नीरज गोस्वामी का सत्यानाश, Kshama की निराशा और शेरे-पंजाब में पैंट खींचती वो दोनों…

तीन ब्लॉगरों वाले परिवार में एक शाम बिताने के बाद 13 जुलाई की अलसुबह आँख लगी तो विवेक रस्तोगी जी से मुलाकात की योजना बन चुकी थी। लेकिन नींद खुली 11 बजे और उठते ही मामाजी के परिवार में कुछ अफ़रातफ़री का माहौल दिखा। बताया गया कि मामीजी के जो बड़े भाई सा’ब, जो एक गंभीर व्याधि से जूझते हुए मुलुंड के वोक्हार्ट अस्पताल में दाखिल थे, की तबीयत कुछ ज़्यादा ही बिगड़ गई है। वे सब वहीं जा रहे। मुझे निर्देश मिला कि उनके लौटने तक घर पर उपस्थित रहूँ और मिज़ाजपुर्सी के आने वाले किसी परिचित का ख्याल रखूँ। दोपहर बाद विवेक जी का ख्याल आया तो अब फोन करता हूँ तब करता हूँ करते-करते शाम हो गई। फिर तो हिचकिचाहट के मारे चुप्पी साध गया।

दूसरे दिन 14 जुलाई को हमें किसी भी हालत में अपनी इस सड़क यात्रा की अंतिम राह पर पुणे की ओर निकलना था। गैस पम्प से गैस डलवाने का इरादा लिए शाम साढ़े सात बजे अकेले ही मारुति वैन ले कर निकल गया, नेरूल की ओर। लेकिन रात की कृत्रिम रौशनियों से चमचमाती सड़कों पर ऐसा भटका कि सायन-पनवेल हाईवे होते हुए जा पहुँचा सानपाड़ा के इलाके में! गलती का आभास तो पहले ही हो गया था लेकिन मैं चलता गया दूर तक और लौटा उन्हीं राहों से।

14 जुलाई की सुबह ही हम पिता-पुत्री तैयार थे मुम्बई से लौटने के लिए। मामाजी के परिवार के हर छोड़े-बड़े सद्स्य ने हमें बड़ी ही भावुकता के माहौल में विदाई दी। फिर आने का वायदा करते हुए जब हमने खारघर छोड़ कर मुम्बई-पुणे एक्सप्रेस हाईवे की राह पकड़ी, तो समय हो चला था सुबह के सात बजे का। लगभग उसी समय मुम्बई में बखूबी हमारा साथ निभाने वाले जीपीआरएस ने मोबाईल से नाता तोड़ दिया।

सड़क मार्ग से की गई इस यात्रा की संक्षिप्त जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें»

खारघर से पुणे की दूरी बस 120 किलोमीटर ही थी। लगातार चला जाता तो समय लगना था लगभग 2 घंटे का। कुदरती नज़ारों का आनंद लेने के लिए, कई व्यक्तियों ने एक्सप्रेस हाईवे की बजाए सामान्य राह से जाने की सलाह दी थी। फिलहाल तो हम एक्सप्रेस हाईवे पर ही थे।

 

जैसे-जैसे आबादी कम होते जा रही थी हमें गगनचुम्बी इमारतों वाले गाँव मिल रहे थे! आसुदगाँव, सुकापुर गाँव, कोल्खे गाँव, कोन गाँव। मौसम बेहद सुहाना था। हल्की सी धुँध और कभी कभी हो जाने वाली बौछार खुशनुमा माहौल बना रही थी। एकाएक ही पहाड़ दिखने लगे और बिटिया ने कैमरे का उपयोग करना शुरू किया।

सुरंगों से गुजरते हुए घुमावदार राहों पर हम कई बार रूके। कई बार प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लेने के लिए और कई बार इंजिन को अधिक गरम होता देख। इस एक्सप्रेस हाईवे पर गाड़ी रोकने की अनुमति नहीं है किन्तु कुछ स्थान नियत किए गए हैं खास परिस्थितियों के लिए।

सुबह 9 बजे के पहले आया खालापुर का टोल प्लाज़ा। इसे पार करते ही अभी एक्सप्रेस-वे पर अभी गति बढ़ाई ही थी कि सामने बोर्ड पर लिखा दिखा ‘Exit to Khapoli खापोली के लिए निकास’।

