Domino Pizza और बाहर खड़ी वह अत्याधुनिक युवती

नाना के तोड़े जा चुके घर के आँगन का हैंडपंप, जनवरी के दिनों में, दोपहर की गुनगुनी धूप का आनंद लेते हुए छत पर, मक्के की रोटी का सरसों के साग और भारी भरकम गिलासों में नमकीन लस्सी के साथ स्वाद,  नानी की प्यार भरी डांट याद करते हुये रात कब गहरा गयी पता ही नहीं चला।

सुबह उठे तो पारिवारिक सद्स्यों को गहमागहमी में पाया। जब सभी जगह तैयारशुदा इंतजामों का प्रचलन चल पड़ा है, यह तो भई मुँबई था। सब कुछ हाजिर हो जायेगा, सिर्फ आपकी एक फोन कॉल पर, ऐसा दावा किया जाता है। इसके बावज़ूद मामा लगे हुए थे लड्डू वाले को धमकाने में, जो समय पर डिलीवरी नहीं दे पाया था।

अखंड पाठ की समाप्ति के पहले आये श्रद्दालुओं को दिये जाने वाले  नाश्ते के समय भी खानपान की सेवा देने वाला बड़ी मुश्किल से आ पाया था। सब उस पर पिले पड़े थे, यह आश्वासन पाने के लिए कि दोपहर भोजन समय पर शुरू हो पायेगा कि नहीं।


अखंड पाठ की समाप्ति पर की जाने वाली अरदास में श्रद्धाभाव लिए सभी परिजन शामिल थे। ऊपर छत पर किए गये दोपहर भोजन के इंतजाम पर कई दूर के रिश्तेदारों से भी मुलाकात हुयी।
मामी के भाई, सरदार केहर सिंह जो भारतीय नौसेना में रहते हुये 1974 में श्रेष्ठ प्रशासन के लिए राष्ट्रपति पदक से नवाजे गये थे, कतिपय शारीरिक व्याधि के कारण सीढ़ियाँ चढ़ पाने में असमर्थ थे,  उनसे मिलने नीचे ही जाना पड़ा। वे आजकल मुम्बई हॉकी एसोशिएसन के मानद सचिव , वेस्टर्न इंडिया फुटबाल एसोशिएसन के मानद अध्यक्ष, मुम्बई एथलीट एसोशिएसन के अध्यक्ष व नेशनल मास्टर्स एथलीट फेडेरेशन के वरिष्ट उपाध्यक्ष हैं।
मध्य भारत में भिलाई जैसी जगह की बनिस्बत, मुम्बई में इन दिनों का मौसम कुछ ज्यादा ही गरम महसूस हो रहा था। भोजनोपरांत, बच्चों ने कार्यक्रम बनाया शाम का। सबने अपने-अपने प्रोग्राम में हमें शामिल करने की ठान ली थी।
बड़ी दुविधापूर्ण स्थिति थी। इतनी गर्मजोशी से भरे अनुरोधों के बीच कैसे किसी को नाराज किया जा सकता था। समझौतों के दौर चले। अगली बार के वादे किए गये। थकान थी, इसलिए पास ही के एक फव्वारेनुमा चौक तक जाने की सोची गयी। ढलते अंधेरे के बीच टहलते हुए, आँखों ही आँखों में अट्टालिकायों की ऊँचाई नापने की कोशिश के बीच जब गंतव्य तक पहुँचे तो पता चला कि आज फव्वारा बंद हैं। हर शहर की माफिक, वहीं लगे अस्थायी खान-पान के स्टालों को भी उपकृत किया गया। वहीं पास ही के एक कथित मॉल की भी सैर की गयी। कीमतों के मामले में यह मंहगा ही लगा।
मॉल जैसी जगहों पर जा कर मुझे पहले के डिपार्टमेंटल स्टोर याद आते हैं। ऐसा पहला स्टोर मैंने अपने कॉलेज के दिनों में, रायपुर में मालवीय रोड पर प्रेम स्टोर्स का देखा था। वह आज भी है, देखता हूँ, लेकिन जा नहीं पाता। पता नहीं आजकल कैसी व्यवस्था है। यह मॉल, बस बड़े से डिपार्टमेंटल स्टोर ही हैं।
वहीं दिखा Domino pizaa। एक मशहूर ब्रांड और बिटिया की  इच्छा को देखते हुए दाखिल हुए। ऐसा मजमा लगा दिखा, जैसे बस आज ही के लिए है यह नायाब खजाना। काऊँटर कन्या ने  पूछा ‘वट डू यू वांट, सर?’ साथ का बच्चा बोल पड़ा ‘वन लार्ज एंड वन कोक। कितना टाईम लगेगा?’ काऊँटर कन्या ने कम्प्यूटर स्क्रीन के अंदर झांकते हुए कहा ‘हार्डली 23 मिन्स’।
समय से पहले ही आवाज लगायी गयी।  सजावटी, गरम, सॉस के साथ पिज़्ज़ा बढ़िया लग रहा था। पिज़्ज़ा भक्षण के साथ-साथ आसपास भी नज़र दौड़ा रहा था। नज़र गयी, काँच से बाहर, कॉरीडोर में। एक बेहद आकर्षक युवती, अत्याधुनिक पोशाक में (कहें तो अल्ट्रा मॉडर्न आऊटफिट) दिखी। नज़रें बार-बार वहीं घूम जाती थीं। अचानक ही उस युवती ने, किसी फिल्म में गंदी बस्ती के चरित्र को जीती, शबाना आजमी के अंदाज में, सिर खुजाना शुरू किया और पलक झपकते ही (शायद) एक जूँ निकाल कर अपने तराशे नाखूनों से उसका काम तमाम कर दिया! मेरी हँसी फूट पड़ी।
एक तो आवाज भारी, उस पर उन्मुक्त हँसी। बिटिया ने नाराजगी भरे स्वर में पूछा ‘क्या हुया?’ मैंने पूरा किस्सा उसे लौटते हुए ही बताया। लौटते हुए ही, बेटे के एक क्लाइंट, सरदार हरजीत सिंह से भी अगले दिन, बांद्रा में मिलने का समय ले किया। बिटिया ने Domino Pizza पर प्रतिक्रिया दी ‘इससे अच्छा तो (आकाशगंगा, सुपेला में स्थित) हमारे अभिनन्दन रेस्टारेंट  में मिलता है!
रविवार था, शायद इसलिए ज्यादा चहल-पहल नहीं दिखी सड़कों पर, लौटते वक्त।
अगली पोस्ट में युनूस जी से मुलाकात।
Domino Pizza और बाहर खड़ी वह अत्याधुनिक युवती
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8 Thoughts to “Domino Pizza और बाहर खड़ी वह अत्याधुनिक युवती”

