क्या आप मेरी मदद कर सकते हैं?

क्या पहले घूँघट बुरका जैसी चीजें मौसम से बचाव के लिए बनाई गई थीं जैसा कि आज की युवतियां चेहरा लपेट कर बाहर निकलती हैं?

आज महिला दिवस के दिन अपने इलाके के एक स्टोर में था. पास ही से एक महीन आवाज आई उफ़ दम घुट रहा मेरा तो!

मेरी गरदन उस तरफ घूमी, एक जीती जागती पुरातन काल की ममी सरीखा कुछ दिखा।

उसके साथ आए बालक ने तब तक सलाह दे दी कि ये जो मुंह लपेट रखा है उसे खोल दो ना!!

हमारी आँखे चार हुई लेकिन उस बालिका ने अपने चेहरे पर कस कर लपेटा गया सफ़ेद कपड़ा नहीं उतारा, बल्कि बाहर जा कर मोबाईल पर उसी हालत में बतियाने लगी

मैं सोच में पड़ गया कि जब हमारी बुज़ुर्ग महिलायें घूंघट में रहती थी तो उसे रूढ़िवादिता कहा जाता था, कट्टरपंथ से नवाज़ा जाता था। पुरूषों को कोसा जाता था इस हाल के लिए।

किसी हद तक प्रगतिवाद के नाम पर उन्हें उससे कथित मुक्ति भी दिलवाई गई

धूप से बचाव

घूँघट

आखिरकार स्त्री आजाद हो गयी!

हिदू धर्म क्या मुस्लिम समाज में भी इसे हेय दृष्टि से देखा जाना शुरू हुआ. लेकिन आज मैं वही सब कुछ देख रहा

समझ नहीं आ रहा कि यह सब क्या है?

बुरका

यदि यह सब मौसम से खुद को बचाने का तरीका है तो घूंघट, बुरका वालों ने कोई गुनाह कर दिया था क्या?
यदि यह बुरी नज़रों से बचने का बहाना है तो पिछली पीढी ने क्या गलत किया था?
यदि फैशन है तो इसे कट्टरपंथ क्यों कहा गया?

क्यों पर्दा प्रथा गलत ठहराई गई और आज इसे स्वीकृति दी जा रही, भले ही कोई भी तर्क दिया जाए?

क्या यह वाकई में स्त्री की सुरक्षा नहीं? चाहे वह घर के सदस्यों से ही क्यों ना हो? क्योंकि आंकड़े बताते हैं कि परिवार की सीमा में ही स्त्रियाँ अधिक प्रताड़ित होती हैं,

क्या पर्दा प्रथा कम होने से महिलायों पर यौन आक्रमण बढ़ गए हैं? यदि हाँ तो क्या पर्दा प्रथा ठीक थी, ठीक है ? यही सोचता हुया मैं घर आ गया, लेकिन प्रश्नों के उत्तर नहीं मिले.

क्या आप कुछ बता कर मेरी मदद कर सकते हैं?

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57 comments

  • डॉ टी एस दराल says:

    पर्दा प्रथा तब शुरू हुई थी जब महिलाएं सचमुच अबला , आश्रित और प्रतंत्र हुआ करती थी ।
    पहले मुग़लों , फिर अंग्रेजों से बचने के लिए पर्दा सिस्टम बना था ।
    बाद में रीति रिवाज़ बनकर रह गया ।
    अब ये रिवाजें तो ख़त्म हो गई लेकिन शहरों में बढ़ते प्रदूषण ने लड़कियों को मूंह ढकने पर मजबूर कर दिया है ।

    वैसे दमे के रोगियों को मूंह ढकने की सलाह दी जाती है ।

  • ललित शर्मा says:

    मुझे तो वीआपी रोड़(एयरोड्रम रोड़) रायपुर पर सारी की सारी मुंह पर दूपट्टा लपेटे नजर आती हैं। चाले पुलिस वाले चालान के नाम पर हजार ले लें लेकिन घर पे पता नहीं चलना चाहिए।

  • चला बिहारी ब्लॉगर बनने says:

    पाबला जी, यह पर्दा कई बार अपने अपनों से पकड़े जाने से बचने के लिए भी होता है,जो मिलन की राह में बाधक होते हैं!!

  • H P SHARMA says:

    इतिहास अपने आपको दोहराता है. ये कह देना कि पर्दा प्रथा गलत थी, ठीक नही है सब जरूरत का खेल है. टिप्पणियो मे जो इशारा किया गया है वो भी सही है और धूल धक्कड से चेहरे की कमनीयता को बचाये रखना भी एक बडा कारण है.

