उत्तर भारत की यात्रा: वह खुशनुमा शाम, 12 ब्लॉगरों के नाम

एक दूसरे से पहली बार मिले चार ब्लॉगरों की 18 दिसम्बर को हुई लम्बी बैठक के बाद अजय जी के निवास पर उनकी कई कम्प्यूटर संबंधित तकनीकी उलझनों का शमन करते आधी रात के बाद जो सोया तो दूसरे दिन कब नींद खुली,

कितनी देर हुई इसका अंदाज़ इस बात से लगाया जा सकता है कि झा दम्पत्ति दोपहर भोजन की तैयारियाँ करते धूप का आनंद लेते दिखे। हमने झट अपना कैमरा उठाया और अजय कुमार झा की यह अनोखी अदा कैद कर ली।

इस बीच कई ब्लॉगर साथियों से बात होने के बाद हम दोनों तैयार थे, उस शाम चाणक्यपुरी स्थित छत्तीसगढ़ भवन में ग्राम चौपाल वाले अशोक बजाज जी द्वारा आमंत्रित सौजन्य भेंट हेतु। ऐन वक्त पर अजय जी को एक फोन कॉल आई और वे मायूस दिखे। पता चला कि उनके जिस नए ठिकाने की बातचीत चल रही थी, उस सिलसिले में प्रापर्टी डीलर कुछ महत्वपूर्ण बात करने आ रहा है।

अब मुझे जाना है अकेले। इस बार मेट्रो की वेबसाईट का सहारा लेने का समय ही नहीं मिला। लक्ष्मी नगर मेट्रो स्टेशन की ओर जाते हुए आटो रिक्शा में ही, मोबाईल से गूगल मैप्स पर किराया और मार्ग देख लिया गया।



