इस दीपावली ने मेरी लाड़ली की जान ले ली

पिछली सर्दियों की एक सुनसान सी रात करीब 11 बज़े जब हम दोनों टहलने निकले तो घर से चन्द कदम की ही दूरी पर उसकी रफ्तार कम होते होते रूक गई।

मैंने डाँट भी लगाई लेकिन कोई असर न होते देख जब ध्यान दिया तो वह आसमान की ओर मुँह किए कुछ देख रही थी। मैंने जब पूछा कि समस्या क्या है तो उसने आराम से बैठते हुए इशारा सा किया कि आप भी देखो!

मैंने उत्सुकता के मारे उसकी नज़रों का पीछा किया तो कुछ सेकेण्ड में पाया कि हज़ारों फुट ऊपर एक जेट हवाई ज़हाज़ गुज़र रहा है!

जेट की कोई आवाज़ तो नहीं आ रही थी लेकिन धीमी सी रौशनी ज़रूर जगमगा रही थी।

इतनी संवेदनशील थी मेरी डेज़ी!! डेज़ी, मेरी लाड़ली जर्मन बॉक्सर

daisy-bspabla

(हमारे कैमरे से डेज़ी )

डेज़ी को मेरे सुपुत्र गुरूप्रीत जिद करके ले आए थे। आते ही वह हमारे परिवार से घुलमिल गई थी। हमारी माता जी का नज़रिया भी बदला और डेज़ी उनकी चहेती बॉडीगार्ड बन गई। घर के पास वाले मैदान में जब शाम को माँ, डेज़ी के साथ जाती तो ढ़ेरों बच्चों के बीच डेज़ी की कलाबाज़ियाँ देखते ही बनती थीं। माताजी जब उठकर चलने को होती तो ऐसा लगता कि किसी व्ही आई पी का चौकन्ना सुरक्षा गार्ड चारों तरफ नज़र रखे हुए है।लोग कहते होंगे कि पालतू को घुमा कर लाया जाए। यहाँ तो उल्टा चक्कर था।

सुबह, शाम, रात को निश्चित समय पर मुझे घुमाकर लाना शायद उसका एक फितूर बन चुका था। मेरे ध्यान न दिए जाने पर तरह तरह के हथकंडे अपनाना वह सीख चुकी थी। फ्रिस्बी मुँह में दबाकर स्प्रिंग जैसे उछलना, सामने लॉन में जाकर अज़ीबोगरीब आवाज़ें निकालना या सीधे मेरी छाती परअगले पाँव रख कर डाँटने के अंदाज़ में जोर जोर से भौंक कर शिकायत करना उसका अचूक हथियार होता था।

अभी पिछले महीने ही दशहरे वाली शाम हम दोनों मैदान में बैठे थे कि इलाके के दशहरा उत्सव स्थल पर आतिशबाज़ी शुरू हुई। डेज़ी ने पहले उत्सुकता से दो कदम बढ़ा कर देखा, लेकिन फिर मुझसे सट कर आड़ लेने की कोशिश करनी चाही। मुझे साफ महसूस हो रहा था कि उसका शरीर सूखे पत्ते जैसा थरथरा रहा है। बहुत कोशिश की उसका डर खतम करने की, लेकिन वह मुझे घर ले जा कर ही मानी।

दीवाली की पूर्व संध्या पर जब अस्पताल से, अपनी दादी के पास से, बिटिया ने फोन कर कुछ देर से आ पाने की बात कही तो डेज़ी का हाल भी जानना चाहा। तब मेरा ध्यान गया कि उसकी तो कोई हलचल नहीं हो रही कुछ समय से। मैंने आवाज़ लगाई, पूरे घर को अन्दर बाहर देख लिया, पास-पड़ोस पूछ लिया कुछ हासिल नहीं हुआ। मैं परेशान। बिटिया को फोन कर ज़ल्दी आने को कहा। आधे घंटे बाद जब वह आई तो उसी ने बमुश्किल 7 इंच की उँचाई छोड़े गए डबल दीवान-बेड के नीचे दुबकी हुई डेज़ी को ढ़ूँढ़ निकाला।