    मुझे ये भी लगता है कि टोप का निचला हिस्सा और जींस का उपर का हिस्सा आजकल बच जाता है तो वो यहा मुह ढकने के काम आ जाता है.

    दादा होली का मूड बन रहा है,आगे और बहकू,सो विराम देता हूँ.

  • rashmi ravija says:

    क्योंकि आंकड़े बताते हैं कि परिवार की सीमा में ही स्त्रियाँ अधिक प्रताड़ित होती हैं,

    यह सोलहो आने सच है. लड़कियां अपने घर में ही सुरक्षित नहीं हैं…और माँ भी किस-किस पर अविश्वास करे….चौबीसों घंटे पल्लू से बाँध कर कैसे रखे…और कुछ ना कुछ अनर्थ हो जाता है.

    पर्दा प्रथा का तो कोई औचित्य ही नहीं है…आजकल लडकियाँ मुहँ पर दुपट्टा जरूर लपेटे रहती हैं.पर वो सिर्फ मौसम से बचाव के लिए…अब लडकियाँ अपने सौन्दर्य के प्रति जागरूक हो गयी हैं. सूरज की किरणें त्वचा को बहुत नुकसान पहुंचाती हैं…मेरा ख्याल है कि सिर्फ इसलिए ही वे चेहरा ढक कर रखती हैं.

  • भारतीय नागरिक - Indian Citizen says:

    बाप को पता नहीं चल जायेगा…

  • 'अदा' says:

    पाबला साहेब,
    आप यहाँ पर्दा प्रथा की बात कर रहे हैं न कि, उस परदे का जो किसी से छिपाने-छुपाने के लिए किया जाता है…
    आज स्त्रियों में जिस तरह से पर्दा हावी होता जा रहा है, ख़ास करके मुस्लिम महिलाओं में यह सोचनीय स्थिति है…. यूँ लगता है जैसे हम पहले से कहीं ज्यादा कट्टरपंथी और पाषाण युग की ओर अग्रसर होते जा रहे हैं….पुरुषवर्ग की बात ही रहने दें, स्वयं महिलाओं की दलीलें इस तरह के नकाबों और बुर्का के लिए सुन कर हैरानी होती है…जिन्हें ख़ुद पर यकीन नहीं होता वही परदे में होती हैं…वर्ना ईश्वर की सुन्दर कृति का ये सरासर अपमान है…वो भी स्वयं रचना के हाथों…इस तरह के परदे पर हर तरह का प्रतिबन्ध लगना ही चाहिए…ये खामखाह समाज के प्रत्येक व्यक्ति के चरित्र को संदेहास्पद बनता है. …जब भी कोई पर्दानशीन मेरे सामने आती है…मुझे ये लगता है उसने मेरा अपमान किया है…क्यूँकि यह पर्दा उसने अपने लिए नहीं मेरे लिए लगाया हुआ है…और किसी को यह अधिकार नहीं है कि कोई बिना कारण मेरी नियत पर शक़ करे…यह बात मैं उन पुरुषों के पक्ष में भी कह रही हूँ ..जो सचमुच अच्छे चरित्र के हैं….
    बहुत अच्छी प्रस्तुती…
    आभार..

  • डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति says:

    पाबला जी… पर्दा इच्छा से कोई रखे ..सम्मान के लिए याँ फिर अपनी रीति के लिए तो ओब्जेक्सन नहीं..किन्तु बाध्य किया जाए वह बहुत गलत है…
    पुरुष की निगाहें गन्दी है इस डर से रेशम के कीड़े की तरह कूकून बन जाए मुनासिब नहीं – हां पहनावा सही होना चाहिये – ..लेकिन यह १०० फीसदी सत्य है कि बुर्के की आड में बहुत कुछ छुप कर किया जाता है…मतलब बुर्के वाली लड़किया आपस में मिल कर घर वालों को झांसा दे सकती है… यह हमें खुद एक मुस्लिम भाइ ने बताया था … कि ये लडकीयां बुर्के न पहने तो ज्यादा बेहतर .. सादर

  • Anil Pusadkar says:

    पाब्ला जी इसे कह्ते हैं खरी-खरी।

  • डॉ महेश सिन्हा says:

    🙂

  • राज भाटिय़ा says:

    पाबला जी यह वो पर्दा हे जो …वेपर्दा होने पर शर्म शार कर दे, इस लिये इन के चेहरे ढके ही रहे, मां बाप की इज्जत बनी रहे,प्रदूषण ओर दमे की शिकार यह लडकिया ही क्यो होती हे? छोरे नही होते, बाकी लोग नही होते?

