धधकती आग में घिरी मारूति वैन से कूद कर जान बचाई हमने

16 जुलाई को प्रारंभ होने वाली यात्रा के अंतिम चरण की योजना बनाते हम पिता-पुत्री जब नांदेड़ स्थित सचखंड गुरूद्वारे के यात्री निवास में सोए तो आँख खुली सुबह 7 बजे

नित्य कर्मों से निपट, कमरे की चाबी लौटा, अपना सामान समेट हमने मारूति वैन में रखा और प्रात:कालीन आराधना के बाद लंगर स्थल पर प्रसाद ग्रहण कर चल पड़े शहर के बाहर की ओर।

सबसे पहला काम किया गया आटो एलपीजी गैस डलवाने का। नांदेड़ हवाई अड्डे के पास स्थित गैस फिलिंग स्टेशन पर 500 रुपए की गैस डलवाने का निर्देश दे मैं अभी पर्स निकाल भी न पाया था कि मशीन ने कार्य खतम होने का संकेत दिया।

मैं हैरान सा पूछ बैठा कि गैस डल गई? वहाँ के कर्मचारी ने पुष्टि करते हाँ में सिर हिलाया तो मैंने अपने आप को दिलासा दी ‘नई तकनीक है कुछ भी हो सकता है

सड़क मार्ग से की गई इस यात्रा की संक्षिप्त जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें»


शहर से बाहर निकल जब राह के दृश्यों का आनंद उठाना शुरू किया तो मौसम खुशनुमा ही मिला। समय हो रहा था सुबह के 9 बजे का। हमें उमरखेड़ होते, यवतमाल-वर्धा से गुजरते, नागपुर पहुँचना था और फिर भिलाई। कुल दूरी लगभग 600 किलोमीटर।

मैंने अंदाज़ लगाया कि यदि खाते-पीते, विश्राम करते हुए अनवरत चला जाए तो अधिक से अधिक रात के 9 बजे तक घर पहुँच ही जाएँगे। वर्धा में यदि सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी से सम्पर्क हो पाया तो 2-3 घंटे अतिरिक्त सही। वैसे, यह मेरे अवकाश का अंतिम दिन भी था।

राह में ही ख्याल आया अनिल पुसदकर जी का। उनके क्षेत्र का नाम जो सामने दिख रहा था! फोन लगाया गया, लेकिन उन्होंने उठाया ही नहीं। आखिर हमने इतनी सुबह उन्हें याद किया था, वे तो सो रहे होंगे 🙂

हदगाँव से पहले पुसद को इंगित करता मील का पत्थर
हदगाँव से पहले पुसद को इंगित करता मील का पत्थर

लगभग 60 किलोमीटर आ चुके थे नांदेड़ से, जब मैंने हदगाँव में प्रवेश किया। आगे बढ़ते गया सड़क संकरी होती गई। संशय हुया तो राह पूछी। बताया गया कि यवतमाल-वर्धा की राह वाला मोड़ हम पीछे छोड़ आए हैं। मारूति वैन को वापस मोड़ कर हदगाँव से लौटे और सही राह वाले मोड़ से होते हुए चल पड़े हम पिता-पुत्री।

हदगाँव से 1 किलोमीटर पहले नागपुर की दूरी बताता सूचना पट
हदगाँव से 1 किलोमीटर पहले नागपुर की दूरी बताता सूचना पट

अभी 3 किलोमीटर ही और चले होंगे कि गाड़ी का इंजन बंद हो गया। किनारे कर जाँच की तो पता चला कि गैस हो गई है खत्म! इतनी ज़ल्दी? 500 रूपए की आटो एलपीजी और 60 किलोमीटर!? भुनभुनाते हुए पेट्रोल में इंजन शुरू किया। कोई हलचल नहीं। प्रयास पर प्रयास करते रहा लेकिन इंजिन टस से मस नहीं हुया। पेट्रोल आ रहा, डिस्ट्रिब्यूटर बढ़िया काम कर रहा, स्पार्क प्लग भी ठीक, करंट भी सही लेकिन कोई नतीज़ा नहीं। आखिर में बैटरी ने भी ज़वाब दे दिया। अब?

