केशधारी सिक्ख व सिर मुंडवाई विधवा

एक ख्याल कि सिक्ख गुरुयों ने एक नेक नीयत योद्धा को केशधारी सिक्ख बने रहने की अनिवार्यता क्यों रखी थी

जैसा कि मैंने अक्सर कहा है कि 1981 मेरे जीवन में बहुत से बदलाव ले कर आया था। इन बदलावों में एक हादसा भी जुड़ा हुआ है मेरे छोटे भाई की मृत्यु का। वह सोलह वर्ष की कच्ची आयु में चलते बना इस दुनिया से।

तब बड़े बुज़ुर्ग आपसी बातचीत में कहते थे कि हमने उसकी जान बचाने के लिए धर्म को ताक पर रख दिया लेकिन वह फिर भी ना बच पाया।

मैंने जो कुछ सुन रखा था उसके अनुसार उसे कोई हृदय रोग था बचपन से और डॉक्टरों ने यही सलाह दी कि अगर बेटे का जीवन बचाना है तो उसे केशधारी सिक्ख ना बनाए। उसके बाल जितने छोटे रखे जा सकें उतना बेहतर होगा सेहत के लिए।

माँ, पिता जी ने यह बात मेरे कट्टरपंथी दादा जी के सामने रखी तो उन्होंने कुछ हिदायतों के साथ अपने पोते का जीवन बचाने की खातिर केश ना रखने की अनुमति दे दी। लेकिन वह फिर भी अल्पायु में दुनिया छोड़ गया।

जब माता जी को अपना पोता, गुरूप्रीत मिला तो बेटे की भावनात्मक यादों के वशीभूत उन्होंने उसके भी केश ना रखने का निर्णय सुना दिया।

दशकों पहले भी जब मैं ‘जान बचाने की खातिर सर के बाल ना रखें’ वाली डॉक्टरी सलाह याद करता तो समझ ना पाता कि आखिर इन अलग अलग दो बातों का क्या संबंध है? मैं अपने शहर, दल्ली राजहरा की लाइब्रेरी में लगभग हर शाम गुजारा करता और वहीं की किताबों में प्राचीन ग्रीक योद्धा, उस समय के सुपरमैन, सैमसन के बारे में पढ़ रखा था कि उसकी ताकत का रहस्य उसके सर के लंबे बालों में छिपा था और उसकी मौत भी तब हुई जब कैद में बाल काट कर उसे निशक्त कर दिया गया।

सैमसन वाले इस तथ्य से मैं बड़ा गुमान करता था कि मेरे भी बाल इतने लंबे हैं इसलिए ताकतवर हूँ। माँ मुझे तो चारपाई पर बिठा कर जमीन को छूते मेरे बालों को रीठा दही से धो कर संभालने का जतन करती लेकिन भाई के बाल ज़रा सा भी बढ़ जाएं तो उन्हें कटवाने पर तुल जाती।

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लंबे बालों वाले कुछ पुरुष व्यक्तित्व व चरित्र

कुछ और उम्र हुई तो सिक्खों के पांच आवश्यक ‘क’ की महत्ता जान पड़ी। बाक़ी सब तो समझ आ गया यह कोई ठीक ठीक नहीं बता पाया कि केश क्यों?

सदियों पहले यदि हिन्दुओं की रक्षा के लिए योद्धा बनाने की बात है तो भारी भरकम केश संभाले या युद्ध कौशल में पारंगत हो परिवार का सबसे बड़ा पुत्र?

इधर मैं यह भी देखता कि ऋषि, मुनि, विदुषी महिलायें, कवि , गीतकार , गायक , कलाकार, चिंतक, पुजारी, सृजक, देवी देवता जैसे व्यक्तित्व लंबे बाल धारण किए हुए हैं उधर लठैत, बदमाश, पुलसिए, फौजी, पहलवान, पंडे, (वृन्दावन की) विधवा महिलाएं, विध्वंसक तत्व, राक्षस सर घुटाए रहते हैं।

फौज और पुलिस में तो बालों को एक निश्चित लंबाई से अधिक बढ़ने ही नहीं दिया जाता। खिलाड़ी, साहसिक अभियान में शामिल भी इसी श्रेणी में शामिल हैं।  जैन धर्म में दीक्षा लेती कन्यायों के केश लुंचन संस्कार और सगे-संबंधियों की मृत्यु पर पुरूषों के मुंडन पर भी निगाह गई मेरी।

