डायरी के पन्ने: रीवां, जबलपुर, कान्हा किसली की यादें


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बैठे ढाले एक दिन पुराने कागजातों की अलमारी खोल ली. इरादा था कि महत्वहीन हो चुकी कतरनों दस्तावेजों को दरकिनार करें और थोड़ी बहुत जगह बना ली जाए.

लेकिन जब एक के बाद एक कागज़ हाथ आते गए यादों का कारवां गुजरने लगा. कहीं बेटे की लिखी चिट्ठी हाथ पड़ गई कहीं दोस्तों के साथ मटरगश्ती की फोटो. विवाह के पहले लिखे पुराने प्रेम पत्र भी हाथ लगे तो किसी अखबार से उतारी गई प्यारी सी शायरी दिख गई.

मैं उलझन में पड़ गया कि क्या फेंकूं क्या रखूं ! जिन पन्नों को वर्षों तक ना देखा ना ज़रूरत पड़ी अब वही प्रिय लग रहे. इसी बीच हाथ लगी एक 1992 की डायरी. जिसमें शेयर बाज़ार की कलाबाजियों का हिसाब किताब था. पन्ने पलटते एक जगह निगाह ठिठक गई. वहाँ कार द्वारा की गई एक यात्रा का संक्षिप्त विवरण नोट कर रखा था.

मुझे याद आया कि इससे संबंधित फोटोग्राफ जब डिज़िटल करवा रहा था तो सोचता था कि कभी इनसे संबंधित संस्मरण लिखूंगा. अब जब यह डायरी के पन्ने दिखे तो लिख ही दिया जाए.

1988 में भी एक बार हम सपरिवार  अपनी नई नई काइनेटिक होंडा में चाचा जी के पास रीवां जा आए थे. वह संस्मरण मैंने  23 साल, वो डरावनी रात और पहाड़ों पर अकेली लड़की से मुलाक़ात नाम से लिखा है.

ऐसे ही 1992 को 1 फरवरी की रात योजना बनी रीवां जाने की. हमारे पास उस समय मारुति 800 थी. 1984 का वह शुरूआती मॉडल जो भारत में ना बना कर सीधे जापान से आयात किया गया था. मारुति टैग के अलावा सब कुछ असल जापानी.

दूसरे दिन सुबह 10 बजे हम चल पड़े भिलाई से. 350 रूपये का पेट्रोल डलवाया और ओडोमीटर की रीडिंग नोट की 64645. उन दिनों पेट्रोल की दर लगभग 16 रूपये प्रति लीटर थी.

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रायपुर, बिलासपुर होते हुए हम चारों जा पहुंचें केंवची तिराहे पर. नाश्ता कर जब हम रवाना होने लगे तो एक थैला पकड़े धोती कुर्ता पहने एक सज्जन पास आए और धीरे से कहा ‘मेरा अमरकंटक पहुँचना बहुत ज़रूरी है अगली बस आने में समय लगेगा. आप मुझे अपने साथ ले जा सकते हैं क्या?’ दशकों पहले किसी इंसान पर आज जैसा अविश्वास सहज ही नहीं किया जाता था. हमने उन्हें पिछली सीट पर बच्चों के साथ बिठाया और चल पड़े अमरकंटक की ओर.

राह में औपचारिक बातों के बीच ही उन्होंने पूछ लिया कि अमरकंटक में कहाँ रुकेंगे? अपन ने कुछ इरादा नहीं बनाया था इसलिए कंधे उचका कर ज़वाब दिया कि अभी तो कुछ सोचा नहीं है, देखते हैं पहुँच कर. उन्होंने प्रस्ताव दिया कि क्यों ना हम सब उनके गुरू के आश्रम में रूक जाएँ सारी सुविधायें हैं कोई दिक्कत नहीं होगी.

हम पहुंचे अंधेरा होने के बाद और जैसे जैसे वे बताते गए मैं अपनी मारुति ले जाता रहा और फिर लंबे चौड़े आश्रम परिसर में हमें जो कमरा दिया गया वह किसी फाइव स्टार होटल के सुइट सरीखा था. वह था बर्फानी दादाजी आश्रम और उन सज्जन का नाम -शक्ति भाई जानी.

भिलाई से बिलासपुर था 150 किलोमीटर और भिलाई से अमरकंटक रहा 270 किलोमीटर.

रात का भोजन कब, कहाँ, कैसे किया अब याद नहीं. लेकिन भोजन के पहले परिसर में घूमते एक बड़े से मंदिर में शीश नवाने गए और वहां पुजारी जी से बातें हुईं . पता चला कि उनका एक बड़ा सा प्रिंटिंग प्रेस है बिलासपुर में और भरा पूरा परिवार है. उत्सुकता से मैंने पूछा कि फिर यहाँ कैसे? इतना सुनते ही उन्होंने चुप्पी साध ली.

