बैंगलोर यात्रा: एक दिन पहले

बैंगलोर

दो ब्लॉगरों द्वारा अपनी स्मार्ट कार के सहारे सड़क से की गई भिलाई बैंगलोर यात्रा की योजना कैसे बनी, तैयारी में क्या कुछ हुया, पढ़िए इस लेख में

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नाक कान गले के डॉक्टर ने किया मेरे दांतों का इलाज़ !

अगर नाक कान गले का डॉक्टर दांतों का इलाज़ कर दे तो हैरानी होगी ही. पढ़िए यह दिलचस्प किस्सा

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जब हाथी के नीचे आते बचे हम

क्या यह संभव है कि कोई हाथी सड़क पर हो और स्कूटर चलाते कोई निकल जाए उसके नीचे से? पढ़िए दिलचस्प किस्सा

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बजाज स्कूटर ने सारा नशा उतार दिया!

आखिर एक एक्सपर्ट ने मामूली से बजाज स्कूटर में ऐसा क्या देखा कि उसका सारा नशा ही उतर गया!

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पंजाब से भिलाई की वो राह जिस पर दुबारा नहीं जाना मैंने!

सड़क मार्ग द्वारा पंजाब से भिलाई तक की कार से हुई ऐसी यात्रा जिसकी राहों पर दुबारा जानबूझ कर नहीं जाना मैंने

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उड़ती चिड़िया के पर नहीं, उड़ते विमान गिनिए

उड़ते विमान की जानकारियों से भरी वेबसाइट का विवरण देखिये यहाँ

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मैं कैसे उसे जानवर कह देता?

हमारी बिटिया ने अपने बचपन में मुझसे एक दिन जिज्ञासा प्रकट की कि ‘दुनिया में सबसे खतरनाक, बददिमाग जानवर कौन सा है?’ मेरे मुँह से बेसाख्ता निकल पड़ा ‘आदमी!इंसान!’ वह हैरान सी फिर पूछ बैठी कि ‘वो कैसे?’ तब तक मैं संभल चुका था और बात को टालने की कोशिश की कि जब बड़े हो जायोगे तो खुद ही समझ आ जाएगा यह सब। बहुत सी बातों के साथ-साथ एक किस्सा उसके साथ भी गुजरा इसी की याद आ गई अचानक। 2009 के किसी दिन मैं बिटिया को उसके कॉलेज…

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जनमदिन के मौके पर हुई दो ब्लॉगरों से पहली मुलाक़ात

इस बार जनमदिन पर पोस्ट लिखना टलते चला आ रहा था क्योंकि सभी वेबसाईट्स के सर्वर बदले जा रहे थे और बिंदास तरीके से लिखने का समय ही नहीं मिला। सर्वर संबंधित काम तो खतम हो गया लेकिन कई छोटी छोटी बातें अभी भी तनाव बढ़ा रहीं। इस बार मन कुछ उदास सा था जनमदिन के मौके पर, जैसा कि मैंने बताया था पिछली बार। इस उदासी को तोड़ा शुभचिंतकों ने, जब 20 सितंबर से ही उनकी बधाईयाँ एसएमएस व मोबाईल द्वारा मिलनी शुरू हुईं। ठीक आधी रात को सुपुत्र…

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आधी सदी का सफ़र और एक नई शुरूआत

आज 21 सितंबर को, इस धरा पर मानव जीवन का सफ़र तय करते पाश्चात्य गणना पद्धति के हिसाब से आधी सदी का वक्त बीत गया। इस मौके पर कल रात माँ बहुत याद आई। सिर्फ़ कल्पना ही कर पाया कि वह कैसे बलैंय्या लेती अपने इस बच्चे की। इससे पहले मन कुछ और उदास होता, दादी की डाँट सुन मुस्कुराते हुए फिर चल पड़ा अपने कर्मपथ पर। दादी 1987 में ही दुनिया छोड़ गई थी लेकिन आज भी मेरे सामने अपनी प्यार भरी डाँट के साथ तब हाजिर होती है…

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शिरड़ी वाले साईं बाबा के दर से लौटा मैं एक सवाली

शिरड़ी वाले साईं बाबा के मंदिर की व्यवस्था पर केंद्रित महाराष्ट्र यात्रा संस्मरण

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