… वो शाम कुछ अज़ीब थी

21 जून की सुबह लैंडलाइन फोन की घंटी बजी. बिस्तर पर पड़े पिता जी को बोर्नविटा पिलाने की कोशिश रोक, पास के कमरे में आ रिसीवर कान से लगाया तो दूसरे सिरे पर बैंगलोर से बिटिया ने चहकते हुए कुछ कहा जो मुझे समझ नहीं आया. दुबारा पूछने पर उसने कहा ‘अरे! हैप्पी फादर्स डे, डैडी’

मेरी रुलाई फूट पडी एकाएक. उसने सकपकाते हुए पूछा ‘क्या हुआ!?’ मैंने अपने आप को संभालते हुए थैंक्यू कहा और बताया कि बी डी उसे पुकार रहे थे, उसकी बातें कर रहे थे और उसी समय तुम्हारा फोन आ गया इसलिए खामख्वाह भावुक हो गया आवाज सुन कर.

हमारे बच्चे अपने दादा दादी को बी डी और बी एम कह पुकारते रहे हैं. बी डी माने बड़े डैडी. बी एम माने बड़ी मम्मा!

उस दिन रविवार था. दिन भर पिता जी अपनी पोती को याद करते रहे, उसे पुकारते रहे. वह महज़ 20 दिन पहले ही तो हमारे पास एक हफ्ते रह कर गई थी अपना जन्मदिन मना कर. उसे अब कुछ बताना भी सही ना लगा मुझे.

पिता जी सितंबर 2014 के बाद धीरे धीरे मोहल्ले में टहलने से घर के आंगन तक सीमित हो गए थे. फिर तो क्रमश: आँगन से ड्राइंग रूम, डायनिंग टेबल, टॉयलेट और आखिर में बिस्तर तक उनका जीवन सिमट गया. मार्च के बाद तो सतर्कता के साथ उन्हें नहलाने के लिए कमरे के साथ लगे बाथरूम तक ले जाता और फिर उतनी ही सावधानी से बंदरिया के बच्चे सरीखे उन्हें चिपकाए बिस्तर पर वापस लिटा देता.

डैडी की वो शामअन्न से उन्हें अरूचि हो चुकी थी. वहीं बिस्तर पर ही सहारा दे कर बैठाता और मिन्नतें कर कर आटा ब्रेड, दलिया,  बिस्किट, खिचड़ी वगैरह खिलाता  चाय पिलाता. मिन्नतें क्या करता था चिल्लाता था. एक तो आवाज़ बुलंद ऊपर से धैर्य की स्वाभाविक जैविक कमी. पड़ोस में भी सुनते होंगे तो ना जाने क्या क्या सोचते होंगे.

कुछ ही दिनों बाद उन्होंने बिस्तर से उठना ही बंद कर दिया और फिर करवट लेना भी बंद.

अल्लसुबह उठता. मैक के साथ टहलने जाता. वापस आ कर चाय बनाता पीता. मैक का खाना रखता. पिता जी का डायपर बदलता. नाजुक सी चमड़ी वाले बदन को स्पंज करता. जबरन कुछ खिलाता पिलाता. सर सहलाता तलवे रगड़ता. जल्दी ठीक हो जाने की ‘धमकी’ देता. फिर नाश्ता बना कर नहाता, खुद खाता, मैक को खिलाता और सारा घर मैक के हवाले कर ऑफिस जाता.

दोपहर ही लौट कर खाना बना कर खाता, डैडी को कुछ पिलाता, मैक को सुलाता फिर वापस ऑफिस की दौड़ लगाता. शाम को ऑफिस से आ कर फिर वही आपाधापी.

21 जून की रात भर डैडी ना जाने क्या क्या कहते रहे कुछ समझ नहीं आया. कुछ कुछ शब्द पल्ले पड़े उससे यही लगा कि वे अपने बचपन की बातें याद कर रहे. पाँच महीने पहले इस दुनिया से जा चुके अपने छोटे भाई का नाम लेते, अपनी पोती को पुकारते. बीच बीच में मुझे पुकार कर पानी भी मांग लेते. उस रात उन्होंने मुझे सोने ना दिया.

22 जून की सुबह महज़ दो घूँट कॉम्प्लान ही गटका उन्होंने. बाक़ी के लिए मना कर दिया. दोपहर जब सर हिला कर कुछ नहीं लिया तो मैंने चेतावनी दी कि अभी नहीं तो शाम को पक्का पी लेना बोर्नविटा. सहमति में सर हिला तो मैं भी कुछ समय बाद ऑफिस लौट गया.

उस शाम जब मैंने कोशिश की तब उन्होंने मना कर दिया. लेकिन मैंने जबरन उनके खुले हुए मुंह में थोड़ा सा बोर्नविटा डाला तो वे गटक गए. संतुष्ट हो कर अभी बैठा ही था कि मन किया थोड़ी देर लेट लूं, कल रात सो भी तो नहीं पाया था.

