धुआंधार बारिश, दिमाग का फ्यूज़ और सुनसान सड़कों पर चीखती कन्या को प्रणाम

… और इस तरह काठमांडू से लौटते हुए, नेपाल के माओवादियों से टकरा कर, सारी रात गाड़ी चला, इलाहाबाद में दोपहर विश्राम के बाद हम रवाना हुए घर की ओर तो 16 – 17 सितंबर की आधी रात गाड़ी मंगवान नाम की जगह पर थी जो रीवां से 30 किलोमीटर दूर है . राह बदल कर हो गई राष्ट्रीय राजमार्ग 7. अभी 700 किलोमीटर का सफ़र बाक़ी, खराब सडकों से बचने की जुगत में जबलपुर हो कर जो जाना था!

मेरे दोनों साथियों, ललित शर्मा, गिरीश पंकज में मतभेद था ‘सही राह’ चुने जाने को लेकर. गिरीश जी का कहना था कि इतनी सारी बसें आती जाती हैं शहडोल रीवां होते हुए इलाहाबाद के लिए, सड़क तो ठीक ही होगी क्या ज़रूरत है जबलपुर की ओर से जाने की. ललित जी का तर्क था -मोटर साइकिल और बस तो खराब सडकों से भी निकल जाते हैं दनदनाते, दिक्कत तो नाजुक सी कार वालों को होती है. मैं भी ललित जी से सहमत था

आखिरकार रीवां पहुँच चाय पीते पीते, ड्राईवरों को पूछा गया तो सबने शहडोल वाली सड़क को ‘ठीकठाक’ बताया. अब इतनी बदतर हालतों वाली सड़कों से हो कर आये थे कि इस ‘ठीकठाक’ शब्द से तसल्ली हुई सभी को. फिर क्या था तीनों जवान चल पड़े अपनी मारुती ईको और रोबोट कन्या नेवीगेटर के संग.

सुबह का सूरज जब तक चमकता तब तक हम 6 घंटों में 150 किलोमीटर ही तय कर पाए थे, राह में दो स्थानों पर चाय और विश्राम काल को मिलाकर.

सुबह 7 बजे, जयसिंहनगर के पहले ही एक रमणीक जगह दिखाई दी. बहता पानी, घने पेड़ों की छाँह, खुला खुला आसमान. किसी ने फ़ोटो खींची, कोई आँखों से ओझल हो गया अपनी लघु/ दीर्घ शंका का निवारण करने 😀 कोई लंबी लंबी साँसें लेता चहलकदमी करने लगा.

काठमांडू आने जाने के लिए हुई 3000 किलोमीटर की यात्रा वाले रोचक संस्मरणों का संक्षिप्त विवरण यहाँ क्लिक कर देखें »

 

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जयसिंहनगर (मध्यप्रदेश) के पास

शहडोल अभी 40 किलोमीटर बाक़ी था. गाड़ी सरपट भागे जा रही. नींद अपना असर दिखाने लगती तो मुंह हाथ धो लेता, बाहर निकल चहलकदमी भी कर लेता.

कई बार सोचा कि किसी साफ़ सुथरी जगह पर चादर बिछा मस्त नींद ले ली जाए. ललित जी और गिरीश जी ने तो चलती गाड़ी में नींद के लिए अगली पिछली सीटों की अदलाबदली करते रात बिता दी थी.

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कन्या नेवीगेटर के बताये सटीक रास्तों की पुष्टि होते ही ललित जी झूम जाते थे. मैं हँसता था कि घर पहुँच कर रातों को नींद कैसे आयेगी आपको, इसके बिना? 😀 वे भी कहते थे कि मुझे तो प्यार हो गया है इससे!

साढ़े आठ बजे के आसपास, शहडोल से 5 किलोमीटर पहले दिखाई दिया एक भव्य मंदिर. ललित जी चिल्लाए रोको… रोको… रोको… मुझे भी याद आया कि वर्षों पहले रीवां आते जाते सोहागपुर के इस हजारों वर्ष पुराने, पाण्डव कालीन मंदिर को तो  पहले भी दो बार देख चुका हूँ.