किराया, दूरी, समय, स्टॉप्स आदि के लिए इससे बड़ा नक्शा देखें
मेट्रो स्टेशन से बाहर होते ही एक खाली आटो भागते दिखा, हाथ दिखाया। उसने साफ कह दिया कि जगह आप बतायोगे। मैंने हामी भरी, लपक कर बैठा और अपने मोबाईल को उसके कान के पास कर दिया। अब एक युवती की आवाज़ उसे बता रही थी राह के बारे में। वह बेचारा आँखें फैलाए आटो दौड़ाता रहा। पलट कर कभी मुझे ताकता, कभी मोबाईल को घूरता। उसकी बोलती बंद हो चुकी थी। यहाँ तक कि छत्तीसगढ़ भवन के ठीक सामने मधुर स्वर में ‘आप अपने गंतव्य पर पहुँच गए है’ सुन कर, किराया तक नहीं बता पाया। मीटर देख उसे भुगतान किया तो वह ऐसे भागा जैसे किसी प्रेतलोक का नज़ारा देख लिया हो।
(स्कूली दिनों के 38 वर्ष बाद मिले अशोक बजाज व रेवा राम यादव)
छत्तीसगढ़ भवन में दाखिल हुआ तो साढ़े पाँच बज रहे थे। अशोक जी को मोबाईल पर सम्पर्क किया गया तो वे अशोक रोड पर मिले। 15 मिनट के अन्दर छत्तीसगढ़ भवन पहुँचने की बात की उन्होंने। तभी पहुँच गए कुमार राधारमण जी। हम दोनों अभी बैठे ही थे कि एक सज्जन मेरा नाम पुकारते हुए आलिंगनबद्ध हो गए। इस आत्मीयता से भ्रमित हो मैंने उन्हें ही अशोक बजाज समझ लिया और कुछ क्षणों बाद उन्हें बधाई भी दे दी। मेरी देखादेखी राधारमण जी भी बधाई देने लगे। उन सज्जन ने हैरानी से पूछा कि किस बात की बधाई? तब खुलासा हुआ कि रेवाराम यादव जी थे, अशोक जी के स्कूली सहपाठी। वे अशोक जी से मुलाकात करने आए थे और उनसे फोन-वार्ता के दौरान मेरा हुलिया बता कर उनके आते तक बतियाने का आग्रह किया था अशोक जी ने। (धोखा इसलिए भी हुआ कि अशोक बजाज जी का चित्र भर देखा था मैंने। और यह हमेशा पाया गया है कि प्रोफ़ाईल चित्र से वास्तविक चेहरा अक्सर ही भिन्न होता है) इसके बाद आगमन हुआ देशनामा वाले खुशदीप सहगल जी और प्रेमरस वाले शाहनवाज़ सिद्दीकी जी का।
इस बीच अशोक जी अपने राजनैतिक मित्रों के साथ आ पहुँचे। फिर धीरे धीरे, हंसते रहो वाले राजीव तनेजा, आईना कुछ कहता है वाली संजू तनेजा, पद्मावलि वाले पद्म सिंह, जनोक्ति वाले जयराम विप्लव, सार्थक सृजन वाले सुरेश यादव, नुक्कड़ वाले अविनाश वाचस्पति, ब्लॉग प्रहरी वाले कनिष्क कश्यप (सर्व जी) ने रास्ता भटकते, फोन कर भवन का पता पूछते अपनी गरिमामय उपस्थिति दी और हम सब वहाँ के कॉन्फ़्रेंस हाल में दाखिल हो गए। जिन ब्लॉगरों से मेरा आमना-सामना पहली बार हो रहा था वे थे
इससे पहले कि वहाँ ब्लॉग बुखार की गर्मी दिखती अशोक बजाज जी के राजनैतिक मित्रों ने उन्हें हमारे बीच छोड़ कर निकलने में फुर्ती दिखाई। ब्लॉगरों के औपचारिक परिचय का आदान-प्रदान अभी खतम ही हुआ था कि टेबलों पर भारी भरकम नाश्ते की प्लेटें सजने लग गईं।
विचार विमर्श चलता रहा। बुज़ुर्ग महिला को एक अफ़सर बेटे द्वारा वृद्धाश्रम में छोड़ कर चले जाना और उसी रात उसकी मृत्यु वाला हादसा, रैन बसेरा में 15 वर्षों से रह रहे लोग, वृद्धों से अनुचित व्यवहार करने वाले सक्षम लोगों के नाम ब्लॉगों पर उजागर करने, वृद्धजनों से उनका पक्ष जानने, बड़े मॉल्स और फुटपाथी व्यव्सायी, राजेश खन्ना अभिनीत अवतार फिल्म, परिवार में बुज़ुर्गों द्वारा ऊल-जुलूल व्यवहार की बातों के बीच सुरेश यादव जी ने एक जापानी बोध कथा सुनाई। राख की रस्सी, बिना हाथ लगाए बजने वाले नगाड़े की रोचक कथा को सभी ने बड़ी तन्मयता से सुना।
खुशदीप जी के चुटकलों के बहाने माहौल में ठहाके गूँज ही रहे थे कि मुझे एक एसएमएस आया Please Call me, I need your help -Shilpa इस एसएमएस में जिस नम्बर को कॉल करने को कहा गया था वह विदेशी नम्बर था लेकिन भारत के मोबाईल नम्बर का भ्रम हो रहा था। मैंने इसकी जानकारी दी तो सभी ने चुटकियां लेनी शुरु कर दीं। फिर तो बातों का रूख मोबाईल कम्पनियों की इस हरकतों पर केन्द्रित हो गया।
