उत्तर भारत की यात्रा: दिल्ली के एसीपी से पंगा लेने/ ना लेने का कारण

मैं चल तो पड़ा लुधियाना से शान-ए-पंजाब में सवार हो, लेकिन उसे नई दिल्ली पहुँचते इतनी देर हो गई कि मेट्रो नहीं मिली शाहदरा जाने के लिए। वहाँ मेरी बुआ जी रहती हैं। अब आटो रिक्शा वगैरह कर भी लेता तो इतनी रात गए उन्हें असुविधा में डालने का मन नहीं किया। तुरंत ही निर्णय ले एक होटल का रूख किया। रिसेप्शन वाले ने कहा कि पहले कमरा देख लीजिए। एक नज़र मारी -फ्रिज़, टीवी, टेलीफोन, डबल बेड, गीज़र, आलमारी सब दिखे।

एडवांस दे कर, कमरा नम्बर 306 का ताला खोल सबसे पहले पंखा ऑन किया तो हेलीकॉप्टर सी आवाज़ जैसा उसने स्वागत किया। टीवी ऑन किया तो कोई चैनल नहीं दिखा सिवाय कुछ अस्पष्ट सी आवाज़ों के। रिसेप्शन में बताने के लिए फोन उठाया तो वह भी बंद। कुछ देर इंतज़ार किया फिर चौथी मंज़िल से उतर रिसेप्शन पर जा भड़का। ना तो कोई पानी ले कर आया था, ना ही को तौलिया-साबुन पहुँचा। लगे हाथों कुछ नाश्ते को भी कह आया। आश्वासन मिला कि सब अभी ठीक हो जाएगा।
कपड़े बदलने के पहले मोबाईल के जी-टाक पर संदेश लिखा At Delhi on Mobile अभी कुछ मिनट ही हुए थे कि राजीव तनेजा जी की कॉल आ गई अपने घर पर निमंत्रित करने का आग्रह करते हुए। थोड़ी देर बाद ही कुमार राधारमण जी भी ऐसा ही आग्रह करते हुए मेरा हाल-हाल पूछने लगे।
आधा घंटा बीत गया। आधी रात भी हो गई थी। भूख ने जोर मारना शुरू कर दिया। फिर कूद-फांद कर नीचे पहुँचा तो पता चला कि अभी तक तो ऑर्डर ही नहीं मिला था रसोईए को। चेतावनी देते हुए ऊपर चढ़ा तो दरवाज़े के सामने पानी, तौलिया, साबुन लिए एक किशोर खड़ा दिखा। बाथरूम का दरवाज़ा खोला तो वहाँ की अव्यवस्था देख गुस्सा आ गया। उस किशोर ने कह दिया कि यह उसका काम नहीं है सुबह आएगा सफ़ाई वाला।
देर से आए स्नैक्स खाते कुछ ज़रुरी ई-मेल्स का ज़वाब दे कर जो सोया तो नींद खुली सुबह 7 बजे। अव्वल तो मैं गरम पानी से नहाता नहीं लेकिन उस सुबह मन किया कि पानी की ठंडक कुछ कम कर ली जाए। कम्बख्त गीज़र ही बिगड़ा मिला
नहा कर, तैयार हो, भुनभुनाते हुए जब अपना सूटकेस संभाल कमरे से बाहर निकलने लगा तो सफ़ाई वाला, एक मैकेनिक को ले कर खड़ा मिला। नीचे रिसेप्शन पर मैंने केवल यही पूछा कि कितने और दूँ? उसने सहमते हुए कहा सर्विस टैक्स छोड़ कर बाकी दे दें। मैंने उपहासपूर्वक कारण पूछा तो ज़वाब मिला कि सर्विस ही नहीं दी जा सकी तो टैक्स कैसा? फिर भी मैंने उसे पूरा बिल काटने को कहा जिससे शिकायत की जा सके। रसीद मिलने के बाद मैंने मालिक से बात करने की इच्छा ज़ाहिर की तो राणा नामक व्यक्ति का एक मोबाईल नम्बर दिया गया जो डायल करने पर बंद मिला। दूसरा नम्बर मांगे जाने पर कहा गया कि बाद में डायल कर लीजिए वे अभी सो रहे होंगे। बातों ही बातों में इशारा कर दिया गया कि ‘वे’ एसीपी हैं!