फिर उस प्रश्न का उत्तर मुझे कई वर्षों बाद स्वयं ही मिला

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3 फरवरी की सुबह 8 बजे चल कर हम आश्रम से कपिल धारा, दूध धारा, नर्मदा उद्गम, संमुदा, माई की बगिया की सैर कर 11 बजे लौटे तो  23 किलोमीटर का चक्कर लग चुका था.

दोपहर 12 बजे रीवां की ओर रवानगी हुई और बुढार में जब 16.38 रूपये की दर से 17 लीटर पेट्रोल डलवाया गया तो ओडोमीटर के अंक 65025 दिख रहे थे. रीवां पहुँचना हुआ शाम 7:30 बजे. तब तक हम भिलाई से 555, बिलासपुर से 406 और अमरकंटक से 286 किलोमीटर का सफ़र कर चुके.

उसी रात भोजन के दौरान चाचा जी ने सुझाव दिया कि अब आए हो तो खजुराहो हो आओ, नज़दीक ही है.

हमने 4 फरवरी की सुबह पेट्रोल डलवाया 200 रूपये का और चल पड़े खजुराहो की ओर. पन्ना की हीरा खदानें राह में ही थीं लेकिन उधर गए ही नहीं. लेकिन 100 रूपये का पेट्रोल ज़रूर डलवा लिया.

अभी खजुराहो 8-10 किलोमीटर दूर ही रहा होगा कि एकाएक दाहिनी ओर लगे बोर्ड पर नज़र पड़ी जिस पर लिखा हुआ था –पाण्डव जलप्रपात. सड़क पक्की थी सो मैंने कार को उधर मोड़ लिया.

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वहाँ का अनुभव ही अनूठा रहा. धरती की सतह से लगभग 30 मीटर की गहराई में गिरता तेज़ जल प्रवाह और गुफाओं से जुड़ी कई किवदंतियाँ सुनीं कि कैसे पांडवों ने यहाँ अज्ञातवास बिताया था और कैसे भीम ने उस जगह हाथ रखा था

वहाँ एक साधु ने यह भी बताया कि भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद ने चार सितंबर 1929 को पाण्डव जलप्रपात पर अपने क्रांतिकारी साथियों के साथ बैठक कर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष का आह्वान करते हुए देश को आजाद कराने का संकल्प किया था. इस बैठक का उद्देश्य ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकना और अंग्रेज शीर्ष अधिकारियों की हत्या करना था.

ऐतिहासिक महत्व का यह मनोरम स्थल अब पन्ना टायगर रिजर्व के अंतर्गत आता है.

खजुराहो का मुख्य मंदिर हमने देखा. ढेरों फोटो भी लिए. जितना सुना पढ़ा देखा था उसके अनुसार ऐसा कुछ नहीं लगा कि कोई बहुत ही आश्चर्यजनक स्थान है.

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थोड़ी देर बाद ही जब मैं लौटने के उपक्रम में अपनी कार का दरवाज़ा खोल रहा था तो मेरी बेरूखी भांप एक गाइड ने सलाह दी कि इतनी दूर से आए हैं खुश नहीं हुए? आप रनेह वॉटरफॉल देख लो!

प्राकृतिक दृश्य हमेशा ही मुझे लुभाते रहे हैं. मैं रास्ता पूछा और चल पडा रनेह जलप्रपात. सोचते जा रहा था कि ये ‘रनेह’ क्या शब्द हुआ? स्नेह होगा ये या फिर कनेह, फनेह, लतेह!

भेद खुला वहाँ जा कर, जब एक स्थानीय व्यक्ति ने मेरी जिज्ञासा शांत की ‘ईहाँ  की रानी आते रही थी ई सुंदरता देखने! नाम पढ़ गया रानी जलप्रपात!! ऊ स्साला अंग्रेज लोगन से बोला नहीं जाता था ढंग से, तो बोलने लगे रानेह/ रनेह वॉटरफॉल. बस्स ऊहीं से ई चल पडा.’

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रनेह जलप्रपात का फाइल चित्र – सौजन्य: www.raduga-center.de

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मानसून दौरान रनेह जलप्रपात का एक वीडिओ

हम गए थे फरवरी के महीने में. एक चरवाहे ने बताया कि बारिश के समय तो यहाँ धूम रहती है.