पास से गुजरते एक आटो रिक्शा वाले पूछ्ताछ की तो एक मैकेनिक के बारे में बताया गया। मैंने, हमेशा जेब में रहने वाले कैमरे, एटीएम कार्ड व अन्य कई वस्तुयों को सामने ग्लव बॉक्स में डाल, बिटिया को कुछ निर्देश दे, उस आटो में सवार हो मैकेनिक की दुकान का रूख किया। शुक्रवार का दिन था, नमाज़ का। दुकान बंद मिली। दुकान के बाहर लिखे मोबाईल पर सम्पर्क किया गया। नेटवर्क के बाहर मिला मोबाईल। हदगाँव का एक चक्कर लगा लिया वह मैकेनिक नहीं मिला। किसी ने उसके भाई की दुकान का पता दिया। वहाँ वह महाशय बतियाते मिले। दुकान से आवश्यक औज़ार और बैटरी लाद हम चल दिए वापस अपनी वैन की ओर्।

आते ही मैकेनिक अपने काम में जुट गया। धूप अपना असर दिखाने लगी थी। मैं सड़क पर टहलते हुए दिनेशराय द्विवेदी, इंदु पुरी, के के मिश्रा, महफ़ूज अली से बतियाते रहा।

लगभग साढ़े बारह बजे इंजिन के दहाड़ने की आवाज़ सुनी तो राहत की सांस ली। मैकेनिक ने बताया कि कार्ब्यूरेटर में कुछ रिसाव है, पैकिंग डालनी पड़ेगी। ओह! तो इसीलिए कई बार चलती गाड़ी रूक जाती थी!? मैकेनिक का सुझाव आया कि वैन को चला कर दुकान तक ले जाया जाए जहाँ तसल्ली से पैकिंग लगाई जा सकेगी। मैंने हामी भरते हुए एटीएम से कुछ धन निकालने की इच्छा जाहिर की और वैन चलाते हुए मैं चल पड़ा वापस हदगाँव की ओर्। मैकेनिक मेरी बगल में बैठा था, बिटिया पीछे की सीटों पर्। अंदर सब कुछ खुला बिखरा पड़ा था।

हदगाँव की ओर मुड़ कर पंचशील स्कूल के कुछ पहले ही एक गति अवरोधक पर गाड़ी ने हल्की उछाल भरी। दो सेकेंड के भीतर ही मैकेनिक चिल्लाया -आग!!! मैंने अपनी बाईं ओर नज़र डाली। आग की लपट देख झट वहीं पड़े तौलिये से उसे ढ़कने की कोशिश की किन्तु आग भड़क चुकी थी। मैकेनिक फिर चिल्लाया -बाहर निकलो। मैंने ब्रेक पर पूरे जोर से पैर दबाया। तब तक आग के शोलों ने मेरी बाईं बांह को चपेट में ले लिया था। मैंने आव देखा ना ताव, अपनी ओर का दरवाज़ा खोला और बाहर कदम रख दिए। लेकिन यह क्या गाड़ी तो अभी रूकी ही नहीं है।

सड़क पर संतुलन न बना पाने के कारण तीन-चार बार लुढ़कने के बाद जब अपने पैरों पर खड़ा हो पाया तो निगाह पड़ी अपनी मारूती वैन के दरवाजों से बाहर निकलती आग की लपटों पर्। मानवीय स्वभाव के वशीभूत हो दौड़ कर पिछले दरवाज़े सरकाए और जो हाथ आया उसे निकाल बाहर फैंकने लगा। मैकेनिक अपने द्वारा लाई गई बैटरी की ओर लपका। लेकिन तब तक सभी बैग्स व सूटकेस में आग लग चुकी थी। पिघला प्लास्टिक हाथों की ऊँगलियों में लगते ही ध्यान दिया तो आग के गोले भयावह होते दिखे। आसपास से शोर उठने लगा -भाग जायो, दूर हो जायो।

