अकेले अकेले एक रविवार यादों के साथ

रंगों के पर्व होली के बाद उस दिन मन उदास कुछ ज़्यादा ही था. कई दिनों से एक अजीब सी हूक बार बार उठ रही थी उन जानी पहचानी राहों जगहों के लिए जहाँ अपने होश संभालने से ले कर हालिया दिनों तक सैकड़ों बार आना जाना हुआ करता था. बार बार घर में कहता कि मैं अब जा रहा हूँ, कल जाऊँगा, अगले हफ्ते जाऊँगा. लेकिन हर बार कुछ ऐसा हो जाता कि सारे मंसूबे धरे रह जाते.

[singlepic id=1 w=320 h=240 float=left]इस बार तो रूका ना गया. ज़हन में रह रह कर सुर्ख लाल, चटकदार पीले फूलों से लदे पेड़ घूमते रहते. मौसम निकल चुका है अत: उस मार्ग पर पड़ने वाले गाँव के निवासी अपने ड्राईवर» को पूछा कि आजकल वे फूल खिले दिखते हैं कि नहीं? ज़वाब मिला कि ‘इधर’ तो कम हैं बालोद के जंगलों में संभवत: मिल जायेंगे बहुत सारे. आखिर एक दिन ठान लिया कि अगली सुबह चल पड़ना है उस छोटे से शहर की और जहाँ मेरा जनम हुआ था.

बस, फिर क्या था! अलसुबह उठा, नहाया, हल्का नाश्ता किया और मोटरसायकिल में किक मार भाग खडा हुआ भिलाई के बाहर जाती सड़क पर. बाहर निकलते ही दिखा यह पेड़ जो शायद अमलतास का है (पेड़ों, पौधों की पहचान तुरंत फुरत नहीं कर पाता भई)

ज़रा सा आगे और बढ़ा ही था कि ऊधम मचाते रामभक्तों ने मानो यह तय कर रखा हो कि इस मानव को ram-bhaktतो आगे नहीं जाने देना है. हमने भी कुछ अनुनय विनय करने की बजाए अपने कैमरे को ही काम पर लगा दिया.

राह के नजारों को जी भर कर देखने की नीयत से मोटरसायकिल की गति मैंने 40 -45 किलोमीटर की ही रखी हुई थी. तभी दिखी पहली छटा सुर्ख फूलों की. हमने टिकाया अपने कैमरे को बाईक की सीट पर और खुद चहलकदमी सी करते निकल लिए उसके सामने से

भिलाई गुंडरदेही मार्ग पर चहलकदमी

भिलाई से दल्ली राजहरा की और जाते हुए दो मुख्य पड़ाव पड़ते हैं. 60 किलोमीटर दूर गुंडरदेही, 60 किलोमीटर दूर बालोद. दोनों ही पहले तहसील मुख्यालय थे लेकिन हाल ही में बालोद को जिला मुख्यालय बना दिया गया है.

इसी भिलाई-गुंडरदेही मार्ग पर मुझे दिखे उन फूलों के पेड़ जिन्हें देखने की हसरत लिए निकला था मैं.

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भिलाई गुंडरदेही मार्ग के ठीक मध्य में जिस कस्बे से गुजरा उसका नाम है ‘अण्डा’ जिसका ख्याल आते ही कुछ सोच कर मुस्कुराहट आ जाती है. बात यह है कि हमारे देश में एक ही नाम के कई गाँव है जिनका नाम अकेले लिए जाने पर उसकी भौगोलिक स्थिति का अंदाज़ लगाना बड़ा दूभर होता है कि ये है किस इलाके का. इसलिए उस गाँव के साथ उसके आसपास के किसी बड़े गाँव का नाम जोड़कर बताया जाता है जिससे समझ आ जाए कि किस इलाके की बात की जा रही है. ऐसे ही मुझे ख्याल आता है मध्यप्रदेश के गाँव भुरजी का और मैं सोचता हूँ कि ये अण्डा और भुरजी अगर आसपास बसे होते तो लोग क्या कहते गाँवों का नाम लेते हुए? अण्डा भुरजी?

