इंटरनेट की दुनिया में क्रांतिकारी बदलाव की सुनामी: दहशत की आहट भी

जिस समय यह लेख प्रकाशित होगा उसके कुछ घंटों बाद (भारतीय समयानुसार 6 जून की सुबह 5:30) ही इंटरनेट के इस मकड़जाल में एक बहुत ही बड़ा क्रांतिकारी बदलाव अपना स्थान लेने वाला होगा.

दरअसल अब तक के परंपरागत संचार नेटवर्क, एक बहुत बड़े परिवर्तन से गुजर रहे हैं और पैकेट आधारित नेक्‍स्‍ट जनरेशन नेटवर्क्स (Next Generation Network) में बदल रहे हैं, ये इंटरनेट प्रोटोकॉल (Internet Protocol) पर चलते हैं।

बोलचाल की भाषा में संक्षिप्त रूप से आईपी पुकारा जाता इंटरनेट प्रोटोकॉल (IP) ऐसी भाषा है जिसका उपयोग विश्व के कंप्‍यूटर, इंटरनेट पर एक दूसरे से संचार करने में करते हैं; यह लगभग फ़ोन नंबर की तरह कार्य करता है, जो हमें एक टेलीफ़ोन को दूसरे से जोड़ने की सुविधा देती है।

वर्तमान इंटरनेट प्रोटोकॉल आईपीवी-4 (IPv4) ,लगभग 27 वर्ष पुराना है, जिसमें अनेक कमियां हैं। इन कमियों को दूर करने के लिए वर्षों की जांच परख के बाद, इसे स्थाई रूप से 6 जून 2012 से इंटरनेट प्रोटोकॉल संस्करण-6  (IPv6) स्‍थापित किया जा रहा है। इस अवसर पर विश्‍व भर के बड़े इंटरनेट सेवा प्रदाता, नेटवर्किंग उपकरण निर्माता और वेब कंपनियां अपने उत्‍पादों और सेवाओं के लिए स्‍थायी रूप से आईपीवी-6 लगाने के लिए एक साथ आ रहे हैं। निश्चित तौर पर यह दिन वैश्विक स्‍तर पर महत्‍वपूर्ण मील का पत्‍थर साबित होगा।

हालांकि भारत के अधिकांश बड़े इंटरनेट सेवा प्रदाता आईपीवी-6 सेवाएं देने के लिए तैयार हैं लेकिन प्रमुख सेवा प्रदाताओं की तैयारी के बावजूद कुछ मुद्दों का समाधान करना जरूरी है, ताकि पूर्ण पारितंत्र को आईपीवी-6 में बदला जा सके। मुख्‍य रूप से चुनौतियां हैं – वेबसाईट्स को इसके अनुरूप ढालना, उपकरणों की सप्लाई करने वालों की जागरूकता और कम्प्यूटर में लगने वाले उपकरणों की स्थिति.

भारत में अभी लगभग 36 करोड़ प्रयोगकर्ताओं के सम्‍मुख साढ़े तीन करोड़ आईपीवी-4 पते हैं। प्रत्‍येक डाटा प्रयोगकर्ता को अनोखा आईपी पता प्रदान करने के लिए एक कड़ी सुरक्षा की भी आवश्‍यकता है। चूंकि आईपीवी-6 आईपीवी-4 के साथ नहीं चलता, इसलिए आईपीवी-6 में रूपांतरण एक जटिल, कठिन और दीर्घकालीन प्रक्रिया होगी, जिसके दौरान आईपीवी-4 और आईपीवी-6 दोनों ही साथ-साथ रहेंगे।

भारत में आईपीवी-6 को व्‍यापक रूप से लागू करने के लिए दूरसंचार विभाग ने जुलाई 2010 में ‘राष्‍ट्रीय आईपीवी-6 प्रयोग दिशा-निर्देश’ नामक एक नीतिगत दस्‍तावेज (पीडीएफ प्रारूप, 21 पृष्ठ) जारी किया था। यह दुनिया में अपनी तरह की एक अनूठी पहल थी. इसके अनुरूप निर्णय लिए गए थे कि सभी बड़े सेवा प्रदाता दिसंबर 2011 तक आईपीवी-6 ट्रैफिक से निपटने और उसकी सेवाएं प्रदान करने का लक्ष्‍य रखेंगे और सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों समेत केंद्र और राज्‍य सरकार के सभी मंत्रालयों और विभागों में मार्च 2012 तक आईपीवी-6 सेवाओं का प्रयोग शुरू हो जाएगा।

बाद का अपडेट: 2013 में एक बार फिर इसका दूसरा संस्करण जारी हुया National IPv6 Deployment Roadmap Version II (पीडीएफ प्रारूप, 154 पृष्ठ)

जिज्ञासा होनी स्वाभाविक है कि इस कसरत की ज़रूरत  क्या है? हुया यह है कि वर्तमान  IPv4 तकनीक आधारित कंप्यूटर से लेकर स्मार्टफोन और कार से लेकर आईपैड तक को इंटरनेट से जुड़ने के लिए जरूरी आईपी पते खत्म होने जा रहे हैं। सामान्य कंप्यूटर नेटवर्क या इंटरनेट से जुड़े हर कंप्यूटर की अपनी पहचान होती है। उन्हें चार भागों वाला एक नंबर XXX.XXX.XXX.XXX आवंटित किया जाता है जिसे आईपी एड्रेस कहा जाता है। यह नंबर कुछ इस तरह का होता है- 192.168.1.140 यानी चार अंकों का जोड़ा। इन्हीं नंबरों की वजह से संकेत और संदेश संबंधित कंप्यूटर तक पहुंच पाते हैं।