अपने बिस्तर पर दीवार की ओर करवट ले कर लेटा तो हमेशा की तरह मैक भी मेरे पास ही नीचे फर्श पर लेट गया. आँख लगी ही थी कि मैक का पंजा महसूस किया अपनी बांह पर. वह मुझे खींच रहा था कि सीधा हो कर लेटूं. मैंने उसे झिड़का तो वापस हो गया वह फर्श पर. लेकिन चंद पलों बाद ही उसकी फिर वही हरकत. पंजे से वह मुझे खींच रहा था सीधे होने के लिए और मैं उसे झिड़के जा रहा था कि थोड़ी देर सोने दे यार!

लेकिन जब वह रूका नहीं. रह रह कर छः सात बार ऐसा ही किया तो मेरा माथा ठनका. कई किस्से कहानियां याद आ गईं कि कैसे एक पालतू कुत्ते ने क्या क्या कारनामे किये. मैं स्प्रिंग जैसे उछल खड़ा हुआ कि क्या हुआ बे?

वो शाम मैक

मेरे दो बच्चे

वह मेरे आगे आगे चलते हुए पिता जी के कमरे में जाने लगा तो मैं चौंका. आम तौर पर मेरी उपस्थिति में वह पिता जी के पास नहीं जाता था लेकिन आज मुझे खुद ले कर जा रहा! वह पिता जी के सरहाने जा कर उकडूं बैठा तो मेरा दिल जोरों से धड़क उठा. मैंने ऊंची आवाज़ में उन्हें पुकारा, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई. पास जा कर उनका सर सहलाने ही लगा था कि आँखों की पुतलियाँ माथे की ओर दिखीं. आभास हो गया कि कुछ गड़बड़ तो है.

हमारी सार्वजनिक उपक्रम की कंपनी का अपना अस्पताल है 1000 बिस्तरों वाला. बोलचाल की भाषा में इसे सेक्टर 9 हॉस्पिटल कहते हैं. मैंने एम्बुलेंस के लिए संपर्क किया तो महज़ 7 मिनट में ही एम्बुलेंस घर के सामने आ कर खड़ी हो गई.

मैक के हवाले सारा घर खुला छोड़, सामने सिन्हा जी के घर वालों को सूचित कर मैं भाग खड़ा हुआ एम्बुलेंस के साथ. आपात चिकित्सा के निरीक्षणों परीक्षणों के बाद जब औपचारिक तौर पर उन्हें ‘भरती’ किया गया तब तक रात के साढ़े नौ बज चुके. डॉक्टर्स अपने काम में जुट गए तो मुझे भूख का अहसास हुआ. शिफ्ट के हिसाब से काम कर भुगतान लेने वाला निजी परिचारक मेरे पास आ कर खड़े हो गया था. मैंने उसे कुछ हिदायतें दीं और घर जा कर, खाना खा कर वापस आते तक विशेष ध्यान रखने की बात कही.

निस्तेज पड़े पिता जी का हाथ अपने हाथ में लिया हुआ था मैंने. अटेंडेंट को अपना मोबाइल नंबर देने के लिए मैंने वह हाथ उठाया, नंबर लिखा और घर जाने के लिए उठ कर एक बार पिता जी की ओर नज़रे डालीं तो आती जाती सांसों से होने वाली सीने की हरकत नहीं दिखीं.

मैंने डॉक्टर को पुकारा. दोनों डॉक्टर पलटे और फिर नर्सों, डॉक्टरों, अटेंडेंट ने रूकी धड़कने वापस लाने की सारी कोशिशे शुरू की. धाड़ धाड़ बजते दिल के साथ मैं कुछ हट कर निराशा में सर हिलाते कांपती टांगों के साथ खड़ा हो गया.

मेरे निगाहों से सामने ही डैडी के पास से धीरे धीरे सारे ही हटने लगे. डॉक्टर एक टेबल पर जा कर कुछ लिखने लगा. मैं धीमे कदमों से चलता डॉक्टर के पास पहुंचा, उसे कांपती आवाज़ में पुकारा और उसने ना में सर हिला दिया.

डबडबाई आँखें लिए डैडी के पास गया. सर सहलाया और फूट फूट कर रो पड़ा. दिलासा देने कोई ना था मेरे पास. रोते हुए ही बिटिया को कॉल किया, शहर में ही रहने वाली छोटी बहन को सूचित किया, चचेरे भाई सहित दिल्ली पंजाब के संबंधियों को भी सूचित किया.

