भिलाई के युवकों द्वारा निर्मित विश्व रिकॉर्ड: सलाहें, योजना व तैयारी

जैसा कि पिछली बार मैंने बताया था कि 1985 में भिलाई के दो नवयुवकों ने मोटरसाइकिल पर विश्व भ्रमण की योजना बनाई व इस माह उसके समापन की रजत जयंती है।

इन नवयुवकों को इस रोमांचकारी अभियान का ख्याल जून 1983 में अपनी नौकरी के शुरूआती दिनों में तब आया जब दोस्तों के बीच एक दिन निर्माणाधीन प्लेट मिल के चाय ठेले पर हंसी-ठठा चल रहा था।

और फिर इस अभियान को भिलाई इस्पात संयंत्र प्रबंधन ने हरी झंडी दी और यह मूर्त रूप ले पाया मई 1984 को

अपने सपूतों की इस ‘वाहियात’ ख्यालातों की खबर लगते ही दोनों युवकों के माता-पिता ने स्वभाविक ना-नुकर करते हुए हामी भर दी और अपना आशीर्वाद दिया।

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सयंत्र के अधिकांश उच्चाधिकारियों ने भी हौसला अफजाई की। हालांकि कई रोचक टिप्पणियाँ और सलाहें भी थीं, जैसे:

  • अभियान से लौटने पर तुम्हारा ट्रांसफर प्लांट के खेल व मनोरंजन विभाग में कर दिया जायेगा,
  • बिना वेतन की छुट्टी ले कर विश्व अभियान पर? तुम साल के 25 हजार गंवा दोगे,
  • दिमाग तो खराब नहीं हो गया तुम लोगों का?,
  • भारत से बाहर जा रहे हो, लौटोगे नहीं?,
  • जब तुम वापस आयोगे तो अपना पूरा इंजीनियरिंग ज्ञान भूल चुके होगे,
  • विदेशों में खाना बेस्वाद होता है, अचार का एक मर्तबान ले जाना,
  • जब लौटोगे तो तुम्हारी शख्सियत बदल चुकी होगी,
  • स्पॉन्सरशिप के पैसों से प्लांट के लिए भरे गये बॉन्ड के पैसे वापस करो और गायब हो जाओ,
  • थाईलैण्ड! वहाँ लड़कियाँ बेहद आज़ादख्याल होती हैं,
  • ज़्यादा ‘फास्ट’ मत चलाना,
  • वाह! लेकिन स्टेपनी कहाँ रखोगे, रात कहाँ बिताओगे?,
  • आते हुए जापान से मेरे लिए एक ‘होन्डा’ ले आना,
  • सारा सामान कैसे ले जाओगे?

विभिन्न आधिकारिक माध्यमों से होता हुआ इन दो जांबाजों का आवेदन, भिलाई इस्पात संयंत्र के प्रबंध निदेशक की टेबल तक जा पहुँचा। तब के प्रबंध निदेशक श्री एन के मित्रा ने इन्हें बुला भेजा और धड़कते दिल लिए दोनों युवक 28 जुलाई 1983 को प्रबंध निदेशक से मिले। अनुमोदन मिला तो उछल ही पड़े दोनों।

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तुरंत ही इसकी योजना बननी शुरू हुई। उन कम्पनियों की सूची बननी शुरू हुई जो अपना नाम इस अभियान से जोड़ने की इच्छुक हों।सबको चिट्ठियां भेजी गईं।

अंतर्राष्ट्रीय राजमार्गों को दर्शाने वाला एक Batholomew World Map मानचित्र लिया गया (तब यह वेबसाईट नाम की चिड़िया नहीं होती थी)। लॉस एंजिल्स ओलंपिक का ध्यान रखते हुए धागे और स्केल से दूरी का अंदाज़ा लगाया गया।

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मोटरसाइकिल निर्माता, एस्कॉर्ट का दुनिया भर के यामाहा डीलरों को पत्र

सुनील थवानी दिल्ली की यात्रा कर आए थे। तभी पता चल गया था कि यह आसान काम नहीं है। एस्कॉर्ट और दो-एक संस्थानों ने अच्छा प्रतिसाद दिया व सरकारी औपचारिकताओं की विस्तृत जानकारी दी।