मुद्दा फिर बुज़ुर्गों की ओर मुड़ा। जयराम विप्लव जी ने इस समस्या को मेट्रो संस्कृति से जोड़ कर बताते हुए गांवों के हालात बेहतर बताए। इसके अलावा नक्सलवाद की भयावहता पर भी उनका अनुभव सामने आया। थानों में पुलिस वालों द्वारा खुद ही, दरवाज़े पर ताला लगा कर, अंदर रहने की बात पर सभी हैरान थे।
इस बीच चाय आ गई और सभी चुस्कियाँ लेते हुए राजनेतायों द्वारा आर्थिक लाभों के किस्सों पर चर्चा करने लगे। विभिन्न विचारों के बीच कनिष्क कश्यप जी ने हिन्दी ब्लॉगरों द्वारा कविता, व्यंग्य, हास्य द्वारा सामाजिक सरोकारों से जुड़े रहने की भावनायों का उल्लेख किया।
संजू तनेजा जी द्वारा 65 वर्ष वाले द्वारा खुद को बुज़ुर्ग ना मानने की मानसिकता की बात की गई तो माहौल में फिर ठहाके गूँज उठे।
अविनाश जी ने पिताजी ब्लॉग की चर्चा की तो वृद्धों से होते हुए बातों का रुख परिवार में महिलायों की स्थिति की ओर हो गया। इस बीच मैंने भी वृद्धों पर केन्द्रित एक ब्लॉग वृद्धग्राम की चर्चा की। इस ब्लॉग से अधिकतर साथी अनभिज्ञ थे। कथित चिट्ठाचर्चायों में इस तरह के अनूठे ब्लॉगों का जिक्र न होने पर उन्हें हैरानगी हुई तो मैंने उस समय याद आए इंडिया वाटर पोर्टल, मीडिया डॉक्टर, दुधवा लाईव, वृंदा, विज्ञान विश्व, दोस्त, My India-My Cause, स्वास्थ्य चर्चा, इंडियन बाइस्कोप, शैशव के नाम गिनाए। अफ़सोस, अधिकतर का सिर इनसे परिचित होने के समर्थन में नहीं हिला।
ब्लॉगिंग के मुद्दे पर खुशदीप जी ने अपने ब्लॉग लेखन द्वारा तनाव-प्रबंधन में सहायता मिलने की बात की। ब्लॉगर सम्मेलन से सामाजिकता बने रहने के लाभ की बात भी उन्होने की। राधारमण जी द्वारा स्वास्थ्य सबके लिए जैसे विषय विशेष ब्लॉग शुरू करने के तत्काल बाद समय प्रबंधन की चुनौतियों का जिक्र किया। फिलहाल हो रही ब्लॉगिंग को उन्होने टिप्पणी केन्द्रित व स्वकेंद्रित बताया। पद्म सिंह जी द्वारा आज़ाद पुलिस वाली पोस्ट की चर्चा भी हुई।
इस बीच आतिथ्य प्रभारी द्वारा मुझे इशारा मिला तो मैं बाहर जा पहुँचा। बताया गया कि रात्रि भोजन के लिए अन्य अतिथियों हेतु कुर्सियाँ कम पड़ रहीं। हालात को देखते हुए हम सब बाहर हॉल में आ गए।
हॉल में आते ही सुरेश यादव जी ने मुझे अपनी स्वहस्ताक्षरित पुस्तक भेंट की। फिर उन्होने मेरी उस यात्रा संस्मरण वाली पोस्ट की चर्चा छेड़ी जिसमें हम घने जंगलों में खूंखार जानवरों के बीच फंस गए थे।
हॉल में सब अपनी अपनी सुविधानुसार एक दूसरे से वार्तालाप में व्यस्त हो गए। मैंने संजू जी से कहा कि आपको बोरियत होती होगी अकेले होने पर्। तो उन्होने राजीव जी की ओर इशारा किया कि वे ले आते है मना करने पर भी। मैंने राजीव जी को टोका तो वह हंसते हुए नाराज़ हो कर बोले ‘आप लोगों को तो खुश होना चाहिए कि मैं एक ब्लॉगर को साथ ले कर आता हूँ।’
इधर खुशदीप जी, पद्म सिंह, शाहनवाज़ की तिकड़ी नुक्कड़ पर पोस्ट लिखे जाने व चित्रों को अपलोड किए जाने में भिड़ी थी उधर अशोक बजाज जी रात्रि-भोज का आग्रह कर रहे थे जिसे सर्वसम्मति से अस्वीकार कर दिया गया। समय हो चला था 9 बजे का। एक एक कर सबने विदा ली अगली बार मुलाकात करने के वादों के साथ।
(बाएं से संजू तनेजा, राजीव तनेजा, सुरेश यादव, पद्म सिंह, शाहनवाज़ सिद्दिकी, अविनाश वाचस्पति, कनिष्क कश्यप, अशोक बजाज, खुशदीप सहगल, बी एस पाबला, कुमार राधारमण, जयराम विप्लव)
मैं अब सवार था पद्म सिंह की कार में शाहनवाज़ सिद्दीकी, जयराम विप्लव, राधारमण जी के साथ। हम सभी को जाना था यमुना पार। राह की भूलभूलैया में पद्म जी को उलझते देख मैंने अपने मोबाईल की मोहतरमा को इशारा किया और उसने शुद्ध हिन्दी में अजय झा के निवास तक पहुँचाने के लिए उन्हें राह बतानी शुरू की। उस सुमघुर स्वर की सलाह के विपरीत एक-दो बार पद्म जी ने अपनी मर्ज़ी से कार को अलग राह पर ले जाने की कोशिश की तो बदले हुए राह से भी जाने की सलाह जारी रही।