  • Archana says:

    समय के साथ बदलाव भी जरूरी है….कई बार पर्दा करना जरूरत बन जाती है कई बार मजबूरी …जरूरत हो तो,कोई परेशानी नहीं होनी चाहिये पर मजबूरी हो तो समस्या हो सकती है …साथ ही जरूरत है हमारी सोच को विकसित करने की पर्दा प्रथा कम होने से यौन आक्रमण बढ़ गए?—ऐसा नही है—जब तक हम अपनी सोच को विकसीत नहीं करते हर किसी को एक ही तराजू मे तोलते रहते है…

  • Atul Shrivastava says:

    ये नये दौर का घूंघट है।

  • Arvind Mishra says:

    मुझे तो ये दस्यु सुंदरियां और कभी कभी तो दुश्चरित्र भी लगती है जो चेहरा दिखाने लायक कृत्य नहीं करती -:)
    एक चुलबुलाती पोस्ट सटीक अवसर पर !

  • डॉ. दलसिंगार यादव says:

    पाबला जी, क्या बात है मेरे और आपके सोचने में समानता क्यों है?
    जैसा कि आपकी पिछली पोस्ट पर की गई टिप्पणी में मैंने ज़िक्र किया था कि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर एक सेमिनार आयोजित किया था जिसके आयोजक पुरष थे और सहभागी महिलाएं। चर्चा के दौरान बात उठी कि आजकल मुंह पर कपड़ा बांधकर लड़कियां झुंड में अपनी सहेली को मिलने के लिए किसी हाउसिंग सोसायटी में आती हैं तो सोसायटी का भी उनकी आइडेंटिटी की जांच नहीं कर पाता है। ऐसे में सुरक्षा के मामले में ख़तरे का अंदेशा बढ़ता जा रहा है। यदि कोई आपत्ति उठाकर उसे हटाने के लिए कहता है तो उसपर सेक्सुअल हैरेसमेंट का मामला आईपीसी की धारा 354 का मामला बन जाता है।
    इसपर मेरा कहना था कि यदि आज की महिला खुद को ढंक कर रखना चाहती है तो पर्दा प्रथा या बुर्क़ा प्रथा को ख़राब क्यों कहा जाता है। जवाब था वह पुरुष समाज द्वारा थोपी गई थी। यह हमने ने अपनी मर्ज़ी से अपनाया है। अपनी ज़रूरत के अनुसार। व्यक्ति स्वातंत्र्य। पहले हम, समाज बाद में।

  • डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह says:

    Pablaji,we are 100percent agreed with this approach.now a days it has become a normal practice for young girls to cover their faces so that no body could identify them but this practice is giving way to moral corruption and illicit relations.Ladies always faught for freedom from Parda system but this young generation is making worst use of it.Administration and police is also against this face hiding and a lot of maids have been found ,indulged in various crimes.Good question raised.Dr.bhoopendra
    mp

  • rashmi ravija says:

    @पाबला जी,
    लोग आपकी पोस्ट को होली से जोड़ रहे हैं..हल्की-फुलकी मान रहे हैं…पर मुझे यह बहुत गंभीर पोस्ट लगी….घर में रिश्तेदारों से तो पर्दा नहीं होता…पर सबको पता है, और जैसा कि आपने भी लिखा है…'परिवार की सीमा में ही स्त्रियाँ अधिक प्रताड़ित होती हैं'….फिर पर्दा किस से??

    और यहाँ कुछ लोगों की तालिबानी मानसिकता झलक रही है…जो इन लड़कियों को दुश्चरित्र बता रहे हैं….बिना सोचे-समझे कैसे कुछ भी लिख दिया जा सकता है.???
    पहले लडकियाँ,धूल-मिटटी…धूप से बची रहती थीं…क्यूंकि वे घर में ही रहती थीं…आज वे स्कूटी ले कॉलेज-ऑफिस- लाइब्रेरी-बाज़ार जाया करती हैं…वे ए.सी.कार अफोर्ड नहीं कर सकतीं…उन्हें इस धूल-मिटटी का ही सामना करना पड़ता है…अगर उस से बचने के लिए वे दुपट्टा लपेट कर रखती हैं…तो लोगों को इतनी परेशानी क्यूँ है?

    आपने जिस लड़की के बारे में लिखा है…कि उसने दुपट्टा नहीं उतारा….हो सकता है , उसे फिर तुरंत ही बाहर जाना हो….वो दुबारा फिर इतनी मेहनत क्यूँ करे…वापस दुपट्टा लपेटने में?

