‘कुंठित मठाधीशों के ब्लॉग व अरस्तू-चाणक्य शैली की टिप्पणियाँ’ वाले आलोक मेहता के ब्लॉग से सभी पोस्ट्स हटाई गईं

नई दुनियां से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता ने होली के अवसर पर हिन्दी ब्लाग जगत पर व्यंग्य बाण छोड़कर सक्रिय ब्लाग लेखकों को लगभग स्तब्ध कर दिया। जब इस लेख को देखा गया तो अधिकतर ब्लाग लेखक हैरान रह गये। वास्तव में दूसरों पर कटाक्ष और प्रहार करने वाला हिन्दी ब्लाग जगत आज खुद भी निशाना बन गया

यह पंक्तियाँ हैं ग्वालियर से दीपक भारतदीप के ब्लॉग पर

आलोक मेहता जी के उपरोक्त चर्चित लेख को जब मैंने प्रिंट मीडिया पर ब्लॉग चर्चा वाले ब्लॉग पर जगह दी तो कुछ समय बाद ही फोन कॉल्स व ईमेल में पूछा जाने लगा कि यह आलोक मेहता है कौन? इनका कोई ब्लॉग़ भी है क्या? अब भी प्रश्न बने हुए हैं तो मैंने सोचा कि आलोक जी की कुछ जानकारियाँ साझा करनी ही पड़ेंगी।
पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित आलोक मेहता, नईदुनिया के प्रधान संपादक हैं व पिछले करीब चालीस वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने वर्ष 1969-70 में इंदौर में नईदुनिया से ही हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश किया, दिल्ली में समाचार एजेंसी हिंदुस्तान समाचार और हिंदी साप्ताहिक हिंदुस्तान में कार्य किया। फिर 1979-82 तक जर्मनी में वॉयस ऑफ जर्मनी की हिंदी सेवा के संपादक रहे। जर्मनी से लौटने के बाद श्री मेहता हिंदी साप्ताहिक दिनमान और फिर नवभारत टाइम्स दिल्ली में विशेष संवाददाता रहे।

1988-91 तक श्री मेहता नवभारत टाइम्स के पटना संस्करण के स्थानीय संपादक रहे। 1991-93 तक वे नवभारत टाइम्स दिल्ली में समाचार सेवा के संपादक रहने के बाद 1994 में हिंदी दैनिक हिंदुस्तान दिल्ली के कार्यकारी संपादक बने और वर्ष 2000 तक इस पद पर रहे। इसके बाद वे 2002 तक हिंदी दैनिक भास्कर समूह के संपादक रहे। 2002 में आउटलुक समूह ने अपनी हिंदी पत्रिका आउटलुक साप्ताहिक का प्रकाशन श्री मेहता के संपादन में शुरू किया। जुलाई 2008 में आलोक मेहता ने नईदुनिया समूह के प्रधान संपादक का दायित्व संभाला और नईदुनिया के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली संस्करण का प्रकाशन शुरू किया।

श्री मेहता ने प्रिंट पत्रकारिता के साथ-साथ टेलीविजन और रेडियो के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य कर अपनी अलग पहचान बनाई है। दूरदर्शन, आकाशवाणी और अन्य टीवी चैनलों पर समसामयिक विषयों पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों में उन्हें अकसर देखा और सुना जाता है। उन्हें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री के साथ व कई अन्य प्रतिनिधिमंडलों में शामिल होकर विदेश जाने का अवसर भी कई बार मिला है। वे 35 से ज्यादा देशों की यात्राएँ कर चुके हैं।

पत्रकारिता, पर्यटन, कविता, कहानियों और समसामयिक विषयों पर उनकी करीब एक दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में श्री मेहता के योगदान के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार, हिंदी अकादमी दिल्ली द्वारा साहित्यकार सम्मान, राष्ट्रीय सद्भावना पुरस्कार-1993, इंदिरा प्रियदर्शिनी सम्मान-1995, पत्रकारिता में उत्कृष्ट सम्मान-1995, राष्ट्रीय तुलसी सम्मान-1996, उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा पत्रकारिता भूषण सम्मान-2006 और हल्दी घाटी सम्मान-2007 से सम्मानित किया जा चुका है। श
्री मेहता एडीटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के अध्यक्ष रह चुके हैं।

