टॉफियों का कारोबार और नाना के घर में लगे हैंडपंप की याद

जैसा कि मैं बता चुका हूँ कि दुर्ग से चली हमारी 8030 एक्सप्रेस ट्रेन 10 जनवरी की सुबह 5 बजे ट्रेन, लोकमान्य तिलक टर्मिनस पहुँची। खारघर के लिए टैक्सी ली गयी। ड्राईवर भी पंजाबीभाषी निकला। सुना तो था कि मारूति की कारें चलना शुरू हो गयीं हैं टैक्सी के रूप में, लेकिन तात्कालिक तौर पर मुझे वहाँ, वही प्रीमियर कारें ही दिखीं। ड्राईवर की चुस्ती-फुर्ती और सेवा-भाव की माताजी ने बाद में तारीफ भी की।

घर की भौगोलिक स्थिति विकिमैपिया पर देख चुका था, लेकिन अंधेरे में कुछ समझ नहीं आया।

मुम्बई में सुबह ही सुबह एक अनुभव हुया कि वहाँ, दिन की रोशनी आने में लगभग आधे घंटे का अन्तर आ जाता है और अँधेरा छाने में भी इतना ही अन्तर दिखता है।

पहला काम तो गुरुग्रंथ साहिब के सामने माथा टेकने का किया गया। फिर शुरू हुया माहौल पारिवारिक परिचय का। कई सदस्यों से तो मैं ख़ुद पहली बार मिल रहा था। मामा का रौब और मामी की सक्रियता अभी भी वैसी ही पायी, जैसी देखता आया हूँ।

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Harry

उनके जिस पोते की लोहडी के अवसर पर हम पहुंचे थे, वह तो ऐसे घुला-मिला कि पूछिये मत। थोड़ी देर ही में ही हम उसके ग्राहक बन गए, टॉफियों के! अपनी तुतलाती भाषा में, जेब में हाथ डालते हुए, प्रश्न भरे अंदाज में हमसे टॉफी के बारे में पूछता और हम हाथ फैला देते। यह अलग रहस्य है कि पूरा माल रिसायकल होता रहा!

यात्रा की कथित थकान उतारने के बाद, दोपहर के भोजन के बाद, नशे की तलब लगी! यह नशा था इन्टरनेट का! पता चला कि घर पर MTNL कनेक्शन तो है लेकिन फिलहाल कंप्यूटर महोदय को कहीं किनारे की जगह पर खिसका दिया गया है। जब तक कंप्यूटर जी को उनके सिंहासन तक पहुंचाया जाता, द्विवेदी जी ने संपर्क किया।

औपचारिक बातों के बाद जब हमने बताया कि रेडियोनामा वाले युनूस जी से मिलने का विचार है, उनसे संपर्क भी किया गया था, ई-मेल द्वारा। तो उन्होंने जानकारी दी कि अनिता कुमार जी भी वहीं पास ही में रहती हैं। (यह तो बाद में पता लगा कि यह ‘पास’ , कोपरखेरना कितना दूर है, जहाँ तक जाने के लिए एक घंटे से भी अधिक का समय लगता!) घर में जब भी कोई पूछता, एकाएक याद ही नहीं आता। मैं यही कहता, कोपेनहैगन जाना है!

द्विवेदी जी की कॉल ख़त्म हुए बमुश्किल पाँच मिनट हुए होंगे कि एक और कॉल आई। नंबर दिखा, नाम नहीं। सोचा रिजेक्ट कर दूँ, रोमिंग में अनजान नम्बर को क्यों रिसीव करुँ? पता नहीं क्या सोचकर कॉल रिसीव की तो सामने से एक रौबीली, आत्मविश्वास से भरी, खनकती आवाज में प्रश्न पूछा गया ‘पाबला जी बोल रहे हैं?’

मैं थोड़ा कुनमुनाया कि कौन है यह? मेरे हामी भरते ही जोश भरी आवाज ने परिचय दिया ‘नमस्कार, मैं अनिता कुमार बोल रही हूँ।’ मैं सकपका गया। अपने आप को संभालते हुए, शब्दों को ठीक करते हुए जब बातें शुरू हुई तो उसका अंत अनिता जी के द्वारा, अगले दिन के दोपहर-भोजन आमंत्रण से हुया। मैंने विनम्रता से उन्हें बताया कि 11 जनवरी का दिन तो पारिवारिक-धार्मिक क्रियाकलापों में ही गुजर जायेगा। कोई गुंजाईश है नहीं बचती, अन्य कार्यों की। तय किया गया कि आने वाले एक दिन लंच साथ-साथ लिया जाए।

जब कंप्यूटर जी का साथ मिला तो द्विवेदी जी को ऑनलाइन पाया। उनसे चैट चल ही रही थी कि युनूस जी अवतरित हुए। मुलाक़ात का समय तय करते हुए मैंने, अनिता जी के आमंत्रण के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि ‘विविध भारती के एक रेडियो कार्यक्रम में, अनीता जी को उनके पति सहित बुलवाया गया था। क्‍या सेन्‍स ऑफ ह्यूमर है उनका!’

