हंपी: पत्थरों के शहर में ब्लॉगरों ने दी दस्तक

हंपी जाने का आईडिया ललित शर्मा जी ने तब दिया था जब हम अपनी कार से भिलाई से बैंगलोर जाते नागपुर पार कर चुके थे.

पिछले संस्मरण में मैंने बताया कि किस तरह योजना बदल कर हमने बैंगलोर से हंपी होते हुए लेपाक्षी मंदिर देख वापस बैंगलोर आने का इरादा किया और एक व्यवहारिक अड़चन को देखते हुए जा पहुंचे विवेक रस्तोगी जी के घर.

स्वभावानुसार 10 मार्च की उस सुबह भी मैं 4 बजे ही उठ गया. खटपट सुन ललित जी भी जाग गए. चाय तो हमने पी ली लेकिन भाभी जी के परांठों के आग्रह पर ना में सर हिला दिया.

अपनी कन्या नेविगेटर को निर्देशित कर, अँधेरा छटने के पहले ही हम रवाना हो गए हंपी की ओर.

अभी हम वाइटफील्ड मेन  रोड भी नहीं पहुंचे थे कि विवेक जी की कॉल आ गई कि कुछ सामान छूट गया है! मैंने हँसते हुए कह दिया कि अगली बार आयेंगे तो ले लेंगे.

तेजी से भागती मारुति ईको जब एच एम टी रोड पर नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ डिजाईन के पास बैंगलोर से निकलते, एशियन हाईवे 47 पर मुड़ी तो सामने ही दिखी एक मेट्रो ट्रेन जैसी चीज!

हंपी जाते दिखा मेट्रो मार्ग

हंपी जाते दिखा मेट्रो स्टेशन

हम दोनों ही हैरान हुए यह देख कि वह सच्ची ही मेट्रो थी. कभी ऐसी चर्चा ही नहीं हुई कहीं कि बैंगलोर में कोई मेट्रो रेल सेवा चल रही.

बाद में पता चल कि 30 स्टेशन और 32 किलोमीटर में चलती, बैंगलोर में नम्मा मेट्रो कहलाती, यह सेवा 2011 में शुरू हुई है और अगला चरण 2022 तक पूरा करने की योजना है.

हंपी जाते दिखी मेट्रो

उस बैंगलोर – मुंबई हाईवे को छोड़ जब हम एक स्टेट हाईवे पर मुड़े तो भूख लग आई.

तुमकर पहंचने के पहले सड़क किनारे कई स्टाल दिखे जहाँ लोग खा-पी रहे. जब मैंने नाश्ते के लिए गाड़ी रोकी तब सुबह के 7:40 हो रहे थे.

हंपी की ओर

सड़क किनारे बने उस बड़े  से झोपड़े में  इडली, डोसा बनता तो दिख रहा था, लेकिन और भी न जाने कौन से स्थानीय व्यंजन भी थे.

मैंने शंकित होते केवल इडली का आदेश दिया. थोड़ी ही देर बाद खांचे वाली प्लेटों में पतला सा पॉलिथीन बिछा कर उसमें एक बहुत बड़ी सी इडली, मिर्च हंपी जाते नाश्तापकौड़ों के साथ पकड़ा दी गई . स्वादिष्ट सांबर और चटनी ने उस एक और ‘इडले’ की भूख जगा दी हमें.

भरपेट नाश्ते के साथ शानदार चाय के बाद हम रवाना हो गए  चित्रदुर्ग की ओर जाते हाईवे पर.

एक टोल हमने कौन सा पार किया अब याद नहीं. लेकिन सुबह 8:30 तुमकुर रोड पर 17 रूपए वाले टोल के बाद 9 बजे करजीवनहल्ली पर जो टोल मिला वहां 70  रुपए देने पड़े.

फिर एक टोल पर 17 रुपए दे कर सुबह पौने दस बजे गुइलालू टोल पर 55 रुपए दिए गए.

हम्पी जाने के लिए, चित्रदुर्ग शहर से हम उस बैगलोर – मुंबई वाले एशियन हाईवे 47 को छोड़ कर होसपेट जाते हाईवे पर हो लिए.

शानदार सड़क के दोनों तरफ पहले तो नारियल पेड़ों की बहुलता वाली खूब हरियाली मिली. लेकिन होसपेट की ओर बढ़ते धीरे धीरे सब गायब होते गया.

काँटों भरी झाड़ियों से गुजरते हाईवे से एक जगह तो चट्टानों से भरे पहाड़ पर इकलौता पेड़ ही दिखा. खेती कहीं कहीं ही होती दिख रही थी.

बीच राह में हमें सैकड़ों ऐसे ट्रेलर मिलते रहे जिनमें पवन चक्कियों का एक एक पंख लदा  हुआ था. उसकी भयावह लम्बाई को देख मैं यही कल्पना करता रहा कि तीन पंखों वाली एक पवन चक्की को असेंबल कैसे किया जाता होगा!

हंपी जाते

हंपी के पहले

हंपी से पहले

कनाम्दुगु, अमलापुर, कुद्लिगी , मरमन्हल्ली होते हम जा पहुंचे होसपेट के पहले एक पुल चढ़ने. अचानक ही मुझे दिखा एक विशाल क्षेत्र में फैला जलाशय. जब तक कुछ समझ आता गाड़ी पुल पर जा पहुँची थी. रिवर्स कर एक ऐसी जगह वापस ला रोकी अपनी मारुति ईको जिससे उस जलाशय की एकाध फोटो ली जा सके. वह था तुंगभद्र जलाशय.

आगे बढ़ते ही अप्रत्याशित रूप से उस हाईवे पर पहाड़ों के बीच सुरंग मिली. जिसे पार करते ही मिले जलेबी सरीखे ओवर ब्रिज.