इसके अलावा वे नेशनल बुक ट्रस्ट, राजा राममोहन राय फाउंडेशन पुस्तकालय कोलकाता के न्यासी और भारतीय प्रेस परिषद, प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, वर्ल्ड मीडिया एसोसिएशन वॉशिंगटन, भारत सरकार की शिक्षा नीति समिति, इंडिया नेशनल कमीशन फॉर को-ऑपरेशन विद यूनेस्को आदि संस्थाओं से भी जुड़े रहे हैं।

मनोनीत सांसद चंदन मित्रा की राज्यसभा से विदाई के बाद खाली हुई जगह के लिए कई पत्रकारों का नाम चर्चा में है। श्री आलोक मेहता का नाम एक ताक़तवार दावेदार के तौर पर उछाला जा रहा है। इस मामले में वे आलोचना का शिकार भी होते रहे हैं। जैसे राष्ट्रपति के बेटे के समर्थन में नई दुनिया की मुहिम, एक अख़बार जिसमें हर रोज छपती है राष्ट्रपति की तस्वीर, नई दुनिया का मतलब राष्ट्रपति भवन का भोंपू !

आश्चर्य मुझे तब हुआ जब मैंने ‘उनके’ ब्लॉग का संदर्भ देने की मंशा से वह ब्लॉग http://articlesam.blogspot.com खोला तो पाया गया कि कल, 28 फरवरी की देर रात तक दिख रही उस ब्लॉग से सभी 24 पोस्ट्स गायब हो चुकी हैं तथा ब्लॉग शीर्षक भी बदल दिया गया है । उस ब्लॉग में लगभग चाटुकारिता ही परोसी गई थी व कुछेक पोस्ट किन्हीं विष्णू राजगढ़िया (संभवत: यह हो सकते हैं) द्वारा लिखी गईं थीं। अब वह ब्लॉग खाली हो चुका है लेकिन उस ब्लॉग की संचित प्रति मिल रही है गूगल बाबा के सौजन्य से
कुछ ही घंटों पहले दिख रहीं पोस्ट्स का ब्यौरा इस प्रकार था:
अब, आप कुछ कहना पसंद करेंगे?
‘कुंठित मठाधीशों के ब्लॉग व अरस्तू-चाणक्य शैली की टिप्पणियाँ’ वाले आलोक मेहता के ब्लॉग से सभी पोस्ट्स हटाई गईं
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‘कुंठित मठाधीशों के ब्लॉग व अरस्तू-चाणक्य शैली की टिप्पणियाँ’ वाले आलोक मेहता के ब्लॉग से सभी पोस्ट्स हटाई गईं” पर 32 टिप्पणियाँ

  1. एक पुराना गीत याद आ रहा है।
    परदे के पीछे मत जाना मेरे भाई!

  2. ओह तो ये माजरा निकला …मतलब कि मिंया जी भी ब्लोग्गर थे ..नई दुनिया के संपादक वाला रुतबा यहां नहीं मिला होगा न ..होली के बहाने अपने मन की बात लिख गए जैसे कि होली की आड में कई लोग कर जाते हैं ….हें हें हें …..और उस आलेख में अपने धांसू ब्लोग का जिक्र नहीं किया उन्होंने ..इत्ता शानदार करियर बताने के लिए आभार …अब उतने ही लंबे उस्तरे का इस्तेमाल करना पडेगा न ..करते हैं हजामत ..किसी दिन
    अजय कुमार झा

  3. आपने सुना दिया है और अब कहने को बाकी रहा भी क्‍या है ? वे प्रसन्‍न तो हम प्रसन्‍न, आप प्रसन्‍न तो हम प्रसन्‍न, सब प्रसन्‍न तो हम प्रसन्‍न, मैं प्रसन्‍न तो मैं प्रसन्‍न। जय प्रसन्‍न। प्रसन्‍नता का आलोक फैलता रहे। दुनिया चाहे नई हो पुरानी हो। प्रसन्‍नता नई ही रहनी चाहिए।

  4. ओह तो अब समझ आया इनकी भड़ास का राज़…
    ब्लागर इनके यहां चिरौरियां करने नहीं जाते न.