ठीक इसके पास ही था नीरज गोस्वामीभूषण स्टील! जहाँ नीरज गोस्वामी जी वरिष्ठ अधिकारी हैं। हम जब से मुम्बई में आए थे तब से तीन बार उन्हें कह चुके थे कि पुणे जाते हुए मिलने आ रहे हैं और हर बार पुणे की यात्रा टल जाती थी। हर बार उलाहना मिलता था, इसलिए इस बार हमने बताया ही नहीं था।

उस मोड़ से मुड़ते ही गाड़ी रोक नीरज जी को मोबाईल पर सम्पर्क किया। घंटी बजती रही। मैंने कुछ पल इंतज़ार किया और फिर नीरज जी की ओर से घंटी बजी।

नीरज जी के साथ जब भी बात होती है तो पंजाबी ज़ुबान का ही इस्तेमाल ही करते हैं हम दोनों। अभी बल्ले बल्ले खतम ही नहीं हुई थी कि नीरज जी ने पूछ लिया ‘कब आ रहे हैं मिलने?’ मैं ऐसे मुस्कुराया जैसे नीरज जी सामने ही खड़े हों और धीरे से बताया कि मैं खापोली में आपके कारखाने के सामने ही खड़ा हूँ।

इतना सुनना था कि नीरज जी की जोरदार आवाज़ कानों में पड़ी ‘सत्यानाश’! मैं समझ नहीं पाया कि हुआ क्या? तभी नाराज़गी भरा स्वर आया ‘मैं इस वक्त दादर (मुम्बई) में हूँ एक मीटिंग के सिलसिले में, आने के पहले क्यों नहीं बताया? मीटिंग कैंसल कर देता और वो दो दिन पहले जब आने की बात कही थी आप आए ही नहीं, उस दिन इंतज़ार ही करता रहा।‘ ठहाकों के बीच बात खत्म करते, फिर कभी मुलाकात की आशा लिए हम चल दिए पुणे की ओर।

 

इसी एक्सप्रेस वे पर हमें दिखा फूड माल। तमाम तरह के लटकों झटकों वाले इस स्थान में सैकड़ों तरह के खाने पीने की चीजें थीं। कुछ तो सजे धजे रेस्टारेंट में और कुछ आस-पास वाले छोटे छोटे स्टालों पर। तरोताज़ा होने के बाद हमने बड़ी सी दीवार पर पेंट किए गए अनोखे नामों वाले मेन्यू से जो कुछ माँगा वह नहीं मिला! तंग आ कर मैंने उस मोबाईल पर बतियाती कन्या से झल्ला कर कहा कि इंसानों के खाने लायक जो है वह दे दो! उसने हड़बड़ा कर मोबाईल छोड़ा और मुझे घूरते हुए सांबर-बड़ा व उत्तपम के कूपन दिए।

 

इसी राह पर आया खंडाला घाट। बेशक सुंदर थे आसपास के दृश्य लेकिन राह भी बड़ी खतरनाक थी। दो जगह मारूति वैन को रोकना पड़ा। आगे बढ़े तो कब एक्सप्रेस वे छोड़ कर राष्ट्रीय राजमार्ग 4 पर आ गए पता ही नहीं चला।

एक टोल नाका पर हमें रोका गया तो हमने टोल रसीद दिखाई। उस कर्मी ने बड़े रूखे स्वर में कहा कि यह एक्सप्रेस-वे की रसीद है, आपको इस हाईवे के लिए अलग रसीद कटानी पड़ेगी। अनजाने में आ गए इस राष्ट्रीय राजमार्ग 4 पर हमें वाकई में इस इलाके की जो सुंदरता देखने को मिली वह शायद एक्सप्रेस वे पर नहीं मिलती।

मुम्बई-पुणे के बीच एक्सप्रेस वे और हाई वे का संगम स्थल
मुम्बई-पुणे के बीच एक्सप्रेस वे और हाई वे का संगम स्थल