(कुछ बातें ब्लॉगरों की)
अब मुझे अगले दिन 20 दिसम्बर की दोपहर की ट्रेन से भिलाई लौटना था। लेकिन उससे पहले अजीब परिस्थितियों में मुलाकात हुई दो नौजवान ब्लॉगरों से।
क्या हो सकती हैं वह परिस्थितियाँ?


किराया, दूरी, समय, स्टॉप्स आदि के लिए इससे बड़ा नक्शा देखें
मेट्रो स्टेशन से बाहर होते ही एक खाली आटो भागते दिखा, हाथ दिखाया। उसने साफ कह दिया कि जगह आप बतायोगे। मैंने हामी भरी, लपक कर बैठा और अपने मोबाईल को उसके कान के पास कर दिया। अब एक युवती की आवाज़ उसे बता रही थी राह के बारे में। वह बेचारा आँखें फैलाए आटो दौड़ाता रहा। पलट कर कभी मुझे ताकता, कभी मोबाईल को घूरता। उसकी बोलती बंद हो चुकी थी। यहाँ तक कि छत्तीसगढ़ भवन के ठीक सामने मधुर स्वर में ‘आप अपने गंतव्य पर पहुँच गए है’ सुन कर, किराया तक नहीं बता पाया। मीटर देख उसे भुगतान किया तो वह ऐसे भागा जैसे किसी प्रेतलोक का नज़ारा देख लिया हो।

(स्कूली दिनों के 38 वर्ष बाद मिले अशोक बजाज व रेवा राम यादव)

छत्तीसगढ़ भवन में दाखिल हुआ तो साढ़े पाँच बज रहे थे। अशोक जी को मोबाईल पर सम्पर्क किया गया तो वे अशोक रोड पर मिले। 15 मिनट के अन्दर छत्तीसगढ़ भवन पहुँचने की बात की उन्होंने। तभी पहुँच गए कुमार राधारमण जी। हम दोनों अभी बैठे ही थे कि एक सज्जन मेरा नाम पुकारते हुए आलिंगनबद्ध हो गए। इस आत्मीयता से भ्रमित हो मैंने उन्हें ही अशोक बजाज समझ लिया और कुछ क्षणों बाद उन्हें बधाई भी दे दी। मेरी देखादेखी राधारमण जी भी बधाई देने लगे। उन सज्जन ने हैरानी से पूछा कि किस बात की बधाई? तब खुलासा हु

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उत्तर भारत की यात्रा: वह खुशनुमा शाम, 12 ब्लॉगरों के नाम” पर 32 टिप्पणियाँ

  1. सुंदर! काश हम भी आप के साथ होते।
    एक पोस्ट मोबाइल पर रास्ता दिखाने वाली तकनीक के इस्तेमाल पर चाहिए।

  2. khub akele akela mze kr rhe ho bhayi yeh achchi baat nhin he . akhtar khan akela kota rajsthan

  3. आनंद में डूबे लग रहे हैं हर चित्र।

  4. पाबला जी नमस्कार।

    आपके ब्लॉग पर पहले भी आ चुका हूँ पर टिप्पणी प्रथम बार कर रहा हूँ। मैं रायपुर का रहने वाला हूँ और अभी भोपाल में रह रहा हूँ।

    संस्मरण बढ़िया है। जिन दो नौजवानों की बात अंतिम लाइन में कर रहे हैं उनमे से एक के ब्लॉग पर आपसे मुलाकात का विवरण पढ़ चुका हूँ। उस पोस्ट से आपके बारे में काफ़ी बातें जानने को मिली थी। वैसे भी आपकी तारीफ़ और चर्चा तो बहुत जगहों में पढ़ने को मिल ही जाती है।

  5. पूरे एक दर्जन ब्लॉगर 🙂

    बढिया मीट रही,केक और पेस्ट्री के साथ।

  6. बहुत सुंदर जी हम तो अजय जी के हाथ का खीरा देख कर ललचा गये ,चलिये पता चल गया कि अजय जी सब्जी अच्छी काटते हे, अगली बार इन्हे ही यह काम सोंपेंगे.
    सभी को एक साथ देख कर बहुत अच्छा लगा धन्यवाद

  7. @ पाबला जी,
    आप को पढ़ कर लगा कि हम भी शामिल थे ….
    उस दिन चाह कर भी नहीं पंहुच सका , अगली बार मिलते हैं !
    शुभकामनायें आपको !