मेरी उत्सुकता और बढ़ गई अनिता जी से रूबरू होने की। युनूस जी से बातचीत में तय किया गया कि 12 जनवरी की दोपहर विविध भारती स्टूडियो में मिला जाए।

इधर जब द्विवेदी जी को इस संभावित मुलाक़ात के बारे में सूचित किया गया तो उन्होंने भी सूचित किया ‘मैंने 27 का भोपाल से और 30 का दुर्ग से टिकट करवा लिया है।’

रात्रि-भोजन पर पारिवारिक सदस्यों के साथ कई पुरानी यादें ताजा की गयीं। गाँव के माहौल की बातें करते करते कई बार भावुकता से गला भी भर आता था। नाना के उस तोड़े जा चुके घर के आँगन के हैंडपंप की याद तो सभी को थी, जिससे ठण्ड के दिनों में पर्याप्त गरम और गरमी के दिनों में बर्फीला पानी निकलता था।

मुझे याद है जनवरी के दिनों में, दोपहर की गुनगुनी धूप का आनंद लेते हुए छत पर, मक्के की रोटी का सरसों के साग और भारी भरकम गिलासों में नमकीन लस्सी के साथ स्वाद लेते हुए, जब कभी, पानी के गिलास छोड़ आते थे तो दूसरे दिन उनमें बर्फ तो जमी हुयी मिलती ही थी। साथ-साथ नानी की प्यार भरी डांट भी मिलती थी।

अगला दिन, अगली पोस्ट में

टॉफियों का कारोबार और नाना के घर में लगे हैंडपंप की याद
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9 Thoughts to “टॉफियों का कारोबार और नाना के घर में लगे हैंडपंप की याद”

  1. बच्चे की टोफ्फी को रिसाइकल करने में बड़ा मजा आता है. तो आप ने मुंबई प्रवास का पूरा लाभ लिया ब्लॉग मित्रों से मिलकर. कोपरखैरने का रास्ता सुंदर लगा होगा. आभार.

  2. अगली पोस्ट का इंतज़ार रहेगा पाब्ला जी।

  3. ऐसी पारिवारिक ऊष्‍मा अब लेखन में ही बची रह गई है। बहुत अच्‍छा लगा यह सब पढकर।
    अगले अंक की प्रीतक्षा रहेगी।

  4. बहुत सुंदर लगा आप का यात्रा विवरण,मजा आ गया, चलिये अब मित्रो से मिले ओर फ़िर बताये, अरे हां उस से पहले तो लोहडी भी तो मनानी है.
    आप की अगली पोस्ट का इन्तजार… ऊडीका…
    धन्यवाद

  5. मुम्बई यात्रा तो बहुत सफल रही होगी इतने लोगों से मिल जो पाये आप ।

    अगले दिन की अगली पोस्ट का इंतजार रहेगा ।

  6. बलविंदर जी…बोत वड्डी गलती हो गायी…तुवाडे आन दा पता ही नहीं चल्या ना ही अनीता जी ने सानू दस्या की तुसी आए होवे हो…खोपोली तों खारघर दा रास्ता मुश्किल नाल वी मिनट दा वे…असी आ जन सी तुवाणु मिलन लयी….गलती हो गायी जी बोत वड्डी गलती…अगली वारी तुसी जदों वीं आओ सानू जरूर फोन करो असी दौडे चले आवांगे…नंबर नोट कर लवो…साडा…9860211911
    नीरज

  7. हिन्दी ब्लोग जगत का परिवार और हमारे सभी के अपने रीश्तेदार और परिवार फैल कर मानोँ एक हो रहे हैँ इसे पढकर बहुत खुशी हुई और तस्वीर मेँ जो मुन्ना है, बडा प्यारा और मासूम है उसे मेरे आशिष
    बधाई हो जी सारे साथिओँ को …
    – लावण्या

  8. भई, हमें तो यह मुन्ना बहुत प्यारा लगा। इनके साथ तो हम अपने आप को रिसाइकल कर रहे हैं!

  9. बिटवा अभी से बिजिनेस के गुर सीख रहा है…हा हा…बहुत प्यारा बच्चा है। यूनुस जी से शिकायत करनी पड़ेगी, कोपेनहैगन को हाईजैक कर लिया वसई और हम देखते ही रह गये, बहुत नाइंसाफ़ी है जी…:) अब सजा ये है कि अगली बार यूनुस भाई को खुद भी साथ में आना पड़ेगा ममता जी के साथ।वैसे पाबला जी कौपरखैरने खारघर से बीस ही मिनिट का रास्ता है, हमसे कहते तो हम मिलने चले आते

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