बीच में खबरें आईं थीं कि 125 फीट ऊंचा यह विराटेश्वर  मंदिर तेजी से पीछे की ओर झुकता जा रहा है

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ललित जी और गिरीश जी तो मंदिर की ओर प्रस्थान कर गए और मैं एक बार फिर उभर आये एड़ी के दर्द को महसूस करते 200 फीट दूर, बाहरी द्वार से अपने कैमरे के ज़ूम का प्रयोग कर तस्वीरें लेता रहा.

पौने दस बजे, शहडोल पार कर मैंने अपनी रोबोट नेवीगेटर को निर्देशित किया अमरकंटक के लिए, जहाँ  से हो कर हमें अचानकमार अभ्यारण पार करते बिलासपुर जाना था. मुझे ध्यान आया धीरेंद्र सिंह भदौरिया जी का. ललित जी ने उन्हें फोन कर बताया कि अनूपपुर से होकर गुजरेंगे हम. मिल सकें तो बढ़िया.

बात बन गई, उनका आग्रह भी आ गया कि भोजन उनके निवास पर ही हो जाए. हमने भी सोचा इसी बहाने एक ब्लॉगर बैठक हो जायेगी, विश्राम भी हो जाएगा. मैं तो एक बार उनसे मिल भी चुका, जब वे भिलाई आये थे.

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लेकिन बुढार निकलते ही हमारी कन्या नेवीगेटर ने जो राह बताई, वह अनूपपुर ना जा कर  किसी और ही तरफ जा रही, लेकिन ले जा ज़रूर रही थी अमरकंटक तक.

बड़ी माथापच्ची की नेवीगेटर के साथ. समय और दूरी का अंतर देख नतीजा निकाला गया कि ये नेवीगेटर वाली राह ही ठीक है.

हम उस राह पर बढ़ लिए. पांच मिनट भी ना हुए कि ‘अमिताभ बच्चन’ की कॉल आ गई. (ललित जी ने धीरेंद्र जी की दाढ़ी को ध्यान में रख, मोबाईल पर उनका नंबर ‘अमिताभ बच्चन’ के नाम से रखा हुया है.) जब उन्हें बताया गया कि हम नहीं आ रहे तो स्वाभाविक तौर पर वे नाराज़ हुए. जानकारी भी दी कि ज़्यादा अंतर नहीं होगा समय का और जिस राह जा रहे हो आप लोग वो सड़क ठीक नहीं है.

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मारुति ईको को वापस मोड़ा गया अनूपपुर जाने वाली सड़क पर.  पौन घंटे बाद अनूपपुर के पहले हमारी कन्या नेवीगेटर रूठ गई. दरअसल, धीरेंद्र जी का निवास अनूपपुर  से 40 किलोमीटर हट कर व्यंकेटनगर में है और उस बेचारी को समझ ही नहीं आ रहा था कि व्यंकेटनगर है किधर!

हमने कई स्पेलिंग बदल कर बताए उसे लेकिन हर बार वह ना में उत्तर देती. ललित जी का सुझाव आया कि इसे अमरकंटक जाने को कहो, राह में पक्का ये व्यंकेटनगर आयेगा फिर चल देंगे उसी राह पर. और हुआ भी वही 🙂 अप्रचलित स्पेलिंग वाला व्यंकेटनगर दिख गया उसे और हम चल पड़े इंतजार करते धीरेंद्र जी के कस्बे की ओर.

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अपडेट्स के लिए ‘अमिताभ बच्चन’ की कॉल आती रहीं. हम तीखी धूप में धूल भरी सड़क पर बढ़ते रहे. वो तो गनीमत थी कि गाड़ी का पिछला कांच फूट जाने के बावजूद एयरकंडीशनर बढ़िया काम कर रहा था. समय रहते एक युक्ति काम जो कर गयी थी चादर को दोहरा तिहरा कर उस खाली जगह को बंद कर देने की.

जैसा कि जानकारी मिल चुकी, व्यंकेटनगर में प्रवेश करते ही धीरेन्द्र जी दिख गए. वे हमारे साथ बैठे और निर्देशित किया एक और स्थान पोंडी, (PIN 484330) की ओर. आधे घंटे के बाद जब हमारी गाड़ी उनके लंबे चौड़े फार्म हाउस में रुकी तो दोपहर का एक बज चुका था.