बड़ी मुश्किल से उसे बाहर निकाला गया। अर्द्धबेहोशी की हालत में उसका मुँह सूख चुका था, कान- पूँछ दुबके हुए थे। मुँह ऐसा खुला हुआ था जैसे बहुत आश्चर्यजनक चीज देख ली हो। उस रात वह मेरे पैरों के बीच ही दुबकी रही।

दीपावली की सुबह उसके डॉक्टर ने जाँच की तो शक जाहिर किया गया कि उसने कुछ खा लिया है जिससे गले का संक्रमण हो गया है। दो दिन में ठीक हो जाएगा। लेकिन शाम, फिर रात होते होते तो पटाखों, आतिशबाजी के दौर ने डेज़ी की वह हालत की, कि मुझे लगने लगा मेरी गोद में कहीं कंक्रीट तोड़ने वाली मशीन तो नहीं पड़ी हुई! रह रह कर वह मेरी ओर देखती और कराह कर जैसे कहती कि इनको मना करो ना!

मैं भी क्या करता? संसद ने इतने बड़े बड़े कानून बना कर भारत सरकार को दिए हैं, उसका पालन करने को बड़े बड़े विभाग बनाए गए हैं, जनता को जागरूक करने को करोड़ों रूपए विज्ञापन के लिए दिए गए हैं, स्थानीय प्रशासन भी एक कागज़ के टुकडे पर अपील जारी कर चुका है। इसके बाद भी मेरे कुछ करने की ज़रूरत थी?

वैसे डेज़ी जैसे दुबके हुए और भी कई लोग होंगे। वे लोग, जिनको अधिकार था उन तीव्र आवाज़ वाले पटाखों को बनाने वाली फैक्टरी के निरीक्षण का, उन पटाखों को बनने से रोकने का, उन पटाखों को दुकानों पर बिकने से रोकने का, उन पटाखों का उपयोग किए जाने पर दंड दिए जाने का, वे सभी पता नहीं कहाँ दुबके हुए थे।

बिटिया मुझसे एक ही बात पूछ रही थी कि जब किसी फैक्टरी में बनने ही नहीं दिए जाएंगे ऐसे भारी भरकम शोर वाले पटाखे तो जनता कहाँ से यह गुनाह कर पाएगी। अब मैं उसे सरकार का राजस्व अर्थशास्त्र समझाने बैठता तो शायद वह ही फट पड़ती।

डेज़ी का खाना छूट चुका था। दीपावली के दूसरे दिन भी एंटीबायोटिक से फर्क पड़ते नहीं दिखा तो 19 अक्टूबर को उसे जिले के पशु चिकित्सालय ले जाया गया। रेबीज़ का शक हुआ तो तुरंत दूर भी हो गया क्योंकि वह पानी भरपूर पीने की कोशिश करती थी। जिस पानी की टंकी में उसने मुझे ढ़केला था उसमें तो वह अपनी आँखों तक चेहरा डुबो कर पानी पीने की कोशिश कर रही थी। शायद पानी उसके हलक के नीचे नहीं जा रहा था। मेरे पूरे निर्देश मानती वह तितलियों के पीछे भागती रहती। बस, जबड़ा बंद नहीं हो रहा था। जीभ एकाएक कालापन लिए बाहर आती और वह बेहोश हो जाती थी। मस्तिष्क में अनियमित रक्त प्रवाह से ऑक्सीजन की अनुपलब्धता व आंशिक पक्षाघात की संभावनाएँ बताई जा रही थीं।

राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त डॉ रॉय की टीम में डॉ तिवारी, डॉ अली, डॉ रात्रे की सतत निगरानी में दो दिन रही डेज़ी को हम घर ले आए थे क्योंकि वह मेरे बिना रह नहीं पाती थी और मुझे तेज़ बुखार था, मैं वहाँ जा नहीं पा रहा था। 20 की रात डेज़ी की चीख-पुकार ने सारे रहवासियों को परेशान किया। मैं जब तक उससे बात करते रहता, कहानी सुनाता वह चुप रहती। तेज़ बुखार में मेरे बेसुध होते ही उसकी कराह शुरू हो जाती। 21 को उसे हल्का सेडेटिव दिया गया तो शांत लेटी रही थी।

22 की सुबह उसकी तड़पड़ाहट मुझसे देखी नहीं जा रही थी। मैं अकेला ही उसे ले कर वेटरनिटी कॉलेज़ भागा। डॉक्टर बाहर ही इंतज़ार कर रहे थे, लेकिन उन्होंने देखते ही कह दिया कि यह इसकी अंतिम सांसें हैं! बच्चों को बुलाने के लिए मोबाईल जेब से निकाला ही था कि डेज़ी ने जैसे एक बार मुझे जी भर देखा और अपने प्राण त्याग दिए। मैं ठगा सा खड़ा रह गया। मेरी लाड़ली डेज़ी जा चुकी थी।

आज मेरा घर चिड़ियाघर शांत पड़ा हुआ है। डेज़ी के बर्तन में मुँह मार कर भाग जाने वाले कौए, डेज़ी की पीठ पर सवार हो जाने वाली गिलहरियाँ, डेज़ी की नींद में खलल डालने वाला चिड़िया समूह, उसे चुनौती देते सरपट भागते चूहे, साथ-साथ फुदकने वाले मेंढ़क, सब खामोश जैसे इंतज़ार कर रहे हों अपने दोस्त का। उन्हें कौन बताए कि वो तो हम मनुष्यों के शौक पर कुर्बान हो चुकी

इस दीपावली ने मेरी लाड़ली की जान ले ली
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इस दीपावली ने मेरी लाड़ली की जान ले ली” पर 34 टिप्पणियाँ

  1. पाबला जी,

    मेरे घर का कुत्ता "जैंगो" भी फटाकों की आवाज से बहुत डरता और काँपता है। यह डर ही था जिसने डेज़ी को आपसे सदा सदा के लिए अलग कर दिया।

    ईश्वर आपको डेज़ी के वियोग को सहन करने की क्षमता प्रदान करे और डेज़ी की आत्मा को शान्ति!

  2. जाने वाला जाता है पीछे छोड़ जाता है लम्बी यादें। जो कभी हमें रुलाती तो कभी हम को हंसाती हैं।

    कुछ दिन पहले मेरे दोस्त के घर से भी ऐसा ही मेहमान चला गया, शायद मेरे लिए उतना दुखददायक नहीं था, जितना उसके और उसकी माता के लिए या फिर उनके आस पड़ोस वालों के लिए। बहुत दुख होता है जब कोई अपना जाता है।

  3. aadarniya pabla ji…….

    main aapka dukh samajh sakta hoon….. main khud aise hi samasya se joojh raha hoon…… mere paas bhi chaar kutte hain….. jismein se ek ko paralytic attack ho gaya hai…… abhi ICU mein admit hai….. doctor ne kaha hai hai….. ki isko aap euthansia de dijiye….. lekin main usko thik karne par zor de draha hoon….. main bhi kutton se bahut pyar karta hoon….. main aapka dukh samajh sakta hoon…… mujhe bahut afsos hai Daisy ki mrityu par….. bhagwaan uski aatma ko shanti pradaan kare……

    subah subah kawwon ko kuch roti zaroor khila dijiyega….. DAISY ki yaad mein….. kyunki aisa kaha jata hai ki jab bhi koi jaanwar jo ghar ka sadasya hota hai…. uski besamay mrityu par….. uski aatma kawwon ke roop mein aa kar khana maangti hai…. maine yeh dekha hai….. main khud jaanwaron se bahut pyar karta hoon…. maine 3 gaay, 2 bhains, 4 kutte, aur kaafi parinde paal rakhe hain….. aur bhi pehle jo paale they kutte paale they…. unki jab mrityu hui ….. to next day….. ghar ki chhta ya aas paas kawwe aa kar bahut chillate they….. phir unko roti de deta tha to phir kha ke chale jaate they…..