तभी दिखने शुरू हुए बड़े बड़े बोर्ड्। लिखा हुया था ‘सन्नी दा ढ़ाबा … किलोमीटर’। कहीं दिखता था बिट्टू दा ढ़ाबा, रंजीत दा ढ़ाबा और ऐसा ही कुछ्। उत्सुक नज़रों के सामने जब सन्नी दा ढ़ाबा आया तो महसूस हुया कि एक नाम को किस तरह भुनाया जा रहा।

 

खंडाला में बिना रूके हम धड़धड़ाते हुए लोनावला भी पार कर चुके थे। जल्द ही आ गया पुणे। शहर में प्रवेश करते ही गाड़ी रोक जिन तीन ब्लॉगरों को फोन किया गया, वे थे Kshama, अभिषेक ओझा व देबाशीष। अभिषेक जी और देबाशीष जी के मोबाईल नम्बर पर अजीबोगरीब ध्वनियाँ मिलती रहीं। सम्पर्क हो पाया Kshama जी से। (बाद में पता चला कि अभिषेक व देबाशीष, दोनों ही भारत से बाहर थे)

Kshama जी ने बताया कि एकाएक ही उन्हें मुम्बई आना पड़ गया था, बस दो घंटे में ही पुणे पहुँच रही हैं। दो घंटों के चार-छह घंटे में बदलने की संभावनायों को देखते हुए मैंने आगे की राह पर निकल चलने का निर्णय लेते हुए Kshama जी से क्षमा मांग ली। बिटिया के पुणे स्थित सहपाठी भी अपने-अपने कार्यालय में व्यस्त हो चुके थे।

अभी 11 नहीं बजे थे लेकिन भूख लग आई थी। सामने दिखा ‘शेरे पंजाब होटल’। मारूति वैन सड़क किनारे खड़ी कर सामान्य से, लकड़ियों से बने उस बड़े से खान-पान केन्द्र के अंदर गए, बैठे, ऑर्डर दिए तो महसूस हुआ कि काऊँटर-मैन, वेटर, साफ़-सफ़ाई वाला सब के सब दक्षिण भारतीय हैं! अभी भोजन लगा नहीं था कि पैरों पर किसी दबाव को महसूस किया मैंने। झांक कर देखा तो गहरे काले रंग की दो बिल्लियाँ जूतों के ऊपर ही बैठी मेरी ओर ताक रहीं थीं। मैंने पैर झटक कर उन्हें दूर किया लेकिन वह घूम फिर कर पुन: आ गई। यह क्रम चलता ही रहता अगर बिटिया ने ‘छोटू’ को कह कर उन्हें निकलवाया न होता।

भोजन अभी खतम भी नहीं हुआ था कि बिल्लियों ने फिर वही हरकत दुहराई। इस बार वह दोनों पैरों पर आने की बजाए मेरी पतलून के पहुँचे को मुँह में दबा कर खींच रहीं थीं। एक पशु की स्वभाविक हरकत मान उन्हें फिर झटक दिया और बाहर काऊँटर पर आ गया। भुगतान कर रहा था कि नज़र पड़ी कुछ दूर वही बिल्लियाँ बैठी हुईं मेरी ओर टुकर-टुकर देख रहीं थीं। न जाने क्या कुछ कहना चाह रही थीं।

पहले तो पुणे में रात बिताने का इरादा था लेकिन किसी से मुलाकात न होने के कारण बचे हुए समय का सदुपयोग करने के इरादे से हमने अगले पड़ाव की ओर चलने का मन बना लिया। शहर के बीच भारी उमस वाले माहौल में गैस पम्प की तलाश में भटकते हुए समय लग गया। आटो एलपीजी टैंक भरवा कर हम दोपहर एक बजे के आस-पास निकल पड़े अहमदनगर की ओर, जहाँ से नांदेड़ की राह पकड़नी थी हमें। नांदेड़, जिसे गुरूद्वारों की नगरी कहा जाता है तथा यहाँ सिक्खों का एक पवित्र तीर्थ स्थान, सचखंड साहिब भी है।

कैसा लग रहा है यह सफर? नीचे टिप्पणी कर बताईये
हमें तो आधी रात को पुलिस गश्ती जीप ने पीछा करते हुए दौड़ाया

