मेरे सामने उस इंसान की गरदन उड़ा दी गई!

लुधियाना मे हम दो मित्रों का रहना होता था 1981 में जनता कालोनी कहलाते स्थान पर। अब तो वह जनता नगर हो गया है 🙂 यह कालोनी गिल रोड पर तब के सी आई टी से सटी हुई थी। वह भी अब ए टी आई हो गया है।

30 वर्ष पहले लुधियाना इतना बड़ा नहीं था जितना अब है। गिल रोड के सायकिल बाज़ार से ली गई साईकिल थी हमारे पास और बारी बारी पीछे बैठ कर हम दोनों सारा लुधियाना घूम चुके थे। तब घंटाघर चौक सच में चौक होता था। अब तो ऊपर ओवर ब्रिज़ तन गया है।

1981 में कथित आतंकवाद जोर पकड़ चुका था। तरह तरह की बातें आए दिन सुनने को मिलती रहती थीं। एक दिन क्लास का समय अभी दूर था। यूँ ही अकेले लक्कड़ वाले पुल की ओर से टहलते हुए घंटाघर चौक से आगे बढ़, चौड़ा बाज़ार के प्रकाश स्वीट्स की ओर कदम उठाए ही थे कि एक दहाड़ती हुई सी आवाज़ की ओर नज़रें उठीं।

कुछ ही दूरी पर पूरी वेशभूषा में एक हट्टा कट्ठा निहंग, फुटपाथ पर खड़े एक सिगरेट पीते युवक को टोक रहा था कि वह सिगरेट ना पीए।

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पारंपरिक वेशभूषा में एक निहंग का प्रतीक चित्र

सिगरेट के नुक्सान गिनाते और सिक्ख धर्म का वास्ता देते उस निहंग की आवाज़ ऊँची होती गई। सिगरेट पीने वाला युवक हलके फुलके अंदाज़ में निहंग की आवाजों पर प्रतिक्रिया देता रहा। अवहेलना की नीयत से उसने दुसरी सिगरेट सुलगा ली। तब तक आसपास मजमा लगना शुरू हो गया था। मैं भी उनमें शामिल हो चुका था।

साम-दाम की एकतरफा कोशिश नाकाम होते देख निहंग ने हुँकार भरी और चेतावनी वाले स्वर में उस युवक को चेताया कि सिगरेट फेंक दे वरना गरदन उड़ा दूँगा! युवक ने उपहास में उड़ा दिया इस चेतावनी को और साथ ही साथ धुँआ भी। इससे पहले कि हम अगली प्रतिक्रिया के लिए साँस लेते, बिजली की गति से उस निहंग ने अपनी भारी भरकम तलवार निकाली और सीधे उस सिगरेट पीते युवक की गरदन पर वार किया।

अगले ही पल उस युवक की गरदन सड़क पर फुटबॉल सरीखी लुड़कती चली गई। मेरी तो आँखें फटी की फटी रह गईं। लोगों में भगदड़ मच गई। मैं डरा हुआ सा दो कदम पीछे हटा लेकिन दौड़ नहीं पाया। मेरी निगाह तो उस सिरकटे युवक के धड़ पर थी जो अब भी खड़ा था और उसके हाथ की ऊँगलियों में अब भी सुलगी सिगरेट फंसी थी। सिर से हैंडपंप सरीखा खून उछल रहा था। जब वह सुलगती सिगरेट, ऊँगलियों की पकड़ ढीली होते ही जमीन पर टपकी तब मुझे होश आया और फिर सरपट भागती भीड़ के साथ हो लिया।

अब भी वह लोमहर्षक दृश्य याद आता है तो धूप में चमकती वह तलवार और ऊँगलियों से छूटती सिगरेट आँखों के सामने कौंध जाती है।

आपने कभी कोई ऐसी घटना देखी है?

मेरे सामने उस इंसान की गरदन उड़ा दी गई!
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मेरे सामने उस इंसान की गरदन उड़ा दी गई!” पर 15 टिप्पणियाँ

  1. हरियाणा रोडवेज़ की एक बस में सिख ड्राइवर के मना करने के बावजूद कुछ लोग बीड़ी पीते रहे. उसकी चिंगारी से बस के नए पेंट में आग लग गई और कई लोगों की जान उसमें गई थी.

  2. अरे बाप रे … बहुत ही डरावना अनुभव रहा होगा … वैसे कुछ ज्यादा ही सजा नहीं दे दी उस निहंग ने …

  3. बेहद खौफनाक नज़ारा देखा आपने।
    १९८१ में हम भी जब गोल्डन टेम्पल गए थे तो चेतावनी मिली थी कि यहाँ आसपास सिगरेट नहीं पीना ।
    अज़ी हमने तो हमेशा के लिए ही छोड़ दी ।

  4. वाकई इस तरह के खौफ़नाक हादसे कभी भूले नही जा सकते…उफ़। मौत का बुलावा इस तरह!!!!

  5. उफ़्फ़ ! शीर्षक से मुझे लगा कि इस बार भी आपने पक्का कुछ न कुछ ऐसा लिखा होगा कि , पढ के हम कहेंगे , ओह तो ये बात थी लेकिन अबकि बार पढा तो ..मुंह से निकला उफ़्फ़ …फ़िर आप तो वहां थे । सुन कर ही जड हो गया सर मैं तो ।
    टिप्पणीकर्ता अजय कुमार झा ने हाल ही में लिखा है: जनलोकपाल , जनांदोलन और जागता समाज ….१My Profile

  6. मेरी टिप्पणी कहाँ गई?’दिल को छू गया’ ही लिखने नही आती मैं किसी ब्लॉग पर या.यहाँ. इत्ती वड्डी वड्डी टिप्पणियाँ लिखने में टाइम लगता है और…निर्दयी लोग उसे उड़ा देते हैं.हादसे का असर अब तक है लगता है.
    मेरी टिप्पणी चिपका देना वापस.जे भी कोई दादागिरी है बेचारी के साथ तो आपने ‘उस’ सांप जैसा व्यव्हार कर दिया.उठा कर नीचे फैंक दिया.हा हा हा
    फिर लिख दूंगी दुबारा.

    • इंदु जी आपकी टिप्पणी उड़न छू होने का मुझे खेद है आप तो खुद जानती है कि उस समय आपको कितनी मशक्कत करनी पड़ी थी. वह टिप्पणी सर्वर बदले जाने के बीच आई थी और बीच रास्ते में कहीं विलीन हो गई. 🙁

      ना केवल आप, बल्कि अतुल श्रीवास्तव जी, प्रवीण पाण्डेय जी की टिप्पणियां भी गायब हैं! वापस लाने के प्रयास जारी हैं

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