जब हम किसी वेबसाइट का पता इंटरनेट ब्राउजर (इंटरनेट एक्सप्लोरर आदि) में डालते हैं तो यह सॉफ्टवेयर उस वेबसाइट के आईपी एड्रेस का पता लगाता है और हमें उस पते पर मौजूद सर्वर पर भेज देता है यानी इंटरनेट का सारा ढांचा इन IPv4 आईपी पतों पर निर्भर है जो , लेकिन इनकी संख्या सीमित (4,29,49,67,296) है और दुनिया में कंप्यूटर बढ़ते जा रहे हैं। आईपीवी-4 का कोटा खत्म होने का मतलब यह है कि पारंपरिक किस्म का इंटरनेट अब समापन की ओर है।

सन् 1977 में जब इंटरनेट पर काम शुरू हुया था तब लगा था कि 4.3 अरब आईपी पते बहुत होंगे। अरे! जब कंप्यूटर ही चंद स्थानों तक सीमित थे तो इतने सारे पतों के खत्म हो जाने की कल्पना कैसे दिमाग में आती! अब इस नई प्रणाली में अंकों के चार जोड़ों की जगह आठ जोड़े होंगे और उनकी अधिकतम संख्या होगी-
340, 282, 366, 920, 938, 463, 463, 374, 607, 431, 768, 211, 456, जिसे गिनना भी शायद संभव नहीं (मोटे तौर पर 340 लिखने के बाद 36 बार शून्य लिखें) :-)।

दुनिया में इतने कंप्यूटर शायद ही कभी होंगे और इतने इंटरनेट पतों की जरूरत शायद ही कभी पड़ेगी। लेकिन क्या पता फिर कुछ ऐसा ही हो!?

IPv4 - IPv6 का तुलनात्मक विवरण
IPv4 – IPv6 का तुलनात्मक विवरण

वैसे तो 99.9% से अधिक उपयोगकर्ताओं को IPv6-सक्षम वेबसाइट पर जाने में कोई समस्‍या नहीं है. हालांकि, कुछ मामलों में ऐसा हो सकता है कि उपयोगकर्ताओं ने IPv6 सक्षम किया हो लेकिन वह ठीक से कार्य नहीं कर रहा हो. ऐसा वेबसाइट पर जाने पर विलंब और कनेक्‍शन की समस्‍याओं के कारण हो सकता है.

IPv6 से जुड़ने की समस्‍याएं सामान्‍यत: गलत ढंग से स्थापित किए गए या गलत व्यवहार करने वाले मॉडेम, ऑपरेटिंग प्रणाली में गड़बड़ी, या इंटरनेट सेवा देने वाले नेटवर्क में समस्‍याओं के कारण हो सकती है. कई मामलों में, समस्या को केवल मॉडेम को अपग्रेड करके या बदलकर और ऑपरेटिंग सिस्टम को अपग्रेड करके दूर किया जा सकता है, .

यदि आपको IPv6-सक्षम वेबसाइट से जुड़ने में दिक्कत हो रही है, तो आप निम्‍न में से किसी एक का उपयोग करके समस्‍या को दूर कर सकते हैं:

  • यदि उपलब्‍ध हो, तो किसी केवल-IPv4 वेबसाइट का उपयोग करें. उदाहरण के लिए, आप www.google.com के बजाय ipv4.google.com टाईप कर Google पर पहुंच सकते हैं
  • अपने ब्राउज़र को नए संस्‍करण में अपग्रेड करें. कई ब्राउज़रों के पुराने संस्‍करणों में IPv6 की गड़बड़ियां होती हैं,
  • ऐसा ब्राउज़र इस्तेमाल करें जिसमें IPv6 कनेक्‍टिविटी संबंधी समस्‍याओं के हल शामिल हों, जैसे Google Chrome.
किसी भी जाँच के पहले सुनिश्चित कर लें कि Control Panel > Network and Internet > Network Connections पर लोकल एरिया नेटवर्क की सेटिंग में आपने IPv6 की सुविधा चुनी हुई है

वैसे आप एक सीधीसादी जांच कर सकते है कि आपका कम्प्यूटर इस तकनीक के लायक है या नहीं? क्लिक कीजिए इस लिंक पर, कुछ क्षण प्रतीक्षा करें जांच ख़त्म होने की और देख लीजिये परिणाम खुद ही

अपडेट@ 6:00, 6 जून 2012:

गूगल ने इस बारे में एक कड़ी जारी की है जिसमे IPv6 का खाका खींचा गया है. साथ ही साथ एक अन्य पृष्ठ में विश्व मानचित्र पर इस तकनीक को किन देशों में किस पैमाने पर अपनाया गया है इसकी जानकारी है

क्या आप तैयार है तकनीक के इस बदलाव के लिए?

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