आज मेरे जनमदाता का जनमदिन है

अभी पिछले दिनों जब भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षायों का परिणाम घोषित हुया तो सुबह-सुबह अपने पिता के चेहरे पर मुस्कुराहट देख कर मुझे आभास हुया कि उन्हें कोई पुरानी बात याद आ गयी है। थोड़ी पूछताछ करने पर पता चला वह, 1989 के आईएएस परीक्षायों के परिणाम सूची में, पूरे भारतवर्ष में, दूसरा स्थान प्राप्त करने वाले अमिताभ जैन का रिकॉर्ड, अंचल में किसी के भी द्वारा न तोड़े जाने से मुदित थे। आखिर अमिताभ जैन उसी शहर से अपनी पढ़ाई पूरी कर निकले थे, जिस शहर में उन्होंने लगभग 40 वर्ष का सेवाकाल बिताया था। दरअसल पिता जी को वह शहर याद आ रहा था।

उन्होंने अविभाजित भारत के उस स्थान में जनम लिया था जिसे आजकल पाकिस्तान कह कर पुकारा जाता है। आम तौर पर विभाजन त्रासदी के बारे में चुप्पी साधे रखने वाले मेरे पिता कभी कभी पुरानी यादों में खोते हुये बताते थे कि जब वह मात्र 8 वर्ष के थे तो कैसे रातों-रात पूरे परिवार के साथ, भरी-पूरी शानदार हवेली, लम्बी-चौड़ी जायदाद और साथियों को छोड़कर वर्तमान पंजाब के एक छोटे से गाँव, बरनाला, में आ टिके थे। कुछ समय बाद ही परिवार को पड़ोस के गाँव में स्थायी ठिकाना मिल गया था।


वे अब भी अक्सर अपनी किशोरावस्था के वे किस्से बताते हैं जब 20 वर्ष की आयु पूर्ण करने से पहले जमशेदपुर में टाटा आयरन एंड स्टील के कारखाने में, जीविकोपार्जन के लिए अपने छोटे भाई के साथ आ पहुँचे थे। दोनों भाईयों के बीच की स्वभाविक झड़पों की कहानियाँ सुनाते हुये वे कई बार मुस्कुरा देते हैं। 1959 के किसी माह में वे दोनों तत्कालीन हिन्दुस्तान स्टील लिमिटेड के निर्माणाधीन भिलाई इस्पात संयंत्र में आजीविका के लिए पहुँचे और तत्काल एक स्थायी नौकरी का प्रबंध हो गया। पिता जी को कार्यस्थल मिला मुख्यालय से 100 किलोमीटर दक्षिण में कच्चे लोहे की खदानों में, दल्ली राजहरा तथा चाचा जी जा पहुंचे भिलाई की कोक ओवन में। वहीं दल्ली राजहरा में मेरा जनम हुया था।

(शॉवेल का एक चित्र)

पिता जी को कार्यभार मिला था सोवियत रूस से आयातित शॉवेल के प्रचालन का। उस भारी भरकम मशीनों से उन्हें हद दर्जे का लगाव था। यह अतिश्योक्ति नहीं है कि वह उस महाकाय मशीन की आवाज़ सुनकर ही उसमें उत्पन्न दोष को बता देते थे। उनके सहकर्मी उन्हें ‘शॉवेल का कीड़ा’ कह कर पुकारते थे। अधिकारी संवर्ग में सेवानिवृत्त होने के पहले, वे अपने सेवाकाल के अंतिम वर्षों में अपनी प्रिय मशीन में आये बदलाव से खुश नहीं थे। उन्हें वह पुरानी इलेक्ट्रोमेकेनिकल रिले से संचालित होने वाली, शोरगुल करती मशीनें ज़्यादा अच्छी लगतीं थीं। आधुनिक थायरिस्टर नियंत्रित खामोश मशीनों से उनकी चिढ़ नज़र आ ही जाती थी। उनका कहना था कि रिले की आवाज़ से ही मेरा अगला कदम निश्चित हो जाता था, लेकिन यह नई मशीनें तो अपना काम ख़ुद करने की कोशिश करतीं हैं।