उनके पारिवारिक सदस्यों से परिचय के बाद, मैं तो भागा मस्त ठंडी हवादार कमरे वाले बिस्तर की ओर. लेटते ही आ गई नींद. आँखें खुली तब, जब ललित जी की दहाड़ सुनी भोजन की सूचना देती. म्याऊँ म्याऊँ करते रहे होंगे वो, लेकिन मैं गहरी नींद में सुनूँ तब ना 😀

स्नान ज़रूरी था, किंतु नींद से उठ कर  शरीर के तापमान को बिना सामान्य किए नहाना माने तकलीफों को खुद बुलाना. सामने डाइनिंग टेबल पर भोजन लगा हुआ. सब मेरी ही ओर देख रहे कि कब कुर्सी पर बैठूं और शुरू हो सिलसिला. ‘शेरों ने भी कभी मुंह धोया है?’ की भावना लिए मैं भी जम गया कुर्सी पर हाथ धो कर.

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बायें से दायें: बी एस पाबला, गिरीश पंकज, ललित शर्मा, धीरेंद्र सिंह भदौरिया

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धीरेन्द जी के पारिवारिक सदस्यों ने स्नेहपूर्वक आग्रह कर कर उस स्वादिष्ट भोजन की कुछ ज़्यादा ही मात्रा उदरस्थ करवा दी. बातों बातों में मुझे भी ख्याल ना रहा कि सफ़र में कुछ कम ही खाता हूँ.

फिर चला कॉफ़ी का दौर. करते ना करते शाम के साढ़े तीन बजने को आए. जिस दिशा में हमें प्रस्थान करना था, उस तरफ के आसमान में काले बादल उमड़ घुमड़ रहे थे बड़ी देर से. मुझे चिंता हुई कि मारुति का पिछला कांच फूटा हुआ है, चादर लगी है तो क्या हुआ? बारिश हुई तो सारा पानी अंदर घुस आएगा.

जुगाड़ की तलाश शुरू हुई तो इतना बड़ा पॉलिथीन ना मिला कि वह खाली स्थान बंद किया जा सके. सलाह मिली कि आगे पेंड्रा रोड/ गौरेला में बहुत दुकानें हैं वहाँ बात बन जायेगी.

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लेकिन पेंड्रा रोड के पहले ही मूसलाधार बारिश शुरू हो गई. पिछली सीट पर बैठे गिरीश जी को जिम्मेदारी दी गई कि गीली चादर का निचला हिस्सा, गाड़ी के बाहर ही रखें. पानी से भीग कर भारी हो चुकी चादर बाहर लटकती रही और काफी हद तक बचाव हुया पानी से.

ऐसा कब तक चलता! हमें तो बहुत दूर जाना है. बरसते पानी में हर संभावित दुकान के सामने चिल्ला कर पूछते बड़े से पॉलिथीन के बारे में तो ना में ही सर हिलता मिला. थक-हार कर ललित जी ने पूछा -छतरी है गाड़ी में. झट से उन्हें छतरी थमाई गई और वे धुआंधार बारिश में किसी दुकान से रस्सी और पॉलिथीन ले आए.

अब समस्या यह कि इतने बरसते पानी में बांधे कैसे उसे? इधर ललित जी ने कन्या नेवीगेटर की सुझाई राह को नकारते हुए अपने पुराने अनुभव के आधार पर किसी दूसरे राह पर जाने को कहा. उस राह को और पॉलिथीन बांधने की जगह तलाशते हम भारी बरसात में चकरघिन्नी की तरह सारे कस्बे में घूमते रहे.

फिर मुझे चिल्लाना ही पडा कि जो यह कन्या कहती है उसे मान क्यों नहीं लेते? अंधेरा हो चला था, ललित जी ने भी हथियार डाल दिए.

SH 8 से होते हुए जब केवंची पहुँचना हुआ तो बारिश थम चुकी, घुप्प अँधेरा छा चुका. हमें पार करना था घना अचानकमार अभ्यारण्य जंगल, जहाँ 25 वर्ष पहले दोपहिया वाहन पर जाते हम पति-पत्नी का पीछा किया था बदमाशों ने ! चाय बिस्कुट गटक कर हम तीनों जवान चल पड़े अगले मोर्चे पर.

