खौफनाक राह, घूरती निगाहें, कमबख्त कार और इलाहाबाद की दास्ताँ

काठमांडू से लौटते हुए हम, इलाहाबाद हेतु अयोध्या-फैजाबाद जाने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग 730 पर आ चुके थे. यहीं एक संभावित घातक दुर्घटना और मौत से सामना होने के बाद जब उस 15 सितंबर की आधी रात का घंटा कहीं बजा होगा तो उस वक्त महज 400 किलोमीटर का सफ़र 20 घंटे में तय कर हम थे बस्ती की ओर जाती सड़क पर.

हमारी कन्या नेवीगेटर के अनुसार अब यह सड़क थी स्टेट हाईवे 64. मेहदावाल नामक स्थान से इस सड़क से बस्ती जाते समय जो अनुभव हमें हुए उसे खौफनाक कहना ठीक होगा. इस 40 किलोमीटर की राह पूरा करने में हमें लगभग सवा घंटा लगा. सड़क बेहद खराब. राह के सारे कस्बे, गाँव बिना बिजली के. पुलिस थानों के कर्मचारी जांघिया-बनियान में सड़क पर घूमते दिखे. दबंग घरों में डीज़ल जनरेटरों से बिज़ली. सारा इलाका मुस्लिम आबादी का प्रतीत हुया. बड़ी बड़ी मस्जिदें. सड़कों, घरों में हरे झंडे.

एक स्थान पर तो मेरी, और पास की सीट पर बैठे ललित शर्मा की की आँखें फटी की फटी रह गईं. सुनसान, गड्ढों वाली सड़क के दोनों ओर, उस अंधेरी रात में, एक किलोमीटर से भी ज़्यादा दूरी तक, सौ से अधिक शानदार चमचमाती लग्ज़री टूरिस्ट बसें कतार से खडीं थीं. वो भी ऐरी गैरी नहीं. अधिकतर तो मल्टी एक्सल वॉल्वो. कहीं किसी इंसा का निशाँ नहीं. और ऐसा नज़ारा तो रह रह कर दिखता रहा.

यूं लगता था कि बहुत बड़े चहल पहल भरे शहर के बस अड्डे पर सैकड़ों बसें खडी हों और किसी रहस्यमयी हमले में सारे मानव ख़त्म हो गए हों. मुझे यह भी ख़याल आया कि ये तो कुछ ट्रांसपोर्ट माफिया सा माज़रा लगता है जहाँ प्रशासन की निगाहों से बचने के लिए सभी बसें यहीं खडी कर दी गईं हैं.

अभी आधा रास्ता ही पार हुया था. सेमारियावान से पहले एक ऐसा पुल मिला जिस तक पहुँचाने वाली निर्माणाधीन सड़क इतनी खराब थी कि एकबारगी लगा हमें वापस मुड़ना होगा. हताशा के पलों में ललित जी नीचे उतरे, पिछली सीट पर सो रहे गिरीश जी को भी जगाया गया. हम तीनों से घूम फिर कर जायजा लिया मिट्टी भरे गड्ढों और संभावित परिस्थितियों का और संभलते संभालते धीमे से गाड़ी निकाल ली पुल के पार

इसी इलाके में एक बार मारुती ईकॊ को मैंने एक गलत गली में मोड़ लिया और शुरू हुई ऎसी भूलभुल्लैया कि हर दस बारह फुट पर मुड़ती गलियां में भटकते ही रह जाते रात के डेढ़ बजे, अगर हमारी कन्या नेवीगेटर ने फुर्ती दिखाते. मिनटों में हमें बाहर ना निकाल लिया होता.

बस्ती की रौशनियाँ दिखनी हुई तो कुछ तनाव कम हुया. रात पौने दो बजे हम बस्ती पार कर नेशनल हाईवे 28 पर थे. हर्रिया में चौकड़ी टोल प्लाज़ा में 80 रूपये दे हम बढे अयोध्या-फैजाबाद की ओर.