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छोटे बालों वाली कुछ महिला व्यक्तित्व व चरित्र

समाचार पत्र-पत्रिकाओं के पन्ने पलटते ध्यान गया कि व्यापार क्षेत्र अंतर्गत भारत की दस सबसे सफल महिलाओं में से लगभग सभी सर के बाल कानो/ कंधो तक कटवा कर रखती हैं। यही हाल विश्व की दस सबसे प्रभावशाली महिलाओं या दस सबसे ऊंचे राजनैतिक पद की महिलाओं का है। जबकि देश विदेश की गायिकाएं, लेखिकाएं अथवा समाज कल्याण में जुटीं महिलाएं लंबी या घनी केश राशि वाली हैं।

अब मामला कुछ कुछ समझ में आने लगा था कि सिक्ख गुरुयों ने एक नेक नीयत योद्धा को बाल लंबे रखने की अनिवार्यता क्यों रखी थी। इससे पहले ‘उलटी-सीधी’ कुछ बातें और हो जाएं।

दुनिया के अधिकतर हिस्सों में सजा के तौर पर सिर के बाल काट देना क्रूरता माना जाता है, इस तरह की सजा पाया व्यक्ति भी हद दर्जे की तौहीन महसूस करता है। सर पर बाल उगाने या गिरने से रोकने, सजाने, संवारने का बाज़ार अरबों-खरबों का है। जिससे भी पूछो वह बालों की घट बढ़ से आत्मविश्वास से जोड़ कर देखता है। भाग-दौड़ वाले माहौल में कामकाजी महिलाएं लंबे बालों को झंझट मानती हैं। स्वाभाविक गंजापन बुद्धिमत्ता, अनुभव और स्थिर व्यक्तित्व की निशानी माना जाता है।

पिछले वर्ष जब इस विषय पर लिखने की सोची मैंने तो इंटरनेट खंगाल मारा। जो कुछ मिला उससे यही निष्कर्ष निकाल पाया कि मानसिक स्वास्थ्य व खास तौर पर भावनात्मक रवैये वाले दिमाग के न्यूरोट्रांसमीटर ठीक ठाक काम करें इसके लिए प्रोटीन बहुत ज़रूरी है और सिर के बाल तो खास तरह के प्रोटीन, केराटिन से बने होते है। निडरता को दिमागी प्रोटीन से जोड़ता लेख भी दिखा। C-Reactive नामक एक विशिष्ट प्रोटीन  के कारण हृदय रोग होने की जानकारी भी मिली।

छोटे भाई के केश ना रखने की सलाह का कारण कुछ कुछ तो समझ आ गया था लेकिन यह पूरी तरह लगने लगा कि कठोरता, निष्ठुरता, संवेदनाहीन विचार, भावनायों के दमन के लिए जानबूझ कर बाल छोटे रखे जाते हैं, सिर मुंडा दिया जाता है और नरमदिली, प्रेम, स्नेह, भावुकता, संवेदनशीलता बनाए रखने के लिए सर के बाल लंबे रखने का जतन  किया जाता है।

शायद सिख धर्मं में भी अपने बल पर अन्याय का मुकाबला वाले योद्धा तैयार करते हुए इस बात का ध्यान रखा गया होगा वरना अनुशासन के घेरे में रहने वाले सरकारी कारिंदों,  लकीर के फकीर क़ानून के रखवालों और उनमे क्या फर्क रह जाता।

समाज में चारों तरफ नज़र दौडाता हूँ तो मन करता है कि दंगे, फसाद, धूर्तता, बलात्कार, व्यभिचार जैसे अपराधों में लोगों के सर के बालों का अध्ययन होना चाहिए, शायद कोई अनोखा शोध हो जाए। और हाँ … अपवाद नाम का शब्द केवल शब्दकोशों के लिए नहीं बना हुआ 🙂

आपका क्या खयाल है?