मैं पहले ही देख चुका था कि बिटिया अपने स्थान पर नहीं है। सुरक्षित स्थान की ओर दौड़ते उसकी आवाज़ से तसल्ली हुई, जब उसने बताया कि वह ठीक है।

ठीक उस पंचशील स्कूल के मुख्य गेट के सामने रूकी थी मारूति वैन। आग, भड़क कर अपना रौद्र रूप दिखाने लगी थी। बच्चे अपनी कक्षायों से निकल कर सामने मैदान में आ कर शोर मचाने लगे थे। मेरे साथ रहे उस मैकेनिक ने पुलिस थाने का नम्बर दिया। मैंने पलट कर एक नज़र वैन की ओर डाली। छोटे-छोटे विस्फ़ोट होने शुरू हो गए। अहसास हो गया कि अब कुछ किया नहीं जा सकता।

गाड़ी में सब-कुछ तो ज्वलनशील है प्लास्टिक का डैशबोर्ड, फोम, कपड़े के सीट कवर, कैमरे-मोबाईल की बैटरियां, नीचे रबर मैट, ऊपर भी वैसा ही, बैटरी एसिड, प्लास्टिक चढ़ी तारों का जाल, ब्रेक ऑयल का डब्बा, कपड़ों का जमावड़ा, चमड़े के जूते, रबर टायर। बदहवासी भरे स्वर में पुलिस को सूचना दे मैंने सोच लिया कि अब पलट कर नहीं देखूँगा गाड़ी की ओर। बिटिया की ओर निगाह गई। डबडबाई आँखें लिए उसकी कातर आवाज़ आज भी मेरे कानों में गूँजती है -डैडी, सब खतम हो गया।

एक दु:स्वप्न
एक दु:स्वप्न

 

आखिर उसे तकलीफ़ क्यों ना होती? कितने चाव से उसने ढ़ेर सारी खरीदारी की थी। कितने ही उपहार उसे मिले थे। कितनी ही पोशाकें वह ले कर चली थी। सब स्वाहा हो रहे थे। द्विवेदी जी ने ठीक कहा है कि जब भी कोई हादसा होता है उस मे अरमानों का नष्ट होना सब से अधिक दुखदायी होता है।

नियति को भांप कर जब मस्तिष्क कुछ स्वतंत्र हुआ तो बांह में लगी आग से उत्तपन्न पीड़ा महसूस हुई जो लगातार बढ़ते गई। यहाँ तक कि कराहें निकलने लगी मेरी। ध्यान गया अपने संस्थान में मिले अग्नि दुर्घटना से निपटने वाले प्रशिक्षण में बताई गईं बातों पर्। नज़र दौड़ाई तो हैण्डपम्प दिखा। जिसके जल प्रवाह के नीचे बाँह को रख ताप को कम करने की कोशिश करने लगा। लोग चिल्लाते रहे पानी मत डालो पानी मत डालो, लेकिन मैंने एक ना सुनी। बाद में मेरा यह निर्णय बहुत लाभदायक साबित हुया।

अब मेरा ध्यान गया कैमरे की ओर्। वह तो अंदर ही रह गया था। मोबाईल टटोले। एक मिला एक नहीं मिला। बाद में किसी ने वह भी ला दिया सड़क से उठा कर्। अजीब सी घबराहट होने लगी तो स्कूल के एक कमरे को तुरंत खाली करा मेरे लेटने का इंतज़ाम किया गया। तब तक दसियों लोग पूछताछ कर चुके थे। पुलिस नहीं पहुँची थी लेकिन समाचार संवाददाता आ चुके थे बारी बारी। काफी समय तक होती लगातार पूछताछ और जिज्ञासायों से झल्ला कर जब मैंने एक व्यक्ति से नाराज़गी जताई तो उसने बताया कि वह पुलिस वाला है।