पेट्रोल टैंक फुल करवा, 16 सितंबर की उस सुबह जब मैंने मारुति ईको को अयोध्या के बाद, इलाहांबाद जाते राष्ट्रीय राजमार्ग 96 पर मोड़ा तो पांच बज चुके थे. काठमांडू से अकेले ड्राइव करते 24 घंटे हो चुके और दूरी तय हुई थी महज 500 किलोमीटर. थकान हावी हो चुकी थी.

अन्धेरा ही था जब मैंने एक गहमागहमी वाले पेट्रोल पंप के पास गाड़ी रोकी. सीट पीछे झुकाई और सो गया धमकाते हुए कि कोई ना उठाये मुझे, जब मेरी मर्जी होगी खुद उठ जाऊँगा.

नींद खुली सुबह सवा सात बजे. आँखें मलते निगाह गई तो ललित शर्मा, गिरीश पंकज दोनों गायब. नींद में ही झूमते ही सड़क पर खुशनुमा मौसम में एक लंबी चहलकदमी कर लौटा तो पेट्रोल पंप से सटे ढाबे जैसे स्थान पर पानी टंकी के पास तन्मयता से दांतों पर ब्रश करते गिरीश जी दिख गए. मैंने आवाज़ लगा कर पूछा तो पता चला किसी एक किनारे की खटिया पर ललित जी खर्राटे मार सो रहे.

काठमांडू आने जाने के लिए हुई 3000 किलोमीटर की यात्रा वाले रोचक संस्मरणों का संक्षिप्त विवरण यहाँ क्लिक कर देखें »

 

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मैंने इशारा किया चलने का. बड़े मज़े से हाथ-पैर-मुंह धोये, ब्रश किया, एक फेसबुक स्टेटस डाला और जम गया एक बार फिर ड्राइविंग सीट पर.

अभी हम ज़रा सा आगे बढे ही थे कि महफूज़ अली ने फेसबुक स्टेटस देख मोबाईल पर घंटी बजा दी -अरे आप इलाहाबाद पहुँच गए? मैं भी इलाहाबाद आया हुआ हूँ, कहाँ मिलेंगे आप सब?

मैंने कहा अभी तो ग्यारह बज जायेंगे इलाहाबाद पहुंचते, कहाँ मिलेंगे ये तो वहां पहुँच कर ही बता पाऊंगा. दरअसल फेसबुक स्टेटस में लोकेशन इलाहाबाद की डल गई थी और वे समझे कि हम पहुंच चुके हैं इलाहाबाद.

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इस बीच इलाहाबाद में पदस्थ कृष्ण कुमार यादव जी की कॉल आ चुकी थी. ललित जी ने पिछली रात ही उन्हें मोबाईल संदेश भेजा था. बातचीत में यह तय हुया कि दोपहर भोजन उनके आतिथ्य में होगा और एक संक्षिप्त मुलाकात के बाद हम रवाना हो जायेंगे रीवां की ओर. मैंने कन्या नेवीगेटर को निर्देशित किया इलाहाबाद इंडियन पोस्ट के अतिथिगृह के लिए और बढ़ चले उस ओर.

इलाहाबाद पहुंचते पहुंचते हमें ग्यारह बज गए. इस बीच हमारे विश्राम स्थल बदले जाने की सूचना मिली यादव जी द्वारा. अब वह स्थल था सिविल लाइंस में जीपीओ. रोबोट नेवीगेटर हमें सही राह बता रही थी लेकिन हम मानव अपने स्वभाव मुताबिक़ उसे गलत ठहराने की कोशिश में कभी किसी सड़क पर मुड़ जाते कभी किसी चौराहे पर खड़े हो जाते, पूछताछ के लिए.

मैंने साथियों से आग्रह किया कि एक बार इसे इसकी मर्जी वाली ज़गह पर पहुँच जाने दो, फिर चाहे जितनी पूछताछ कर लेना.