भिलाई लौट आने के पांच छः महीने बाद हमने अख़बार में पढ़ा कि कॉलेज के कुछ छात्र छात्राएं यहाँ पिकनिक मनाने आए और उनमें से तीन की मौत हो गई 100 फीट गहरे जल प्रवाह में.

अगले दिन 5 फरवरी की दोपहर 1 बजे हम रवाना हुए जबलपुर की ओर. 200 रूपये का पेट्रोल डलवाया रीवा में और 100 रूपये का सिहोरा में. राह में ही एक स्थान पर एकाएक मारुति का बोनट आगे की ओर से उखड़ कर आ टिका विंडस्क्रीन पर. नीचे उतर देखा तो लॉक सहित उखड चुका था. साथ रखी रस्सी से उसे बाँध कर टिकाये रखे हम पहुँच गए शाम के 7 बजे जबलपुर. ठहरना हुआ राइट टाउन के होटल पारस में. रीवां से जबलपुर 270 किलोमीटर.

दूसरे दिन 6 फ़रवरी को भेड़ाघाट धुआंधार  देख कर हमने राह पकड़ी कान्हा-किसली की. जबलपुर में 10 लीटर पेट्रोल जब डलवाया गया तो ओडोमीटर की संख्या दिखी 65905.

शाम 5:30 बजे कान्हा किसली अभ्यारण्य पहुंचे और एमपी टूरिज्म डेवलेपमेंट कारपोरेशन (MPTDC) की ‘झोपडी’ Hutment में रूकना हुआ. भोजन के पहले अन्य पर्यटकों के साथ एक फ़िल्म देखी गई अभ्यारण्य के कार्यालय में. लौटते हुए शुरू हो गई बारिश.

रूक रूक कर होती बारिश के बीच हमने भोजन किया एक लालटेन की रौशनी समेटे, चारों तरफ से खुले रेस्टोरेंट में. बार बार चेतावनी मिल रही थी कि बाहर कतई ना निकलें ,शेर आ सकता है

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अगले दिन सुबह 7 बजे हम निकले अपनी ही गाडी में शेर देखने. साथ में था एक अधिकृत गाइड.  एक दो जगह उतर कर तस्वीरें लेने लगे तो गाइड ने हड़का दिया कि ज़ल्दी करो कोई अनहोनी हो गई तो मैं जिम्मेदार नहीं.

आखिरकार दो घंटे तक सारी राह कोई शेर ना दिखा. हम लौट आये साढ़े नौ बजे और भिलाई की ओर वापस लौटने का मन बना लिया.

लेकिन जो सोचा जाए वह कभी होता है इससे पहले कि हम अपनी अपनी सीटों पर ढंग से बैठें, राता के पास कार का अगला टायर पंक्चर हो गया. स्टेपनी निकाली तो उसमें हवा नहीं. अब अचानक ही मुंह उठाए यात्रा पर निकल पड़ेंगे तो यही होना था.

मैं टायर खोलता रहा और बच्चे बाहर टहलते रहे. पास ही से निकलते दो स्थानीय वासी साइकिल पर जाते रुके और कारण पूछा. मैंने बताया तो उन्होंने सावधान किया कि यहाँ कभी भी शेर निकल आता है इन सबको कांच चढ़ा कर अंदर बैठाओ और आप चलो हमारे साइकिल पर. टायर बनवा कर लाते हैं.

मोचा नाम के गाँव से टायर बनवाये गए, मुझे साइकिल से छोड़ा गया और जब तक टायर लगा कर रवाना नहीं हुए हम, वे दोनों वहीँ खड़े रहे. मैंने चलते वक्त उनके हाथ कुछ रूपये रखने चाहे लेकिन साफ़ इनकार कर दिया गया

आगे, बम्हनी बंजर में टायर फिर पंक्चर. मंडला में उसे बनवाया और 230 रूपये का पेट्रोल भी डलवाया गया. माधोपुर के पास फिर पंक्चर.

शाम होने लगी थी. स्टेपनी तो स्टेपनी थी नाजुक सी. टायर खोल कर ट्रक पर सवार हो पहुंचा अगले गाँव अंजनिया और वापिस भी आया किसी दूसरे  ट्रक से. अंधेरा छा चुका, भिलाई तो अभी 250 किलोमीटर दूर था और इन परिस्थितियों  में आगे बढ़ना बुद्धिमानी नहीं.

चार किलोमीटर दूर अंजनिया पहुँच कर पूछताछ की कि रात बिताने के लिए कोई होटल मिल जाए. एक ने सुझाव दिया कि वो सामने PWD का रेस्ट हाउस है उसके चौकीदार से पूछ लो वह 20 रूपये ले कर रात बिताने दे देगा. मैंने वही किया.

