धुआंधार बारिश, दिमाग का फ्यूज़ और सुनसान सड़कों पर चीखती कन्या को प्रणाम

काठमांडू से लौटते हुए शहडोल, अनूपपुर हो कर भयावह अंधेरी रात में गाड़ी चलाते रीवां से भिलाई पहुँचने का रोमांचक संस्मरण

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खौफनाक राह, घूरती निगाहें, कमबख्त कार और इलाहाबाद की दास्ताँ

सडक मार्ग द्वारा काठमांडू से लौटते हुए इलाहाबाद में बिताये गए कुछ घंटों की दास्ताँ

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सुबह सुबह तोड़-फोड़, माओवादियों से टकराव, जलते टायरों की बदबू और मौत से सामना

काठमांडू से लौटते हुए भारत की सीमा में जब एक रोंगटे खड़े कर देने वाले हादसे में हुआ मौत से सामना

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नेपाल की मुर्गी, उसकी मुस्कान, मेरी नाराज़गी और लाखों का मुआवजा

डेढ हजार किलोमीटर कार चला कर नेपाल की राजधानी पहुंचे भिलाई के बी एस पाबला द्वारा काठमांडू में बिताए एक दिन का दिलचस्प सचित्र संस्मरण

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भैंसा भोजन, खिलखिलाती युवती, पीछा करते युवक और आधी रात का काठमांडू

छत्तीसगढ़ के भिलाई से सड़क मार्ग द्वारा भारत नेपाल सीमा पार कर काठमांडू पहुँचने की रोमांचक दास्ताँ

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काठमांडू जाती कार को नागालैंड वाले खींच ले गए

काठमांडू जाती कार को, उत्तर प्रदेश में, आखिर नागालैंड वाले क्यों खींच ले गये? इस बात का खुलासा करता रोचक यात्रा संस्मरण

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काठमांडू की ओर दही की तलाश में तीन तिलंगे

सड़क मार्ग से काठमांडू की ओर बढ़ते हुए दही की तलाश में भटकते ब्लॉगर्स द्वारा छत्तीसगढ़ सीमा से उत्तरप्रदेश जाने का रोचक संस्मरण

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काठमांडू सफ़र के पहले की दहशत

भिलाई के ब्लॉगर बी एस पाबला द्वारा सड़क मार्ग से काठमांडू की यात्रा प्रारंभ किए जाने के पहले उत्त्पन्न विषम परिस्थितियाँ बताता संस्मरण

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आखिरकार दुनिया के उस इकलौते अद्भुत स्थान जा ही पहुंचे हम

भिलाई के बी एस पाबला द्वारा दुनिया के एक रहस्यमयी स्थान तक की यात्रा का रोचक संस्मरण

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महाराष्ट्र का वह बुद्धिमान रोबोट हमारा मन मोह गया

मई 2013 में सड़क मार्ग से पुणे जाते हुए, हमें अहमदनगर होते हुए जाना था. चचेरा भाई साथ ही था. अहमदनगर से पहले ही हमें ऐसा कुछ नज़ारा दिखा कि वर्षों पहले किसी काम से तौबा किये हुए मन ने आखिरकार वही काम करने का मन बना लिया 😀 एशियन हाईवे पर अपनी मारूती ईको दौड़ाते हम दोनों भाई भिलाई से 625 किलोमीटर दूर नांदेड पहुँच चुके थे जो हमारी इस यात्रा में एक पड़ाव था और सिक्ख धार्मिक स्थल भी. हमारे जीपीएस उपकरण ने संध्या 4 बजे जहाँ गाड़ी…

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1984 – ए रोड स्टोरी

इस बार मई माह में गाँव जाना हुया एकदम अकेले. मार्च में चचेरी बहन के विवाह पर देश-विदेश से इकट्ठा हुए कुनबे वालों की गहमागहमी के बाद, मेरे सबसे छोटे चाचा का घर सुनसान पड़ा था. इधर, हमारे घर का ताला ही तब खुलता है जब भिलाई से कोई पारिवारिक सदस्य वहाँ पहुंचता है. अकेले ही था सो अरसे बाद लुधियाना रेल स्टेशन पर उतर सायकिल रिक्शा, बस, ऑटो-रिक्शा की सवारी करते गाँव पहुंचा तो कई पुरानी बातें याद हो आईं. उन्हीं में से एक है 1984 की यह सड़क…

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