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इलाहाबाद का आल सेंटस कैथेड्रल चर्च

हुआ वही, इस रोबोट कन्या ने एक व्यस्त इलाके में ठीक जीपीओ के गेट के सामने रोका, लेकिन संयोगवश वह गेट बंद कर दिया गया था. जब आगे बढे तो नेवीगेटर ने दूसरा गेट सुझाया और हम एक चर्च वाले बड़े से चौराहे पर घूम कर  दाखिल हो गए उस अंग्रेजों के ज़माने की बनी इमारत के परिसर में.

भारतीय डाक सेवायों के निदेशक, यादव जी ने अपने स्टाफ को पहले ही बता रखा था हमारे बारे में.  उनके अधिकारियों कर्मचारियों ने हमें, हमारे छिटपुट सामान को उस इमारत की ऊपरी मंजिल पर दो बड़े बड़े कक्षों में पहुंचाया. जिस कक्ष में मैं था वह 50 X 50 फुट का तो रहा होगा. मैंने आव देखा ना ताव  लंबे चौड़े बिस्तर पर चादर ओढ़ सो गया कि मुझे कोई ना उठाये खुद उठ जाऊंगा.

यादव जी को इत्तला दी गई. उन्होंने कहा -भोजन कीजिए, आराम कीजिए. जब तरोताजा हो जाएँ तो सूचित कीजिएगा. परिसर में, ऑफिस में ही हूँ तुरंत आ जाऊँगा.

दोपहर 1:25 पर महफूज़ अली का नाम पुकारती कॉल आनी शुरू हुईं. मोबाईल पास ही रखा हुया था साइड टेबल पर. लेकिन थकान भरी नींद के कारण शरीर इतना शिथिल हो चुका कि चाह कर भी फोन उठाने से आलस्य करता रहा. लेकिन काल्स आती ही रहीं. बड़ी कोशिश से आँखें बंद किये हुए ही मोबाइल टटोल कर कान से लगाया और ऊपर आने की राह बताता गया उन्हें. कॉल चलते में ही वे आए और बिस्तर पर ही मेरे सीने से लिपट गए.

बड़ी मुश्किल से आँखें खोली, शरीर को हरकत दी तो ललित शर्मा सोफे पर आराम करते नज़र आये. मैंने पूछा कि इतने बड़े 10 X10 के बिस्तर पर एक किनारे सो नहीं सकते थे? ज़वाब मिला -आपकी नींद में खलल पड़ जाता तो नाराज़गी झेलनी पड़ती.

साथ ही उन्होंने सूचित कर दिया कि स्नान कर, वे और गिरीश जी, दोनों भोजन कर चुके. हंसते हुए उन्होंने एक आँख दबाई और कहा -रसोईया पूछ रहा था, ड्राईवर सा’ब खाना कब खायेंगे?

उस बड़े से कक्ष से लगा हुया ही किचन और डाइनिंग रूम है. गिरीश जी दूसरे कक्ष में आराम कर रहे थे. मस्त गरम पानी के स्नान के बाद मैंने भोजन की गुहार लगाई. ललित शर्मा, महफूज़ अली ने मना कर दिया साथ देने से.

सादा लेकिन स्वादिष्ट भोजन परोसते रसोईये ने बड़ी उत्सुकता और हैरानीपूर्वक मुझसे पूछा -आपके साथी बता रहे थे कि आप छत्तीसगढ़ से अकेले कार चला कर काठमांडू गए और अब अकेले ही चलाते लौट रहे. ये सच है क्या? मैंने सहमति में सर हिलाया तो सुनने मिला -बड़ी हिम्मत का काम है सर ये तो!

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दोपहर 3 बजते बजते यादव जी आ कर भी शामिल हो गए हमारी बातों में. ब्लॉगिंग सहित कई राजनैतिक, सामयिक, व्यक्तिगत बातें चलती रहीं. चाय का दौर चलते में जनसंदेश टाइम्स की पत्रकार भी आ गईं.  बातों का दौर जारी रहा.

शाम के साढ़े चार बज रहे थे, जब हमने प्रस्थान की सोची. इससे पहले हम कूच करें,  कृष्ण कुमार यादव जी, परिसर के भ्रमण पर ले गए.