इस राह से जब भी जाना होता है तो गुंडरदेही में एक विशिष्ट ‘होटल’ में मुंगौड़ों का स्वाद लेना नहीं भूलते तो इस बार नियम कैसे तोड़ देते! सो खोए की जलेबियों के साथ धीरे धीरे उदरस्थ कर गए गर्मागर्म मुंगौड़े!

मौसम गरमी का था. सुबह के साढ़े नौ बज रहे थे. राह की हरियाली को आँखों में भरते हुए खरामा खरामा हम पहुँच गए बालोद के 4 किलोमीटर पहले झलमला. जहाँ से राह मुडती है इस इलाके के महत्वपूर्ण जल आपूर्ति वाले जुड़वां बांधों की ओर

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बचपन से अब तक जितनी बार भी अपने वाहन से आना जाना हुआ है कोशिश रही है कि कुछ पल यहाँ बिता लिए जाएं. मौसम और समय को देखते हुए सारा क्षेत्र सुनसान ही पडा था

हमने भी बाईक खडी की, जूते उतारे और धीरे धीरे पत्थरों पर डगमगाते हुए नीचे पानी की सतह तक उतर गए. कैमरे को आदेश था ही कि भी हमारे भी एक दो पोज़ मारते फोटो ले लो 😀

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शोर मचाती उछली लपकती लहरें एक अजीब सी अनुभूति उत्तपन्न कर रहीं थी. अरसे बाद मैं अकेला ही बैठा था तो ढेर से चिंतन मनन की स्थिति में समय कितना बीता उसका अहसास तब हुआ जब धूप चुभने लगी

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एक सदी पुराने डैम का विवरण

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राजहरा बालोद राजनांदगाँव तिराहा

उसके बाद बढ़ना हुआ दल्ली राजहरा की ओर. पहले कभी ध्यान नहीं गया लेकिन इस बार अकेला था तो दिखा कि किसी ज़माने में घने जंगलों वाला यह वन क्षेत्र तो ठूंठ क्षेत्र में बदल चुका है.

जैसे जैसे बढ़ता गया उदास होता गया. बचपन की कई यादें सताने लगीं इन इलाकों में कभी सायकिल से घूमा करते थे. अब तो वह शहर भी खंडहर होते जा रहा. कौन मिलेगा मुझे वहाँ? बेमतलब ही भावुकता बढ़ेगी!

हालत यहाँ हुई कि शहर के प्रवेश पर बने बेहद पुराने ओवर ब्रिज की रेलिंग पर बैठा तो आगे जाने की हिम्मत ही नहीं की. वहीं बैठे बैठे निहारते रहा लौह अयस्क वाली दूर की पहाड़ियों को जो अपनी ऊँचाई खो कर चौथाई भर रह गई हैं

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एक बार और सोचा फिर बाईक मोड़ कर वापस चल दिया भिलाई की ओर. एक भी नहीं बजा था. सारी राह सूनी मिली. कोई पलाश नहीं, कोई अमलतास नहीं. मन उदास हो गया कि यह वही घने जंगल थे जहाँ से गुजरने में भी डर लगता था

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लौटते हुए एक बार फिर उन जुडवाँ बांधों के निचले हिस्सों में छायादार पेड़ों के बीच हवादार माहौल में हरी हरी घास पर ढेर सारे पक्षियों की तरह तरह की आवाजों के बीच सोए हुए कुछ समय बीता ही था कि अजय झा जी की कॉल से नींद खुली. कुछ ज़रूरी बातों के बाद उन्होंने पूछा कि कहाँ हैं? ऑफिस में या घर में? मैं मुस्कुराते हुए बोला ना घर ना ऑफिस! मैं हूँ सुनसान जंगल में.