इन्ही ओवरब्रिजेस पर घूमते हुए दाहिनी तरफ वाली सड़क का इशारा मिला हंपी जाने का. शानदार दृश्यों से घिरी घुमावदार सड़क पर भागती हमारी गाडी ने जब होसपेट को बायपास से पार किया तो हंपी महज 10 किलोमीटर दूर रह गय

आराम से अपनी स्मार्ट कार चलाते हम अब तक करीब 8 घंटों में बैंगलोर से 350 किलोमीटर चल चुके थे.

जल्द ही हरियाली दिखने लगी. आँखें तलाश रही थी ऐसी कोई चीज जिससे लगे कि हंपी आ गया! और फिर दिखी पत्थरों, चट्टानों से बनी एक संरचना.


हंपी में प्रवेश

मैंने गाड़ी किनारे लगाई. दोनों उतरे. आसपास का जायजा लिया. वहां काम कर रहा बंदा खास कुछ ना बता पाया टूटी फूटी हिंदी में.

तब तक सड़क किनारे एक बोर्ड दिखा . अंदर जा देखते कोई बागीचा लगा. बीचोंबीच बने कुएं को केंद्र बना चारों ओर किसी महल को इस अ तरह का आकर दिया गया है जिससे अपने अपने कक्ष में बैठे व्यक्ति को कुएं का पानी  दिखता रहे.

ललित जी ने वहां कार्यरत लोगों से पता किया कि पुरातत्व विभाग का ऑफिस कहाँ है? बताया गया कि आगे कमलापुर में अंबेडकर  चौक पडेगा वहीँ है वो ऑफिस.

मैंने गाडी आगे बढ़ाई तो हरे भरे वातावरण से घिरी सड़क ने हमें हंपी का मनोरम दृश्य दिखाया.

हंपी की राह
हंपी की हरयाली
हंपी का ऑफिस

करीब 8 किलोमीटर बाद हमें दिखा बाबा साहेब अम्बेडकर की मूर्ति वाला चौक. और जब तक वहां पहुँचते, उससे पहले ही दाहिनी ओर पुरातत्व विभाग का हंपी का भोजन दिख गया बोर्ड.

ललित जी ने पहले ही डिप्टी सुपरिंटेंडिंग आर्कियोलॉजिस्ट श्री प्रकाश से बात की थी लेकिन वह उस समय भोजनावकाश पर थे. भूख हमें भी लग आई थी. वहां के स्टाफ ने हमें सुझाव दिया कि सामने अंबेडकर चौक के पास दो तीन ‘होटल’ हैं जहाँ भोजन किया जा सकता है.

चंद कदमों की दूरी पर वह ‘होटल’ मिला जहाँ हमने स्वादिष्ट भोजन का आनंद उठाया. दो लोगों के भोजन के लिए भुगतान  किया गया महज 120 रूपये का. वहां के चंचल चपल एक युवक से फोटो भी खिंचवा ली.

तीन बजे के आसपास हम जा पहुंचे पुरातत्व विभाग के ऑफिस. कहीं जा रहे प्रकाश जी से बाहर ही बातचीत हो गई. उन्होंने एक युवक को निर्देशित किया कि वह हमें हम्पी ‘घुमा’ दे.

गाडी हमारी तैयार ही थी. झटपट हमने उस युवक को बिठाया और चल पड़े उस अनजान, पत्थरों के शहर हंपी की रोमांचक यात्रा पर.

आखिर क्या होगा वहाँ ?

हंपी: पत्थरों के शहर में ब्लॉगरों ने दी दस्तक
5 (100%) 3 votes
Print Friendly, PDF & Email

Related posts

10 Thoughts to “हंपी: पत्थरों के शहर में ब्लॉगरों ने दी दस्तक”

  1. कमाल की जगह लगी हमें हाम्पी. जिसे भी इतिहास में रूचि है उसके लिए तो वहां एक हफ्ता भी कम लगता है. उधर सड़कें भी अब अच्छी बन रही हैं.
    बस घूमते रहिये और हमें भी घुमाते रहिये.

  2. हंपी की रोचक प्रस्तुति बहुत अच्छी लगी .
    आपको जन्मदिन की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं!

  3. पाबला जी बहुत अच्छा लगा सारी जानकारी को जानकार |आपका प्रत्येक लेख Important होता है|

    भारत मे पहली बार Ethical Hacking Guide in Hindi Part 1 ko अपनी भाषा Hindi मे Realease होने जा रही है जिसमे Hindi के कठिन Word को English मे ही रखा गया है |यह Book को तीन Parts मे उपलब्ध किया जाएगा|20 September 2016 को Book का First Part PDF और Hard Copy मे उपलब्ध होगा |यह Book इतनी सरल भाषा मे लिखी गई है इसे Zero Level से Expert Level तक पढ़ सकते है|

    विशेष जानकारी के लिए Contact करे pareshdas692@gmail.com AND

    Pareshtech.blogspot.com

  4. Bahut badhiyaa yatraa ka Vivran diyaa hai aapne

  5. रोचक प्रस्तुति

  6. एक्सीलेंट post

  7. नवीन कुमार उत्तम

    हम्पी यात्रा का अगला लिंक नहीं मिल रहा।

    1. बी एस पाबला

      Sad
      दरअसल,वह लिखा ही ना जा सका अभी तक

  8. चित्रों के साथ सुन्दर अभिव्यक्ति , आपका अनुकरण तो पूरा ब्लॉग जगत करता है।

  9. बहुत अच्छा लिखा है आपने ! अच्छा लगा !

Leave a Comment


टिप्पणीकर्ता की ताज़ा ब्लॉग पोस्ट दिखाएँ
Enable Google Transliteration.(To type in English, press Ctrl+g)
[+] Zaazu Emoticons