औपचारिकतायों के बाद मुझे निर्देशित किया गया कि थाने में हाजिरी दी जाए, जहाँ से मुझे इलाज के लिए जाना होगा स्थानीय अस्पताल में। तमाम खानापूर्ति के बाद, प्राथमिक उपचार करा मुझे कुछ दिनों बाद पुन: हाजिरी देने की हिदायत दे, जाने की अनुमति मिली।

कुछ दूर स्थित बस स्टैंड की ओर जाते मैंने अपनी स्थिति पर गौर किया। अस्तव्यस्त पहनावा, पैरों में मामूली स्लीपर, जली हुई बांह, बिगड़ा चेहरा, आंखों में आंसू। पास कुछ नहीं बचा था सिवाय बदन के कपड़ों के। एक स्वभाविक चपलता, चैतन्यता, दम्भ, मुस्कान, चहक गायब थी। तमाम लोगों की बेचारगी जतलाती निगाहें हमारी ओर थीं। जीवन के इस रूप पर भी मैं मुस्कुराए बिना रह ना सका।

हदगाँव से ऊमरखेड़, फिर ऊमरखेड़ से यवतमाल, यवतमाल से नागपुर पहुँचना हुआ बस बदलते हुए। पूरी राह मुझे अपनी बांह से वैसी ही गंध आती रही जैसे आग पर किसी मांस को भूने जाते हुए आती है। नागपुर में कदम रखते रखते रात के साढ़े बारह बज चुके थे। तारीख बदल कर हो चुकी थी 17 जुलाई।

नागपुर स्टेशन पर हल्का-फुल्का खाना खा कर, पौने दो बजे चली ट्रेन के जनरल डब्बे में बैठ हम दोनों जा पहुँचे सुबह 6 बजे दुर्ग स्टेशन और फिर 5 किलोमीटर दूर भिलाई, अपने घर। माता जी हैरान-परेशान। सारी बात पता चली तो रो-रो कर उनका बुरा हाल था। पिछली रात सुपुत्र गुरूप्रीत ने मुझसे बात की थी मैंने उसे घटनाक्रम के बारे में कुछ नहीं बताया था। वह रवाना हो रहा था स्टार टीवी में आने वाले अक्षय कुमार के धारावाहिक मास्टर शेफ़ के के लिए और मैं उसे विचलित नहीं करना चाहता था। जब तक वह लौटा नहीं उसे कुछ बताया भी नहीं गया।

दो घंटो की नींद के बाद मैं जा पहुँचा अपने संस्था के अस्पताल। बर्न इकाई के प्रमुख प्लास्टिक सर्जन की देखरेख में इलाज शुरू हुया और आज कोई देख कर बता नहीं सकता कि मैं ऐसे किसी हादसे का शिकार हुया था। बिटिया को तो एक खरोंच भी नहीं आई थी। वह पैरों के बल जमीन पर आ टिकी और वैसे ही खड़ी रह गई थी।

यह कुछ तस्वीरें हैं मेरे निवास पर कुशलक्षेम के लिए आए ललित शर्मा, जी के अवधिया और शरद कोकास जी की। उस दिन अवधिया जी का जनमदिन था।

जी के अवधिया, शरद कोकास, ललित शर्मा
जी के अवधिया, शरद कोकास, ललित शर्मा
हमारे एक कंट्रोल रूम में जी के अवधिया, ललित शर्मा
हमारे एक कंट्रोल रूम में जी के अवधिया, ललित शर्मा
कंट्रोल रूम में शरद कोकास, जी के अवधिया
कंट्रोल रूम में शरद कोकास, जी के अवधिया
ललित शर्मा, जी के अवधिया, शरद कोकास
ललित शर्मा, जी के अवधिया, शरद कोकास