    लड़कों और लड़कियों की त्वचा में फर्क होता है. पिगमेंटेशन…सन-स्पॉट्स..लड़कों को नहीं होते….और लड़के गंजे भी हो जाएँ (आजकल तेजी से हो भी रहे हैं) तो फर्क नहीं पड़ता लेकिन लड़कियों को अपने बाल का ख्याल रखना ही पड़ता है. पहले औरतें घर से बाहर नहीं निकलती थीं,फिर भी वे उबटन, तरह तरह के लेप का प्रयोग करती थीं….आज लड़कियों के पास इतना समय नहीं है…वे बचाव ही करेंगी ना अपना..

    मैं इस बात से इनकार नहीं करती…कि कई बार..परिचितों की नज़र से बचने के लिए भी यह पर्दा सहायक होता हो…परन्तु अगर वे मिलने जाती हैं…तो किसी लड़के से ही ना…वो सच्चरित्र हो गया….और लड़की दुश्चरित्र.?? हालांकि यह प्रमुख कारण नहीं है. पुणे में अधिकाँश लडकियाँ, बाहर से पढ़ने आती हैं…उन्हें इस शहर में कोई नहीं पहचानता फिर भी वे दुपट्टा लपेट कर स्कूटी चलाती हैं…वे किसकी नज़रों से बचने के लिए ऐसा करती हैं??

    यहाँ ज्यादातर टिप्पणियाँ देख मुझे अफ़सोस हो रहा है….लोग जरा ध्यान से पढ़कर…सोच-समझकर कुछ लिखें तो बेहतर होगा. इसे वे लडकियाँ नहीं पढ़ रहीं…पर हमें भी पढ़कर अच्छा नहीं लग रहा.

  • विष्णु बैरागी says:

    क्‍या गजब कर रहे हैं पाबलाजी। दो अलग-अलग बातों को मिला कर नई बात पैदा कर रहे हैं। बुर्का और पर्दा प्रथाऍं तो जबरिया हैं जबकि यह 'नकाब प्रथा' तो स्‍वैच्छिक है।

    धूल,धूप, धुँआ आदि से बचाव क नाम पर जमाने से चेहरा छुपा कर प्रियतम से आसानी से मिला जा सकता है। बाप-भाई के पास से निकल जाओं तो उन्‍हें भी पता नहीं चलता।

    वैसे भी, कोई भी व्‍यवस्‍था न तो सम्‍पूर्ण निर्दोष होती है और न ही सम्‍पूर्ण सदोष।

    लेकिन आपकी पोस्‍ट पढ कर मजा आ गया। जिन्‍दगी के मेले में बहार आ गई।

  • Rahul Singh says:

    आपके सवाल वाली यह पोस्‍ट और उस पर आई टिप्‍पणियां पढ़कर लगा कि मदद तो होगी ही नहीं, आगे कुछ कहने से मसला उलझेगा ही, सो बस हाजिर मानें हमें भी.

  • PD says:

    कोई चाहे कुछ भी पहले, जब तक वह हमारे संविधान के अंतर्गत अश्लील ना हो तो क्या फर्क पड़ता है.. सभी की अपनी व्यक्तिगत आजादी होती है.. अब भले ही वह अपने प्रेमी से मिलने जा रही हो, उससे क्या? यह कोई गुनाह तो नहीं??

  • girish pankaj says:

    बिलकुल नए दौर की यह पर्दा-प्रथा अनेक चिंताए एक साथ पेश करती है. बिगड़ता पर्यावरण मुख्य कारण है. पर्यावरण जो प्राकृतिक है, और पर्यावरण जो सामाजिक भी है. पर्दा नहीं, नकाब कहें. धूल और कड़ी धूप से बचना है इसलिए नकाब और अपने को छिपाए रखना है तो नकाब. धूप से बचने के लिए गर्मी में मैं भी नकाब धारण कर लेता हूँ. लेकिन जैसे ही छाँव में आता हूँ. नकाब हटा लेता हूँ. भली लड़कियां भी यही करती है. लेकिन जब कुछ लड़किया. छाँव में भी नकाब लगाये किसी के साथ बैठी नज़र आती है, तब उस वक्त सोचता हूँ, वह ऐसा कर रही है,तो ठीक ही कर रही है. चेहरा खुला रहे तो टुच्चे किसमके लोग तरह-तरह की बातें बनाने लगते है. लड़की बैठी भर है लेकिन वे नमक-मिर्च लगा कर पेश करेंगे. इसलिए ठीक भी है परदे में रहे चेहरा. वैसे लड़कियों को इन सबसे बचनाचाहिये. लम्पट लडके तो लड़की का भावनात्मक शोषण करे लेंगे मगर ऍन मौके पर ठेंगा दिखा देंगे. लेकिन अंततः सोचता हूँ कि जब दो लोगों की सहमति है तो नकाब में रहे, खुले रहे, अपने को क्या…अपन अब्दुल्ला दीवानाकी तरह व्यवहार क्यों करें..कुल मिला कर बिलकुल 'नयी समस्या' पर आपकी गंभीर पोस्ट ने देखो, इतना लिखवा लिया.