    Bhagwaan ….. DAISY ki aatma ko shaanti de…. main is dukh ki ghadi mein aapke saath hoon….

    saadar,

    Mahfooz

  4. बहुत इमोशनल कर दिया आपने पाबला जी , ईश्वर आपको इससे उबरने के लिए जरूरी उर्जा दें….

  5. aadarniya pabla ji…….

    main aapka dukh samajh sakta hoon….. main khud aise hi samasya se joojh raha hoon…… mere paas bhi chaar kutte hain….. jismein se ek ko paralytic attack ho gaya hai…… abhi ICU mein admit hai….. doctor ne kaha hai hai….. ki isko aap euthansia de dijiye….. lekin main usko thik karne par zor de draha hoon….. main bhi kutton se bahut pyar karta hoon….. main aapka dukh samajh sakta hoon…… mujhe bahut afsos hai Daisy ki mrityu par….. bhagwaan uski aatma ko shanti pradaan kare……

    subah subah kawwon ko kuch roti zaroor khila dijiyega….. DAISY ki yaad mein….. kyunki aisa kaha jata hai ki jab bhi koi jaanwar jo ghar ka sadasya hota hai…. uski besamay mrityu par….. uski aatma kawwon ke roop mein aa kar khana maangti hai…. maine yeh dekha hai….. main khud jaanwaron se bahut pyar karta hoon…. maine 3 gaay, 2 bhains, 4 kutte, aur kaafi parinde paal rakhe hain….. aur bhi pehle jo paale they kutte paale they…. unki jab mrityu hui ….. to next day….. ghar ki chhta ya aas paas kawwe aa kar bahut chillate they….. phir unko roti de deta tha to phir kha ke chale jaate they…..

    Bhagwaan ….. DAISY ki aatma ko shaanti de…. main is dukh ki ghadi mein aapke saath hoon….

    saadar,

    Mahfooz

  6. इनसे इतना अपनान हो जाता है कि चारों ओर सूनापन लगता है, इनकी यादें पीछा ही नहीं छोड़ती हमारे आगे-पीछे भागने के वो लम्‍हे बरबस आंखों में चलचित्र की भांति सजीव हो उठते हैं, बहुत ही भावुकता से ओत-प्रोत आपकी यह प्रस्‍तुति अन्‍दर तक झकझोर गई, सच आपके परिवार के लिये कभी दुखद क्षण रहा, ऐसे समय में संयम के साथ डेजी की आत्‍मा की शांति के लिये दुआ है हमारी ।

  7. पाबला जी!
    डेजी के जाने की घटना दुखद है।
    मुझे भी कुत्ते पालने का बहुत शौक है। मेरे साथ तो ऐसा कई बार हो चुका है।
    कुत्ता घर के सदस्य की ही तरह होता है।
    उसके चले जाने पर बड़ा दुख होता है।

  8. आपने भावुक कर दिया-आदमी एंव कुत्ते के प्यार की कहानी हमने पाठ्यक्रम मे पढी थी किसी क्लास में "कुकुर समाधी" जो एक मिशाल है, आपके घर के सूने पन को मै समझ सकता हुँ,

  9. मेरे घर में कुत्ते पालना वर्जित था और है भी.. मगर वर्जनायें तोड़ना शायद मानवों का सबसे प्रिय सगल रहा है.. सो मुझे इस जीव से अथाह प्यार होता चला गया.. डेजी से मैं कभी मिला नहीं, लेकिन उससे मुझे कितना लगाव हो चुका था यह पाबला जी अच्छे से जानते हैं..

