जब एशियाई हाइवे पर दौड़ी हमारी गाड़ी

भारत में एशियाई हाईवे के प्रादुर्भाव का रोचक वर्णन

एक लंबे अंतराल के बाद एक ऐसा मौक़ा लगा मिला जब सड़क मार्ग पर अपनी गाड़ी दौड़ाते हुए प्रदेश से बाहर जाया जा सकता था. हमने वह मौक़ा हाथ से जाने ना दिया. साथ दिया चचेरे भाई ने. तेजी से भागती गाड़ी में बैठे जब उसने सड़क किनारे लगे सूचना पट्ट पर AH लिखे देखा तो पूछा कि NH (National Highway), SH (State Highway) तो मालूम है यह AH क्या है? तो उसके बाद हुई बातचीत के दौरान ही मैंने सोच लिया कि इस पर लिखूंगा यात्रा से लौटने के बाद.

दरअसल, हमारे जुड़वां बच्चों में से एक, गुरुप्रीत के चले जाने के बाद उनका जनमदिन आया 26 मई को. बिटिया थी पुणे में. पहले तो रेल से जाने की योजना बनी किंतु जैसे जैसे तारीख नज़दीक आते गई वैसे वैसे अवसाद, संताप, अनिद्रा के मारे मेरी तबीयत बिगड़ते चले गई.

मैं जानता था कि अगर रेल द्वारा, आरामतलबी के साथ गया तो शायद बात और बिगड़ जाए. एक ही दायरे में अटके मस्तिष्क को इधर उधर भटकाना ज़रूरी लग रहा था अपना इलाज़ मुझे मालूम था. विकल्प मौजूद दिखा सो निर्णय हुआ सड़क मार्ग से जाने का. इस निर्णय में साथ दिया चचेरे भाई ने.

Maruti Eeco

भिलाई से लगातार पुणे तक जाना व्यवहारिक नहीं है इसलिए बीच राह में पड़ते नांदेड में सिक्ख धार्मिक स्थल सचखंड श्री हुजूर साहिब में एक रात रूकने का इरादा बना 24 मई की सुबह 4 बजे घर से चल पड़े. अपने मशीनी साथी जीपीएस नेवीगेटर को हमने पहले ही निर्देशित कर दिया था इच्छित स्थान के लिए.

बढ़िया बन चुकी फोर लेन वाली सड़क पर चार जगह टोल टैक्स पटाते हम सुबह 9 बजते बजते नागपुर के बाहरी इलाके में पहुँच चुके थे. जीपीएस यंत्र ने हमें निर्देशित कर दिया था बाहरी सड़क से निकल जाने के लिए. नागपुर से बहुत पहले ही हमारी गाड़ी दौड़ पड़ी थी अगले पड़ाव की ओर, जो मेरे हिसाब से वर्धा-यवतमाल होना चाहिए था. बूटीबोरी का इलाका पार करते ही मुझे आभास होने लग गया कि यह वो सड़क नहीं जिससे हम पिछली महाराष्ट्र यात्रा पर आये थे. इस बात की पुष्टि भी हो गई जब दरोडा टोल प्लाज़ा पर रसीद मिली जिसमें लिखा था नागपुर – हैदराबाद सेक्शन!

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चचेरे भाई ने झट से अपने मोबाईल पर गूगल मैप्स पर देख कर बताया कि गाड़ी तो वर्धा – यवतमाल के समांतर किसी ऎसी सड़क पर दौड़े चले जा रही है जो हैदराबाद की ओर जाती है. मैंने अपनी मारूति ईको रोक कर अवलोकन किया और पाया कि भले ही दूरी, समय अधिक दिख रहे हों लेकिन हमारे मशीनी साथी ने हमें ठीक ही सलाह दी है.

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कहाँ वर्धा -यवतमाल का ढेरों मोड़, पहाड़ियाँ, गाँव, कस्बों, भीडभाड़ से हो कर गुजरता सामान्य रास्ता और कहाँ शानदार, फोर लेन वाली सुनसान, कम ट्रैफिक वाली मलाईदार सड़क!