नीरज गोस्वामी का सत्यानाश, Kshama की निराशा और शेरे-पंजाब में पैंट खींचती वो दोनों…
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जून-जुलाई 2010 में की गई इस यात्रा का संस्मरण 20 भागों में लिखा गया है. जिसकी कड़ियों का क्रम निम्नांकित है.
मनचाही कड़ी पर क्लिक कर उस लेख को पढ़ा जा सकता है

  1. सड़क मार्ग से महाराष्ट्र यात्रा की तैयारी, नोकिया पुराण और ‘उसका’ दौड़ कर सड़क पार कर जाना
  2. ‘आंटी’ द्वारा रात बिताने का आग्रह, टाँग का फ्रेंच किस, उदास सिपाही और उफ़-उफ़ करती महिला
  3. ‘पाकिस्तान’ व उत्तरप्रदेश की सैर, सट्टीपिकेट का झमेला, एक बे-सहारा, नालायक, लाचार और कुछ कहने की कोशिश करती ‘वो’
  4. खौफ़नाक आवाजों के बीच, हमने राह भटक कर गुजारी वह भयानक अंधेरी रात
  5. शिरड़ी वाले साईं बाबा के दर से लौटा मैं एक सवाली
  6. नासिक हाईवे पर कीड़े-मकौड़ों सी मौत मरते बचे हम और पहुँचना हुया नवी मुम्बई
  7. आखिर अनिता कुमार जी से मुलाकात हो ही गई
  8. रविवार का दिन और अपने घर में, सफेद घर वाले सतीश पंचम जी से मुलाकात
  9. चूहों ने दिखाई अपनी ताकत भारत बंद के बाद, कच्छे भी दिखे बेहिसाब
  10. सुरेश चिपलूनकर से हंसी ठठ्ठे के साथ कोंकण रेल्वे की अविस्मरणीय यात्रा और रत्नागिरि के आम
  11. बैतूल की गाड़ी, विश्व की पहली स्काई-बस, घर छोड़ आई पंजाबिन युवती और गोवा का समुद्री तट
  12. सुनहरी बीयर, खूबसूरत चेहरे, मोटर साईकिल टैक्सियाँ और गोवा की रंगीनी
  13. लुढ़कती मारूति वैन और ये बदमाशी नहीं चलेगी, कहाँ हो डार्लिंग?
  14. घुघूती बासूती जी से मुलाकात
  15. ‘बिग बॉस’ से आमना-सामना, ममता जी की हड़बड़ाहट, आधी रात की माफ़ी और ‘जादू’गिरी हुई छू-मंतर
  16. नीरज गोस्वामी का सत्यानाश, Kshama की निराशा और शेरे-पंजाब में पैंट खींचती वो दोनों…
  17. आधी रात को पुलिस गश्ती जीप ने पीछा करते हुए दौड़ाया
  18. किसी दूसरे ग्रह की सैर करने से चूके हम!
  19. वर्षों पुरानी तमन्ना पूरी हुई, गुरूद्वारों के शहर नांदेड़ में
  20. धधकती आग में घिरी मारूति वैन से कूद कर जान बचाई हमने

… और फिर अंत में मौत के मुँह से बचकर, फिर हाज़िर हूँ आपके बीच

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36 Thoughts to “नीरज गोस्वामी का सत्यानाश, Kshama की निराशा और शेरे-पंजाब में पैंट खींचती वो दोनों…”

  1. ललित शर्मा

    bahut badhiyaa hai ji abhi tak ka safar.

  2. भारतीय नागरिक - Indian Citizen

    मुझे हमेशा टोल से नफरत होती है. पहले गाड़ी खरीदने पर एक्साइज, फिर सेल्स, फिर रोड टैक्स और रजिस्ट्रेशन. ऊपर से तीस रुपये लीटर का पेट्रोल साठ रुपये, और इस सबके बाद टोल टैक्स. सा चलने के लिये सड़क और पुल भी नहीं दे सकते.

  3. राज भाटिय़ा

    आप की यात्रा बहुत मन भावन लगी, सभी चित्र भी बहुत सुंदर लगे, यह टोल टेक्स इन सडको को देख कर तो नही चुभता, लेकिन जब मे पिछले साल रोहतक से व्यास जी गया तो रास्ते मे टोल टेक्स बहुत चुभा था, क्योकि सडके तो सडके तो शेरा शाह सुरी के जमाने की ओर टोल टेक्स बहुत ज्यादा.धन्यवाद

  4. संगीता पुरी

    हमेशा की तरह ही ये पोस्‍ट भी बहुत अच्‍छी लगी .. चित्र तो इंडिया के लग ही नहीं रहे हैं !!

