गन्ना रस क्यों नहीं पीता मैं!?

वैसे तो मेरे शहर, भिलाई में जनवरी का माह बीतते बीतते गन्ना रस के अस्थाई ठिकाने सज जाते हैं लेकिन अब कुछ देर हुई इनके दिखने में।

होली के दो दिन पहले ऑफ़िस से लौटते एक मित्र अपने लिए मोबाईल हैण्डसेट खरीदने में सहायता के लिए मुझे साथ ले गए।

वापसी में उन्होंने गन्ना रस वाले के सामने गाड़ी रूकवा ली। उनका इरादा भांप मैंने साफ इंकार दिया कि गन्ना रस नहीं पीता मैं!

हैरानी से उन्होंने पूछा -क्यों? कारण बताने का मन नहीं था सो टरका दिया कि नहीं पीता सो नहीं पीता।

गन्ना रस की ‘दुकानें’ देखते मुझे दो किस्से बरबस याद हो आते हैं।

वर्षों पहले पंजाब के टांडा-दसूया के बीच हाईवे से सटे अपने ससुराल वाले गाँव में जब हमारी छोटी सी बिटिया ने गन्ना पेर कर गुड़ बनाए जाने की प्रक्रिया देखी तो गन्ना रस के भंडार को देख अचंभित रह गई।

गन्ने के खेत से गुड़ तक

बिटिया को ससुर जी ने गाढ़े रस से भरा बड़ा सा गिलास थमाया तो उसकी आँखें चमक उठी। लेकिन दो घूँट भरते ही उसने गिलास मेरी ओर बढ़ा दिया “छी: कित्ती बदबू आ रही है।”

ससुर जी हँस पड़े “शहर के जिन बच्चों को ढ़ेर सा पता नहीं कैसा पानी मिला, जाने कहाँ की बर्फ़ मिले पतले से रस की आदत पड़ गई हो उन्हें ऐसे शुद्ध रस से बदबू ही आएगी!”

फिर मैंने बड़े मज़े से चुस्कियाँ लेते हुए दो गिलास पी डाले उस बदबू वाले रस के 🙂

 गन्ना रस

लेकिन कुछ वर्षों पहले उमस भरी गरम मौसम की एक शाम मैं भिलाई निवास के पीछे वाले चौक पर गन्ना रस के स्टाल पर रूका। कम बर्फ़ वाले दो गिलास रस की फरमाईश कर कुर्सी पर पसर गया। तब तक एक परिवार भी पहुँच गया। गन्ना रस वाले ने बड़ी फुर्ती से पानी लेकर गिलास रगड़ रगड़ कर साफ़ किए, मशीन को भी नहला कर साफ़ कर लिया।

छोटा सा डीज़ल एंजिन चालू हुआ। जब तक मशीन लय में आ पाती तब तक नींबू, अदरक संभाल लिए गए। जैसा कि आम तौर पर सड़क किनारे के स्टाल पर होता है, हम भी उस सारी प्रक्रिया पर नज़रें गड़ाए हुए थे। महाशय ने ज़मीन पर रखे छिले हुए गन्ने के ढ़ेर से चार छह टुकड़े निकाले, मशीन में ठूँस दिए। जोर पड़ा तो मशीन की रफ़्तार धीमी पड़ गई। फटाफट कुछ और गन्ने दबोचे गए। वे मशीन मे गए ही थे कि मैं जोरों से चिल्ला उठा “अबे! ये क्या कर रहा है!?” मेरी तीखी आवाज़ सुन रस वाले ने चेहरा घुमाया। “अरे, अरे अरे” कह्ते हुए मेरे हाथ के इशारे की दिशा की ओर देखा तो ‘हे राम’ कहते हुए खड़ा ही रह गया।

मशीन में ठुँसे, तेजी से सरकते जा रहे गन्नों के बीच चाबुक सरीखा बुरी तरह लहराता काले से रंग का साँप था। पलक झपकते ही सारे गन्नों का कचूमर मशीन के बेलनों के दूसरी ओर जा चुका था और साथ में वह निरीह प्राणी भी।

वह दिन था और आज का दिन। गन्ना रस के स्टालों पर निगाह भी पड़ जाती है तो रीढ़ की हड्डी में बिजली की तरंगों जैसा जो कम्पन होने लगता है उसकी लहर रह रह कर कितनी ही देर तक होती रहती है।

बस। इसीलिए गन्ना रस नहीं पीता मैं!?

गन्ना रस क्यों नहीं पीता मैं!?
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गन्ना रस क्यों नहीं पीता मैं!?” पर 44 टिप्पणियाँ

  1. पीलिया वाले गन्‍ना रस पीते हैं और माना यह भी जाता है कि पीलिया का संक्रमण केन्‍द्र भी साफ-सफाई रहित गन्‍ना रस केन्‍द्र ही होते हैं.