घुप्प अंधेरी रात में उस ऊँचे, घुमावदार रास्तों से गुजरते जंगली जानवरों से पाला पड़ता रहा. सिवाय उस संरक्षित क्षेत्र वाले जंगल में प्रवेश करते और बाहर निकलते हुए चेक पोस्ट पर नाम, पता, गंतव्य, मंतव्य दर्ज कराते दिखे मानवों के अलावा 50 किलोमीटर तक ना आदम ना आदमजात.

हाँ, एक ऊंचे पहाड़ी मोड़ पर चकाचौंध हेडलाइट्स की रौशनी में दिखी चहलकदमी करती युवती. निगाहें हमारी गाड़ी की ही ओर थी. सारा ध्यान उस तीखे मोड़ पर होने के कारण मैं तो कुछ ज़्यादा निगाह ना डाल पाया लेकिन ललित जी, गिरीश जी ने जो देखा भांपा, उसकी बहुत देर तक व्याख्या होती रही आपस में.

रात 10 बजते बजते तो हम बिलासपुर भी पार चुके थे. वहाँ से रायपुर रह गया 120 किलोमीटर. लेकिन फोरलेन में परिवर्तित होती सड़क से गति सीमित ही रही. दो बार तो मुझे नींद का झोंका आया, सड़क किनारे गाड़ी खडी कर ही सीट पर सो गया. लेकिन हर बार चंद मिनटों बाद अज़ीब सी आवाजें निकालते, पानी माँगते उठा. ललित जी ने हैरानगी से पूछा -क्या हुआ? तो बेसाख्ता मेरे मुँह से निकल गया कि शरीर थक जाए, तो भी नींद लगते सब पटरियों पर बिखरा बिखरा नज़र आता है.

और इस तरह रात के 12 बजे हम नांदघाट पार कर गाड़ी दौड़ाते, आँखें फाड़े, कम होती दूरी गिनते, बतियाते पहुँच गए भनपुरी. अपनी कन्या नेवीगेटर को मैंने पहले ही गिरीश जी के घर का पता बता दिया था. बढ़ते फैलते शहर की चौड़ी सडकों, फ्लाई-ओवर्स की भूलभुलैया से गुजरते हुए जब उसने घर से 2 किलोमीटर पहले एक बस्ती में मुड़ने को कहा तो ललित जी, गिरीश जी दोनों ने उसका कहा मानने से इंकार कर दिया कि ये गलत ले जा रही, आप तो आगे चलो.

उसके बाद वो सुनसान सडकों पर बेचारी चीखती रही कि दायें मुड़ो, बाएं मुड़ो लेकिन दशकों से रायपुर शहर में रहने वाले हमारे दोनों साथियों ने उसकी एक ना सुनी. मैं भी खामोशी से साथियों का कहा मान कर गाड़ी दौड़ाता रहा.

लेकिन मोवा के पास एक ही जगह पर जब गाड़ी घूम फिर कर तीन बार आ खड़ी हुई तो मेरे थक चुके दिमाग का फ्यूज़ उड़ गया. झल्ला कर मैंने कहा -आप दोनों अब एक शब्द भी नहीं निकालोगे मुँह से. चुपचाप बैठे रहिए.

दस मिनट भी नहीं लगे होंगे कि गलियों सडकों के बीच से निकालते हुए उस रोबोट कन्या ने गिरीश जी के घर के सामने जा टिकाया गाड़ी को, तो ललित जी ने दोनों हाथ जोड़ कर उसे प्रणाम किया 😀

Bs Pabla

 

काठमांडू आने जाने के लिए हुई 3000 किलोमीटर की यात्रा वाले रोचक संस्मरणों का संक्षिप्त विवरण यहाँ क्लिक कर देखें »

 

अभी तो ललित जी को अभनपुर छोड़ना था. राह पकड़ी नए बने रायपुर की ओर. वीरान पड़ी रनवे जैसी चौड़ी सड़कें मिलें तो रफ़्तार बढ़ ही जाती है. फर्राटे से दौड़ती गाड़ी को नेवीगेटर रास्ता बताते जा रही थी. और जब 18 सितंबर की सुबह 4:30 पर नेशनल हाईवे 43 पर प्यारी नन्ही मारुती ईको ने तीखा मोड़ लिया तो वह रोबोट कन्या चहकी -चार किलोमीटर बाद आप अपनी मंजिल पर पहुँच जायेंगे!! ललित जी उसकी तारीफ़ में बरबस बोल उठे -गज़ब !!