 

कुछ औपचारिकतायों के कारण, बाद में दो बार मेरा जाना हुया घटना स्थल पर। यह तस्वीरें थीं उस हादसे के बाद की।

 

इस तरह अंत हुया हमारी सड़क मार्ग से महाराष्ट्र यात्रा का। हादसे की सूचना देते, स्वास्थय लाभ की कामना करते ब्लॉगर साथियों की पोस्ट्स द्वारा तथा टिप्पणियों के रूप में साथियों की मंगलकामनाएं मिलीं। आभार सभी का।

कई साथी इस बात पर खफ़ा हैं कि विवरण वाली पोस्ट्स देर से लिखी जा रहीं हैं, बाकी ब्लॉग्स भी अपडेट नहीं हो रहे। अब किया भी क्या जाए? सरकारी नौकरी के घंटों में ब्लॉगिंग को मैं समय नहीं देता। सामाजिक-पारिवारिक जिम्मेदारियों से बचे समय में इंटरनेट पर अपनी महत्वाकांक्षी योजनायों की अलग प्राथमिकतायें हैं। जैविक घड़ी अपनी जगह है। परिवार में हुए हादसों ने बची खुची कसर पूरी कर दी है।

कोशिश रहेगी 2010 से उबर कर 2011 में नई ऊर्जा के साथ आपका स्नेह पाने की।सही है ना!?
धधकती आग में घिरी मारूति वैन से कूद कर जान बचाई हमने
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जून-जुलाई 2010 में की गई इस यात्रा का संस्मरण 20 भागों में लिखा गया है. जिसकी कड़ियों का क्रम निम्नांकित है.

मनचाही कड़ी पर क्लिक कर उस लेख को पढ़ा जा सकता है

  1. सड़क मार्ग से महाराष्ट्र यात्रा की तैयारी, नोकिया पुराण और ‘उसका’ दौड़ कर सड़क पार कर जाना
  2. ‘आंटी’ द्वारा रात बिताने का आग्रह, टाँग का फ्रेंच किस, उदास सिपाही और उफ़-उफ़ करती महिला
  3. ‘पाकिस्तान’ व उत्तरप्रदेश की सैर, सट्टीपिकेट का झमेला, एक बे-सहारा, नालायक, लाचार और कुछ कहने की कोशिश करती ‘वो’
  4. खौफ़नाक आवाजों के बीच, हमने राह भटक कर गुजारी वह भयानक अंधेरी रात
  5. शिरड़ी वाले साईं बाबा के दर से लौटा मैं एक सवाली
  6. नासिक हाईवे पर कीड़े-मकौड़ों सी मौत मरते बचे हम और पहुँचना हुया नवी मुम्बई
  7. आखिर अनिता कुमार जी से मुलाकात हो ही गई
  8. रविवार का दिन और अपने घर में, सफेद घर वाले सतीश पंचम जी से मुलाकात
  9. चूहों ने दिखाई अपनी ताकत भारत बंद के बाद, कच्छे भी दिखे बेहिसाब
  10. सुरेश चिपलूनकर से हंसी ठठ्ठे के साथ कोंकण रेल्वे की अविस्मरणीय यात्रा और रत्नागिरि के आम
  11. बैतूल की गाड़ी, विश्व की पहली स्काई-बस, घर छोड़ आई पंजाबिन युवती और गोवा का समुद्री तट
  12. सुनहरी बीयर, खूबसूरत चेहरे, मोटर साईकिल टैक्सियाँ और गोवा की रंगीनी
  13. लुढ़कती मारूति वैन और ये बदमाशी नहीं चलेगी, कहाँ हो डार्लिंग?
  14. घुघूती बासूती जी से मुलाकात
  15. ‘बिग बॉस’ से आमना-सामना, ममता जी की हड़बड़ाहट, आधी रात की माफ़ी और ‘जादू’गिरी हुई छू-मंतर
  16. नीरज गोस्वामी का सत्यानाश, Kshama की निराशा और शेरे-पंजाब में पैंट खींचती वो दोनों…
  17. आधी रात को पुलिस गश्ती जीप ने पीछा करते हुए दौड़ाया
  18. किसी दूसरे ग्रह की सैर करने से चूके हम!
  19. वर्षों पुरानी तमन्ना पूरी हुई, गुरूद्वारों के शहर नांदेड़ में
  20. धधकती आग में घिरी मारूति वैन से कूद कर जान बचाई हमने