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अंग्रेजों की इमारत के साथ ही भारत सरकार द्वारा एक और इमारत बनाई गई है जिसमें फिलाटेलिक काउंटर, संग्रहालय सहित कुछ कार्यालय भी हैं.

वहीं बाहर बड़ी शान से सन 1872 का षट्कोणीय लैटर बॉक्स चमचमा रहा है.

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1872 के लैटर बॉक्स संग, बायें से दायें -महफूज़ अली, कृष्ण कुमार यादव, बी एस पाबला, गिरीश पंकज

भवन के भीतर अंग्रेजों के सुप्रसिद्ध रॉयल कोट ऑफ़ आर्म्स की प्रतिकृति उकेरी गई है.

साथ ही साथ विभिन्न अवसरों पर जारी डाक टिकटों, प्रथम दिवस आवरण के वृहद रूप अन्य अवसरों के छायाचित्रों, ऐतिहासिक जानकारियों सहित सज्जापूर्वक रखे गए हैं.

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पांच बजते बजते मैं अपनी ड्राइविंग सीट पर जम चुका था. सामान पहले ही कर्मचारियों द्वारा रखा जा चुका.

महफूज़ अली तथा कृष्ण यादव जी ने अपनी सारी टीम के साथ, हाथ लहराते हुए हमें विदा किया और हम अपनी कन्या नेवीगेटर की बताई राह पर चल पड़े पिछले फूटे कांच के बदले लगी रंग बिरंगी चादर वाली पताका फहराते 🙂

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इससे पहले कि हम इलाहाबाद से बाहर से बाहर निकलें, वहाँ के बाशिंदों ने ट्रैफिक के मामले में बहुत हलाकान किया. कई बार तो ऐसा लगा ललित जी कहीं गाड़ी से उतर किसी को पीट ना दें. 😀

किसी भी दोपहिया वाहन में रियर व्यू मिरर अपने निर्धारित स्थान पर नहीं दिखे, कोई भी वाहन कभी भी किसी भी दिशा में मुड़ता दिखा, भागती गाड़ी के आगे से कोई भी कभी भी किसी की तरफ से सड़क पार करते लोग दिखे, किसी भी चौराहे पर लाल बत्ती की परवाह करते लोग नहीं दिखे.

ऐसे ही एक लाल बत्ती पर मैंने एम जी रोड पर सुभाष चौराहे पर गाड़ी रोकी. पीछे गाड़ियों के हॉर्न बजने लगे. बाजू से तमाम वाहन, लाल बत्ती होने के बावजूद भागे जा रहे थे आगे. मेरे पीछे की जीप ने जैसे तैसे अपने आप को निकाला और हमारे पास से गुजरते हुए गाड़ी रोकी, ड्राईवर ने गरदन निकाल पहले हमें घूरा, फिर नंबर प्लेट पर निगाह डाली और बाएँ ओर गरदन झटकते बढ़ गया आगे.

मुझे बड़ा गुस्सा आया. लाल बत्ती का रंग बदल ही नहीं रहा था. आव देखा ना ताव गाड़ी आगे बढ़ा दी.  जो होगा देखा जाएगा के अंदाज़ में. लेकिन रोकता कौन? कोई था ही नहीं वहां!

मुट्ठीगंज के बेहद भीड़ भरे इलाके से होते हुए जब हमें इविंग क्रिश्चन कॉलेज के पास वाले गंगा नदी के पुल तक कन्या नेवीगेटर ने पहुंचाया तो पता चला ठीक पुल के पहले चार चार फुट ऊंचे खंभे लगा कर उस रास्ते को बंद कर दिया गया है.


इस उम्मीद में गाड़ी मोड़ी कि कन्या नेवीगेटर हमें किसी दूसरे रास्ते से ले जाए. लेकिन वह भी घुमा फिरा कर उसी राह ले आई. मैंने खीज कर दूर कहीं जाने की सोची जिससे कोई दूसरी राह मिल जाए पुल पार करने की. लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात. नौ किलोमीटर दूर जा कर भी रोबोट नेवीगेटर वहीं ले जाने लगी. ललित जी ने किसी राहगीर से पूछा उसने भी वही राह बताई. ललित जी चिल्लाये -अबे! वहां तो खंभे लगे है! ज़वाब मिला -तो नीचे से उतर कर घूम जाईये.