अब बचा ही क्या था. भिलाई में अपने घर के सामने जब गाड़ी रोकी मैंने, तो सुबह के छह भी नहीं बजे थे! एक घंटे का ही आराम किया होगा और ठीक नौ बजे हाजिर थे अपन ऑफिस में अपने बॉस के सामने.

इस तरह हमने 7 दिनों में 3000 किलोमीटर का सफर तय किया काठमांडू आने जाने में, वो भी अकेले ड्राइव करते

मोगैंबो खुश हुआ होगा कि नहीं?

धुआंधार बारिश, दिमाग का फ्यूज़ और सुनसान सड़कों पर चीखती कन्या को प्रणाम
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7 दिनों में, भिलाई से सड़क मार्ग द्वारा
काठमांडू आने जाने के लिए हुई 3000 किलोमीटर की यात्रा वाले प्रतिदिन के रोचक संस्मरण 8 हिस्सों में में लिखे गए हैं. जिन्हें रुचि अनुसार पढ़ा जा सकता है इन कड़ियों पर क्लिक कर

  1. काठमांडू सफ़र के पहले की दहशत
  2. काठमांडू की ओर दही की तलाश में तीन तिलंगे
  3. काठमांडू जाती कार को नागालैंड वाले खींच ले गए
  4. भैंसा भोजन, खिलखिलाती युवती, पीछा करते युवक और आधी रात का काठमांडू
  5. नेपाल की मुर्गी, उसकी मुस्कान, मेरी नाराज़गी और लाखों का मुआवजा
  6. सुबह सुबह तोड़-फोड़, माओवादियों से टकराव, जलते टायरों की बदबू और मौत से सामना
  7. खौफनाक राह, घूरती निगाहें, कमबख्त कार और इलाहाबाद की दास्ताँ
  8. धुआंधार बारिश, दिमाग का फ्यूज़ और सुनसान सड़कों पर चीखती कन्या को प्रणाम
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7 दिनों में, भिलाई से सड़क मार्ग द्वारा
काठमांडू आने जाने के लिए हुई 3000 किलोमीटर की यात्रा वाले प्रतिदिन के रोचक संस्मरण 8 हिस्सों में में लिखे गए हैं. जिन्हें रुचि अनुसार पढ़ा जा सकता है इन कड़ियों पर क्लिक कर

  1. काठमांडू सफ़र के पहले की दहशत
  2. काठमांडू की ओर दही की तलाश में तीन तिलंगे
  3. काठमांडू जाती कार को नागालैंड वाले खींच ले गए
  4. भैंसा भोजन, खिलखिलाती युवती, पीछा करते युवक और आधी रात का काठमांडू
  5. नेपाल की मुर्गी, उसकी मुस्कान, मेरी नाराज़गी और लाखों का मुआवजा
  6. सुबह सुबह तोड़-फोड़, माओवादियों से टकराव, जलते टायरों की बदबू और मौत से सामना
  7. खौफनाक राह, घूरती निगाहें, कमबख्त कार और इलाहाबाद की दास्ताँ
  8. धुआंधार बारिश, दिमाग का फ्यूज़ और सुनसान सड़कों पर चीखती कन्या को प्रणाम
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धुआंधार बारिश, दिमाग का फ्यूज़ और सुनसान सड़कों पर चीखती कन्या को प्रणाम” पर 34 टिप्पणियाँ

  1. यह अंतिम एपिसोड भी बेहद जीवंत और रोचक हैऐ , आप सरदार भी है और असरदार भी , जितना अच्छी ड्राइविंग है, उससे भी खूब सूरत लेखन शैली है , काश, मुझे यह शैली मिल जाती . लेकिन मिलेगी नहीं , क्योंकि वो आपके पास है और ललित शर्मा के पास है। आपने उदारता के साथ मुझे भी शामिल किया है , वरना लोग ‘एकल अभियान’ चलाये रखते हैं .अपने यात्रा वृतांतों की पाण्डुलिपि बनाइये, किसी प्रकाशक को पकड़ते है प्रकाशन के लिए.

