उत्तर भारत की यात्रा: पं. डी के शर्मा ‘वत्स’ की हैरानगी से पड़ा पाला

ब्लॉगर मित्रों का लगातार यह आग्रह बना हुआ है कि उत्तर भारत की हालिया यात्रा का विवरण साझा करूँ। अब समझ नहीं आ रहा कि चाणक्यपुरी बैठक का हाल पहले दिया जाए या उससे इतर अन्य ब्लॉगरों से मुलाकात य फिर कुछ और?

बेहतर यही लग रहा कि यात्रा का कारण बताते हुए शुरू करूँ अपनी बात।

दरअसल मुझे अपनी स्वर्गवासी माता जी के अस्थि विसर्जन के लिए कीरतपुर, पंजाब स्थित पातालपुरी गुरूद्वारा जाना था। इसी सिलसिले में लुधियाना स्टेशन पर 15 दिसम्बर की सुबह 5 बजे उतर, टैक्सी द्वारा अन्य पारिवारिक सदस्यों के साथ मैं 8 बजे के आसपास कीरतपुर जा पहुँचा और गमगीन वातावरण में, निर्देशानुसार तमाम परम्परायों का अनुसरण कर, तुरंत ही लुधियाना स्टेशन के लिए लौट गया।

 जैसा कि मैंने पहले भी लिखा है कि किसी भी धर्मस्थल पर मुझे उसकी स्थापत्य कला, प्रबंधन व वातावरण अधिक आकर्षित करता है।
इसी तारतम्य में कुछ चित्र लेने का मन कर आया जो कुछ ऐसे हैं।
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लुधियाना स्टेशन से कीरतपुर जाते समय जो गहरा कोहरा हमें मिला वह लौटते हुए काफ़ी हद तक छंट चुका था।
जब मैं स्टेशन में दाखिल हुया तो दोपहर का 1 बज चुका था। स्टेशन के ही रेस्तरां में भोजन करते हुए ख्याल आया ज्योतिष की सार्थकता, कुछ इधर की कुछ उधर की वाले पं. डी के शर्मा ‘वत्स’ जी का।
भोजन के पश्चात, शायद पिछले कई दिनों की भाग-दौड़ से हुई थकान या अनायास ही अपने आप को अकेला पा कर मस्तिष्क में उमड़ी भावनायों के कारण अजीब सी घबड़ाहट होने लगी। कुछ आराम कर लिया जाए यह सोच रिटायरिंग रूम की मांग की तो पता चला कि सब के सब आरक्षित हैं। एक खाली होना है 3 बजे के बाद।
शाम 5:25 की ट्रेन है शान-ए-पंजाब। दो घंटे के लिए लगभग 400 रूपए देने पड़ते। वस्तुस्थिति बताए जाने पर एक अधिकारी ने आश्वासन दिया कि दो घंटे के लिए सौजन्यतावश आपको सुविधा मिल जाएगी। मैंने उसी आधार पर ‘वत्स’ जी को सम्पर्क कर रिटायरिंग रूम का ठिकाना बता दिया और उसके खाली होने की प्रतीक्षा में प्लेटफार्म पर ही वक्त गुजारने लगा.
पंडित जी आए तो ढ़ाई बज चुके थे। पहचानने में कोई देर नहीं लगी। वही मुस्कुराहट, वही बातों का अंदाज़। गर्मजोशी से गले मिले हम और रिटायरिंग रूम के खाली होते ही दाखिल हो गए अंदर्। पहली बार आमना-सामना हुया था हमारा।
एक बार फिर इस बात की पुष्टि हुई कि प्रोफ़ाईल में लगे चित्र की तुलना में वास्तविक ब्लॉगर कहीं अधिक युवा दिखता है। बातों ही बातों में पता लगा कि ज्योतिष को पूर्णकालिक समय देने वाले ‘वत्स’ जी अपने होजियरी वाले संस्थान में भी व्यस्त रहते हैं।
इससे पहले कि हम अपनी अन्य बातें शुरू कर पाते, तीन-चार लोग अंदर आ गए कि एक कमरा हमें दे दिया गया है। मैं उन अधिकारी महोदय के पास भागा तो पता चला कि वे तो जा चुके उनकी जगह जो आया उसे कुछ मालूम नहीं। मन मार हम दोनों बाहर आ गए। वैसे भी पंडित जी के आ जाने के कारण भावनायों का ज्वार धीमा पड़ गया था। अब आवश्यकता नहीं रही थी आराम करने की
प्लेटफार्म के बेंच पर सामान रख मैं चाय लेने के लिए मुड़ा तो पंडित जी कुछ इशारा करते उठ खड़े हुए। मैंने सोचा किसी शंका का निवारण करने जा रहे होंगे। लेकिन इधर मैं चाय के कप और बिस्कुट ले आया उधर पंडित जी भी कपों के साथ चिप्स का पैकेट लाते दिखे।
इधर हमने खाते-पीते बातें शुरू कीं। उधर नया-नया खरीदा मेरा कैमरा काम करता रहा।
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हालिया हादसों, ब्लॉगिंग की हलचलों, पारिवारिक चर्चा, व्यापारिक मामलों की बातें करते हुए जब मौसम पर बात आ टिकी तो पंडित जी ने एक खास अंदाज़ में सिर को आहिस्ता से 300 डिग्री घुमाते प्लेटफार्म के लोगों पर निगाह डाली और हैरानगी भरे स्वर में कह ही बैठे कि एक भी बंदा ऐसा नहीं दिख रहा जिसे ठंड ना लग रही हो। उनका इशारा मेरी पोशाक की ओर था।