  • सतीश पंचम says:

    पाबला जी,

    यहां रोज सुबह देखता हूं ऑफिस जाते वक्त पति पत्नी साथ ही घर से ऑफिस के लिये निकलते हैं…..पति बाईक पर बैठा आगे चला रहा होता है और उसके पीछे पत्नी मुंह ढंके हुए जाती है….अब उन्हें किस बात का डर ….लेकिन ऐसा करते हैं क्योंकि धूल -धक्कड़ का मामला होता है।

    और महिलाएं ही क्यों कई बार पवई-अंधेरी जैसे ईलाके में ही देखा है पुरूष भी रूमाल बांधे नजर आते हैं….संभवत: धुँए या डस्ट से बचाव के लिये क्योंकि अब पहले जैसे लोग स्किन के प्रति लापरवाही नहीं बरतते……अंधेरी इलाके में हो सकता है ज्यादा मॉडेल – फिल्म वाले रहते हैं इसलिये भी फेस कवरिंग होती है ।

  • नरेश सिह राठौड़ says:

    पोस्ट के साथ साथ टिप्पणियां भी रोचक है |

  • वन्दना says:

    आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (10-3-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

  • इंदु पुरी गोस्वामी says:

    मैंने पूरा आर्टिकल पढा. समय,काल,परिस्थितयों के अनुसार पर्दा प्रथा बुरी नही थी.किन्तु पर्दा ही सुरक्षा प्रदान करता था या है,मैं इससे सहमत नही हूँ.
    जब परदाप्रथा चरम पर थी तब भी परिवारों में बहुत कुछ घटित होता था.
    आज लड़कियों का चेहरा यूँ ढक कर घूमना???
    प्रदुषण,तेज धुप से बचाव इसका कारन तो है ही.चेहरे ढके होने से छेड़खानी के चांसेस भी कम होते हैं.
    और…….गर्ल,बॉय फ्रेंड के लफड़े ज्यादा बढ़ गये हैं.चेहरे को इस ढंग से ढकने पर पेरेंट्स या किसी परिचित द्वारा पहचान लिए जाने का भय भी नही रहता.
    हा हा हा वाट एन आइडिया सर जी!
    कोई शक?

  • गगन शर्मा, कुछ अलग सा says:

    आज का एक पर्दा दसियों समस्याओं का हल बन गया है।

  • गगन शर्मा, कुछ अलग सा says:

    आज का एक पर्दा दसियों समस्याओं का हल बन गया है।

  • गौरव शर्मा "भारतीय" says:

    कभी सुनने में यह नहीं आया की सर पर घूँघट रख कर अपराधी में अपनी पहचान छुपायी हो पर इस प्रकार के पर्दों की आड़ में जो घटनाएँ घटित हो रही हैं वह चिंतनीय हैं…रहा सवाल प्रदुषण का तो इससे बचने के लिए केवल यही एकमात्र उपाय हो ऐसा नहीं कहा जा सकता अतः इसप्रकार मुंह बांधकर घुमने की प्रथा पर अवश्य रोक लगाना चाहिए |

  • प्रवीण पाण्डेय says:

    रीतियों का सामयिक बुद्धि से अपनाने का साहस हो समाज में।

  • बी एस पाबला says:

    मेरा प्रश्न तो वहीं का वहीं रह गया 🙁
    करीब सभी का ध्यान आज की पीढी पर रहा
    लेकिन मुझे यह जिज्ञासा है कि घूंघट , बुरका, पर्दा को स्त्री की बेड़ियाँ क्यों प्रचारित किया गया और आज क्यों उसे स्वीकार किया जा रहा?

    क्या उस समयकाल में पिछली पीढी के मुकाबले प्रदूषण नहीं बढ़ा?
    क्या आज भी पुरूषों की मानसिकता नहीं बदली? क्या इसका अर्थ है हर समय काल में पुरूषों की निगाहें 'वैसी' ही रहीं? अगर हाँ तो फिर इत्ती हाय तौबा क्यों?

    प्रदूषण तो उत्तरोत्तर बढ़ते ही जा रहा.
    घूंघट बुरका तो आज भी प्रासंगिक है राजस्थान, गुजरात के साथ साथ अरब देशों जैसे रेगिस्तानी इलाके के लिए

    इसके अलावा इन पर्दा प्रथायों का प्रचलन उन्ही क्षेत्रों में अधिक क्यों दिखता है जो लगातार बाहरी आक्रमणकारियों का शिकार होते रहे हैं?