  5. एक बात समझ में नहीं आ रही कि क्या श्री आलोक मेहता ने ऐसा व्यंग्य लिखा ही नहीं था या किसी ब्लागर ने शरारत की थी। उसने यह पोस्ट क्यों हटाई? हमने नई दुनियां अखबार नहीं देखा। आपकी पोस्ट पर ही पढ़ा था। उस हिसाब से लगा कि यह एक व्यंग्य भर है। इसी कारण अपना लेख लिखा था। सारी सामग्री आपके पाठ और टिप्पणियां पर आधारित थी। अब यह अलग बात है कि किसी का मकसद व्यंग्य की आड़ में अपना प्रचार करना हो। बाकी तो आप जानते हैं कि बड़े लोगों क बड़ी बातें बहरहाल आपने मेरे लेख का उल्लेख किया इसके लिये धन्यवाद! इतना जरूर बताईये कि वाकई वह व्यंग्य प्रकाशित हुआ था कि नहीं। अगर नहीं तो हम भी अपना पाठ हटा लेंगे।
    दीपक भारतदीप

  6. पाबला जी, बहुत खूब "खोजबीन वर्क" से निपटाया आपने इन 5 स्टार चाटुकार महोदय को…। "नईदुनिया" इसी कांग्रेसी चाटुकारिता परम्परा की वजह से भास्कर और पत्रिका के मुकाबले पिटता जा रहा है…। हालांकि बाकी के दोनों भी कोई दूध के धुले नहीं हैं, लेकिन चमचागिरी की भी कोई सीमा तो होनी चाहिये कि नहीं? 🙂

    हिन्दी ब्लॉग्स की बढ़ती लोकप्रियता और ब्लॉग की दुनिया में कोई "दादागिरीपूर्ण दखल" न कर पाने के कारण कई प्रिण्ट और इलेक्ट्रानिक मठाधीश बड़े कुंठित हो रहे हैं आजकल…

  7. श्री श्री 1008 007 पाबला जी की जय
    अच्छा भुरता बनाया इस सरकारी टट्टू का

  8. @ दीपक भारतदीप

    यह किसी की शरारत नहीं है। जैसा कि कतरन पर भी स्पष्ट है, आलोक मेहता जी का लिखा गया यह लेख 28 फरवरी को वास्तविक रूप में नई दुनिया की साप्ताहिक पत्रिका 'संडे नई दुनिया' के पृष्ठ 6-7 पर प्रकाशित हुआ है। इस बार इस पत्रिका को 48 पृष्ठीय होली विशेषांक बना दिया गया है।

    इस छपे हुए लेख को उनके ब्लॉग पर नहीं डाला गया था। जैसा कि हटा दिए गए Blog Archive में दिख रहा है कि उस पर अंतिम पोस्ट अगस्त 2009 में ही गई थी।

  9. आईये हम सब मिल के परम पारखी और आलोचक विद्वान श्री आलोक मेहता जी को बहुत सारे ब्लोग पुरुस्कार ..खुशदीप जी के मंत्रीमंडल में से कोई पद ..दिलवाते हैं ..इसके बाद शायद वे हिंदी ब्लोग्गर्स के हक में कोई बढिया सा आलेख लिखेंगे ..और उससे प्रभावित होकर गूगल बाबा हिंदी एडसेंस चालू कर देंगे हर ब्लोग्गर का घर परिवार ब्लोग्गिंग से चलने लगेगा सबके लिए पीएफ़ पैंशन का जुगाड हो जाएगा ….

    क्या कहा ये सब कुछ नहीं होगा ….यदि इन्होंने कुछ अच्छा भी लिख दिया तो भी आलोक मेहता के ब्लोग पर पढने टीपने की गारंटी लेगा कौन …..??
    अमां भांग पी के ये मैं लिख क्या रहा हूं अब तो निकल लूं

    अजय कुमार झा

  10. भगवान सबका भली करें!
    होली की शुभकामनाएँ!

