हर डेढ़ साल में, शुक्र ग्रह से पृथ्वी पर जीव आते हैं!

मानव अभी तक बाहरी ग्रहों के कथित प्राणियों के बारे में अपुष्ट कल्पना ही करता रहा है, लेकिन अब यह दावा किया जा रहा है कि लगभग हर डेढ़ साल में शुक्र के जीव हमारी पृथ्वी पर आते हैं। ये हैरतअंगेज दावा किया है एक श्रीलंकाई वैज्ञानिक ने, जिनका कहना है कि हर 580 दिन बाद पृथ्वी, शुक्र और सूर्य एक लाइन में आ जाते हैं और तब उस ग्रह के अति सूक्ष्म जीव पृथ्वी पर आ जाते हैं।

ब्रिटेन की कार्डिफ यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर चंद विक्रमसिंघे का कहना है कि शुक्र के पर्यावरण में भारी संख्या में अति सूक्ष्म जीव हैं। Panspermia सिद्धांत के समर्थक विक्रमसिंघे ने कहा है कि यह रिसर्च उन्होंने अपनी बेटी जानकी के साथ मिलकर की है। इस सिद्धांत के मुताबिक जीवन की शुरुआत अंतरिक्ष की अतल गहराइयों में हुई थी और फिर वहां से धूमकेतुओं पर सवारी करते हुए यहां आ पहुंचा।

इसका एक चित्रण , नीचे दिए गए वीडियो पर देखा जा सकता है




एक सभा को संबोधित करते हुए विक्रमसिंघे ने बताया कि हर 580 दिनों में सूर्य, पृथ्वी और शुक्र एक कतार में आते हैं और तक ये अति सूक्ष्म जीव शुक्र से पृथ्वी पर आ जाते हैं। एक बार में करीब एक से 10 ग्राम बैक्टीरिया पृथ्वी तक पहुंच जाते हैं। उन्होंने कहा, पृथ्वी, शुक्र और मंगल एक-दूसरे से जैविक रूप से जुड़े हुए हैं। पृथ्वी पर मौजूद जीवन किसी न किसी तरह से एक श्रृंखला के रूप में अंतरिक्ष के हिस्सों से जुड़ा है।

आज से कुछ समय पहले तक माना जाता था कि शुक्र और पृथ्वी में काफी समानता है। इतनी कि यहां जीवन के संकेत मिल सकते हैं। लेकिन 1960 के दशक के बाद वैज्ञानिकों को पता चला कि शुक्र और पृथ्वी में जीवन में मामले में कोई समानता नहीं है। शुक्र के ऊपर हमेशा सल्फ्यूरिक अम्ल की बूंदों के बादल छाए रहते हैं।

हालांकि हाल ही में किए गए शोध ने एक और कहानी की ओर इशारा किया। 1970-80 के दशक के आसपास सर फ्रेड हॉयले और चंद विक्रमसिंघे ने दावा किया कि जीवन का संबंध ब्रह्मांड से है। शुरुआत में तो इस पर काफी विवाद हुआ, लेकिन पिछले दो दशकों से हॉयले और विक्रमसिंघे के मॉडल को कई और वैज्ञानिकों और अंतरिक्ष संस्थानों ने स्वीकार किया है।

यहां भारत की बात करें तो, जुलाई 2001 में , केरल के दक्षिणी भाग में लाल रंग की बारिश हुयी थी, जिसने कपड़ों को इतना लाल कर दिया था, जैसे कि खून से रंगे हों! इस घटना का आधिकारिक स्पष्टीकरण दिया गया कि लाल रंग की वर्षा, अरब से आने वाली हवा में धूल से हुयी है। किन्तु महात्मा गांधी विश्वविद्यालय के डॉ. गॉडफ्रे लुई आश्वस्त नहीं थे . उन्होंने सोचा था कि इस लाल वर्षा का कोई-ना-कोई विशेष कारण है।

उन्होंने नमूने एकत्र किये, एक इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप के अंतर्गत उन्होंने देखा कि सब कुछ धूल कण नहीं थे, वे जिंदा थे! लेकिन , क्या इस रहस्यमय जीवन का रूप क्या था? पता लगाने के लिए केवल एक ही तरीका है, डीएनए। लेकिन परिणामों से पता चला कि उसका कोई डी
एनए ही नहीं है! यह जीवन के रूप में था लेकिन वैसा नहीं जैसा हम जानते हैं। पृथ्वी पर जीवन डीएनए पर निर्भर करता है। किसी एक में या किसी अन्य तरीके से , डीएनए में सभी आनुवंशिक जानकारी होती हैं। यदि वर्षा वाली लाल कोशिकाओं का डीएनए नहीं था तो यह केवल एक ही बात सामने आती है, डॉ. गॉडफ्रे के अनुसार, वे बाह्य अंतरिक्ष से आए थे!

अगर आप Panspermia सिद्धांत के बारे में अधिक जानकारी चाहिए तो यहाँ देखिये या फिर यहाँ। इस सिद्धांत पर’नासा’ की वेबसाईट भी देख ही लें। फिर भी मन न भरे तो बाह्य अंतरिक्ष में जीवन के लिए समिति में दस्तक दें।

यह बहस तो चलती ही रहेगी कि, क्या हम सब बाहरी ग्रह के प्राणियों की संतति हैं!?

हर डेढ़ साल में, शुक्र ग्रह से पृथ्वी पर जीव आते हैं!
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6 Thoughts to “हर डेढ़ साल में, शुक्र ग्रह से पृथ्वी पर जीव आते हैं!”

  1. प्रभाकर पाण्डेय

    सुंदर लेख । अच्छी जानकारी ।

  2. Anonymous

    Dear Friend,
    Panspermia has its takers, but I don’t believe in the principal in its absoluteness. Life on Earth is too perfectly evolved to its conditions to be from anywhere else.

    There’s only one true home for humanity, and this our mother Earth. We can travel to space, to other planets, go anywhere, but there will only be one place where we will feel at home, and that’s Earth.

  3. दिनेशराय द्विवेदी

    विज्ञान नए नए रहस्य खोलता रहता है, बाद में उन में से अनेक भ्रम भी निकलते हैं।

  4. अंकुर गुप्ता

    बहुत अच्छी जानकारी दी आपने.

  5. राज भाटिय़ा

    दिनेशराय जी की बात से सहमत हे.

  6. चंद्रभूषण

    एनोनिमस की राय से पूर्ण सहमति, हालांकि इसे डॉक्ट्रिन की तरह लेना उचित नहीं है। पैनस्पर्मिया कोई सिद्धांत नहीं, सिर्फ एक परिकल्पना है, जिसकी पुष्टि की ओर संकेत करता एक भी तथ्य अभी तक पाया नहीं जा सका है। धरती पर डीएनए से इतर जीवन आरएनए आधारित वाइरस के रूप में पाया जाता है, जो सिद्धांततः अंतरिक्षीय स्थितियों में भी अपना ढांचा बनाए रख सकते हैं। यह एक खिड़की है, जो पैनस्पर्मिया के लिए लंबे समय तक गुंजाइश बनाए रखेगी।

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