  • बी एस पाबला says:

    @ डॉ टी एस दराल जी

    शहरों में बढ़ते प्रदूषण ने लड़कियों को मूंह ढकने पर मजबूर कर दिया है ।
    ठीक है तो फिर इतनी सारी तकनीक किस काम की?

    क्या सारे मुंह छिपाए लोग दमे के मरीज है?

    पर्दा प्रथा तब शुरू हुई थी जब महिलाएं सचमुच अबला , आश्रित और प्रतंत्र हुआ करती थी

    आपके शब्दों से ऐसा लगता है कि आजकल महिलाएं झूठमूठ की अबला , आश्रित और प्रतंत्र हैं 🙂
    (होली है!)

  • बी एस पाबला says:

    @ ललित शर्मा जी

    पुलिस वाले चालान के नाम पर हजार ले लें लेकिन घर पे पता नहीं चलना चाहिए।

    फिर कौन कहता है कि यह अबला हैं?

  • बी एस पाबला says:

    @ चला बिहारी ब्लॉगर बनने

    यह पर्दा कई बार अपने अपनों से पकड़े जाने से बचने के लिए भी होता है,जो मिलन की राह में बाधक होते हैं!

    इसका मतलब कि पुरूष किसी से नहीं डरते, अपनी बीबी से भी नहीं?
    (होली है)

  • बी एस पाबला says:

    @ Archana jee

    जरूरत है हमारी सोच को विकसित करने की पर्दा प्रथा कम होने से यौन आक्रमण बढ़ गए?—ऐसा नही है—जब तक हम अपनी सोच को विकसीत नहीं करते हर किसी को एक ही तराजू मे तोलते रहते है..

    यह किसी पुरूष की सोच नहीं सरकारी और गैर-सरकारी आंकड़े हैं

  • बी एस पाबला says:

    @ डॉ. दलसिंगार यादव जी

    पर्दा प्रथा या बुर्क़ा प्रथा पुरुष समाज द्वारा थोपी गई थी। यह हमने ने अपनी मर्ज़ी से अपनाया है।

    यह क्यों नहीं माना जाता कि घूंघट/ बुर्का खुद औरत ने अपनी मर्जी से पहना था?
    पुरूषों को हर बात में क्यों 'घसीट' लिया जाता है?

  • बी एस पाबला says:

    @ rashmi ravija jee

    पहले लडकियाँ,धूल-मिटटी…धूप से बची रहती थीं…क्यूंकि वे घर में ही रहती थीं

    तब भी वे घूंघट, बुर्के में क्यों रहती थीं?

    जिस लड़की के बारे में लिखा है…कि उसने दुपट्टा नहीं उतारा….हो सकता है , उसे फिर तुरंत ही बाहर जाना हो….वो दुबारा फिर इतनी मेहनत क्यूँ करे…वापस दुपट्टा लपेटने में?

    वह लड़की उसी 'ममी' वाली हालत में मोबाईल पर बात करती रही,
    मेरे देखे जाने से रवाना होने तक, बीस मिनट तक !!!

    पहले औरतें घर से बाहर नहीं निकलती थीं,फिर भी वे उबटन, तरह तरह के लेप का प्रयोग करती थीं.

    उसके बावजूद घूंघट. बुरका, परदा?

  • बी एस पाबला says:

    @ विष्णु बैरागी जी

    बुर्का और पर्दा प्रथाऍं तो जबरिया हैं
    यह 'नकाब प्रथा' तो स्‍वैच्छिक है।

    लेकिन इनके लिए जिम्मेदार कौन है?

  • बी एस पाबला says:

    @ PD jee

    कोई चाहे कुछ भी पहले, जब तक वह हमारे संविधान के अंतर्गत अश्लील ना हो तो क्या फर्क पड़ता है.

    (1948 से पहले) जब संविधान नहीं था तब?