  8. जिसे आप खीरा समझ रहे हैं
    वो कद्दू है
    इसलिए तो टमाटर लाल हैं

    पोस्‍ट टिप्‍पणीमय होती जा रही है
    खूब सारी शुभकामनायें

    पहले चित्र में 11
    अंतिम में 12
    जो एक नहीं हैं
    कौन नहीं हैं
    वे ही बतलायें

    अब खटीमा चले आओ ब्‍लॉगरों

  9. यही वह क्षण होते हैं जो बेमजा हो चली दिनचर्या में जिंदगी फूंक देते हैं।

  10. यही वह क्षण होते हैं जो बेमजा हो चली दिनचर्या में जिंदगी फूंक देते हैं।

  11. यही वह क्षण होते हैं जो बेमजा हो चली दिनचर्या में जिंदगी फूंक देते हैं।

  12. यही वह क्षण होते हैं जो बेमजा हो चली दिनचर्या में जिंदगी फूंक देते हैं।

  13. यही वह क्षण होते हैं जो बेमजा हो चली दिनचर्या में जिंदगी फूंक देते हैं।

  14. यही वह क्षण होते हैं जो बेमजा हो चली दिनचर्या में जिंदगी फूंक देते हैं।

  15. यही वह क्षण होते हैं जो बेमजा हो चली दिनचर्या में जिंदगी फूंक देते हैं।

  16. बहुत बढ़िया , मजेदार , रोचक , स्वादिष्ट संस्मरण ।

  17. अब जब रोज़ एक से बढ़िया एक पोस्ट लगाने पर भी यह सुनने को मिलेगा कि आजकल अच्छी पोस्टे आ नहीं रही तो अजय भाई और क्या करते … !!!

    पहले ही चित्र में आपने सब को बता दिया ! 😉

    रोचक संस्मरण … लगे रहिये सर !

  18. हा हा हा सही है सर सही है ..ब्लॉगर मीट में सलाद काटते ब्लॉगर से नाश्ते में तर माल उडाते ब्लॉगर तक दिख गए ..बताईए भला ..अभी ये ठाट हैं तो फ़िर गूगल बाबा क्यों देंगे एडसेंस किसी हिंदी ब्लॉगर को

  19. पाबला जी ,चलो देर से ही सही अपने बढ़िया और बहुत अच्छा संस्मरण लिखा है .धन्यवाद .
    कृपया ब्लोगर मीट की तिथि सुधार कर 18 के बजाय 19 कर लें .

  20. ''क्या हो सकती हैं वह परिस्थितियाँ?'' न ताडेंगे, न बूझेंगे, लेकिन अगली पोस्‍ट का इंतजार जरूर करेंगे.

  21. बहुत ही आत्मीय विवरण…सबके चहरे से ख़ुशी झलक रही है….देख कर ही पता चल रहा है,कितने खुश हैं सबलोग आपस में मिलकर….

    होती रहें आपकी ऐसी मुलाकातें और पढ़ते रहें हम विवरण

  22. वाह.. खूबसूरत बातें और सुस्वादिष्ट नाश्ता..

  23. मुलाक़ात तो बेहतर है पर परिस्थितियां ? उत्सुक्त बना रही हैं !

  24. बढ़िया…रोचक एवं स्वादिष्ट विवरण…
    इस बात का मलाल रहेगा कि अगले दिन फिर से आपसे मुलाक़ात नहीं हो पायी 🙁

  25. खूबसूरत तस्वीरों के साथ एक बेहतरीन रिपोर्ट

  26. वाह ! एक एक बातें अक्षरशः याद कैसे रहीं आपको… वास्तव में वह शाम यादगार थी हम सब के लिये… अशोक बजाज जी के कई मित्र तो समझ भी नहीं पाए कि ये जीव आखिर ऐसा क्या करते हैं जिन्हें ले कर अशोक जी इतने उत्साहित हैं… और अपनी बिरादरी का न समझ उठ कर चले गए थे:) बहुत विस्तृत और खुश्निमा रिपोर्ट… खुशनुमा शाम की तरह

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