    आगे कुछ ना लिखूंगा..

  10. पटाखों की दुनिया छोड़ के,
    प्यार की दुनिया में खुश रहना मेरे यार…
    इक जानवर की जान आज इंसानों ने ली है
    चुप क्यों है संसार…

    पाबला जी, आज तो आप ने रूला ही दिया…काश आपकी ये व्यथा सरकार के कानों तक पहुंचे और फिर किसी डेज़ी को ऐसे डरते-दुबकते दम न तोड़ना पड़े…

    जय हिंद…

  11. पाबला जी,
    मेरे घर के मुख्य दरवाजे के पास एक छोटा सा सीमेंट का चबूतरा बना हुआ, उस चबूतरे के नीचे मेरी लाडली 'धद्दो' सोयी है !
    आज भी उसकी हर एक बात याद आती है पर क्या करे ?? मेरा पहला बच्चा था वो, चला गया …………….
    आपके दर्द को समझता हूँ !
    ईश्वर आपको डेज़ी के वियोग को सहन करने की क्षमता प्रदान करे और डेज़ी की आत्मा को शान्ति!

  12. हमारी भी एक steffy थी वह भी फटाकों से बहुत डरती थी.सभी कुत्ते फटाके से डरते हैं. दीवाली के दिन आप को एक भी कुत्ता बाहर घूमता नहीं मिलेगा. ऐसी १२ दिवाली निकालने के बाद वह मर गयी. बड़ा अफ़सोस हुआ जानकर की आपकी डेजी अब नहीं रही. संभव है की उसने अपनी उम्र जी ली हो

  13. ईश्वर डेजी की आत्मा को शांति प्रदान करें ।

  14. द्विवेदीजी के यहाँ ये खबर पहली बार पढ़ा था. दुखद !

  15. मार्मिक लेखन पावला साहब, जो आपके मन की पीडा को गहरे तक उजागर कर रहा है ! मेंरी तरफ से हार्दिक सवेदना! हालांकि यह दुखद सन्देश हमें शरद कोकास जी के ब्लॉग के मार्फ़त पहले ही चल चुका था ! मेरे घर में भी एक स्वीटी है मेरे साथ पिछले दस साल से ! उससे पहले भी एक और स्वीटी हमारे पास थी जिसे सड़क पर एक स्कूटर सवार ने मार दिया था, और मै वो क्षण आज तक नहीं भूला जब उसे चोट लगी थी और वह अंतिम क्षणों में दौड़कर पास आते हुए हमारा मुह टक्कर कुछ कहने की कोशिश कर रही थी! जो लोग इन जीवो को अपने साथ पलते है वे इस बात को बहुर करीब से जानते है कि इंसान के ये मित्र कितने सवेदनशील होते है, सिर्फ बोल नहीं पाते मगर समझते इंसान से भी ज्यादा है ! जहा मै रहता हूँ उस गली में दिन भर में कई कारे गुजर जाती होंगी मगर ज्यों ही मेरी गाडी घर से करीब १०० मीटर दूर गली के मोड़ पर पहुचती है, स्वीटी भौंकना सुरु कर देती है ! इंसानों में तो शायद हमारा कोई अपना गेट पर बीसों बार हार्न बजाने के बाद ही बाहर निकले !