… और फिर अंत में मौत के मुँह से बचकर, फिर हाज़िर हूँ आपके बीच

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31 Thoughts to “धधकती आग में घिरी मारूति वैन से कूद कर जान बचाई हमने”

  1. ललित शर्मा

    आग में तप कर ही सोना कुंदन बनता है। रब अपने बंदो की परीक्षा लेता है। जिसमें खरा बंदा ही उत्तीर्ण हो पाता है।

    किसी ने कहा है-
    "जख्म पर जख्म खाता रहा,
    फ़िर भी यह दिल मुस्कुराता रहा।
    गम तो मुझे इस कदर मिले
    के गम का अहसास ही जाता रहा।"

    हादसों से उबरना एक बड़ी बात है,रब सबका रखवाला है।

  2. Rahul Singh

    आपकी जीवटता के ढेरों प्रशंसक हैं, सचमुच लाजवाब है वह.

  3. राजीव तनेजा

    गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में…
    आपकी जीवटता को सलाम..

  4. ajit gupta

    ओह साँस रोके सारा वाकया पढ़ा। आप जीवट वाले व्‍यक्ति हैं, नहीं दूसरा होता तो इतना नहीं कर पाता। अब सब ठीक है, चलिए 2011 में सब कुछ शुभ ही हो।

  5. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi

    इस कड़ी का बेसब्री से इंतजार था। लेकिन पढ़ते पढ़ते आँखें डबडबा आई। पूरा भी नहीं पढ़ सका हूँ। आप लिख कैसे पाए?
    ….अपने आप पर झल्ला रहा हूँ। इतना कुछ हुआ और उस के बाद भी कुछ और हादसे…. और मैं….

  6. संगीता पुरी

    सबकुछ पहले से मालूम होते हुए भी पूरा वाकया पढते हुए सांसे थम सी गयी थी .. बहुत हिम्‍मत दिखाते हुए आपलोग इस मुसीबत से निकल पाए .. जान बची तो और नुकसान का महत्‍व नहीं रह जाता है .. 2011 आपलोगों के लिए शुभ हो !!

  7. P.N. Subramanian

    हमारे तो रोंगटे खड़े हो गए. आप पर क्या कुछ न बीता होगा, सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है.

  8. भारतीय नागरिक - Indian Citizen

    मैं अपनी सान्त्रो में सीएनजी किट लगवाने की सोच रहा था, अब हिम्मत नहीं हो रही..

  9. इंदु पुरी गोस्वामी

    'जीवन के इस रूप पर भी मैं मुस्कुराए बिना रह ना सका।' ओ जी शेर किसको कहते हैं फिर?
    रंगते खड़े हो गये यूँ तो ये सब पढ़ कर,किन्तु…
    आप और माऊ सुरक्षित रहे …रब की मेहरबानी है.
    दुर्घटना के कुछ देर पहले ही उस दिन मेरी आपसे बात भी हुई थी.थोड़ी देर बाद ही शायद बज़ पर पढते ही………. अरे अभी गुरुप्रीत और माऊ के पोते पोतियों को खेलना है.उनका घोड़ा कौन बनेगा बताइए? टिक टिक घोड़ा…है न?

  10. इंदु पुरी गोस्वामी

    रंगते नही जी रोंगटे खड़े हो गये उस दिन भी और आज भी.