  • डॉ महेश सिन्हा says:

    रश्मि जी से सहमत

    पुरुष प्रधान समाज में लड़की क्या कर रही है इस पर सबकी नजर रहती है । लड़कों को तो बढ़ावा दिया जाता है ।

    यह प्रश्न ही male chavunistic है । पुरुष क्या करते हैं इसपर कोई कुछ नहीं कहता । अगर इसमें कोई गड़बड़ी है भी, जिसका जिक्र मीडिया भी गाहे बगाहे करता रहता है, तो यह व्यक्तिगत मामला माना जाना चाहिए॰

  • डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर says:

    साहब, आप जैसे लोगों को जवाब नहीं मिले तो हम जैसे लोग क्या बता पायेंगे? हाँ ये तय है कि हमने कुछ कहा तो घेरे में जरूर आ जायेंगे. पर्दा, बुरका यदि अपराधों को रोकता तो फिर क्या बात थी. किसी समय में ये जरूरत थी इज्जत बचाने के लिए, अब है कोम्प्लेशन बचाने के लिए……………
    बहरहाल इस पर सार्थक बहस हो तो अच्छा अन्यथा हर बार की तरह ही पुरुष को दोष दिया जाएगा.
    जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

  • डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर says:

    साहब, आप जैसे लोगों को जवाब नहीं मिले तो हम जैसे लोग क्या बता पायेंगे? हाँ ये तय है कि हमने कुछ कहा तो घेरे में जरूर आ जायेंगे. पर्दा, बुरका यदि अपराधों को रोकता तो फिर क्या बात थी. किसी समय में ये जरूरत थी इज्जत बचाने के लिए, अब है कोम्प्लेशन बचाने के लिए……………
    बहरहाल इस पर सार्थक बहस हो तो अच्छा अन्यथा हर बार की तरह ही पुरुष को दोष दिया जाएगा.
    जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

  • चण्डीदत्त शुक्ल says:

    सीधी बात…नो बकवास स्टाइल में लिखी गई पोस्ट, सोचने को मज़बूर भी करती है। हालांकि सच्चाई इतनी सरल नहीं है, जितनी सरलता से आपने पेश कर दिया है…यह तो आपका कौशल है, लेकिन इस ओर लोगों को गंभीर होकर विचार करना होगा।

  • K K Mishra says:

    किती बड़ी बात को आप ने सरल शब्दों में कह दिया अब भी कोई न समझे तो लोग बने ब्नाये मूर्ख ही है, जो कथित बुद्धिजीवी कहते है स्वयं को

  • K K Mishra says:

    जिसे आप जबरिया कह रहे है दरसल वह नैसर्गिक है, किन्तु उसे जबरन भी इस्तेमाल करवाने की कोशिश की जाते रही है, शायद महिलाये पर्दे में अत्यधिक सहज महसूस करती है अपने को, उन तमाम तीक्ष्ण, असहज व कलुषित पुरूषीय नज़रो से !

  • वाणी गीत says:

    पर्दा प्रथा सही है या गलत , मैं कुछ कह नहीं सकती क्योंकि ससुराल में मैं खुद पर्दा करती हूँ ..मायके में परदे की पाबन्दी हटा दी गयी है ..
    तमाम प्रगतिशील विचारों के बावजूद मैं मानती हूँ की कई बार इस परदे के कारण अप्रिय स्थितियों से बचना हो जाता है …फिर भी यह तय है की हमारी भावी पीढियां पर्दा नहीं करेंगी, इस समय में यह संभव ही नहीं है !

    आजकल लड़कियों/लड़कों के मुंह पर स्कार्फ का बड़ा कारण प्रदूषण है, लगातार बढ़ रहे वायु प्रदर्शन के कारण सांस से सम्बंधित बीमारियाँ , चेहरे पर मुहांसे , धब्बे आदि आम हो गये है इसलिए यदि उनके चेहरे को इससे सुरक्षा मिलती है तो इसमें क्या हर्ज़ है ! कुछ प्रतिशत लड़कियां अपने बॉय फ्रेंड्स/गर्ल फ्रेंड्स के साथ तफरी करते हुए बचने के लिए चेहरे को दहकती होंगी , सिर्फ इसलिए सभी लड़कियों/लड़कों के बारे में ऐसी धारणा अनुचित है !

  • वाणी गीत says:

    भूल सुधार

    @ लड़कियां /लड़के
    ढकती

  • निर्मला कपिला says:

    पावला जेरे मै तो बहुत साल पर्दा करती रही हू। घूँघट निकाल कर गाँव की सीमा पार करनी पदती थी और घर मे सारा दिन। इसका दर्द तो भुक्त भोगी ही जान सकता है वैसे पोस्ट और टिप्पणियाँ रोचक हैं। धन्यवाद।

  • शरद कोकास says:

