आप सोचेंगे, नकली हाथ काम करेगा

लकवे से पीड़ित लोगों के लिए बंदरों के मार्फत एक खुशखबरी आई है। अब ऐसी रोबॉटिक आर्म ईजाद होने को है, जो दिमाग के इशारे समझकर ठीक वैसे ही काम करेगी, जैसे हाथ करता है। पिछले दिनों बंदरों के ऊपर किए गए प्रयोग के दौरान देखा गया कि वे रोबॉटिक आर्म को अपनी जरूरतों के हिसाब से संचालन करने में सक्षम हो पा रहे हैं। इसके बाद से ही लकवे के मरीजों के लिए अंग तैयार करने की दिशा में खासी तेजी से काम शुरू हो चुका है। बंदरों के हाथ में लगी बांहनुमा उपकरण का नियंत्रण दिमाग से ही होता था। उन्होंने इसका इस्तेमाल खाने और चबाने के लिए किया। इतना ही नहीं कुछ बंदरों ने तो इस बांह की उंगलियों को भी चाटने की कोशिश की। हालांकि इस प्रयोग के दौरान शत प्रतिशत कामयाबी नहीं मिली, फिर भी पहले के कृत्रिम अंगों के मुकाबले इसका संयोजन कहीं बेहतर था।


Nature Journal में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक University of Pittsbergh से जुड़े ब्रिटिश शोधकर्तायों ने उम्मीद जताई है कि अब तक हॉलिवुड की फिल्मों में दिखने वाला Robotic Arm असल जिंदगी की हकीकत बनने को है। इस प्रयोग के लिए बंदरों की असली बांह को पट्टियों के सहारे उनके शरीर से इस तरह बांध दिया गया कि वे उनका इस्तेमाल न कर सकें। इसके बाद बांह वाली जगह रोबॉटिक आर्म लगा दी गई। इन बंदरों की दिमागी हलचल रेकॉर्ड करने के लिए sensor स्थापित कर दिए गए। जब भी बंदरों को कुछ खाने की इच्छा होती थी, उनके दिमाग में वैसे ही सिग्नल उत्तपन्न होने लगते थे। सेंसर के जरिए कंप्यूटर उनकी इच्छा को ताड़ लेता था और उसी के हिसाब से उस बांह को निर्देश देता था। धीमे-धीमे बंदर ये समझ गए कि उनकी चाह के हिसाब से नया हाथ हलचल कर रहा है। जल्द ही वे अपनी दिमागी शक्ति का इस्तेमाल इस हाथ से चीजों को पकड़ने के लिए करने लगे। कुछ ही सप्ताह में उन्हें इस रोबॉटिक आर्म से खाने में भी कोई दिक्कत नहीं रही।

इसी तर्ज पर साइंटिस्ट और भी कई मशीनें विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं। बंदरों वाली बांह में दिमागी संकेत समझने के लिए इलेक्ट्रोडका इस्तेमाल किया गया था, लेकिन दूसरी मशीनों में इनकी जगह Nerve Graft उपयोग किए जा रहे हैं। इसके बाद किसी दुर्घटना या बीमारी की वजह से हाथ पैर खोने वाले लोगों को अपने काम के लिए दूसरों का मुंह नहीं ताकना पडे़गा। इतना ही नहीं रीढ़ की हड्डी में चोट लगने की वजह से चलने फिरने में लाचार लोग भी दिमाग से संचालित कृत्रिम पैरों की मदद से चल सकते हैं।