  11. हम भी शास्त्री जी वाली बात कहेंगे।
    होली की हार्दिक बधाई अवम शुभकामनायें।

  12. यह है कोन? स्टील का या चंदी का या सोने का लेकिन है तो चम्म्चा ही ना

  13. आदरणीय आलोक मेहता जी,
    ये अच्छी बात नहीं है।

    पाबला साहब,
    आपका बहुत बहुत आभार इन पर रंग आचमन करने के लिए। हा हा।

  14. महान पत्रकार..? होने के फायदे उठा रहे हैं पहली बार ब्लागर्स को पता चला ऐसी ऐसी महान विभूतियाँ हैं दुनिया में
    इश्वर इनको माफ़ करे ये क्या कह और कर रहें हैं इनको नहीं मालूम

  15. महान पत्रकार..? होने के फायदे उठा रहे हैं पहली बार ब्लागर्स को पता चला ऐसी ऐसी महान विभूतियाँ हैं दुनिया में
    इश्वर इनको माफ़ करे ये क्या कह और कर रहें हैं इनको नहीं मालूम

  16. महान पत्रकार..? होने के फायदे उठा रहे हैं पहली बार ब्लागर्स को पता चला ऐसी ऐसी महान विभूतियाँ हैं दुनिया में
    इश्वर इनको माफ़ करे ये क्या कह और कर रहें हैं इनको नहीं मालूम

  17. महान पत्रकार..? होने के फायदे उठा रहे हैं पहली बार ब्लागर्स को पता चला ऐसी ऐसी महान विभूतियाँ हैं दुनिया में
    इश्वर इनको माफ़ करे ये क्या कह और कर रहें हैं इनको नहीं मालूम

  18. महान पत्रकार..? होने के फायदे उठा रहे हैं पहली बार ब्लागर्स को पता चला ऐसी ऐसी महान विभूतियाँ हैं दुनिया में
    इश्वर इनको माफ़ करे ये क्या कह और कर रहें हैं इनको नहीं मालूम

  19. महान पत्रकार..? होने के फायदे उठा रहे हैं पहली बार ब्लागर्स को पता चला ऐसी ऐसी महान विभूतियाँ हैं दुनिया में
    इश्वर इनको माफ़ करे ये क्या कह और कर रहें हैं इनको नहीं मालूम

  20. महान पत्रकार..? होने के फायदे उठा रहे हैं पहली बार ब्लागर्स को पता चला ऐसी ऐसी महान विभूतियाँ हैं दुनिया में
    इश्वर इनको माफ़ करे ये क्या कह और कर रहें हैं इनको नहीं मालूम

  21. महान पत्रकार..? होने के फायदे उठा रहे हैं पहली बार ब्लागर्स को पता चला ऐसी ऐसी महान विभूतियाँ हैं दुनिया में
    इश्वर इनको माफ़ करे ये क्या कह और कर रहें हैं इनको नहीं मालूम

  22. परदे में रहने दो परदा ना उठाओ ….

  23. जनाव आलोक मेहता साहब, ये ब्लॉग जगत के ही कुंठित लोग है जो आप जैसे पदमश्री पाए महा पुरुषो की भाषा नहीं बोल पाने के बावजूद सच्चाई बयान करते है ! वरना तो देश आप जैसे प्द्मश्रीयों और पद्म्भुशनो की दुनिया पढ़ते-पढ़ते ही अप्रत्यक्ष तौर पर गुलाम हो गए पास्ता के !

  24. ब्लॉगर बंधुओं से निवेदन है की आलोक मेहता ने होली के अवसर पर ब्लागजगत की जो चुटकी ली और अपनी कुंठाएं हम पर थोपीं तो उसका जवाब हम उनके ही लहजे में उन्हें दें -सारी संपादकी समझ में आ जायेगी!
    मैं आज ही उस लेख पर कुछ लिखने वाला था -मेहता जी आपने हमारी उतारी और अब हम आपकी उतारते हैं तनिक गम करिए !

  25. ee Mehta type log hi Hindi patrakaarita ko badnaam koiye hue hain.. chamcha kaheen ka..

  26. ब्लागर एकता जिंदाबाद जिंदाबाद
    ये सारा विवरण उन्हे भेज दिया जाए

    कुछ लोग और लहू लुहान हो चुके हैं
    रविश और पीपी बाजपायी जैसे

  27. मैं फ़िर आ गया ….

    पहले तो मुझे लगा कि जरूर को अपना ही है ..चलो अपना है अपने बीच का है फ़िर तो ये रगडा झगडा चलता है …बाद में पता चला कि लो कल्लो बात ये तो कोई नई दुनिया से आया है ….आज ही नई दुनिया की मुलाकात पुरानी दुनिया से करवाते हैं …बस थोडी देर बाद
    अजय कुमार झा

  28. ये ज़िंदगी के मेले दुनिया में कम न होंगे, अफ़सोस हम न होंगे…………….

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