(अपनेदादाकीगोदमेंनवजात, हमारासुपुत्रगुरुप्रीत)

 

उसी शहर में, मैं जनमा-पलाबढ़ा। बचपन के शुरूआती चार वर्ष, हमारे सुपुत्र गुरूप्रीत ने भी वहाँ बिताये। जबकि (हमारी सुपुत्री) उसकी जुडवाँ, रंजीत हमारे पास थी। 1997 में 58 की उम्र में पिता जी ने जब अपना कर्त्तव्य काल खत्म किया तो उन्हें मेरे पास कर रहने की बहुत उत्कंठा थी। लेकिन यहाँ भिलाईआकरभीवेनिराशहीहुये, उन्हें उस छोटे से शहर की याद आती ही रही। मैं भी जानता हूँ कि वह एकशहर, दल्लीराजहरा, परिवारजैसा था। भिलाई में दो वर्ष बिताने के बाद उन्हें अपने खेत याद आने लगे। मेरे दादा जी के देहावसान के बाद उन्हें गाँव कुछ ज़्यादा ही याद आने लगा था। भरे मन से अपने गृहस्थ जीवन में जुटाए गए साजोसामान के साथ भिलाई को विदा कह गए।

(अपने दादा दादी के साथ जन्मदिन मनाता, हमारा सुपुत्र गुरुप्रीत)

गाँव में अपना ख़ुद का दोमंजिला मकान बनावा कर वे बहुत खुश थे। लेकिन एक बार जब अपनी खानपानकी आदतोंकेकारणगंभीररूपसेबीमार पड़ गए तो हमने उन्हें अपने पास ही रहने के लिए मना लिया। वे आ तो गए, लेकिन मेरी टोका टाकी शुरू हो गई कि यह वस्तु खानी है यह नहीं खानी है। जो खाने में विविधता व प्रयोगधर्मिता के शौकीन रहे हैं उन्हें ऐसे बंधन में कब तक रखा जा सकता है। कभी कभी लगता है कि फ्यूजनफूड कीअवधारणाउन्हींकेदिमागकीउपजहोगी 🙂 कभी-कभी मेरा कोई ना कोई परिचित कह बैठता है कि उनकी उम्र हो गई जो वो चाहते हैं, दो। तुम अपना खून क्यों जलाते हो? लेकिन मन नहीं मानता।

समाचार पत्रों, सैटेलाईट चैनल्स, दोनों पोते पोतियों, डेजी और भरपूर नींद के साथ समय बिताते हुए वे आजकल मेरेपासही रहते हैं। निशक्त हो चले पिता जी को अपने पसंदीदा डिस्कवरी चैनल पर तकनीकी जानकारियों वाले कार्यक्रम में कभीशॉवेलदिखजातीहैतोउनकीचमकतीआँखेंदेख, माँ चिढाती है कि सब नाटक है इनका। अभी आकर खड़ी हो जाए वह मशीन, तो लपक कर चढ़ जायेंगे उस पर! फिर नहीं कहेंगे कि हाथ पैर अकड़ रहे हैं।

आप भी सोचेंगे कि यह सब मैं क्यों बता रहा हूँ? दरअसलआजउनकाजनमदिन है। वे आज 70 वर्ष के हो गए हैं। इस मौके पर मुझे कई बातें याद आ गयीं, सोचा आपसे भी कुछ साझा कर लूँ वह यादें।

शायद मैंने ठीक ही किया। नहीं?

आज मेरे जनमदाता का जनमदिन है
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आज मेरे जनमदाता का जनमदिन है” पर 15 टिप्पणियाँ

  1. आपके जन्मदाता के जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई… आज के दिन तो उनसे तोहफा माँगिए … आशीर्वाद और शुभकामनाओं के रूप में…

  2. जन्मदिन की बहुत बधाई दीजियेगा अपने पिताजी को हमारी तरफ़ से भी ।

  3. बिल्कुल ठीक किया आपने-परिवार की यादें और बातें परिवार के साथ साझा करके.