नागपुर के पहले से ही मुझे भूख लग आई थी जिसे चचेरे भाई ने यह कहते हुए दबा दिया कि नागपुर के बाद आराम से नाश्ता करेंगे. यहाँ तो दूर दूर तक कोई ढाबा नज़र नहीं आ रहा था. 100 की रफ़्तार से भागती गाड़ी से दिखा भी तो दूर कहीं सड़क के दूसरी ओर. देखते ही हँसी भी आ गई नाम ही कुछ ऐसा था कि दक्षिण भारतीय – उत्तर भारतीय, दोनों को लुभाने की कोशिश साफ साफ नजर आ रही थी

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तभी चचेरे भाई की निगाह पड़ी सड़क किनारे एक सूचक पट्ट पर. लिखा दिखा AH 43 . उसने तुरंत पूछा “ये NH (National Highway), SH (State Highway) तो मालूम है लेकिन AH क्या है?” मैंने मुस्कुराते हुए कहा “देख लो गूगल के सहारे”

बात यह है कि एशियन हाईवे परियोजना, जिसे ग्रेट एशियन हाईवे परियोजना भी कहा जाता है, एशिया में राजमार्ग प्रणालियों के सुधार के लिए 32 एशियाई देशों, यूरोप तथा United Nations Economic and Social Commission for Asia and the Pacific द्वारा सहकारिता के आधार पर AH 43लागू की गई है. इसके अंतर्गत, जहां तक हो सके नए मार्ग बनाने की बजाए वर्तमान राजमार्गों को सुधार कर सम्पूर्ण एशिया में विश्वस्तरीय मार्गों का जाल बिछाया जाना सुनिश्चित किया गया है. कुल मिला कर 1,41,000 किलोमीटर लंबाई वाले इन मार्गों के सहारे एशिया से यूरोप को सड़क के जरिये जोड़ा जाना भी संभव हो सका है

इस परियोजना की शुरूआत 1959 ईस्वी में संयुक्त राष्ट्र द्वारा, अंतर्राष्ट्रीय सड़क परिवहन के विकास के नज़रिए से की गई थी. 1960-70 के प्रथम चरण में इस ओर उल्लेखनीय कार्य हुआ लेकिन 1975 में आर्थिक सहायता रूक जाने पर यह धीमा पड़ गया. 1980-1990 के दशकों में बदले हुए राजनैतिक परिदृश्य व आर्थिक बदलावों ने इसमें तेजी लाई और जब 1992 में एक ठोस कदम उठाते हुए Asian Land Transport Infrastructure Development project (ALTID) का गठन हुआ तो इस कार्य में उल्लेखनीय प्रगति हुई

2003 में बैंकॉक में हुए विभिन्न सरकारों द्वारा एक सम्मेलन में एशियाई राजमार्ग संजाल पर मसौदा तैयार हुया जिस पर हस्ताक्षर शंघाई में 2004 में हुए और इसे लागू किया गया 2005 में.

अब तक इस महा परियोजना में 26 बिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश किया जा चुका है लेकिन कार्य पूरा किये जाने के लिए अभी भी 18 बिलियन अमेरिकी डॉलर की कमी पड़ रही है.

नीचे दिए गए चित्र द्वारा, भारत में इन एशियन हाईवे का संजाल प्रदर्शित किया गया है. यदि इसी चित्र को क्लिक किया जाए तो सम्पूर्ण एशिया का मानचित्र देखा जा सकता है

AH Map

अभी तक AH1 से AH87 तक के क्रमांक आबंटित किये जा चुके एशियन हाईवे के 1 से 9 अंक उन मार्गों को दिए गए हैं जो सारे महाद्वीप तक फैले हैं. 10-29 तथा 100-299 अंक वाले मार्ग दक्षिण एशिया को आबंटित हैं. 30-39 तथा 300-399 अंक वाले मार्ग पूर्वी एशिया व उत्तर पूर्वी एशिया को दिए गए हैं. 40-59 व 400-599 दक्षिण एशिया को, 60-89 व 600-899 उत्तरी एशिया, मध्य एशिया, दक्षिण-पश्चिम एशिया को दिए गए हैं.

