कीड़े लगी गोभी खाईए, स्वस्थ रहिए!

हमारे सुपुत्र ने पिछले दिनों यूँ ही बातों बातों में सिफारिश की कि आमिर खान का सत्यमेव जयते देखिये, अच्छी बातें रहती हैं. चूँकि इस कार्यक्रम के बारे में मेरे अपने विचार हैं, सो मैं मुस्कुराते हुए कंधे उचका कर रह गया.

रविवार रात अचानक ही इस कार्यक्रम के पुनर्प्रसारण पर निगाह पड़ी तो ठिठक गया. विषय था फसलों में कीटनाशकों का खतरनाक स्तर का प्रवेश. कुछ मिनट तक बातें सुनते रहा और अचानक मुझे याद आ गया कुछ वर्षों पहले एक समाचारपत्र में खबर का शीर्षक –स्वस्थ रहना है तो कीड़े लगी गोभी खाईए!

शीर्षक पढ़ते ही मैं चौंका, मन ही मन भुनभुनाया और लगा ‘खबर’ पढने. उसमे भी वही सब कुछ लिखा था जो आजकल बहस में होगा.
कीटनाशक के बिना सब्जियां

 

लिखा था कि बेदाग़, साफ़ सुथरी, चमचमाती, सफ़ेद, ताज़ी दिखती गोभी हर ग्राहक को आकर्षित करती है. जबकि बासी दिखती, कीड़े लगी, पीली सी मुरझाई सी, ढेर से दाग वाली गोभी को देख कर ही नाक भौं सिकोड़ ली जाती है.

बिना कुछ किए फटाफट काट कर वह सफ़ेद चमचमाती गोभी जब रसोई में पकती है तो ढेर से रसायनों, कीटनाशकों को भी परोसती है खाने में, जबकि उस बेचारी मुरझाई कीड़े वाली गोभी में से कीड़े वाला हिस्सा काट कर अलग कर पकाया जाए तो उसके साथ कोई ज़हर ना निगलना पड़े.

बात तो पते की थी. मुझे याद आया कुछ वर्षों पहले तक जब मटर छीले जाते थे तो ना जाने कितनी फलियों में इल्लियाँ निकलती थी और छीलने वालों की चीखें भी! प्याज कटता था तो सारे घरवालों की आँख में आंसू होते थे, हरी मिर्च मुंह में आ जाए तो क्या चीख पुकार मचती थी. जाने कहाँ गए वो दिन 🙁

अखबार की वह छोटी सी खबर मुझे अक्सर याद आती रहती है लेकिन अफ़सोस यह होता है कि अब कीड़े वाली गोभी या कोई और सब्जी दिखती ही नहीं बाजार में. जब दिखती नहीं, खाई ही नहीं जाती तो स्वस्थ कैसे रहा जाए?

निश्चित तौर पर उस प्रकृति ने, ईश्वर ने, जिसे सुपर प्रोग्रामर भी कहता हूँ मैं, ऎसी प्रोग्रामिंग की हुई है, ऐसा चक्र बनाया हुआ है जो हमारे ही लाभ का है. लेकिन हम पता नहीं किस रौ में अपने ही पाँव में कुल्हाड़ी मारते चले जा रहे.

यदि मिले तो आप कीड़े लगी गोभी खाना पसंद करेंगे?

कीड़े लगी गोभी खाईए, स्वस्थ रहिए!
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कीड़े लगी गोभी खाईए, स्वस्थ रहिए!” पर 24 टिप्पणियाँ

  1. बिल्कुल कीड़े वाली गोभी ही खायेगें मिले तो सही। आप को तो कोई प्रोब्लम ही नहीं आप के पास तो बहुत जगह है घर के आगे अपनी गोभी खुद ही उगा सकते हैं।
    कोई दो साल पहले मैं ने सोचा किचन की खिड़की में धनिया उगाया जाये। पहले भी कई बार किया था। साबुत सूखा धनिया थोड़ा सा डाला और बस हो गया। लेकिन अब आप सिर पीट लीजिए धनिया नहीं उगेगा, जा कर बीज खरीदने पड़ेगें तब उगेगा।
    किसान तो सुसाइड करेगें ही न

  2. बहुत पहले फ़ूड स्पेशलिस्ट किरण आनंद का एक इंटरव्यू पढ़ा था जिसमे उन्होंने बताया था कि वे इस विषय से सम्बंधित पढ़ाई करने फ्रांस गयीं थीं और वहाँ उन्हें बताया गया था कि ‘कीड़े वाली सब्जी ही इस्तेमाल करें…कीड़े वाला हिस्सा आधा काटकर फेंक दें…और बाकी हिस्सा प्रयोग में लाए…यह ज्यादा पौष्टिक और स्वादिष्ट होता है .’