सामने ही पश्चिम बंगाल के नंबर वाली कार बिंदास चले जा रही थी. मैंने उसका पीछा करना शुरू कर दिया. कमबख्त वो भी ठीक वहीँ पहुंची जहां खंभे गड़े थे. इससे पहले मेरे मुंह से गालियाँ निकलती, वह कार नदी की ओर जाती एक सड़क की ओर उतर गई. मैं भी पीछे पीछे लपका. ललित जी ने कहा ये तो घाट की ओर जा रही. मैं बढ़ते गया और आखिर नदी के समांतर जाते नेवीगेटर ने सुझाया पुल पर जाने का नया रास्ता. तब कहीं जा पुल पार कर पाए हम.

अब हम थे नेशनल हाईवे 27 पर. सड़क का सुधार कार्य जारी था. औद्योगिक इलाका दिख रहा. चाय पी गई सड़क के किनारे खाट पर बैठ कर.

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काठमांडू आने जाने के लिए हुई 3000 किलोमीटर की यात्रा वाले रोचक संस्मरणों का संक्षिप्त विवरण यहाँ क्लिक कर देखें »

 

रीवां करीब 130 किलोमीटर था, वहां से. पहले तो इरादा था रीवां का किला देखते हुए जाने का. लेकिन अब तो मामला ही गड़बड़ हो गया. शाम के छः बज रहे.फिर तो रात भर गाड़ी कहाँ कहाँ से गुजरी याद नहीं, क्योंकि सड़क ठीक ही थी 🙂

आधी रात जब गाड़ी मंगवान नाम की जगह पर थी तो हम रीवां से 30 किलोमीटर दूर थे और राह बदल कर हो गई थी राष्ट्रीय राजमार्ग 7. अभी तो 700 किलोमीटर का सफ़र बाक़ी था, खराब सडकों से बचने की जुगत में जबलपुर हो कर जो जाना था!

ठीक सोचा था ना हमने?

अगली कड़ी में क्लिक कर पढ़िए धुआंधार बारिश, दिमाग का फ्यूज़ और सुनसान सड़कों पर चीखती कन्या को प्रणाम

खौफनाक राह, घूरती निगाहें, कमबख्त कार और इलाहाबाद की दास्ताँ
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7 दिनों में, भिलाई से सड़क मार्ग द्वारा
काठमांडू आने जाने के लिए हुई 3000 किलोमीटर की यात्रा वाले प्रतिदिन के रोचक संस्मरण 8 हिस्सों में में लिखे गए हैं. जिन्हें रुचि अनुसार पढ़ा जा सकता है इन कड़ियों पर क्लिक कर

  1. काठमांडू सफ़र के पहले की दहशत
  2. काठमांडू की ओर दही की तलाश में तीन तिलंगे
  3. काठमांडू जाती कार को नागालैंड वाले खींच ले गए
  4. भैंसा भोजन, खिलखिलाती युवती, पीछा करते युवक और आधी रात का काठमांडू
  5. नेपाल की मुर्गी, उसकी मुस्कान, मेरी नाराज़गी और लाखों का मुआवजा
  6. सुबह सुबह तोड़-फोड़, माओवादियों से टकराव, जलते टायरों की बदबू और मौत से सामना
  7. खौफनाक राह, घूरती निगाहें, कमबख्त कार और इलाहाबाद की दास्ताँ
  8. धुआंधार बारिश, दिमाग का फ्यूज़ और सुनसान सड़कों पर चीखती कन्या को प्रणाम
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7 दिनों में, भिलाई से सड़क मार्ग द्वारा
काठमांडू आने जाने के लिए हुई 3000 किलोमीटर की यात्रा वाले प्रतिदिन के रोचक संस्मरण 8 हिस्सों में में लिखे गए हैं. जिन्हें रुचि अनुसार पढ़ा जा सकता है इन कड़ियों पर क्लिक कर