हंसते हुए मैंने उन्हें बताया कि तीन ही अवसरों पर गरम कपड़ों का सहारा लेता हूँ मैं! पहला तब जब स्वास्थय ठीक ना हो, दूसरा जब सचमुच ठंड हो और तीसरा मौका वह होता है जब किसी की निगाहों का ज़वाब देने की नीयत से यह बताना हो कि मेरे पास भी जैकेट, स्वेटर, कोट आदि हैं। कंगाल नहीं हूँ इस मामले में

अभी बातों का दौर चल ही रहा था कि एकाएक सुपुत्र गुरूप्रीत का फोन आ गया। दवाईयों से असर से बोलने में हो रही तकलीफ़ के बावज़ूद, बेहद भावुकता भरी बातें करते हुए उसने मुझे रुला ही दिया। बहते आँसुयों को झटक कर ध्यान पंडित जी की ओर गया तो वह भी ताज़ा आई फोन कॉल का ज़वाब देते तनावग्रस्त से दिखे।

ज्ञात हुया कि उनके संस्थान में कुछ आवश्यक कार्य आ गया है, उनके भाई का फोन था। मैंने तत्काल उन्हें लौटने का आग्रह किया। अनमने से पंडित जी ने पुन: मिलने के वादे के साथ विदा ली तो पौने पाँच हो गए थे।

सही समय पर आई शान-ए-पंजाब के आरक्षित कुर्सी यान में अपना स्थान ग्रहण कर मैं चल पड़ा दिल्ली की ओर, जहाँ चार दिन रूकने का इरादा बना कर आया था। कारण केवल यही था कि पिछले दिनों की विपत्तियों में उलझे मन को कुछ इधर-उधर भटका सकूँ।

ठीक किया ना मैंने?

उत्तर भारत की यात्रा: पं. डी के शर्मा ‘वत्स’ की हैरानगी से पड़ा पाला
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उत्तर भारत की यात्रा: पं. डी के शर्मा ‘वत्स’ की हैरानगी से पड़ा पाला” पर 17 टिप्पणियाँ

  1. गरम कपड़े पहनने के तीन कारण रोचक बताए |पंडितजी से मिलने का आपको सौभाग्य मिल गया आप बहुत भाग्यशाली है | उनके ये चित्र भी बहुत बढ़िया लगे | इसी प्रकार मिलवाते रहे तो जिंदगी का मेला सफल है |

  2. हम भी मिले हैं एक बार पण्डित जी से लेकिन दिल्ली में।

  3. सत श्री अकाल जी
    मुझे तो हर गुरुद्वारे की स्थापत्य कला, व्यवस्था आदि दूसरे धार्मिक स्थलों से ज्यादा प्रभावित करती है।
    ये सचमुच वाली ठंड कब होती है जी

    पण्डित जी से मिल कर हमें भी बहुत अच्छा लगा था दिल्ली में

    प्रणाम

  4. बहुत सुन्दर रहा ये संस्मरण और साथ मे तो फ़ोटो लगाये है बहुत ही बढिया रहे।

  5. अच्छा लगा आपका पंडित जी से मिलने का संस्मरण पढ़कर.

  6. सुन्दर मनमोहक चित्रों के साथ,पन्डित जी से मुलाकात के बारे में पड़ कर अच्छा लगा ।

  7. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (30/12/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
    http://charchamanch.uchcharan.com

  8. कीरतपुर गुरूद्वारे के दर्शन कर हम भी धन्य हो गए ।
    सुन्दर तस्वीरों सहित नाईस पोस्ट ।

  9. From FeedBurner:

    आपके यात्रा वर्णन में हम भी शामिल हो जाते हैं…

    -veena srivastava

  10. अच्छा लगा देखकर पवित्र गुरुद्वारे को और आपको और पं जी को

  11. अच्छा लगा देखकर पवित्र गुरुद्वारे को और आपको और पं जी को

  12. अच्छा लगा देखकर पवित्र गुरुद्वारे को और आपको और पं जी को

  13. सभी चित्र बहुत सुंदर ओर अच्छे लगे, वत्स जी से मै भी पहली बात लुधियाना मे ही मिला था दस बीस मिंट के लिये ओर वो क्षण जिनद्गी भर नही भुल पाऊंगा, बहुत अपना पन मिला था इन से, फ़िर पता नही रोहतक का वादा कर के भी नही आये,अब बेटे का क्या हाल हे,

  14. पंडत जी तो सदा जुवान है जी। चिरयुवा
    103 साल की उमर में भी क्या जलवे हैं इनके।:)

  15. सब से पहले बेबे को शत शत नमन !

    चलिए … आप के माध्यम से हमे भी दर्शन हो गए इस प्रवित्र स्थल के !

    वैसे पंडित जी अगर चकित थे तो कुछ गलत नहीं थे … आप को इस मौसम में इस हुलिए में देख हर कोई चकित ही होगा !

  16. चलिए पंडित जी ने कुछ देर ही आपका साथ तो दिया …..सचमुच ये दिन बड़े ही कठिन बीते हैं आपके …हिम्मते मर्दा…..आप सभी को पार कर गए हैं …नए वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं !

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