  2. गन्ने के रस वाला किसी पूर्व एशियाई देश का तो नहीं था … डिस्कवरी पर ऐसे जूस उधर के ही लोग निकालते दिखाई देते हैं. 🙂
    टिप्पणीकर्ता भारतीय नागरिक ने हाल ही में लिखा है: और अब नरेन्द्र कुमारMy Profile

  3. ओह ! बड़ा भयंकर वाकया है जी । अब हम तो फ्रूट जूस भी नहीं पी पाएंगे । क्या पता उसमे कितने कॉकरोच , कीड़े या मक्खियाँ पिसती हों ।
    वैसे तो गोल गप्पे में भी हाथ घोलकर न जाने क्या क्या मिल जाता होगा । 🙂

  4. डर तो लगता है पर गन्‍ने के रस का दूसरा कोई सानी भी तो नहीं

  5. होली मुबारक हो ! पाबला जी ,
    आजकल तो खाना-पीना ही बाहर का रह गया है …हाँ! पर आप की तरह आँखे खुली और कानो का चोकन्ना होना जरूरी है ….बाकि असी
    ते अपने हिस्से दा खा-पी बेठे हाँ!
    खुश ते स्वस्थ रहो !

  6. होली मुबारक हो ! पाबला जी ,
    आजकल तो खाना-पीना ही बाहर का रह गया है …हाँ! पर आप की तरह आँखे खुली और कानो का चोकन्ना होना जरूरी है ….बाकि असी
    ते अपने हिस्से दा खा-पी बेठे हाँ!
    खुश ते स्वस्थ रहो !
    टिप्पणीकर्ता ashok saluja ने हाल ही में लिखा है: जीवन की दौड़ …..मृत्यु की और ….My Profile

  7. उधर कमरबंद / नाड़े की जगह सांप इधर गन्ने की जगह सांप 🙂

    मेंहदी हसन साहब से अग्रिम माफी के साथ फिलहाल एक पैरोडी 🙂

    सांप ही सांप निकल उट्ठे हैं पैजामे में
    कंपकंपी छूटी बुखार आ गया ठिकाने में
    सांप कुछ इस तरह गन्ना मशीन में आये
    जिस तरह ज़हर उतर आया हो पैमाने में 🙂

  8. अपुन तो कोई रस या जूस नहीं पीते। गन्ने का रस तो कभी नहीं। गन्ना चूसने में जो आनन्द है वह रस में कहाँ?
    फिर असावधानी का नतीजा तो हमेशा भुगतना ही पड़ता है।

  9. हम तो अपने ऑफ़िस के केन्टीन में पीते हैं Cool और आजकल गन्ने का रस भी ब्रांड के साथ बिक रहा है, जो हमारे यहाँ कभी मधुशाला के नाम से लगता था। Cheers
    टिप्पणीकर्ता विवेक रस्तोगी ने हाल ही में लिखा है: हड़ताल है ! (Strike..!)My Profile

  10. पाबला जी, अपने साथ कभी ऐसी दुर्घटना तो नहीं हुई, पर जल्‍दी हम भी इतनी हिम्‍मत नहीं जुटा पाते। 🙂

  11. कल्पना मात्र से उबकाई आ रही है। हम तो वैसे ही गन्ने का रस नहीं पीते परिचितों को भी ये वाक्या जरूर बतायेगें, भले गन्ने का रस बेचने वाले हमारे दुश्मन बन जायें

  12. अच्छा तो लगता ही है पीना भरी गरमी में…
    टिप्पणीकर्ता समीर लाल “पुराने जमाने के टिप्पणीकार” ने हाल ही में लिखा है: अतिथि- तुम कब जाओगे..मात्र फिल्म नहीं, एक हकीकत!!My Profile

  13. पिछले ८ साल से मैं गन्ने का रस नहीं पीता. ८ साल पहले गले का जो संक्रमण हुआ तो ६ महीने की दवा और दर्द सहना पडा. हां इतना जरुर करता हुँ कि सडककिनार दुकानदारों को पोटेशियम परमेगनेट की पुडियायें मुफ्त बांटता रहता हूँ जिससे कि संक्रमण कम से कम फैले.

    सस्नेह — शास्त्री

    हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
    http://www.Sarathi.info

  14. ओह कल्पना मात्र ही सिहरा देने वाली है। हमारे साथ भी ऐसा होता तो शायद हम भी छोड़ दिये होते। फिलहाल जब भी पीने जायेंगे आपका किस्सा याद आयेगा।
    टिप्पणीकर्ता ePandit ने हाल ही में लिखा है: दक्ष – आखिर आ ही गया पाँच हजारी ऍण्ड्रॉइड ४.० (ICS) टैबलेटMy Profile

  15. ab n pilaana hai to mt pilaao pr yun draao to mtttt. apun to hotels ho ya sdk kinare ka khomcha………jb khaane ka soch hi liya hai to uss taraf jyada dimaag nhi lgaate. saamp pees jaaye chaahe magarmchchh juice peena to peena bssss. kya krun?? aisiiich hun main toooo hi hi hi

  16. साफ-सफाई रहित और जहाँ पेरने वाले बेलन लोहे के हों वे हानिकारक होंगे सबसे अच्छा तो लकड़ी के बेलन हैं जिससे रस आपने कभी पिया था.

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