  1. नाना और दादा के घर की तो बात ही कुछ और होती है। आप की पोस्ट ने हमें भी हमारा बचपन याद दिला दिया। ऐसा ही एक हैंडपम्प हमारे दादा के घर था

  2. आपने अपना anubhaw बहुत suder dang से prstut किया है …badhaaee….शब्द से मन paviter हो गया है…..changa जी

  3. यू ट्युब देख कर बहुत अच्छा लगा।

  4. पाब्ला जी वो सब तो ठीक है मगर आप उस अल्ट्रा माड लड़की की हर हरकत पर क्यों नज़र रखे हुए थे? अच्छा लिखा आपने।

  5. आधुनिकता में बड़ा कचरा है। उस कचरे में बहुत कुछ छिपा होता है – जूं तो जरा सी चीज है! 🙂

  6. बड़े दिलचस्प अंदाज मे लिख रहे है आप ।

  7. डोमिनो पिज्जा…फव्वारे वाला सर्कल….ये कभी हमारे शाम गुजारने के अड्डे हुआ करते थे…जूं मारती लड़की कभी दिखाई नहीं दी….आधुनिकता के पीछे कितनी गन्दगी है इसका जीता जागता उधाहरण दिया है आपने…पंजाबी में कहावत है ” अन्नी शुकिनी ते बोजे विच गाजरां…”
    नीरज

  8. बढि़या लगा आपका संस्‍मरण

    आपके ब्‍लॉग पर आना अच्‍छा लगा…साथ ही साइडबार में अपने ब्‍लॉग का लिंक देखना भी…धन्‍यवाद

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