एस्कॉर्ट के ए के मरकान ने इस अभियान का तीसरा सद्स्य बनना भी स्वीकार कर लिया। एयर इंडिया की एयर होस्टेस रहीं मशहूर भारतीय यात्री सुश्री मेहर मूस, जो लगभग दुनिया के हर हिस्से में जा चुकी थीं, उन्होंने बहूमूल्य सूचनाएँ भी दीं।

अनिरुद्ध गुहा कलकत्ता की ओर गए। जहाँ उन्हे टाटा स्टील से बहुत अच्छा प्रतिसाद मिला। वे इंग्लिश चैनल पार करने वाले प्रथम भारतीय तैराक मिहिर सेन से भी मिले। लंदन हेतु, यूरो-एशियन मैत्री रैली-79 के सद्स्यों ने भी कई व्यवहारिक सूचनाएँ दीं। दो अन्य सद्स्यों की तलाश भी पूरी नहीं हुई। अभियान में आने वाला खतरा व अनिश्चितता किसी अन्य को नहीं भाया।

इधर चिट्ठियों का जवाब आना शुरू हो गया था। ज़्यादातर तो खेद प्रकट वाली ही थीं। जब लगा कि चिट्ठियाँ लिखने से काम नहीं बनने वाला तो अनिरुद्ध, बम्बई के लिए रवाना हुए (तब यही नाम होता था)।

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अंतरराष्ट्रीय ड्राईविंग परमिट

शिपिंग कार्पोरेशन ऑफ इंडिया, सिधिया स्टीम शिप व एयर इंडिया से हुई प्रारंभिक बातचीत में सीमित सफलता ही मिली। हाँ, कुछ कम्पनियों ने आर्थिक मदद का आश्वासन अवश्य दिया। अंतरराष्ट्रीय ड्राईविंग परमिट तब तक बन चुका था

तत्कालीन खेल विभाग और विदेश मंत्रालय से आधिकारिक झंडी मिलने पर वीसा का प्रबंध भी हो गया। इसी बीच व्यक्तिगत कारणों से ए के मरकान, अभियान से अलग हो गए।

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विदेश मंत्रालय का वीज़ा नोट

जावा तथा एन्फील्ड कम्पनियों की बेरूखी के चलते, इन युवकों ने अपना साथी चुना उस समय की सनसनी, दोहरे इंजिन वाली राजदूत यामाहा 350 सीसी मोटरसाइकिल को।

1984 को आज ही के दिन 5 अप्रैल को नई चमचमाती राजदूत RD 350 खरीदी गई जो आने वाले एक वर्ष तक इनकी विश्वस्त मित्र थी।

मोटरसाइकिल से किये गए विश्व भ्रमण के संस्मरणों को कुल 10 आलेखों में संजोया गया है. सारे आलेखों की सूची के लिए यहाँ क्लिक करें»

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23 देशों में फैला 50, 000 किलोमीटर लम्बा यह साहसिक, रोमांचकारी विश्व रिकॉर्ड वाला अभियान तो अभी शुरू भी नहीं हुआ है, लेकिन आप कैसा महसूस कर रहे, बताईएगा.

आइये चलें सफर की शुरुआत पर जहाँ भिवंडी के दंगो के बीच रवानगी हुई विश्वमोहिनी द्वारा विदेशी धरती की ओर.

भिलाई के युवकों द्वारा निर्मित विश्व रिकॉर्ड: सलाहें, योजना व तैयारी
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  1. भिलाई के युवकों द्वारा निर्मित विश्व रिकॉर्ड की रजत जयंती: विशेष लेख-माला
  2. भिलाई के युवकों द्वारा निर्मित विश्व रिकॉर्ड: सलाहें, योजना व तैयारी
  3. भिवंडी के दंगे, विश्वमोहिनी और विदेशी धरती पर पहला कदम
  4. पिरामिड, पोप का आशीर्वाद और वेनिस की नहरें
  5. बीयर की दीवानगी, मोटरसाइकिल का बिगड़ना और रात का वह नज़ारा
  6. बाईक रैली के पुरस्कार, जर्मन युवती और बुल फाईट
  7. मोनालिसा की मुस्कान, प्रिंस हैरी का जनम और शेरवुड के जंगल
  8. नियाग्रा जलप्रपात, चांद से लाई चट्टान और कनाडा का चांदनी चौक
  9. तली हुई टिड्डियाँ, रात की रंगीनी और मेक्सिको की सुंदरियाँ
  10. भिलाई के युवकों द्वारा मोटरसाइकिल पर विश्व भ्रमण का विश्व रिकॉर्ड
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12 Thoughts to “भिलाई के युवकों द्वारा निर्मित विश्व रिकॉर्ड: सलाहें, योजना व तैयारी”