  11. अन्तर सोहिल

    भयावह घटना
    एक सैल्यूट आपको पैर बजाकर कर रहा हूँ जी
    आपसे मिलकर मुझमें भी ऊर्जा और हिम्मत का संचार हो रहा है। दो-चार मुलाकातें और करनी पडेंगी आपसे 🙂

    प्रणाम

  12. Kajal Kumar

    मुझे लगता है कि मैंने इस हादसे का ज़िक्र आपकी पहले की किसी पोस्ट में पढा है…

  13. राज भाटिय़ा

    हे राम… इस का कुछ अंश पहले भी पढा था,लेकिन आज भी पढ कर रोंगटे खडे हो जाते हे, चलिये अब आने वाला समय आप सब के लिये शुभ हो

  14. बी एस पाबला

    From Feed:

    भाई पाबला जी ,यात्रा के इस मार्मिक पड़ाव की सूचना पाकर उस समय जो चिंता हुई थी वह सहज कल्पना के दायरे में थी .आज ऐसा महसूस कर रहा हूँ कि जैसे किसी परम शक्ति ने आप के नेक इरादों और आप के होसले को पुरुस्कृत करने हेतु आप और आप की बेटी को बचाया .यद्यपि यह घटना बहुत दुखद है क्योंकि इसमें धन और माल की हानि के आलावा सपनों ,इरादों ,चाहतों का भी नुक्सान हुआ .बहुत कुछ झुलस गया.

    नए वर्ष का नया प्रभात अपनी नयी किरणों से आप के नए सपनों में सुख और समृद्धि के नए रंग भरे ,यही कामना करता हूँ

    – सुरेश यादव

  15. vinay

    हम तो कामना करतें,अब आने वाला साल सब खुशियां लेकर आये इस प्रकार के हादसे आपके जीवन मे कभी ना हों।

  16. dhiru singh {धीरू सिंह}

    पाबला जी मैने आपसे जीबटता सीखी है . अभी बीच में मै ज्यादा कार नही चलाता था और ड्राइवर पर निर्भर था .आपसे बात होने के बाद मै लगभग रोज़ १०० किमी कार खुद ही चलाता हूं और तब भी चलाई जब पएर मे चोट के कारण डा. ने चलने से भी मना किया था

  17. शरद कोकास

    ( यह टिप्पणी कृपया सभी पाठक अवश्य पढ़ें ) "अस्तव्यस्त पहनावा, पैरों में मामूली स्लीपर, जली हुई बांह, बिगड़ा चेहरा, आंखों में आंसू। पास कुछ नहीं बचा था सिवाय बदन के कपड़ों के। एक स्वभाविक चपलता, चैतन्यता, दम्भ, मुस्कान, चहक गायब थी। तमाम लोगों की बेचारगी जतलाती निगाहें हमारी ओर थीं। जीवन के इस रूप पर भी मैं मुस्कुराए बिना रह ना सका "
    ऐसा वाक्य पाबला जैसा ही कोई लिख सकता है ।
    उस दिन जब पाबला जी को देखने हम लोग उनके घर गये थे तो माँ ने बताया कि ये दोनो जब आटो से उतर कर घर में प्रवेश करने लगे तो इनकी हालत देखकर वे भी नहीं पहचान पाई थीं ।
    और पाबला जी भी खूब … हाथ जला है खाना खाते नही बन रहा है तो माँ से छुपकर खाना खा रहे हैं ताकि वे देखें तो उनको दुख न हो । आज इस पोस्ट को पढ़कर माताजी की याद आ रही है ।
    अब इन चित्रों के बारे मे…
    हम लोग खाते पीते दिखाई दे रहे है ना ? क्या बतायें अवधिया जी का जन्म दिन भी मनाना था ना , सो पाबला जी के हाथ मे दर्द था फिर भी मेरे साथ होटेल गये और मिठाई व समोसे लेकर आये ।
    ( और यह पाबला जी के लिये )
    किसी कवि ने आपके ही लिये लिखा है … आह से उपजा होगा गान ।

  18. ali

    पाबला जी घटना क्रम बहुत ही अफसोसनाक है पर अच्छा ये कि आप और बिटिया सही सलामत हैं ! कार कैमरा जैसी संपत्तियां आती जाती रहती हैं पर जीवन अमोल है !

