गूगल एडसेंस का चेक और आयकर कार्यालय के बीच मेरा दिन

वित्त वर्ष की समाप्ति के आखिरी दिन, 31 मार्च को, दो ऐसी जगहों पर जाना पड़ा, जहाँ सरकारी नियंत्रण माना जाता है। दरअसल आयकर (Income Tax) निर्धारण वर्ष 2008-09 की विवरणी, कतिपय पारिवारिक व्यस्ततायों और लापरवाही के कारण अब तक जमा नहीं कर पाया था।

करते करते 31 मार्च भी आ पहुँची थी। जो आखिरी मौका देती है विवरणी जमा करने का। हमारा टैक्स (Tax) तो विभागीय स्तर पर ही कट जाता है और प्राथमिक स्तर की औपचारिकतायें भी वहीं निपट जाती हैं।

समय निकाल कर आनन-फानन में इन्कम टैक्स की वेबसाईट खोली, डाउनलोड की लिंक पर जा कर ITR-1 फॉर्म लेकर प्रिंट किया, फॉर्म 16 की सहायता से भरा और पहुँच गये घर से 2 किलोमीटर दूर आयकर कार्यालय, पूरे कागजात लेकर।

हर वार्ड की लाईन में 8-10 लोग खड़े थे। उनमें भी ज़्यादातर किशोर ही थे। थोड़ी देर में ही उन सबकी, आपस में बातचीत से पता चला कि वे आकस्मिक श्रमिक थे विभिन्न औद्योगिक इकाईयों, चार्टर्ड एकाऊँटेंटो, समूहों, व्यक्तियों के। सभी के पास 25-25 फॉर्म तक थे। अपना नम्बर आने पर काम खतम कर फिर लाईन में पीछे लग जाते थे, नये फॉर्म लेकर!

जब मेरा नम्बर आया तो फॉर्म हाथ में लेकर काऊँटर पर बैठे व्यक्ति ने कुछ कहा जो हम दोनों के बीच अधखुली काँच की दीवार के कारण सुना ना जा सका। कान लगाकर सुनने का प्रयास किया तो सुनाई पड़ा “बीएसपी (Bhilai Steel Plant) वाले हो?” (जबकि मैं बीएसपी वेतनधारकों के लिए निर्धारित लाईन में ही खड़ा था!) मैंने सहमति में सिर ऊपर नीचे हिलाया। फिर आवाज़ आयी “इसके साथ लगने वाले फॉर्म कहाँ हैं? उन्हें लगाईये।”

मैं पिछली बार भी इस मुद्दे पर बहस कर चुका था, इसलिए बड़े शांत, लेकिन ऊँचे स्वर में बोला “फॉर्म में कहीं लिखा नहीं है कि कौन-कौन से फॉर्म साथ में देने हैं। कही लिखा है तो बताईये, मैं लेकर आया हूँ। तुरंत देता हूँ।” उसने उलट-पलट कर देखने का उपक्रम किया और अपने (सीनियर) साथी से कुछ कहा। उसके साथी ने पिंजरे के शेर की तरह काँच की दीवार के पास आकर कहा कि आप फोटो कॉपी (Photo Copy) दे दो, ओरिजनल मत दो। मैंने फिर दोहराया “वो भी दे दूँगा, लेकिन कही लिखा है तो बतायो ना। जब लिखा ही नहीं है तो क्यों दूँ?” अब पहले ने झल्लाते हुये फॉर्म अपने तीसरे साथी को देते हुए कहा “दे दो पावती (Acknoledgement), जो होगा ये खुद निपट लेगा” झट से ठप्पा लगा और पावती मेरे हाथ में आ गयी।

असल बात यह है कि जब इन Income Tax के नये ITR फॉर्मों की घोषणा वित्त मंत्री चिदम्बरम जी ने की थी तो संसद में उन्होंने कहा था कि इन नये फॉर्मों के साथ किसी तरह के कागजात देने की आवश्यकता नहीं होगी। हुया भी ऐसा ही। अपने राम को यह बात अच्छे से याद थी और फॉर्म भरने वाले निर्देशों में भी इस बात की पुष्टि की गयी है। पिछले साल भी आयकर कर्मचारी के साथ ऐसी ही बहस हुयी थी और उसने नाराज़गी के साथ यह कहते हुए फॉर्म लिया था कि आप गलत जगह आ गये हो, आपको तो सीधे चिदम्बरम या मनमोहन के पास फॉर्म जमा करना था!

आयकर विवरणी का काम मेरी उम्मीद से पहले खतम हो गया था। पास ही में बैंक कॉम्लेक्स है। बिटिया के खाते वाले गूगल एडसेंस (Google Adsense) का चेक, वहीं के पीएनबी (Punjab Natinal Bank) की शाखा में 12 मार्च को जमा करवाया था। सोचा ताज़ा स्थिति देख लूँ।

वहां पता चला कि अब तक वह चेक क्लीयर ही नहीं हुया है। मैंने हैरानी से पूछा “अब तक नहीं हुया!? पूरे 21 दिन हो गये हैं! आखिर वह चेक गया कहाँ है जो इतनी देर लग रही है?” उसने भी अपने साथी का सहारा लिया। उनकी आपसी बातचीत से पता लगा कि चेक को नागपुर भेजा गया था, चूँकि वहाँ CITIBANK की शाखा नहीं है, इसलिए वापस आ गया। उसे फिर वापस मुम्बई भेजा गया है।” बड़े धीमे, संयत स्वर में मुझे बताया गया कि एक-दो दिन में हो जाना चाहिए। मैं चुपचाप उठा और सीधे ब्रांच मैनेज़र के चैम्बर में जा पहुँचा।