हालांकि कमरे के कई चित्र लिए हैं, वीडियो रिकॉर्डिंग की है, रसीदें हैं, बातचीत की पूरी रिकॉर्डिंग है। फिर भी भिलाई आने पर मैं सोच रहा हूँ कि जिस दिल्ली में कार के दरवाजे से टकराने पर समझाईश देने वाले को गोली मार दी जाती है वहाँ के एसीपी से पंगा लिया जाए कि नहीं!?
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उत्तर भारत की यात्रा: दिल्ली के एसीपी से पंगा लेने/ ना लेने का कारण” पर 26 टिप्पणियाँ

  1. कारवां गुजरने के बाद की बात है, लेकिन आगे के लिये कभी ऐसा मौका आये(पंजाब से दिल्ली की तरफ़ जाने का) तो सब्जी मंडी स्टेशन पर उतर जाना चाहिये, बाहर निकलते ही मेट्रो स्टेशन है जहाँ से सीधी मेट्रो शाहदरा के लिये मिलती, सिर्फ़ सोलह मिनट में आप शाहदरा होते। इस पोस्ट विशेष पर टिप्पणी इसलिये, क्योंकि मैं खुद शाहदरा का रहने वाला और वर्तमान में लुधियाना से चालीस किलोमीटर दूर रहता हूँ:)

  2. पोस्‍ट तो बनती ही है और वह बन ही गई, बाकी रहा सवाल का जवाब, वह तो सवाल में ही है.

  3. पा'जी!
    एसीपी के इलाके का हाल कैसा होगा? इलाके वालों को भगवान बचाए!

  4. पाबला जी,
    अगर एक बार मुझे याद लिया होता तो कसम खुदा की, एक स्पेशल मेट्रो चलवा देता। कश्मीरी गेट से रात साढे बारह बजे तक मेट्रो मिलती है। अगर सवारी हो तो वे शाहदरा तक भी पहुंचाई जा सकती हैं।
    कोई नामुमकिन नहीं है।

  5. अच्छा किया पंगा नहीं लिया। नहीं तो मुझे भी पहुंचना पड़ जाता और इमरजेंसी लैंडिक करनी पड़ती:)

  6. अब तो आप खुद ही समझ गये होंगे दिल्ली का हाल्……………आखिर राजधानी है।

  7. सरदार जी ,सबसे अच्छा अपना घर होता है उसके जैसी सर्विस कही नही मिलने वाली है |इस लिए मै तो घर से बाहर कम ही निकलता हू | अगर निकल भी गया तो होटल मे रहना आज तक नही किया है |

  8. पिछली बार मे रोहतक के एक होटल मे रुका था, यहां आ कर करीब २० दिन तक बिमार रहा था, इस बार घर पर रुका, जब कि घर पर कुछ भी समान नही था, लेकिन बिमार नही हुआ, क्योकि खाना घर पर ही बनवाता था, बाकी अगर आप ने पंगा लेना हे तो ले लो जी,आप ने पेसे भी दिये ओर कोई आराम भी नही मिला, ओर कमरे की हालात भी अच्छॆ नही हे, लेकिन आगे कोई सुनने वाला भी हो तो बात बने.

  9. सर जी … पंगा ना लो … मैं तो यही कहूँगा ! उनका तो काम ही यही होगा … आप कहाँ बेकार के चक्करों में पड़ोगे !

  10. पंजाबी में गालियाँ खाने की तो उन्हें आदत होगी… दो-चार छत्तीसगढ़िया सुना आते… 🙂 🙂

  11. देखिये बुआ के घर कभी भी जाया जा सकता है. मेरे भतीजे भतीजियाँ तो कभी भी टपक सकते हैं.अब संकोच करेंगे तो यही तो होगा.
    घुघूती बासूती

  12. From FeedBurner:

    बात पंगा लेने की नहीं है…जो गलत है उसके खिलाफ जाना ही चाहिए..