    आप पर रब की मेहर हमेशा बनी रहे !

  19. सुशील बाकलीवाल

    इतना सब पढने के बाद लगता है कुछ कहने की गुंजाईश ही नहीं है ।
    आपकी परिस्थितिजन्य जिन्दादिली को बारम्बार सलाम…

  20. H P SHARMA

    sabse badee baat ye hai ki aap samay par baahar nikal sake. kisee bhee durghatnaa ka parinam is baat par nirbhar karta hai ki ham kam se kam samay mai kitne badhiya nirnay le paate hai. aap hameshaa in sabmai khare utarte hai. ye to baad mai pata chala ki ye baad kee ghatnaao ke shuruaat bhar hai. bhagwaan aapke is atmbal aur har haal mai vivekpoorn nirnay ko hameshaa aapke saath rakhe yahee aslee poonjee hai.

  21. H P SHARMA

    mei aapkee jeevatataa ko pranaam kartaa hoo

  22. वन्दना

    आपकी अति उत्तम रचना कल के साप्ताहिक चर्चा मंच पर सुशोभित हो रही है । कल (27-12-20210) के चर्चा मंच पर आकर अपने विचारों से अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.uchcharan.com

  23. नीरज जाट जी

    बहुत दुखदाई होती हैं इस तरह की घटनायें।

  24. नरेश सिह राठौड़

    इस मुसीबत के समय भी जो मुस्कुरादे वो ही तो सरदार है | सरदार किसी पगड़ी धारी को ही नही कहते है जिगर भी होना चाहिए | आपके इस जिगर को सलाम | भगवान आपकी कुशलता को बनाए रखे |

  25. मीनाक्षी

    इस पोस्ट को बिना रुके पढ़ गए…. बस मुँह से निकला..जान बची सो लाखों पाए ….

  26. जब भी याद आती है हादसे की रोंगटे खड़े हो जाते हैं

  27. आदरणीय श्री पाबला जी,
    वैन मेरी पसंदीदा गाडियो में से एक हैं ,एक बार ऐसा हादसा होते होते हुए बचा था |मेरे पिता ड्राइव कर रहे थे ,माँ पीछे बैठी थी और मैं पीछे पीछे अपनी मोटर साईकिल से चल रहा था ,मैंने देखा की नीचे से पेट्रोल रिस रहा हैं ,तुरंत पापा कों ओवरटेक कर रोका ,और नीचे देखा तो साईलेंसर पर पेट्रोल गिर रहा था |गैस से चलने वाली गाड़ी ,पता नही पापा कों क्या सुझा की पेट्रोल भरा लिए थे उस दिन |माँ इतना डर गयी की अगले ही दिन डीजल कार खरीद ली |
    आप इतने हिम्मती हैं ,बहुत मजबूत हैं |कई वर्षों से आपको पढ़ रहा हूँ |इतनी लंबी यात्राये ,तमाम प्रकार की चुनौतिया इतनी जिंदादिली !सैल्यूट हैं आपको |आप हमेशा सुरक्षित ,खुश और स्वस्थ्य रहें और आपके आशीर्वाद और स्नेह की छत्र-छाया में हम सब हमेशा बने रहे |
    टिप्पणीकर्ता डॉ अजय कुमार ने हाल ही में लिखा है: allahabad/इलाहाबादनामा -३ {इलाहाबादी भाषा में}My Profile

  28. Shiv Kumar Dewangan

    जाको राखे साइयां-मार सके न कोय;
    ऐसे हादसों से बचकर आना सचमुच एक चमत्कार को बात है.

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