इस काम से जुड़े शोधकर्ता डॉ. एंड्रयू के मुताबिक हमारा फौरी मकसद ऐसा उपकरण बनाने है, जिससे पक्षाघात के पूरी तरह से शिकार हो चुके लोगों को फायदा पहुंचे। अंतत: हम दिमाग की जटिलताओं को पूरी तरह से समझना चाहते हैं। इस प्रयोग के बारे में टिप्पणी करते हुए लंदन के इंपीरियल कॉलेज के प्रोफेसर पॉल मैथ्यूज कहते हैं कि रोबॉटिक आर्म में कंधे, कुहनी, कलाई और उंगलियों की हरकत को देखने से समझ में आता है कि यह पहले से मौजूद कृत्रिम अंगों से बहुत ज्यादा उन्नत है। इससे यह भी साबित होता है कि दिमाग के एक छोटे से क्षेत्र में पैदा होने वाले बहुत छोटे से 100 इलेक्ट्रिक सिग्नल हाथ के जटिलतम हलचल करने में सक्षम है।

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आप सोचेंगे, नकली हाथ काम करेगा” पर 2 टिप्पणियाँ

  1. जी, यह समाचार एक दो दिन पहले ही देखा था. आभार प्रस्तुति का.

  2. जेनरेटर से पैदा होगी हाइड्रोजन गैस क्लाइमेट चेंज की समस्या से न सिर्फ विश्व के राजनीतिज्ञों, बल्कि पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों की भी चिंता बढ़ी है। वे अब ऐसी कवायद में जुटे हैं, जिसके तहत ऊर्जा की जरूरत भी पूरी हो जाए और वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन भी कम हो। ब्रिटेन की ‘आईटीएम पावर’ नामक कंपनी ने इस दिशा में ऐसा ही सराहनीय प्रयास किया है।

    कंपनी ने हाइड्रोजन गैस पैदा करने वाला जेनरेटर तैयार किया है। इसका आकार ज्यादा बड़ा नहीं है। इसे गराज अथवा घरों में आसानी से रखा जा सकता है। कंपनी का दावा है कि इससे लोगों को बिजली का भारी भरकम बिल चुकाने से राहत मिलेगी। कार चलाने के लिए भी यह गैस कारगर होगी। साथ ही, कार्बन के उत्सर्जन से भी निजात मिलेगी। उम्मीद है कि अगले दो सालों में इसका व्यावसायिक इस्तेमाल शुरू हो जाएगा। इसकी कीमत 2,000 पाउंड (लगभग डेढ़ लाख रुपये) होगी।

    आईटीएम पावर ने ‘फोर्ड फोकस’ कार का भी अनावरण किया। इसके स्वरूप में बदलाव किया गया है, ताकि हाइड्रोजन की मदद से इसे चलाया जा सके। कंपनी ने लंदन स्थित ‘सोसायटी ऑफ मोटर मैन्युफैक्चरर्स ऐंड ट्रेडर्स’ में इस नई तकनीक (जेनरेटर) का अनावरण किया। इसके निर्माताओं का कहना है कि इसकी मदद से हाइड्रोजन से वीइकल न चला पाने की समस्या दूर हो जाएगी। हाइड्रोजन पैदा करने वाले कम लागत के जेनरेटर को शेफील्ड रिसर्च बेस में तैयार किया गया और इसे बनाने में वैज्ञानिकों को 8 साल लग गए।

    आईटीएम का दावा है कि पारंपरिक तरीकों से हाइड्रोजन गैस तैयार करने में जितना खर्च आता है, उसके केवल एक प्रतिशत से ही इस जेनरेटर की मदद से हाइड्रोजन गैस तैयार की जा सकती है।

    आईटीएम पावर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जिम हीथकोट ने कहा कि जीवाश्म ईंधन विशेषकर तेल पर निर्भरता कम करने और कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन कम करने की जरूरत के मद्देनजर एक विकल्प के रूप में हाइड्रोजन का भविष्य कभी भी उज्ज्वल नहीं रहा। लेकिन, अब परिस्थितियां धीरे धीरे बदल रहीं हैं। उन्होंने बताया कि इस जेनरेटर का एक कमजोर पक्ष यह है कि इसे चलाने के लिए बिजली की जरूरत पड़ती है।

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