वहाँ थे रंजन कुमार। किसी विभागीय कर्मी से कोई चर्चा कर रहे थे। चर्चा छोड़ मेरी ओर मुड़े। मैंने अपनी समस्या बतायी। यह भी मैंने बताया कि स्थानीय एसबीआई (State Bank of India) की शाखा में 12 मार्च को ही सुपुत्र के खाते वाले गूगल एडसेंस (Google Adsense)का चेक जमा करवाया था जो दूसरे दिन ही क्लीयर होकर खाते में रकम दिखा रहा था। जानकारी मिली कि स्टेट बैंक का, सिटीबैंक के साथ गठबंधन (Tie-up) है। इस कारण वह चेक तुरंत क्लीयर हो गया, हमारा गठबंधन नहीं है। 80 के दशक में था।

जब मैंने पूछा कि चेक नागपुर क्यों भेजा गया, जब वहाँ सिटीबैंक की कोई शाखा ही नहीं है? तो उनका जवाब मिला कि अंदाजे से भेज दिया होगा कि इतना बड़ा शहर है, वहाँ तो इस अंतर्राष्ट्ररीय बैंक की शाखा होगी ही। जब मैंने किंचित रोष से कहा कि इंटरनेट पर बमुश्किल 15 सेकेंड लगते हैं यह देखने में कि, सिटीबैंक की सम्पूर्ण भारत में शाखायें कहाँ-कहाँ है। फिर उधर से जवाब आया कि पुराना सिस्टम होता तो रज़िस्टर के सामने वाले पन्ने पर चिपका देते। अब दिक्कत होती है। इंटरनेट पहुँच (Internet Access) हर कर्मचारी को नहीं दिया जा सकता। उन्होंने सलाह दी कि आप जब चेक जमा कराते हैं तो बैंक की शाखा का नाम लिख दिया कीजिये। बात जँच गयी क्योंकि इस गूगल वाले चेक पर बैंक की शाखा का नाम नहीं लिखा होता। वैसे उन्होंने भी मुझे 4 अप्रैल का आश्वासन दिया है।

वैसे बात हैरानी की लगी मुझे। पूरे मध्यप्रदेश – छत्तीसगढ़ में सिटीबैंक की मात्र दो शाखायें हैं। इंदौर और भोपाल। महाराष्ट्र में मुम्बई-पुणे के अलावा नाशिक, औरंगाबाद, यहाँ तक कि अकोला में भी सिटीबैंक है लेकिन नागपुर में नहीं! पूर्व दिशा की ओर देखें तो कोलकाता के पहले सिर्फ भुबनेश्वर! मैं अपने उस प्रदेश क्षेत्र की बात कर रहा हूँ जो औद्योगिक तरक्की कर चुका।

पंजाब नेशनल बैंक की एक और दिलचस्प इंटरनेटीय कहानी फिर कभी।

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गूगल एडसेंस का चेक और आयकर कार्यालय के बीच मेरा दिन” पर 9 टिप्पणियाँ

  1. आप की बात सही है …भले ही कड़वी है ……बैंको और anya सरकारी विभागों का सच यही है जो आपने प्रस्तुत किया है …..

  2. ताज्जुब है कि वाणिज्यिक प्रतियोगिता के बढ जाने के बावजूद ऐसे ठस लोगो बैंकों में अभी भी ऊंची कुर्सियों पर बैठे हैं.

    हां इन्कमटेक्स दफ्तर में आपका अनुभव सुन कर अच्छा लगा. उम्मीद है कि अगले दो चार सालों में वे और अधिक यूजर-फ्रेडली हो जायेंगे.

    सस्नेह — शास्त्री

  3. इरशद अली जी, ये अंदर की बात है 🙂

  4. पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के लोग भी कंप्यूटर मित्र नहीं हैं। इस लिए यह परेशानी आती है। लेकिन फिर भी राष्ट्रीयकृत बैंकों में से स्टेट बैंकों ने बहुत कुछ सुधारा है खुद को लेकिन वे ठगते तो नहीं। निजि क्षेत्र के बैंक तो अपने तामझाम दिखा कर ठगने में लगे हैं।

  5. पाबला जी,

    एडसेंस का मेरा चेक तो हर बार एक से डेढ़ महीने के बाद कलेक्ट हो कर आता है जिसे कि मैं यूनियन बैंक के अपने खाते में लगाता हूँ। पता नहीं आजकल चेक कलेक्शन में क्यों इतना समय लगता है। पूछने पर कभी भी संतुष्टिजनक जवाब नहीं मिलता। पर आपके पोस्ट से एक फायदा यह जरूर हुआ कि पता चल गया कि स्टेट बैंक में सिटी बैंक का चेक लगाने से जल्दी क्लीयर हो जाता है। अब से मैं भी अपने एडसेंस चेक को स्टेट बैंक के अपने खाते में लगाया करूँगा। जानकारी के लिये धन्यवाद!

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