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उसने जो कमरा दिया वह शानदार था लेकिन बिस्तर लगा पलंग एक ही था. बच्चों को ऊपर जगह दे नीचे मोटे कालीन पर एक और गद्दा बिछा कर रजाई भी दे दी गई मुझे. खाना भी वही चौकीदार ले आया.

अगले दिन सुबह ही सुबह चाय भी मिल गई. तैयार हो बाहर निकले तो दिखा रात को ठण्ड इतनी थी कि सारी गाड़ी ओस से ढकी पड़ी और मारुति की पार्किंग लाइट्स रात को जलती छूट गईं, अब कार स्टार्ट नहीं हो रही. धक्का लगवा कर कार चली और हम चल पड़े अपनी राह पर.

अगला पंक्चर हुया बिछिया में और उससे अगला चिल्फी में टायर की हालत देख पंक्चर वाले ने हाथ खड़े कर दिए. नया टायर ट्यूब लाने में कई घंटे लग जाते. पुराना कोई टायर था नहीं उसके पास. फिर पता नहीं उसके मन में क्या आया, कुछ तीन पांच कर टायर बना दिया और चेतावनी दी कि स्पीड 40-45 के ऊपर ना करना वरना ‘टायर’ कभी भी टैं बोल जाएगा.

भिलाई पहुँचना हुआ रात के साढ़े आठ बजे. ओडोमीटर था 66480 पर

तब से कान पकड़े , गाडी की बाक़ी देखभाल हो ना हो टायर ज़रूर ठीक रखें जाएँ. राह में कहीं कुछ हो गया तो कम से कम बांध कर, लुढ़का कर कहीं आगे पीछे तो जाया जा सकता है.

आपको कोई ऐसा वाक्या याद है?

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डायरी के पन्ने: रीवां, जबलपुर, कान्हा किसली की यादें” पर 22 टिप्पणियाँ

  1. धोखा…..हमें लगा प्रेम पत्र सार्वजिक किए जा रहे हैं…..खैर यात्रा वृतांत हमेशा की तरह खूबसूरत है

  2. पढ़ते पढ़ते बहुत कुछ याद आया |जीवन मे यात्रा न हो तो शायद जीवन का आनंद ही न मिले
    मै आपके कम्प्युटर के कुछ पोस्ट का इंतजार कर रहा हु iPhone

    • Approve
      सही बात है
      मिलते हैं ज़ल्द कंप्यूटर संग

  3. कही जाए बिना भी सैर का मजा लेना है तो आपका यात्रा वृतांत पढ़ लिया जाए। मैंने पूरी यात्रा आपके साथ ही कर ली। इतना रोचक लिख कैसे लेते हैं आप?

  4. Heart
    थैंक्यू अनुपम जी

    जो याद आता है लिखते चले जाता हूँ

  5. रोमांचक, रोचक और करीने से सिरों को जोड़ता हुआ संस्मरण

  6. एक अच्छी और साहसिक यात्रा का वर्णन करके आपने हम सबको भी रोमांचित कर दिया, पर परिवार के साथ यात्रा पर जाने के लिए पूरी सावधानी और सुरक्षा के साथ ही यात्रा करनी चाहिए. क्योंकि आपने किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा है तो आपकी मुसीबतें भी आसानी से तल जाती हैं. क्योंकि अच्छे लोगों के साथ hamesha अच्छा ही होता है. पर लव-लेटर्स का मज़्मून जानने की उत्सुकता तो हमेशा रहेगी. कभी मुलाकात होने पर धीरे से कानों में बता दीजियेगा.

  7. पुरानी डायरी जब भी खुलती है बहुत कुछ यादे और राज की बाते बाहर आती है । एक छोटे से यात्रा विवरण नोट से इतनी पुरानी यात्रा के बारे में लिखना सचमुच काबिले तारीफ है । शायद ये बहुत पुरानी यात्रा थी इसलिए इस पोस्ट में हमे तीन जगओ ( अमरकंटक , कान्हा, और खुजराहो ) जानकारी बहुत कम मिली ।
    मुझे लगता है आपको यात्रा विवरण के नोट के साथ के साथ अपनी गाड़ी के कम / पैट्रोल का हिसाब भी मिला होगा , जिसकी झलक इस पोस्ट में अमरकंटक और खुजराहो से ज्यादा मिल रही है ।
    आपको उन प्रिटिंग प्रेस वाले की क्या बात बाद में समझ आई ?

    आपसे हर बार कुछ न कुछ सिखने मिलता है ।

  8. Smile
    प्रिटिंग प्रेस वाले की बात -वैवाहिक जीवन की जटिलताएं और पारिवारिक जायदाद की खींचतान

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