  16. पाबला जी दिनेश जी के लेख पर पढा था देजी के बारे, बहुत दुख हुया था, कोई शव्द नही बचा कि केसे ओर क्या कहे,घर मे पले जानवर को कोई जानवर कहे तो दुख होता है, मेरे बच्चो ने अपने जन्म दिन पर मांगा था हेरी जो आज सात साल का हो कर हम सब का प्यारा ओर सब का रखवाला है, बहुत दुख होता है, भगवान आप को इस दुख को सहने की शक्ति दे
    ओर डेजी जहां भी हो शांति से रहे.
    नये साल पर या पटाखो के समय, घर के किसी सदस्य को हमेशा घर के पालतू जानवर के पास रहना चाहिये ओर उस समय उसे ज्यादा प्यार देना चाहिये

  17. मै क्या कहूँ पाबला जी , मैने तो सब कुछ कह दिया है ..आपके इस वर्णन से डेज़ी के अंतिम समय के सारे चित्र आँखों के आगे साकार हो गये .. लेकिन वह चित्र जिसमे ऊंचे आसमान में जाते हुए जेट को डेज़ी देख रही है ..मै जानता हूँ वह उस वक़्त सोच रही होगी .".इंसान तुम इस आधुनिक युग या ज़ेट युग में तो पहुंच गये लेकिन अभी सभ्य नहीं हुए ।"

  18. पावला जी डेजी की असमय म्रत्यु को जानकर बहुत दुख: हुआ,ईशवर आपको इस दुख: सहने की शक्ति दे,दिवाली के पटाखो के शोर से कुत्ते को बहुत एनगजाईअटी होती है,इस समय किसि ने किसि का कुत्तों के पास होना बहुत आवश्यक है ।

  19. पाबला जी, मेरे घर में कभी गाय-भैंस के अलावा कोई पालतू न रहा। मुझे विछोह से भय लगता है। वे मुझ से बहुत जल्दी प्यार करने लगते हैं। हालांकि मैं उन्हें पास नहीं आने देता। डेजी को तो पहले ही दिन से मैं ने पास न आने दिया। पर वह थोड़ी ही देर में मेरी नजर को भांप गई थी। दूर रहती थी लेकिन प्यार उस के पास भरपूर था। मैं उस से दुबारा मिलना चाहता था। लेकिन शायद यह विधि को मंजूर न था।

  20. कभी कभी पेट्स हमें इंसान बनने की सीख देते हैं, और हम उनको समझ ही नहीं पाते.
    बड़े दुःख की बात है की आदमी के गलत आचरण ने एक मासूम की जान ले ली.

  21. आपका डेज़ी से प्रेम सर्वज्ञात है । हम इस दुख में शरीक हैं ।

  22. शब्द नहीं है कहने को..भावनाएँ पहुँचेंगी…

    आपका दुख महसूस कर पा रहा हूँ.

  23. पाबला जी,हम आपके दुख को समझ सकते हैं….लेकिन जो विधाता को मन्जूर ।
    ईश्वर आपको संबल प्रदान करे!!

  24. हमारे परिवार ने भी इस दुःख को झेला है और इसको हम सब अच्छी तरह से समझ सकते हैं।ईश्वर आपको इस दुःख को सहन करने की शक्ति दे और डेज़ी की आत्मा को शांति।ॐ शांति शांति।

  25. अपनों के जाने का गम कभी न कभी सबको झेलना ही पडता है .. और इसे सहने की शक्ति ईश्‍वर दे ही देते हैं .. ईश्‍वर डेजी की आत्‍मा को शांति दें .. अब बस यही प्रार्थना कर सकती हूं !!

  26. आखिर मुहे भी रुला गयी डेजी -मेरा भी कोई जैसे कर्ज हो उतर गया अब !
    इसलिए ही मुझे हर दीपावली अपनी डेजी को लेकर गाँव जाना पड़ता है!

  27. जब मैंने बचपन में महान लेखिका महादेवी वर्मा के संस्मरण 'सोना' पढ़ा था तब मेरी आँखें नम हुई थी, आज आपको पढ़कर कुछ ऐसा ही लग रहा है. तुरंत टिप्पणी भी नहीं लिखपाया.

  28. इस मर्मस्पर्शी लेख को पढकर मन भीग गया. जाने वाले चले जाते है लेकिन पीछे यादे छोड जाते है…

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