  1. Arvind Mishra

    जबरदस्त इस सनसनी को स्टार्ट होने की बेकरार प्रतीक्षा है .
    क्या ख़ूबं दस्तावेज जुटाए हैं ….

  2. डॉ टी एस दराल

    बहुत साहस का परिचय दिया इन तद्कालीन नौज़वानों ने ।
    आपका लेखन भी कम साहसी नहीं है । आभार।

  3. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi

    क्या महसूस करेंगे? रोएँ खड़े हो रहे हैं।

  4. डॉ महेश सिन्हा

    लेखनी का आगाज इतना अच्छा है तो अंजाम की कल्पना ही की जा सकती है

  5. राज भाटिय़ा

    बहुत रोमांच महसुस कर रहा हुं , युरोप के कुछ देशो मै तो कोई डर नही लेकिन पकिस्तान से तुर्की तक ओर फ़िर इटली के नेपल्स तक खतरा ही खतरा, उध्र्र रुस लेंड मै भी कम खतरा नही…. लेकिन इन नोजवानो ने जब फ़ेसला किया है तो जरुर जीत भी हांसिल की होगी… अगली कडी का इंतजार है जी

  6. भारतीय नागरिक - Indian Citizen

    दस बरस पहले हमने भी कोशिश करनी चाही थी, लेकिन किसी ने भी पलट के एक उत्तर तक भी नहीं दिया…

  7. वीनस केशरी

    वाह पोस्ट पढ़ कर दिल खुश हो गया
    रोमांचित हूँ

    अपने सपूतों की इस 'वाहियात' ख्यालातों की खबर लगते ही दोनों युवकों के माता-पिता ने स्वभाविक ना-नुकर करते हुए हामी भर दी

    हा हा हा

  8. ललित शर्मा

    यह यात्रा तो प्रारंभ से ही रोमांचित कर रही है।
    लेकिन इसकी तैयारियाँ भी काफ़ी करनी पड़ती है,
    यह पता चला, मुस्किलें भी खुब आती हैं।

    आगे इंतजार है।

  9. हिमांशु । Himanshu

    हंसी-ठठ्ठे में हाथ में ली गयी चीज ने बड़ा काम करवा दिया ! हंसी-ठट्ठे को हंसी में उड़ाना ठीक नहीं । सराहना करनी होगी, लगन की! आगे की कड़ियों की प्रतीक्षा में !

  10. anitakumar

    पोस्ट पढ़ कर मन तो कर रहा है कि हम भी ऐसे मजे लूट आयें, भले देर से ही ये लालसा जागी हो। लेकिन हमें तो सायकिल चलानी भी नहीं आती, और मोटर सायकिल से डर लगता है। 🙁 क्या करें हुन्दाई वालों को ही पूछें या पवन पुत्र हनुमान को। इन दोनों की हिम्मत की दाद देते हैं

  11. सुरेश यादव

    विश्व भ्रमण के इस उत्साही कार्य को साधुवाद.ऐसी सूचनाएं जीवन में उत्साह भरती हैं.पाबला जी को धन्यवाद.

  12. Shiv Kumar Dewangan

    आज इस लेख को मैंने पहली बार पड़ा है, यादों के झरोखों से चुन-चुन कर सोनझरी निकालने का काम आप इतनी बखूबी से करते हैं, की अगले पोस्ट की विषय-वस्तु का अंदाज़ा लगा-लगा कर इंतज़ार करना पड़ता है.

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