कड़कड़ाती ठंड में अपनी कार से पंजाब का सफर


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इस बार पंजाब जाने का कार्यक्रम बना एक निजी आयोजन के लिए. एक ऐसा आयोजन, जहाँ विभिन्न शहरों स्थानों की भागमभाग होनी तय थी. निशक्त बुज़ुर्ग पिता के साथ ट्रेन, बस, टैम्पो, ऑटोरिक्शा की ढ़ेरों, उतराई चढ़ाई रेंगाई दौड़ाई की कल्पना कर विचार किया गया कि इस बार अपनी मारुति ईको से ही चला जाए. खर्च शायद कम हो और सुविधाजनक भी होगा.

लेकिन पिताजी ने इंकार कर दिया. वैकल्पिक व्यवस्था यह की गई कि चचेरे भाई के साथ वे भिलाई से लुधियाना ट्रेन से जाएँ. बाक़ी सब तो संभाल लिया जाएगा एक बार पहुँचने के बाद.

इधर बिटिया को पुणे से लुधियाना की सीधी ट्रेन टिकट, दो महीने पहले भी नहीं मिल पाई. उसके लिए भी इंतज़ाम यही हो पाया कि वह दिल्ली तक आए और फिर हम सब वहां से चलें पंजाब

आश्चर्यजनक रूप से दो हफ्ते पहले ही एकाएक पिताजी ने स्वयं ही मेरे साथ चलने की इच्छा जाहिर कर दी. अब मैं परेशान ! जिन मुद्दों पर पिताजी ने इनकार किया था, उन्हीं के कारण मेरी चिंता बढ़ने लगी. अब रोज ही उन्हें बहला पुचकार पूछता -पक्का मेरे साथ ही जायोगे? वो जो आपने फलां दिक्कत बताई थी उसका क्या होगा? आने जाने में ही 3000 किलोमीटर हो जायेंगे !

लेकिन वे मस्त अंदाज़ में कहते -अरे! चलो, जो होगा देखा जाएगा.

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रवानगी का दिन तय हुआ 5 जनवरी. गाड़ी की सारी आवश्यक जांच करवा ली गई. उत्तर भारत के कोहरे के कहर का सामना करने के लिए भारी भरकम लाईट्स लगवा लीं. कैमरे की मेमोरी कार्ड निकाल कंप्यूटर पर सारे चित्र डाल, फॉर्मेट कर दिया गया. आकस्मिक खाने पीने का इंतज़ाम कर लिया गया.

5 जनवरी की सुबह 5 बजे के पहले ही रवाना हो गए हम नागपुर की ओर. हालांकि गूगल मैप और हमारी रोबोट नेवीगेटर ने राहें कुछ और ही सुझाईं थीं लेकिन मैंने चुनी वह राह जो मेरे ख्याल से कम समय में पहुंचाती गंतव्य तक.


साढ़े पांच बजे, अंजोरा बाईपास पर 79 रूपए का टोल शुल्क पटा कर हम बढ़ गए नागपुर की और. इरादा था नागपुर बाईपास से निकलने का लेकिन मित्रों ने जानकारी दी कि भंडारा से आगे फोरलेन पर कुछ काम चल रहा, मुश्किल होगी, बेहतर होगा रामटेक हो कर निकल जाना.

अंधेरा ख़तम होते ही मैंने हमेशा की तरह चलती गाड़ी से फोटो लेना शुरू कर दिया. लेकिन जितनी बार फोटो लेता उतनी बार कैमरे से अज़ीब सी बीप्स आती ! मैं कुछ समझ ही नहीं पाया. वो तो तब पता चला जब टोल पटाते गाड़ी की रफ्तार कम थी तो कैमरे पर दिखा ‘No Memory Card in Camera’.ओत्तेरे की !! मेमोरी कार्ड तो घर पर कंप्यूटर में ही लगी रह गई 🙁

नेशनल हाईवे 6 पर, सुबह पौने आठ बजे भण्डारा के पहले 69 रूपए टोल शुल्क दे कर मैंने एक ढाबे के सामने गाड़ी रोकी नाश्ते के लिए. बढ़िया चाय के साथ परांठों का लुत्फ़ उठा कर अपनी गाड़ी में तलाश की कि कहीं कोई मेमोरी कार्ड पड़ी हो तो कैमरे में डाल ली जाए. लेकिन कहीं कुछ ना मिला.

नाश्ता करते वहाँ, पैरों को पतली रस्सी से बाँध कर रखे गए मुर्गे दिखे जिनमें से एक की बाँग बड़ी ऊंचे स्वर में थी. मैं मुस्कुराया कि कब कट जाएगा ये पता नहीं, लेकिन बांग दमदार है. लगे हाथों मोबाईल से तस्वीर भी ले ली

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नौ बजे NH 6 पर ही वैनगंगा नदी के पुल के लिए 21 रूपए शुल्क दे हमने प्रवेश किया भंडारा में और कन्या नेवीगेटर के सुझाए रास्ते के अनुसार चल दिए रामटेक की ओर. जहाँ सड़क से लगा हुया था एक बाँध, यह मैं देख चुका था गूगल मैप पर. ज़्यादातर राह औसत ही थी.

पिताजी अपनी सुविधानुसार पिछली सीट पर जा लेटे थे औऱ थोड़ी देर बाद ही उनके खर्राटों की आवाज़ सुनी तो देखा मस्त कंबल ओढ़े सो रहे हैं. वह सीट मारुती ईको के बीचो बीच ही है, जिसके कारण किसी भी तरह के हिचकोलों का असर कम ही होता है.