मरच्यूरी की औपचारिकता पूरी कर थके क़दमों से आधी रात के बाद घर लौटा तो मैक, गेट के सामने ही इंतज़ार करते मिला. उससे लिपट कर मैं ना जाने कितना रोया. वह भी खामोशी से मेरे गले लगा रहा. रात भर रह रह सुबकने बाद सुबह कब आँख लग गई पता ना चला.

उठते ही मोबाइल पर झांकते फेसबुक मैसेंजर पर इंदौर से अर्चना चावजी का संदेश दिखा कि पिता जी का स्वास्थ्य कैसा है? मैं चौंका कि उन्होंने कभी नहीं पूछा इस बारे में, आज कैसे? ध्यान दिया तो उस मैसेज का समय ठीक वही था जब पिता जी ने अंतिम सांस ली होगी. मैंने वापस यही बताते हुए ज़वाब दिया तो उनका भी प्रत्युत्तर आया कि कैसे उन्हें आभास हो गया था इस बारे. मैं भी हैरान कि भाई बहन के एक मुंहबोले रिश्ते में ऐसे भी दिल के तार!

अंत समय में पिता जी जिस तरह बिटिया को पुकारते रहे थे, उसे याद कर मैंने निर्णय लिया कि एक दिन बाद 24 जून को अंतिम संस्कार किया जाए. लेकिन वह उड़ कर फिर भी ना पहुँच पाई समय पर.

मैं अकेला वो शाम

इधर मैक ने खाना पीना छोड़ दिया. मैंने बहुत कोशिश की कि वह कुछ खा ले लेकिन वह सामने पड़ा खाना खाने के लिए भी ना माना. 24 जून की सुबह भी जब लोगों की आवाजाही बढ़ गई तब भी उसने ताज़ा बने खाने की ओर देखा तक नहीं. मक्खियाँ भिनभिनाने लगीं तो मैंने उस खाने को एक थाली से ढकवा दिया.

अपने संस्थान की ओर से शव वाहन पहुँचने की सूचना मिली तो हम रवाना हुए मरच्यूरी की ओर. पिता जी को ले कर जब हम वापस घर पहुंचे तो एक बार फिर मैं मैक से लिपट कर रो पड़ा. उसी के पास आंसू पोंछते कुर्सी पर बैठा ही था कि डैडी को नीचे उतार कर फर्श पर रखा गया धार्मिक रीति रिवाजों के लिए.

तभी मैक ने भीड़ के बीच से झाँक कर देखा कि डैडी आ गए हैं. फिर क्या था! उसने खाना ढक कर रखी गई प्लेट हटाई अपनी थूथन से और सारा खाना ख़त्म कर दिया फ़टाफ़ट. सुबह से मेरी उसकी ‘बातचीत’ देख रहे कई लोग हैरान रह गए यह देख कर. एक बार फिर मेरी रूलाई फूट पड़ी इस जानवर कहे जाने वाले के व्यवहार पर.

आज पिता जी को गए सवा महीना हो गया. अब भी ऐसा कई बार होता है कि पानी का ग्लास लिए उनके कमरे की ओर चले जाता हूँ या कभी कभी अचानक ही उन्हें आवाज़ लगा बैठता हूँ. तब मैक दौड़े आता है कि यार! वो तो हैं नहीं अब!! तू कर क्या रहा?

… वो शाम कुछ अज़ीब थी
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… वो शाम कुछ अज़ीब थी” पर 27 टिप्पणियाँ

  1. वीर जी ,बहुत कठिन समय है ये…..लेकिन हो जाएगा ये भी पार ..
    हाँ…. ये सब आश्चर्य जनक घटा…..मुझे आपको पाबला जी कहना कभी अच्छा नहीं लगा ….ईश्वर उनके बताए मार्ग पर चलने का सम्बल देता रहे ,यही प्रार्थना…

  2. namastey uncleji…

    aapne… dada ji k chale jane k baad hi muje call kia hamari baat bhi hui.. us waqt mai papaji k sath Delhi ja ra tha train me tha
    jab aapne bataya to muje samajh hi nai ki kya kahu… turant mummy ko call lgaya maine…

    aur kaha ki uncleji k aate tk ghar ka dhan rkhna… unhone btaya ki mac b hai ghar pe to main zara nischint ho gya…

    mac sach me ek ghar ka sadasya hi hai…

    dada ji k gurudwara me hue karyakram me shaamil hoke muje unki boht yaad aayi… unki aawaz aur unki bachpan ki btai kahaania aaj bhi yaad h…
    unhone aaj k pakistan me janm lia aur batwaare me yaha aaye wo baatein unhone btai thi….

    unko shraddhanjali

  3. भौतिक रूप से उन का इतना ही साथ था। यह अकेलापन कुछ समय सालेगा। पर हर पिता और माँ अपनी संतानों में पुनर्जन्म पाते हैं। वे आप में जीवित हैंं और आप बिटिया में। वे आज भी आप के साथ हैं खुद आप के अंदर।

  4. बहुत ही भावपूर्ण श्रद्धांजलि है आपकी.
    बीडी को हमारी भी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि. ईश्वर उनकी आत्मा को शांति व मोक्ष प्रदान करें.
    टिप्पणीकर्ता रवि ने हाल ही में लिखा है: सर जी, आपके 500 करोड़ की पाई-पाई का हिसाब मांगेंगे…My Profile

  5. भावुक कर दिया आपने.
    भगवान बी एम / दादा जी की आत्मा को शान्ति देवे.