  1. काठमांडू सफ़र के पहले की दहशत
  2. काठमांडू की ओर दही की तलाश में तीन तिलंगे
  3. काठमांडू जाती कार को नागालैंड वाले खींच ले गए
  4. भैंसा भोजन, खिलखिलाती युवती, पीछा करते युवक और आधी रात का काठमांडू
  5. नेपाल की मुर्गी, उसकी मुस्कान, मेरी नाराज़गी और लाखों का मुआवजा
  6. सुबह सुबह तोड़-फोड़, माओवादियों से टकराव, जलते टायरों की बदबू और मौत से सामना
  7. खौफनाक राह, घूरती निगाहें, कमबख्त कार और इलाहाबाद की दास्ताँ
  8. धुआंधार बारिश, दिमाग का फ्यूज़ और सुनसान सड़कों पर चीखती कन्या को प्रणाम
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खौफनाक राह, घूरती निगाहें, कमबख्त कार और इलाहाबाद की दास्ताँ” पर 21 टिप्पणियाँ

    • :Smile:
      टूटने से तो दो चार टुकड़े होंगे
      फूटने से तो जर्रा ज़र्रा बिखर जाता है

  1. सच है, अनजानी राहों पर बिना थके लगातार गाड़ी चलाना भी किसी रोमांच से कम तो नहीं। बड़ी अच्छी लगी ब्लॉगरों की आत्मीय बैठक।

    • :Daze:
      कभी कभी तो दिमाग ही चकरा जाता था

  2. आदरणीय श्री पाबला जी |
    आप इलाहाबाद आये भी ,चले भी गए ….मैं भी आजकल इलाहाबाद में ही हूँ |मेडिकल कालेज में |वैसे पिछले वर्ष आप लखनऊ तक तक ही आये थे ,तब मेरी आपसे बात हुयी थी |इस बार मुझे हवा ही नही लगी की आप मेरे बगल वाली सड़क से ही निकल रहे हैं |डाक-खाना {इलाहाबाद का जी पि ओ }एक ऐसी जगह हैं जहाँ लगभग हर इलाहाबादी का कोई न कोई कार्य पड़ता हैं |श्री कृष्ण कुमार जी के कार्यकाल में बहुत ही सार्थक सुधार हुए हैं |इलाहाबाद डाक परिक्षेत्र ने महाकुम्भ से लेकर उत्तराखंड त्रासदी तक बड़ी जिम्मेदारी भरे कर्तव्यों का निर्वहन किया हैं |ट्रैफिक रूल्स का पालन करने वाले इलाहाबाद में ,अक्सर परेशान हों जाते हैं …..आज्कल इलाहाबाद नामा लिख रहा हूँ …..आप उसपर अपने जैसा ही मेरा अनुभव पायेंगे |सुंदर चित्र |
    सुंदर लेखनी
    “अजेय-असीम{Unlimited Potential}”|

    • :Heart:
      चलिए, अगली बार हो जायेगी मुलाक़ात

  3. इलाहाबाद का ट्रैफ़िक देखकर तो मुझे अपने रायपुर की ट्रैफ़िक व्यवस्था पर गर्व हुआ। वरना सबसे घटिया ट्रैफ़िक रायपुर और अहमदाबाद का ही समझता था। ये तो इन दोनो को भी मात कर गया। सैल्यूट इलाहाबाद एवं इलाहाबादी 🙂

    • :Star-Struck:
      गज़ब का ट्रैफिक (नॉन) सेंस था इलाहाबादियों का

  4. आनंद आ गया , यात्रा विवरण पढ़कर ! अगले किसी प्रोग्राम में हम भी उम्मीदवार हैं आपके साथ चलने के लिए !

  5. रोचक विवरण। इलाहाबाद में यातायात कि स्थिति वास्तव में बेहद ख़राब है।

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