केशधारी सिक्ख व सिर मुंडवाई विधवा
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29 comments

  • सिर के बालों के विषय में सबके अपने-अपने विचार और तर्क हैं। मैने कहीं पढा था कि सिर के बाल ब्रह्मरंध्र की रक्षा करते हैं तथा मस्तिष्क को वैचारिक प्रदूषण से मुक्त रखते हैं। इसलिए वैदिक काल में गौखुर के बराबर शिखा रखी जाती थी। शिखा स्थान को मनुष्य की उर्जा का केन्द्र माना गया है।

    बालों का पोषण भी शरीर की उर्जा से होता है, शायद इसिलिए डॉक्टर ने बाल छोटे रखने की सलाह दी होगी। फ़ौजियों के छोटे बाल रखने का कारण शारीरिक साफ़ सफ़ाई को लेकर है।
    टिप्पणीकर्ता ललित शर्मा ने हाल ही में लिखा है: भूभल: सामाजिक चेतना की आंच का प्रज्जवलन — ललित शर्माMy Profile

    • साफ़ सफाई रखना निश्चित तौर पर स्वास्थ्यकारक है लेकिन क्या यह मान लिया जाए कि केशधारी सिक्ख या मुस्लिम धर्मावलंबी फौजी ‘उतना’ ध्यान नहीं देते इस बात पर?

  • एक धार्मिक प्रतीक और भाई, इन दोनों से ही भावनात्मक लगाव से यह बात स्पष्ट है कि केश के बारे में सही जानकारी पाने के लिये आप कितने उद्वेलित रहे होंगे।

    आपके भाई के बारे में जानकर दुःख हुआ। उनके केश काटने वाली बात का सही कारण तो चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोग ही बता पायेंगे।

  • आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

  • बहुत बड़े और बहुत छोटे बाल उन पर अधिक समय न देने के लिये रखे जाते हैं, पता नहीं कितना समय बचता होगा?
    टिप्पणीकर्ता प्रवीण पाण्डेय ने हाल ही में लिखा है: मैकपुरुष का प्रयाणMy Profile

  • mrityunjay kr Rai says:

    very informative post, written with a broad mind and bigger perspective.

  • एक टेक्निकल ब्लागर का ब्लाग इतनी देर से खुलता है कि हमें दूसरा ब्लाग देख कर लौटना पड़ता है। कुछ कीजिए पाबला जी 🙂
    टिप्पणीकर्ता Chandra Mouleshwer ने हाल ही में लिखा है: नीलम कुलश्रेष्ठ- एक समीक्षाMy Profile

  • dr t s daral says:

    सुन्दर व्याख्या की है ।
    बाल हों तो झंझट । न हों तो संकट ।

  • सही कारण की खोज के लिये इस विषय के विशेषज्ञों की शरण में जाना पड़ेगा। यदि वहाँ समुचित कारण नहीं मिलता तो उन चिकित्सकों को भी ढूंढना पड़ेगा जिन्होने केश-कर्तन की सलाह दी थी, हो सकता है कि उनकी सलाह के पीछे कोई वैज्ञानिक कारण न होकर कुछ अन्य पूर्वाग्रह या ईवेन कोई छिपा हुआ/परोक्ष कारण रहा हो।

    सनातनी परिवारों में मुण्डन के पीछे दो अलग-अलग कारण होते हैं। बच्चों का मुंडन संस्कार उनके पूर्व संस्कारों से शुद्ध होकर नया जीवन आरम्भ करने का प्रतीक है और ब्राह्मण का मुंडन पवित्रता का ताकि मन्दिर की पाकशाला या वैद्यक/शल्यक्रिया आदि में बाल गिरने या सर से कुछ झरने की सम्भावना न्यूनतम रहे। आधुनिक सिख डॉक्टरों द्वारा दाढी में जाली लगाने का उद्देश्य सेम हो सकता है। इसी प्रकार भारत में सन्यासियों द्वारा बाल न कटाने की बड़ी प्राचीन परम्परा रही है जिसका उद्देश्य अपने रख-रखाव जैसी बातों से ऊपर उठकर अपने उद्देश्य के प्रति समर्पण है। खालसा की स्थापना के समय भी गुरु महाराज को ऐसे ही सपर्पण की आवश्यकता थी जिसमें पीरी का यह रूप सहयोगी होता और हुआ।

  • मैं चुप रहूंगी
    बस एक शर्त…. बालों की अदला बदली कर ले अपन दोनों?
    प्राचीन काल में राजा लोग,योद्धा बाल लम्बे रखते थे सर के बीच में जुड़ा बनाते थे जिससे युद्ध में सिर पर होने वाले प्रहार से सिर सुरक्षित रहे. प्रारंभ में सिक्ख योद्धा होते थे शायद इसी कारण उनमे भी लंबे केश रखने का चलन शुरू किया गया.
    मूंडन संस्कार और परिजन की मृत्यु पर केश देने की परपरा के पीछे क्या लोजिक है?नही मालूम.हाँ बड़ों के मुंडित सिर देख कर दूर से पता चल जाता था कि इनके घर में किसी की मृत्यु हो गई है.लोग शोक प्रकट करने के लिए गलत व्यक्ति को नही पकड़ बैठते थे. हमारे परिवार में न मृत्यु पर बाल देने का रिवाज है न मुंडन संकार का.इस लिए………. मैं चुप रहूंगी.

