटने का अच्छा तरीका है, जब सरकार रोड़ टैक्स लेती है तो टोल की जरुरत ही नहीं है। पब्लिक प्राईवेट पार्टनरशिप में सिर्फ़ पब्लिक नहीं है और सब है।

    1. बी एस पाबला

      Approve
      पब्लिक हलाकान है बाक़ी सब मस्त हैं

  4. Harivansh Sharma

    बेहद सुन्दर प्रस्तुति,आप की इस जानकारी के लिए धन्यवाद।
    मार्ग दर्शन के साथ ,सडको की,सरकार,ओर सड़क निर्माता की जानकारी
    इन्वेस्टमेंट इन सडको के निर्माण हेतु। ओर फिर वसूली। ऐसे सुहाने सफ़र में
    टोल प्लाजा बड़े दैत्य रूपी लगते है। फिर भी अच्छी सड़क ओर व्यवस्था
    के प्रति आभार तो प्रकट करना ही चाहिए।

  5. बी एस पाबला

    Smile
    बात सही है लेकिन अक्सर कोफ़्त ही होती है गुणा भाग करने के बाद

  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (06-07-2014) को “मैं भी जागा, तुम भी जागो” {चर्चामंच – 1666} पर भी होगी।

    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर…!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

    1. बी एस पाबला

      THANK-YOU
      शुक्रिया रूपचन्द्र जी

  7. ब्लॉग बुलेटिन आज की बुलेटिन, ईश्वर करता क्या है – ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है … सादर आभार !

    1. बी एस पाबला

      THANK-YOU
      शुक्रिया ब्लॉग बुलेटिन

    1. बी एस पाबला

      Heart
      शुक्रिया सुशील जी

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