  5. शिवम् मिश्रा

    हम तो शुरू से कहते रहे है … हम इस सफ़र में साथ साथ है … सो पूरे आनंद आ रहे है !

  6. राजीव तनेजा

    रोचक वर्णन

  7. वन्दना अवस्थी दुबे

    शानदार सफ़र, रोचक शैली में ललचा रहा है. तस्वीरें बहुत सुन्दर हैं.

  8. चन्द्र कुमार सोनी

    happy journey.
    thanks.
    http://WWW.CHANDERKSONI.BLOGSPOT.COM

  9. Udan Tashtari

    बढ़िया यात्रा वृतांत चल रहा है…थोड़ा और ओर्गनाईज़्ड निकलते तो सबसे मुलाकात भी हो जाती.

    खैर, आगे बताईये अब!!

  10. Sanjeet Tripathi

    o ji baki sab chhoro yar, nanded mujhe bhi jana hai shish nawane….
    pata nai waheguru kab mauka denge…

  11. Arvind Mishra

    कैसा लग रहा है यह सफ़र =जोरदार

  12. ali

    'तीन तीन ब्लागरों वाले घर' से होकर गुज़रे फिर भी उम्मीद कि 'एक घर एक ब्लागर' वाले बन्दों का हौसला ना टूटेगा 🙂

  13. Tarkeshwar Giri

    Mujhe to laga ki main kudh ghum raha hun.

    Ghuma hi diya apne.

    Kabhi Dilli Aaiye fir ham apko Gadwal Le chalenge.

  14. ज़ाकिर अली ‘रजनीश’

    आपके सफर में हम भी हमसफर बने हुए हैं जी, आप बताते रहो, हम पढ रहे हैं।

    ———
    मन की गति से चलें…
    बूझो मेरे भाई, वृक्ष पहेली आई।

  15. राम त्यागी

    में भी इस रास्ते पर एक बार जा चुका हूँ , कॉलेज के दिनों में खंडाला , लोनावाला और मुम्बई की सैर करी थी , अच्छा लग रहा है आपकी यात्रा वृतांत में भाग लेकर . हम भी आपके साथ जैसे कार में हों ! बाकी भाई दरवाजे के सामने खड़े होकर घंटी बजाने से पहले फोन की घंटी बजा दिया करो अडवांस में 🙂

  16. shikha varshney

    ये सांभर बड़ा और न जाने किस किस की तस्वीर बज्ज पर देखी. वहां आर्डर करना मना था तो इधर आये कि शायद यहाँ मिल जाये :).पर यहाँ चित्र देख कर और वर्णन पढकर मजा आ गया.

  17. anitakumar

    बहुत मजा आ रहा है पढ़ने में आप देखना आप जल्द ही ट्रेवोलोग लिख रहे होगें। नीरज जी का सत्यानाश टाइटल में पढ़ कर हम तो डर ही गये थे। आप तो हमें विस्तार से ये बताओ कि ये नक्शे मोबाइल में कैसे देखते हैं जी। मुझे तो लाख कौशिश करने के बाद भी ये सेवा उपलब्ध नहीं हो रही। एक पोस्ट हो जाए इसी पर मय चित्रों के

  18. नीरज गोस्वामी

    बाउजी सच्ची आपसे न मिल मिल पाने का मलाल मुझे आजतक है…कितने अरमान सजाये थे आपसे मुलाकात के लेकिन सारे मिटटी में मिल गए…आप से बात करने के बाद मीटिंग में क्या डिस्कस हुआ याद ही नहीं रहा…इस गम से तब तक नहीं उबर पाउँगा जब तक आप से अपने ही घर पर बैठ कर ठहाके नहीं लगा लेता…सच्ची…मुच्ची कह रहा हूँ…इसे मजाक मत समझना.