    • :Heart:
      आपके सानिध्य में कई नई बातों का ज्ञान मिला
      शुक्रिया साथ रहने के लिए गिरीश जी

  2. मोगेम्बो बहुत नाराज है। आप ने अपने शरीर के साथ बहुत अत्याचार किया है। कोई प्रीवेंशन ऑफ सेल्फ बॉडी एट्रोसिटीज एक्ट होता तो अब तक एफआईआर दर्ज करवा कर आप को टांग दिया होता।

    • :Afraid:
      सर जी, क्यों डरा रहे हैं नन्हे से बच्चे को

  3. बहुत रोचक और रोमांचक यात्रा विवरण ,पाबला जी.
    आपके जज्बे को सलाम ! इतनी लम्बी ड्राईविंग के लिए . हम तो दो – ढाई घंटे की ड्राईविंग में ही पस्त हो जाते हैं.

  4. बहुत मजा आया आपका ट्रैवैलाग पढ कर.. ऐसा लगा मानों आपकी ईको की पिछली सीट पर ही बैठे हों।

    वाकई शरीर पर अत्याचार तो हो ही गया.. लेकिन ऐसी यादगार यात्रा का अपना नशा है.. जय हो आपकी ड्राईविंग स्किल्स (किल्स :-डी) का…

  5. यात्रा जरूर मजेदार रही, परंतु बिना नींद पूरी करे और नींद के झोंके आने वाली हद तक ड्राईविंग करते जाना, बहुत खतरनाक और जोखिम भरा कृत्य है, अब आप जो है, ऑटोमेटिक चलने वाली कार की खोज करें या फ़िर जो साथ में जा रहे हैं, उन्हें पहले १५ दिन की ड्राईविंग की ट्रेनिंग दिलवायें और फ़िर उनसे भी ड्राईविंग में मदद लें, या फ़िर जो ड्राईविंग मे अच्छे हैं, उन्हें भी साथ में लें ।
    टिप्पणीकर्ता विवेक रस्तोगी ने हाल ही में लिखा है: ब्लॉगिंग की शुरूआत के अनुभव (भाग १)My Profile

  6. पाबला जी, आने के बाद तबियत कैसी रही ?
    मोगैंबो खुश नहीं हैरान, परेशान हुआ। तनाव-थकान-अनियमित दिनचर्या तन-बदन पर असर तो डालती ही है। इतनी लम्बी यात्रा के लिए समय जरूर प्रचूर मात्रा में होना चाहिए। जिससे हड़बड़ी और दौड़-भाग न हो।
    हम तो आराम से पढ़ कर जानकारी हासिल कर लेंगे

  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति…!

    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बृहस्पतिवार (07-11-2013) को “दिमाग का फ्यूज़” (चर्चा मंच 1422) पर भी होगी!

    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।

    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर…!

    • :Smile:
      मैंने पहले भी कई बार निवेदन किया है कि टिप्पणियों में लिंक दिए जायेंगे तो मेरा रोबोट उनको ऑपरेशन टेबल पर ले जा कर चीर-फाड़ कर देगा

      जब पहले से ही टिप्पणी बक्से के नीचे विकल्प दिया है कि “टिप्पणीकर्ता की ताज़ा ब्लॉग पोस्ट दिखाएँ”
      तो फिर अलग से लिंक क्यों देना!

  8. मस्त बिंदास यात्रा रही आपकी….रात मे विचरती कन्या का हालचाल तो पूछ लेते…क्या कोई जिज्ञासा नहीं हुई….वैसे कन्या नेवीगेटर ८० फीसदी तो सही ली ले गई आपको…

    • :Smile:
      कन्या नेवीगेटर ने हमारा बहुत साथ दिया
      विचरती कन्या का हाल पूछने का मौक़ा बड़ा ऊटपटांग था

  9. कैप्टन पाबला का रहस्य रोमांच से भरपूर यात्रा वृतांत..मज़ा आ गया

  10. एक अंतराल के बाद फिर पढ़ा. मज़ा आ गया. बधाई . काश, आपकी लेखन-शैली अपने को भी मिल जाती लेकिन यह इस जन्म में सम्भव नहीं है.

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