    पिता जी सदा स्वस्थ रहें. उनके जन्म दिवस पर उनके दीर्धायु होने की कामना के साथ हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाऐं.

    आप सब को परिवार में उनके जन्म दिन की मुबारकबाद.

  4. आपके पिताजी को जन्मदिन बहुत मुबारक पाबला जी। और यह पोस्ट बहुत भाई मन को।

  5. पाबला जी, इस पोस्ट को पढ़ते पढ़ते आँखे नम हो आईं। जी चाहता है अभी पिताजी के पास पहुँच जाऊँ। पिता जी को जन्म दिन की बहुत बहुत शुभकामनाएँ।

  6. हमारी ओर से भी आपके जन्मदाता के जन्मदिन की हार्दिक बधाई स्वीकारें | शुभकामनाओं सहित…. |

  7. बहुत अच्छा लगता है जब अपना समझ कर कोई अपनी बातों को साझा करता है। लगता है अनदेखे अपनों का परिवार का दायरा और बढ गया हो। पापा जी के जन्मदिन पर आपके पूरे परिवार को बधाई। प्रभू उन्हें सदा स्वस्थ एवं प्रसन्न रखे।

  8. मेरी और से भी जन्मदिन की ढेर सारी बधाइयाँ..

  9. ittefaak se aaj mera bhee janmdin hai…..hamaaree taraf se aadarneey pita jee ko charan sparsh aur shubhkaamnaayein…

  10. आप के पिता जी को जन्म दिन की ढेर सारी बधाई, आप ने तो इस पोस्ट को लिख कर हमें रुला ही दिया। भगवान करे आने वाले कई सालों तक बच्चे दादा दादी का प्यार पाते रहें और वो दोनों स्वस्थ रहें। ज्यादा टोका टाकी मत करिए, ऊपर वाला सब को देखता है।

  11. आप के पिता जी के जन्मदिवस की बहुत बहुत मुबारकबाद— आपने ये मीठी यादें हम से साझा कर के बहुत अच्छा किया, पाबला जी।

    अपने पिता जी से कहियेगा कि उन के जन्मदिवस पर बरनाला के पास ही से यमुनानगर से भी शुभकामनायों की खुशबूदार हवायें आई हैं जो कि यह संदेश लेकर आई हैं —

    तुम जियो हज़ारों साल, साल के दिन हों पचास हज़ार।

    इस परवरदिगार से यही अरदास है कि आप का चमन यूं ही खिला रहे — ये बच्चे अपने दादी दादे के साये में यूं ही फलते फूलते रहें। अपनी मां जी तक भी मुबारकबाद पहुंचाईयेगा। और दोनों को पैरी-पैनां।

    बाकी रही पार्टी की बात, अगली बार बरनाला जाना तो आपने इसी रास्ते से ही होकर है ना !!
    ढ़ेरों शुभकामनायें।

  12. अपने पिताजी को हमारी तरफ़ से भी जन्मदिन की बहुत बधाई और शुभकामनाएं दें .. वे स्‍वस्‍थ रहें और उनके आशीष से आप भी सानंद रहें ।

  13. बाऊजी को जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई।

  14. dada ji ko aur aap sabhi ko dher sari shubhakaamnayen..

    dada ji se cake katvana mat bhuliyega.. 🙂

  15. आप सभी की बधाईयों, शुभकामनायों हेतू धन्यवाद।

    जब यह अनदेखे अपनों के संदेश, पिताजी तक पहुँचाये गये तो उनके लिए भी यह एक अनोखा अनुभव रहा।

    परिवार के सीमित सदस्यों के बीच, प्रचलन अनुसार केक तो कटवा ही लिया हमने।

    आशीर्वाद तो मिलना ही था 🙂

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