इस परियोजना में सबसे लंबा हाईवे है AH1, जो कि 20,557 किलोमीटर लंबा है, यह टोक्यो से प्रारंभ हो तुर्की-बुल्गारिया सीमा तक कोरिया, चीन, भारत (इंफाल – दिसपुर – कोलकाता – कानपुर – आगरा – दिल्ली – अटारी), पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान को पार करते हुए जाता है .

विभिन्न वर्गीकरणों व प्रारूप मानकों के आधार पर इन राजमार्गों को चार श्रेणियों में बांटा गया है: प्राथमिक, श्रेणी 1, श्रेणी 2, श्रेणी 3

प्राथमिक श्रेणी वाले कंक्रीट मार्गों पर दो-पहिया वाहन, हलके वाहन व पैदल चलने की अनुमति नहीं है. इन पर गति सीमा 120 किलोमीटर की है श्रेणी 1, चार/ छह लेन वाले कंक्रीट मार्ग हैं, जिन पर गति सीमा 100 किलोमीटर की है. श्रेणी 2 वाले कंक्रीट मार्ग दो लेन पर गति सीमा 80 किलोमीटर की है. श्रेणी 3 भी दो लेन वाले मार्ग हैं किंतु कोलतार वाले, गति सीमा 60 किलोमीटर. यह सबसे न्यूनतम मानक है और वहां लागू किया जाता है जहां आर्थिक सहायता शिथिल है या निर्माण के लिए भूमि सीमित है.

कोई हैरानगी नहीं हुई यह जान कर कि भारत में अधिकतर एशियन हाईवे श्रेणी 3 वाले हैं 🙁

AH43

इस संबंध में अधिक विवरण इस 97 पन्नों की पीडीएफ फाइल में मिल सकेगा. इसी संबंध में प्रस्तुत किये गए प्रेजेंटेशन का अवलोकन भी 22 पन्नों में परिवर्तित किये गए पीडीएफ फाईल के द्वारा किया जा सकता है. इन एशियन हाईवे का वर्गीकरण और डिजायन स्टैण्डर्ड इस पीडीएफ फाइल पर देखा जा सकता है.

हम जिस एशियन हाईवे पर चले जा रहे थे वह वैसे तो नेशनल हाईवे 7 है लेकिन इस नई अवधारणा के चलते आगरा – ग्वालियर – नागपुर – हैदराबाद – बेंगलुरू – मदुराई – श्रीलंका Asian Highway 43 भी है.

NH7

 

नागपुर के पहले से जो भूख लगी थी वह चचेरे भाई के अभी अभी करते शांत हुई निर्माणाधीन मार्ग के किनारे एक ढाबे में. सारी यात्रा में एक बात स्पष्ट हो गई कि अब, ट्रक चलाने और ढाबे चलाने में सिक्खों का एकाधिकार ख़त्म हो चुका.

 

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शाम के चार बजते बजते हम दोनों भाई, भिलाई से 625 किलोमीटर दूर नांदेड पहुँच चुके थे जो हमारी इस यात्रा में एक पड़ाव था और सिक्ख धार्मिक स्थल भी. यहाँ हमने गुजारी रात

अगली सुबह जब पुणे के लिए रवाना हुए तो राह में एक बुद्धिमान रोबोट ने वह काम कर दिया जिससे मैं वर्षों से बचता रहा. वह क्या था. पढियेगा अगले संस्मरण में.

अभी तो बताईये आपने कभी एशियन हाईवे पर गाड़ी दौडाई है?

जब एशियाई हाइवे पर दौड़ी हमारी गाड़ी
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