    पाबला जी … गड़बड़ यह हुई है कि दो विषय एक साथ मिल गये हैं , समाज में पर्दा प्रथा और वर्तमान में दुपट्टे या कपड़े से मुँह ढाँकना ।
    पहले विषय के लिये आप से एक स्वतंत्र लेख लिखने की दरकार है । थोड़ा अध्ययन मैं भी करता हूँ ।
    दूसरे विषय पर अपना सीधा सीधा कहना है कि हमारे राज्य की सड़कों पर चलते हुए इतने प्रदूषण , धूल धुआँ का सामना करना पड़ता है कि मैं भी आजकल मुँह लपेट कर चलने लगा हूँ । पत्नी और बिटिया भी जब दुपहिये पर होते हैं वे मुँह ढाँककर ही चलते हैं .. ।
    और टिप्पणी का स्लागओवर – पिछले दिनो ट्रैफिक चौराहे पर खड़े एक सिपाही को मैने मुफ्त की सलाह दे डाली .. भैया दिन भर धूल में खड़े रहते हो.. कहीं कुछ दमा- वमा हो गया तो .. बेहतर है मुँह पर कपड़ा बान्ध कर खडे रहा करो .. हमारे यहाँ की सड़के धूल व धुएँ से मुक्त होने से तो रहीं ।
    अंत में – रश्मि जी को बेहतरीन टिप्पणी काबिले गौर है ।

  • vinay says:

    पाबला जी मेने सब टिप्पणीयां पड़ी,परन्तु मूल कारण में नहीं समझ पा रहा हूं ।

  • अमित शर्मा says:

    आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएं । ठाकुरजी श्रीराधामुकुंदबिहारी आप सभी के जीवन में अपनी कृपा का रंग हमेशा बरसाते रहें।

  • शंकर फुलारा says:

    समय और परिस्थितियों अनुसार सबकुछ ठीक था ठीक है ठीक रहेगा, यही समयचक्र है |
    होली पर आप को परिवार के साथ शुभ कामनाएं ।
    ये त्यौहार सबके जीवन में कमसेकम सौ बार आये

  • ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ says:

    Tippadiyan padhkar maza aa gaya.

  • डॉ० डंडा लखनवी says:

    पावला जी!
    समय के साथ सोचने का नजरिया भी बदलता रहता है। पहले का पर्दा दूसरे की मर्जी से थोपा हुआ था। अब का पर्दा खुद का ओढ़ा हुआ है। पहले का पर्दा अशिक्षा के कारण था। अब का पर्दा शिक्षा के कारण है। एक लेडी डाक्टर का कहना है-"आजकल की पढ़ी-लिखी लड़कियाँ प्रेगनेन्सी पीरियड में इलाज के दौरान नुस्खे में बेडरेस्ट लिखने का विशेष आग्रह करती हैं। मैंने पूछा- "वे ऐसा क्यों करती हैं?" लेडी डाक्टर का उत्तर था- "ऐसा वे ससुराल में काम के बोझ से मुक्त रहने के लिए करती हैं। उसने यह भी बताया कि अनपढ़ लड़कियाँ ऐसा आग्रह नहीं करती है। आधुनिक पर्दा ऐसी ही समझदारी की देन है। साहित्य के क्षेत्र में ऐसी प्रवृत्ति को तात्कालिकता से अभिहीत किया जाता है। यह समय की माँग के अनुसार तात्कालिक सुरक्षा की दृष्टि से अपनाया हुआ बदलाव है। सुरक्षा के कारण कुछ भी हो सकते हैं। इस प्रवृत्ति को जाति, धर्म की परंपराओं से संबंधित नहीं माना जा सकता है।
    ===========================
    प्रशंसनीय………लेखन के लिए बधाई।
    ==========================
    देश को नेता लोग करते हैं प्यार बहुत?
    अथवा वे वाक़ई, हैं रंगे सियार बहुत?
    ===========================
    होली मुबारक़ हो। सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

  • Dinesh pareek says:

    होली की आपको बहुत बहुत शुभकामनाये आपका ब्लॉग देखा बहुत सुन्दर और बहुत ही विचारनीय है | बस इश्वर से कामनाये है की app इसी तरह जीवन में आगे बढते रहे | http://dineshpareek19.blogspot.com/
    http://vangaydinesh.blogspot.com/
    धन्यवाद
    दिनेश पारीक

  • AlbelaKhatri.com says:

    parde me rahne do

    parda na uthaao

  • ePandit says:

    ये नये स्टाइल का बुर्का तो अक्सर मैं भी पहनता हूँ। धूल से ऍलर्जी है, नाक एकदम बन्द हो जाती है। मेरे विचार से प्रदूषण से बचाव एक बड़ा कारण है। बाकी दूसरे कारण भी होंगे ही।

  • chander kumar soni says:

    khushi-khushi sab manjoor hain,
    lekin zabardasti se manjoor nahi hain.
    yahi samajh lijiye aap.
    thanks.

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