    -veena srivastava

  13. यह तो अच्छा हुआ कि उस रात को पंगा नहीं लिया नहीं तो एस पी साहब रात में ही पी के किसी को कमरे में घुसेड कर दफाए .गुलछर्रे …लगा देते ….जान की खैर मनाईये !
    एक दिन फोन पर तो बतिया ही लीजिये …..

  14. आप के इस पंगात्मक वाकये को पढ़कर महसूस कर सकता हूँ कि ऐसे वक्त किस तरह की खीझ और झल्लाहट हुई होगी।

    गनीमत समझिये कि किसी फूलमती ने दरवाजा नहीं खटखटाया 🙂

  15. ये सात सितारा होटल आपने ढूँढा कैसे ?
    खैर टाइम पास करने के लिए काम तो खूब मिल गया ना ।

  16. वाह होटल तो शानदार खोजा आपने भी | कम से कम फोन कर होटल मालिक को बता तो दीजिये क्या पता उसे भी इन सब की जानकारी ना हो और जिन के भरोसे होटल छोड़ा हो वो भी राम भरोसे चला रहे हो |

  17. नव वर्ष के आगमन पर आपको पुरे परिवार सहित बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाएँ |

  18. अजी एसीपी ने जिस काम के लिये होटल खोल रखा है, उन कामों के लिये किसी ग्राहक को सुविधाओं की जरुरत नहीं होती।

    प्रणाम

  19. आपने तो देश दिखा दिया. क्या यह होटल कहलाने योग्य है? दूसरा इस का सालाना इन्स्पेक्शन होता होगा, इसमें कुछ नहीं मिलता होगा.एसीपी साहब का होटल है. यूं ही तो नहीं बना होगा. सब बड़े कारोबार ऐसे ही थोड़े न खड़े हो जाते हैं… एसीपी से टकराना मुश्किल नहीं. मुश्किल है व्यवस्था से पंगा लेना… और आप व्यवस्था से पंगा लेना चाहते हैं..

  20. नव वर्ष 2011 की हार्दिक शुभकामनायें!

    पल पल करके दिन बीता दिन दिन करके साल।
    नया साल लाए खुशी सबको करे निहाल॥

  21. सुदूर खूबसूरत लालिमा ने आकाशगंगा को ढक लिया है,
    यह हमारी आकाशगंगा है,
    सारे सितारे हैरत से पूछ रहे हैं,
    कहां से आ रही है आखिर यह खूबसूरत रोशनी,
    आकाशगंगा में हर कोई पूछ रहा है,
    किसने बिखरी ये रोशनी, कौन है वह,
    मेरे मित्रो, मैं जानता हूं उसे,
    आकाशगंगा के मेरे मित्रो, मैं सूर्य हूं,
    मेरी परिधि में आठ ग्रह लगा रहे हैं चक्कर,
    उनमें से एक है पृथ्वी,
    जिसमें रहते हैं छह अरब मनुष्य सैकड़ों देशों में,
    इन्हीं में एक है महान सभ्यता,
    भारत 2020 की ओर बढ़ते हुए,
    मना रहा है एक महान राष्ट्र के उदय का उत्सव,
    भारत से आकाशगंगा तक पहुंच रहा है रोशनी का उत्सव,
    एक ऐसा राष्ट्र, जिसमें नहीं होगा प्रदूषण,
    नहीं होगी गरीबी, होगा समृद्धि का विस्तार,
    शांति होगी, नहीं होगा युद्ध का कोई भय,
    यही वह जगह है, जहां बरसेंगी खुशियां…
    -डॉ एपीजे अब्दुल कलाम

    नववर्ष आपको बहुत बहुत शुभ हो…

    जय हिंद…

  22. डाक्टर अरविन्द मिश्र जी जो रिस्क बताया है उससे सहमत !

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