    बिटिया की फोटोग्राफी देख कर हैरत में पड़ गया हूँ…यहाँ सालों रहने के बाद भी हम एक भी ऐसी फोटो नहीं खींच सके और उसने सफर के दौरान ऐसी गज़ब की फोटो खींचलीं…ये हुनर उस से सीखना पड़ेगा इसलिए अगली बार जब आप हमारे घर आयें तो उसे साथ लेकर आयें…तब उसे गुरु बनायेंगे और गुरु दक्षिणा भी देंगे…

    कदों आ रए ओ भ्राजी?

    नीरज

  19. अभिषेक ओझा

    आप तब आये जब हम पुणे छोड़ चुके… खैर कोई बात नहीं मुलाकात तो होगी ही कभी न कभी. और इस रास्ते पर तो इतना आना जाना हुआ कि पूछिए मत. और इतना खुबसूरत रास्ता है कि कभी उबाऊ नहीं लगा. खासकर बरसात के दिनों में तो.. ओह !

  20. बी एस पाबला

    @ भारतीय नागरिक – Indian Citizen

    मुझे हमेशा टोल से नफरत होती है.

    अपना भी यही हाल है 🙂

  21. बी एस पाबला

    @ राज भाटिया

    सडके तो शेरा शाह सुरी के जमाने की ओर टोल टेक्स बहुत ज्यादा

    यही तो मैंने भी देखा है यात्रा में

  22. बी एस पाबला

    @ संगीता पुरी

    चित्र तो इंडिया के लग ही नहीं रहे हैं!!

    यहीं के हैं 🙂

  23. बी एस पाबला

    @ शिवम् मिश्रा

    हम तो शुरू से कहते रहे है … हम इस सफ़र में साथ साथ है

    आपका साथ बना रहे

  24. बी एस पाबला

    @ Udan Tashtari

    थोड़ा और ओर्गनाईज़्ड निकलते तो सबसे मुलाकात भी हो जाती.

    बात तो सही है

  25. बी एस पाबला

    @ Sanjeet Tripathi

    nanded mujhe bhi jana hai shish nawane…pata nai waheguru kab mauka denge

    chaliye agli baar

  26. बी एस पाबला

    @ राम त्यागी

    दरवाजे के सामने खड़े होकर घंटी बजाने से पहले फोन की घंटी बजा दिया करो अडवांस में 🙂

    बैराग का गीत याद कीजिए -'पीते पीते कभी कभी ये जाम…'

  27. बी एस पाबला

    @ anitakumar

    एक पोस्ट हो जाए इसी पर मय चित्रों के

    पहले की पोस्ट्स पर अमल होता नहीं दिखता 🙂

  28. बी एस पाबला

    @ नीरज गोस्वामी

    मलाल तो मुझे भी है नीरज जी!
    गलती मेरी ही थी पहले बता नहीं पाया आपको

    क्या करता? तीन बार कह कर भी नहीं आ पाया था, चौथी बार बोलने में संकोच हो गया 🙂

    ज़ल्द ही मिलता हूँ आपसे, शायद अगले माह

  29. बी एस पाबला

    @ अभिषेक ओझा

    मुलाकात तो होगी ही कभी न कभी

    बिल्कुल जी, दुनिया गोल है

  30. जी.के. अवधिया

    दीपावली के इस शुभ बेला में माता महालक्ष्मी आप पर कृपा करें और आपके सुख-समृद्धि-धन-धान्य-मान-सम्मान में वृद्धि प्रदान करें!

  31. Meenu Khare

    सुन्दर.दीप पर्व की हार्दिक बधाई।

  32. पाबला जी वैसे तो मैं आपको 2008 से जनता हूँ इनरनेट के थ्रू , पहले छद्म नाम से लिखता था ब्लॉग पर . आप की फोटोग्राफी कमाल की है !!मान गए आप को गुरु बनाने की इच्छा हो आई !! आप के लेखन की तो बात ही क्या !!अगर ये चेला आप को जंच जाये तो बन जाययेइगा I -गुरु!!

    1. बी एस पाबला

      Heart
      स्वागत है आपका

  33. भोजनालय में रहते हुए भी
    बिल्लियाँ रहती थीं भूखी
    सचमुच कितनी शालीन
    सभ्य थीं वे बिल्लियाँ

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