  6. आपके दर्द को समझ सकती हूँ गुजरी हूँ उस दौर से ………बस हिम्मत रखिये यही है जीवन ………विनम्र श्रद्धांजलि

  7. वाहेगुरु उनकी आत्मा को शांति दे …आप सब को ये दुःख सहने की शक्ति ,
    विनम्र श्रद्धांजलि….नमन |

  8. क्या कहूँ सर … मैं खुद पिछले एक साल से खुद को सँभालने की कोशिश में लगा हूँ … आप पर जो बीत रही है अच्छे से समझता हूँ … पिता का साथ होना अपने आप में बहुत बड़ा संबल होता है |

    यही कह सकता हूँ कि खुद को संभालिये |

    पापाजी को सादर नमन और विनम्र श्र्द्धांजलि |
    टिप्पणीकर्ता Shivam Misra ने हाल ही में लिखा है: “लोकमान्य” की ९५ वीं पुण्यतिथिMy Profile

  9. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, मेहनती सुप्रीम कोर्ट – ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है … सादर आभार !
    टिप्पणीकर्ता ब्लॉग बुलेटिन ने हाल ही में लिखा है: मेहनती सुप्रीम कोर्ट – ब्लॉग बुलेटिनMy Profile

  10. कैसे कहूँ, क्या कहूँ कुछ समझ ही नहीं आ रहा, ऐसा लग रहा है आपको पढ़कर कि जीवन में किसी का बिछुड़ना बहुत ही दुखदायक होता है, पर जीवन तब भी जारी रहता है। खुद का ध्यान रखें।

  11. सर जी,,, आप अपने पिता से कितना प्यार, स्नेह और सेवा करते थे!! यही सोच कर मेरी आँखों में आँसू आ गए हैं | बी डी जी को मेरी सच्ची विनम्र श्रद्धांजलि |
    टिप्पणीकर्ता हर्षवर्धन श्रीवास्तव ने हाल ही में लिखा है: एलोवेरा ( घृतकुमारी ) के लाभ और गुणMy Profile

  12. आपके अहसास अपने से लगे। कभी बचपन में बड़ी बहन के अचानक गुजरने से मैंने उन दर्दनाक दिनों को महसूस किया है। किशोरावस्था में हृदय और कोमल होता है, तब उस दर्द से उबरने में कई साल लगे थे।

    आपके पिताजी को श्रद्धाँजलि। ईश्वर उन जैसे पिता और आप जैसा पुत्र सभी को दे।

  13. आपके दुःख को समझ सकता हूँ ! बेटे का पिता के साथ बड़ा गहरा रिश्ता होता है ! बस यहीं आकर इंसान बेबस हो जाता है ! आप अपना ध्यान रखें …

  14. कुछ कहते नहीं बन रहा। ऐसी ज़िंदगी किसी आम इंसान की नहीं हो सकती। पता नहीं भगवान अच्छे आदमियों को ही इतने दुःख क्यों देता है। कुछ यादें साल महीने क्या ताउम्र नहीं जाती। फिर भी हम सब यही कह सकते है की भगवान आपको ये सब सहने और भूलने की शक्ति दे। वो देगा भी।
    टिप्पणीकर्ता nirmla.kapila ने हाल ही में लिखा है: कविताMy Profile

  15. सर्वशक्तिमान ईश्वर आपके दुखों को सहने की क्षमता प्रदान करें इसके आगे शब्द शायद छोटे पड़ गए पर आपकी भावना निशब्द व जीवन उत्प्रेरक है । संभव है कि हमारी आने वाली पीढ़ियां इस मंथन को समझ ना पाए पर मील का पत्थर तो वही है जिसे आपने जीवन में जिया या जीवन का अनुभव है सादर नमन

  16. बी,डी, को मेरी हार्दिक श्रद्धांजलि,
    जाने वाले हमारी यादों में जिंदा रहते है,

  17. ये भीगा भीगा, अजीब सा दुख ‘अंदर’ से धीरे धीरे …वर्षों तक रिस रिस के कलेज़े पे आता रहता है पाबला जी…. ईश्वर सहन करने की शक्ति देगा आपको .

  18. सच में पड़ते पड़ते रो पड़ा हूँ . अपने माता पिता याद आ गए .

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