    मुझे याद है..कभी गाँव में अपनी चाची की मदद करने के ख्याल से सब्जी काटने के लिए आगे बढती भी तो भिन्डी और गोभी काटने से मना कर देती कि उसमे बहुत कीड़े होते हैं..आज जब बिलकुल साफ़ बिना कीड़े वाली भिन्डी काटते/बनाते ख्याल आ ही जाता है…जाने कितना कीटनाशक भी पका रही हूँ साथ-साथ
    टिप्पणीकर्ता rashmi ravija ने हाल ही में लिखा है: मानसिक विकलांगता से कहीं बेहतर है,शारीरिक विकलांगताMy Profile

    • :Worry:
      विकल्प सीमित ही हैं, किया भी क्या जाए

  3. अपन तो फूल गोभी खाते ही नहीं तो दोनों तरह के नुकसान से बचा जा रहा है।
    @अनिताकुमारजी,
    आप किसान से बीज ला कर भी कभी धनिया नहीं उगा सकेंगी। साबुत धनिया कभी भी नहीं उगता। अगर आप को धनिया उगाना ही है तो यह प्रयोग करिए, धनिया के साबुत बीजों को जमीन पर या बोरी पर रख कर किसी साफ जूते या चप्पल से उन्हें घिसिए, जब उने दो हिस्से हो जाएं तो उन्हें उगाईये। अगर इस बार भी नहीं उगे तो…. गमला बदल दीजिए।
    🙂

  4. हां सर आपने ठीक कहा , गोभी , मटर ही क्यों साग भिंडी सहित तमाम सब्जियों में छोटे छोटे कीडे कीट निकलना आम बात थी और स्वाभाविक भी , लेकिन अब कीडों की जगह ज़हर ने ले ली है और तिस पर मजबूरी ये कि हम कीडों वाले हिस्से को काट कर अलग कर लेते थे मगर इस ज़हर को चाह कर भी अलग नहीं कर सकते 🙂 🙂


    टिप्पणीकर्ता अजय कुमार झा ने हाल ही में लिखा है: सज़ा ए मौत : न सज़ा,न मौत ..बिजनौर टाइम्स में प्रकाशित आलेखMy Profile

    • :Tears:
      कहते हैं मानव विकास कर रहा!

  5. यह पश्चिमी अंधानुकरण का नतीजा है। हम उनकी चमकती हुई अर्थव्‍यवस्‍था को देखकर अपनी सुदृढ़ व्‍यवस्‍था को भूल जाते हैं। एक या दो पीढ़ी बीतने के बाद तो कोई लौटाकर ले जाने वाला भी मिलेगा या नहीं, पता नहीं। 🙁
    टिप्पणीकर्ता सिद्धार्थ जोशी ने हाल ही में लिखा है: इंद्रियों को जीतने वाले के आगे अप्‍सराओं का नृत्‍यMy Profile

  6. एक बात और मैं जोधपुर राजस्‍थान से नहीं बलिक बीकानेर राजस्‍थान से हूं… मेरी जियोग्राफिकल स्थिति गूगल हमेशा ही गलत बताता है, पता नहीं क्‍यों
    टिप्पणीकर्ता सिद्धार्थ जोशी ने हाल ही में लिखा है: इंद्रियों को जीतने वाले के आगे अप्‍सराओं का नृत्‍यMy Profile

    • :Pleasure:
      यह आई पी पते पर आधारित तकनीक है. आपका इंटरनेट सर्वर जहां का होगा वहीं का पता दिखेगा

  7. ओह्ह मतलब बहुत सारे रसायन भी साथ में उदरस्थ कर चुके हैं, वैसे रसायनों का प्रभाव अभी तक तो कुछ हुआ नहीं है पर सब्जियों के बारे मॆं आपने जो भी बातें लिखीं हैं, वे बिल्कुल सही हैं, इल्ली मुझे बहुत अच्छी लगती थी ।
    टिप्पणीकर्ता विवेक रस्तोगी ने हाल ही में लिखा है: जेद्दाह में सप्ताहांत, टैक्सीवाले की बातें, निराला में भोजन, मुशर्रफ़ और एमग्रांड कार (Weekend in Jeddah, Taxiwala, Lunch In Nirala, Musharraf and Emgrand Car)My Profile

    • :Delighted:
      आहिस्ता आहिस्ता सरकती टहलती भटकती इल्ली को देखना सच में भाता था

  8. सबसे पहले तो यह रंग-बिरंगे स्माइल लगाने की कला सिखाइये। पोस्ट से अच्छे तो आपके जवाब में आये ये स्माइली लगते हैं। 🙂

    पहले बीबी को पोस्ट पढ़ाकर आशय समझा दूँ वरना… ।:)

  9. इस पोस्ट के लिए एक और शीर्षक..
    सब्जी में हाजिर कीड़े बताते हैं कि वह स्वास्थ्यवर्धक है।
    टिप्पणीकर्ता दिनेशराय द्विवेदी ने हाल ही में लिखा है: किराएदार से मकान खाली कैसे कराएँ?My Profile

  10. Sabjiyon me keede ? Ek lambi cheekh aur hath me pakdi sbji ka duur tk fainkaa jana….dono kaam palak jhapakne se pahle ek sath hote the. Anguli ke por ke neeche keede ki gudgudi bhri chhuwan……aaj bhi rongte khde kr dete hain .

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