 

परिवार वालों के लिए गुंडरदेही से मुंगौड़ों की एक खेप लेते हुए 3 बजते बजते घर पहुँचना हुआ. तो एक अप्रत्याक्षित परिस्थिति मेरी प्रतीक्षा कर रही थी.

यह थी पिछले रविवार की दिनचर्या.
कैसी रही?

अकेले अकेले एक रविवार यादों के साथ
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यह ड्राईवर है कौन? इस बारे में ज़ल्द ही एक दिलचस्प लेख होगा आपके सामनेPowered by Hackadelic Sliding Notes 1.6.5

अकेले अकेले एक रविवार यादों के साथ” पर 14 टिप्पणियाँ

  1. वाह सर ,
    मैं तो फ़ोन पर जब आपने बताया तो अंदाज़ा लगा ही रहा था कि कुछ ऐसा ही नज़ारा होगा । अगली बार दोनों जन चलेंगे सर
    टिप्पणीकर्ता अजय कुमार झा ने हाल ही में लिखा है: कोल्ड-बोल्ड ब्लॉगिंग और फ़ास्ट फ़्युरियस फ़ेसबुकMy Profile

  2. सर जी बहुत गलत बात है आपकी … पोस्ट लिखा करो महाराज … यह खाने पीने की बातें न किया करो जी … यह भी कोई बात है … अब बताओ जलेबी जैसी चीज़ का चित्र लगा दिया … हद है यह तो … अब कल सुबह ही मँगवाता हूँ … नाश्ते मे दही जलेबी और बाकी जो भी पकाया गया हो … पर जलेबी तो अब खानी ही खानी है !

    बाकी चित्र और वर्णन के बारे मे फिर बाद मे बात करेंगे … आपने जलेबी दिखा कर ध्यान हटा दिया पोस्ट से … 😉
    टिप्पणीकर्ता Shivam Misra ने हाल ही में लिखा है: हैप्पी बर्थड़े … बुआ …My Profile

    • :Heart:
      सच का सामना कीजिए
      बिना खाए पिए कोई बात बनती है क्या

  3. सर जी ,
    नमस्कार
    पढकर तो ऐसा लगा की मैं भी हूँ आपके साथ . मुह में पानी आ गया जलेबी और पकोडो के बारे में सुनकर .

    सर अगली बार मुझे जरुर साथ ले चलिए …..

    आपका
    विजय

    • :Hello:
      अभी फोन करते हैं आपको प्रोग्राम के लिए

  4. पाबला जी, आजकल की अतिव्यस्तता के बीच बीते दिनों में वापस जाने की ललक ही तो वास्तविक जीवन है!

    आपने मुझे 1988-89 के वे दिन याद दिला दिए जब मेरी पोस्टिंग बालोद के स्टेट बैंक कृषि विकास शाखा में थी और मुझे जब भी बालोद से रायपुर आना जाना होता था तो अपनी बाइक से ही आया जाया करता था।

  5. तो बाइक का आनन्द ले लिया। मैं भी चाहता हूँ जाना किसी ऐसी ही राइड पर। जहाँ इन दिनों रह रहा हूँ वहाँ से बस बस्ती आरंभ होते ही जंगल शुरू होता है। लेकिन घुटने का लिगामेंट अभी सही नहीं, बाइक धूल खा रही है खड़ी खड़ी। कार में वो मजा कहाँ?
    आप यात्राएँ करते रहें. हमें बताते रहें।कभी तो हमें भी प्रेरणा मिलेगी इतनी कि निकल पड़ेंगे।

  6. हम तो सोच ही रहे थे की पाबला जी कहाँ गायब हो गए . फिर सोचा — इतना भारी भरकम आदमी भला कहीं गायब हो सकता है ! 🙂

    अब पता चला की अकेले जंगलों में घूम रहे थे . बादशाओ कोई कंपनी सम्पनी होती तो और भी अच्छा रहता जी .

    • :Overjoy:
      जहाज का पंछी जाएगा कहाँ सर जी

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