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रामटेक बाँध

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रामटेक बाँध पर

रामटेक बाँध, जिसे खिंडसी झील भी कहा जाता है, मुझे नेवीगेटर पर पहले ही दिख रहा था. एक लाख घन मीटर की भंडारण क्षमता वाला यह बाँध महज 230 मीटर लंबा और 22 मीटर ऊंचा है. 1913 में बने इस बाँध पर बनी सड़क से ही सारा यातायात गुजरता है. कैमरा तो काम करता नहीं इसलिए मोबाईल के साथ जद्दोजहद कर एक फोटो ले ही ली गई.

NH 7/ AH 1 पर गाड़ी दौड़ाने का मंसूबा तब धरा का धरा रह गया जब पेंच टाइगर रिज़र्व क्षेत्र से गुजरती सड़क बेहद खराब अवस्था में मिली. पिताजी का उलाहना भी मिला ‘ये तुम्हारी वही सड़क है ना? जिसकी तारीफ़ करते थे कि एशियन हाइवे वाली सड़क है !!’ 🙁

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भिलाई से साढ़े तीन सौ किलोमीटर दूर लखनादोन के पास दोपहर डेढ़ बजे शिवनी लखनादोन खंड के लिए 60 रूपए शुल्क का भुगतान किया गया. सड़क अब ठीक ही थी. लगभग यहीं गैस हो गई खत्म और गाड़ी आ गई पेट्रोल पर. अभी 25 लीटर से अधिक तो था ही टंकी में.

भूख लग आई थी. तेज भागती गाड़ी से जो भी ढाबा दिखता, वह ‘वैष्णो’ ढाबा ही दिखता. सफर में अंडे या आलू को ही प्राथमिकता देता हूँ मैं.

बड़ी मुश्किल से एक ढाबा ऐसा दिखा जहाँ लिखा था चिकन! बढ़िया गरमागरम रोटियां और बाद में चाय का लुत्फ़ ले हम चल पड़े सागर की ओर.

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सवा तीन बजे बकोरी टोल प्लाज़ा से सामना हुआ राष्ट्रीय राजमार्ग 26 पर. शुल्क था 65 रूपए, संध्या साढ़े पांच बजे तीतरपानी टोल नाका. शुल्क 60 रूपये, साढ़े छह बजे चितौरा टोल प्लाजा. शुल्क 90 रूपए चुकाते हुए हम बम्होरी से होते हुए रहेली-सागर सड़क के जरिये, प्रवेश कर गए सागर शहर में.

हमारी रोबोट नेवीगेटर ने होटल के लिए जहां रुकने का इशारा किया वह सिविल लाइन्स इंदिरा नगर का चौराहा था. रोबोट कन्या इशारा कर रही थी कि यहीं कोई होटल कांची और होटल वरदान है लेकिन रात के आठ बजने वाले थे. ठण्ड अपने शबाब पर आ चुकी थी और कोहरा गहराने लगा था.सामने ही एक होटल दिखा. एक कमरे की दर साढ़े चार सौ रूपये बताई गई. पिता जी से पूछा मैंने कि पहली मंजिल तक की सीढ़ियां चढ़ लेंगे वे? अनमने ढंग से हामी मिली. झट से हम दाखिल हो गए.

गरम पानी भी मिल गया और भोजन भी. कड़कड़ाती ठण्ड में रजाई ओढ़ जो सोया मैं, तो आँखे खुली अगली सुबह 5 बजे.

अब हमें चलना था दिल्ली की ओर.

© बी एस पाबला

कड़कड़ाती ठंड में अपनी कार से पंजाब का सफर
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कड़कड़ाती ठंड में अपनी कार से पंजाब का सफर” पर 14 टिप्पणियाँ

  1. ये तो गलत बात हैं पाबला जी.
    आप 5 जनवरी को गए थे और यात्रा संस्मरण 22 जून को लिखा हैं.
    इतने लम्बे समय हमें आपके खूबसूरत चित्रों व जानकारी परक लेख से युक्त यात्रा संस्मरण से वंचित रहना पड़ा.
    चलो कोई बात नहीं, अगली कड़ी का इंतज़ार हैं.
    धन्यवाद.
    चन्द्र कुमार सोनी

    • Smile
      सोनी जी,
      जनवरी अंत में लौटा, फिर कुछ लापरवाही, कुछ पिता जी की नासाज़ तबीयत, कुछ घरेलू व्यस्तता, कुछ चुनावी चक्कलस मिला कर देर हो ही गई

    • Delighted
      जोशी जी, लिखा ज़रूर ‘चिकन’ था लेकिन भोजन सामान्य ही किया गया.
      वो क्या है ना, ऎसी जगहों पर कुछ ‘स्वाद’ आता है जो ‘वैष्णो’ में नहीं मिल पाता

  2. बहुत दिनो से इस सफर का इंतजार था। पर सर्दी आई भी तो ठीक २२ जून को जब सूरज माथे पर था।
    टिप्पणीकर्ता दिनेशराय द्विवेदी ने हाल ही में लिखा है: बहिन को आत्मनिर्भर होने में मदद करें ….My Profile

    • Heart
      गर्मियों में सर्दी का अहसास भी गज़ब है सर जी

  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

    आपकी इस’ प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (24-06-2014) को “कविता के पांव अतीत में होते हैं” (चर्चा मंच 1653) पर भी होगी!

    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर…!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक

  4. हाँ जी पढ़ रहे हैं जैसे साथ ही बैठे हों हम भी. अगली कड़ी बारिश में ???? कोई बात नही जी इंतज़ार कर लेंगे. अगली बार साथ में मेमोरी कार्ड लेना न भूलना.
    वो होता तो शायद कुछ और फ़ोटोज़ देखने का आनंद आता हमे भी ,

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