  • ajit gupta says:

    बडा खोजपरक आलेख है। आनन्‍द आया।

  • Deepak Baba says:

    कुछ भी कर लो कैसे भी कर लो – मन को संतुष्टि होनी चाहिए.

    हर तरह के लोग हर जगह मिल जायेंगे.

    ए दुनिया ऊंटपटांगा…

    बस.

  • बाकों पर एक शोध प्रबन्ध लिख ही डालिये । जब हमारे नहीं रहेंगे तब पढ़ा करेंगे ।

  • बालों पर एक शोध प्रबन्ध लिख ही डालिये । जब हमारे नहीं रहेंगे तब पढ़ा करेंगे ।

  • पाबला जी, देर से आई हूँ किन्तु विषय मेरे भी बचपन के चिन्तन के हैं।
    मुझे याद आता है अपने एक सहपाठी का पगड़ी पहने हुए पहला दिन। शायद उसके परिवार ने मौसम गलत चुना था। गर्मी या असुविधा के कारण उसे चक्कर आ रहे थे। बिना पटके के वह पगड़ी उतारना नहीं चाहता था और कक्षा का कप्तान वह, यूँ चक्कर खाता बैठे भी नहीं रह सकता था। हारकर सिकरूम की शरण में जाकर पगड़ी उतारी उसने। शायद भाई को गर्मी से ब्लड प्रैशर बढ़ता हो या कोई अन्य समस्या होती हो, सिर ठंडा रखना आवश्यक रहा हो। उस जमाने में एसी आदि का चलन भी कम ही था।

    मेरी समझ में श्री गोबिन्द सिंह जी ने सिखों को बाल रखने को इसलिए कहा होगा कि सामान्य बालों में तो कोई भी शत्रु चार कक्के पहन, सिखों सी वेषभूषा धारण कर अपने को सिख कहता हुआ स्वयं को हिन्दुओं की रक्षा के लिए योद्धा घोषित कर, हिन्दुओं से धोखा कर सकता था। प्रायः हिन्दु स्त्रियाँ अपने सिक्ख रक्षकों पर पूरा विश्वास कर अपनी रक्षा का भार उनपर सौंप उनके बताए अनुसार किसी अन्य स्थान जाकर भी छिपने को तैयार रहती थीं। ऐसे में कोई नकली सिक्ख बन रक्षक की जगह भक्षक बन सकता था। किन्तु केशधारी बनना इतना सरल नहीं था। वह वर्षों का काम था, सो इतनी सरलता से शत्रु सिक्ख का रूप धरकर हिन्दुओं का विश्वास नहीं जीत सकता था। बात तो यह वर्दी की थी किन्तु गुरू ने ऐसी वर्दी धारण करवाई जो आम आदमी एक दो दिन के लिए धारण नहीं कर सकता था। देखा जाए तो यह उनकी मास्टर स्ट्रोक थी। इसके अतिरिक्त केशों का एक अन्य लाभ भी था। सिक्ख पल भर को भी भूल नहीं सकता था कि वह गुरू का सैनिक है और वह और अधिक अनुशासित व लक्ष्य की ओर केन्द्रित रहता था। शायद गुरू गोबिन्द सिंह वर्दी व टीम वर्क के महत्व को जानने वाले पहले मानव थे।
    खैर, जो भी हो, तबके पंजाब में हिन्दु धर्म को जीवित रखने व स्त्रियों की रक्षा के लिए उन्हें मेरा सलाम।
    घुघूती बासूती

  • Anupam Singh says:

    पाबला जी ये लेख आपने किस मकसद से लिखा था, यह तो नहीं जानता। हां अब यह गुरप्रीत के जन्म से जुडे आपके परिवार के विश्वास पर एक दस्तावेज जरूर बन गया है। पहले भी यह लेख पढा था, लेकिन कुछ लिख नहीं पाया था।

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