अब वो चंदा लेने नहीं आते !

त्यौहारों का मौसम शुरू हो गया है. गणेशोत्सव की रौनक गली-मुहल्लों से लेकर चौक-चौराहों तक है. इस बार भी हमेशा की तरह टोलियां बना कर कई बच्चे चंदा लेने घर पहुंचे. कोई गुरूप्रीत का दोस्त है तो कोई मैक का. मेरी माँ को घेर कर कहानी सुनने वाले बच्चे भी कब किशोरावस्था में आ गए पता ही नहीं चला. सबकी इच्छा रहती है कि ज़्यादा से ज्यादा चंदा मिल जाए.

इन टोलियों को देख कर मुझे अपने बचपन की याद आ जाती है. चंदा वसूली में जब बढ़ चढ़ कर हमारी टोली धावा बोलती थी घरों में तो उस छोटे से औद्योगिक कस्बे, दल्ली राजहरा में सभी का स्नेह मिलता. झूठ मूठ की डाँट और ढेरों हिदायतें देते चाचा चाची, मामा मामी, ताऊ ताई, च्झाई जी पहले तो कुछ खिलाते पिलाते फिर फिर विदा करते चव्वनी, अठन्नी, रूपए दे कर.

मौक़ा कोई भी हो! रावण बनाने, जन्माष्टमी, सरस्वती पूजन, गणेश उत्सव, दुर्गा पूजा, होली के लिए तो हम सब दोस्तो के साथ मिल कर चंदा इकठ्ठा करते थे. समय बीतता गया. नौकरी लग गई. शहर बदल कर भिलाई हो गया. समाज की अवधारणा में बदलाव हो गया.

फिर तो मैंने भी देखा शहर में चंदा मांगने वालों की तदाद लगातार बढ़ती गई. मौक़ा चाहे जैसा भी हो चंदा मांगने वालों की टीम रंग-बिरंगी तस्वीरों वाली रसीद बुक लेकर चंदा वसूली के लिए हाजिर हो जाते हैं चंदा माँगने आई टोली हजार से दो हजार से काम की बात ही नहीं करती.

मैं कई बार हैरान होता कि एक ही समारोह के लिए 5 – 10 समितियां चंदा वसूल करती क्यों हैं? श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, दही लूट, भंडारा करने का चंदा, शोभायात्रा पर चंदा, जयंती का चंदा, मंदिर निर्माण के लिए चंदा, रामायण प्रतिस्पर्धा, जसगीत प्रतियोगिता जैसे त्यौहारों पर भी चंदा ‘वसूली’ की जाने लगी. साल भर किसी ना किसी नाम पर चंदा वसूली का यह दौर चलते देखा मैंने.

इसी ‘चंदाखोरी’ में एक बार मेरे साथ अजीब घटना हुई

बात शायद 7-8 साल पुरानी है. ऑफिस से लौट कर चाय पी रहा था कि कॉल बेल बजी. झांका तो तिलक लगाये, गमछा लपेटे, कुर्ते पायजामे वाले, इलाके के परिचित चेहरे दिखे. आमना सामना होते ही जोश भरा स्वर उभरा -नमस्कार सरदार जी, मंदिर निर्माण के लिए चंदा लेने आये हैं निराश मत कीजियेगा. .

जिस निर्माण के लिए वह कथित ‘सहयोग राशि’ चाह रहे थे थे उसी के लिए पहले भी दो परिचित चंदा ले जा चुके थे. यही बात याद आते मेरा मन बदल गया. मैंने उसी बात का जिक्र करते मना कर दिया. लेकिन बीस लोगों के उस समूह ने हंगामा करते तमाशा खड़ा कर दिया. मैंने कहा भी कि हम सिक्ख लोग जब किसी गैर सिक्ख के घर नहीं जाते अपने किसी धार्मिक आयोजन में सहयोग राशि माँगने के लिए! तो आप लोग क्यों अपने धर्म से अलग लोगों के घर जाते हैं?

वाद विवाद बढ़ा तो एक विचार कौंधा और मैंने ‘समझौता’ करते हुए 501 की रसीद कटवा ली. लेकिन उससे पहले सामने दिख रहे सभी महानुभावों का परिचय मांगा और उनके नाम-पते उन्ही से लिखवा लिए.

मैंने इस मामले का ज़िक्र अपने कई सिक्ख साथियों से किया. कुछ हफ़्तों बाद ही गुरूनानक जयंती थी. एक दिन मैंने बीस बाईस पगड़ीधारी साथियों को इक्कट्ठा किया और सभी समा गए सूमो, स्कार्पियो, सफारी जैसी पांच गाड़ियों में.

चंदा

उस नाम पते लिखे कागज़ को लिए हम जा पहुंचे कथित सचिव के घर. जब पांच धड़धड़ाती गाड़ियां उनके घर के सामने रुकीं और एक एक कर पगड़ीधारी, हट्टे कट्टे सरदार उतरे और सीधे उन सज्जन का नाम ले कर ऊंचे पुकारा ‘…. जी, निक्क्लो बाहर’ घर के बाहर मोहल्ले की उत्सुक नज़रों को नज़रअंदाज़ करते हैरान परेशान सचिव जी पसीना पोंछते हाजिर. क्या हुआ सरदार जी?

रसीद बुक पर पेन चलाते बब्बू ने कहा ‘ओ ज्जी, गुरुनानक जयंती का चंदा लेने आये हैं, पंज हजार की रसीद काट रहे हैं रब्ब भला करेंगे आपका!’ उन महाशय ने हमारे समूह की ओर नज़रें दौड़ाईं और मुझे पहचान लिया. लडखडाती आवाज़ में इतना ही कह पाए कि कुछ कम कीजिए सरदार जी. मैंने लाचारी जाहिर करते कह दिया कि ये गुरुद्वारा समिति वाले मेरी नहीं मानेंगे. उनके चेहरे पर हवाईयां उड़ने लगी. घर के अंदर गए और दो हजार हाथ में लिए आ गए वापस. नाम तो था ही हमारे पास. बब्बू ने रसीद काटी और हम सब चल दिए अध्यक्ष जी के घर की ओर!

अध्यक्ष जी के घर के बाहर भी वैसा ही नज़ारा. वे घर पर नहीं थे. हमने भी उनकी पत्नी को कह दिया कि उनका इंतज़ार करते हैं जब आएंगे तभी जाएंगे यहां से 😀

उन्हें खबर दी गई होगी घर के सामने बीस सरदारों के इकट्ठा होने की. वे दौड़े दौड़े आये कि माज़रा क्या है? उन्हें भी कहा गया कि गुरुनानक जयंती का चंदा लेने आये हैं, पंज हजार की रसीद काट रहे हैं. वे अकड़ गए कि नहीं दूंगा एक भी पैसा, है ही नहीं मेरे पास! गुरमुख और लवली ने आराम से इत्तला दी ‘कोई बात नहीं हम यहीं डेरा डालते हैं आप इंतज़ाम करो तभी खिसकेंगे इधर से. खाने पीने की व्यवस्था करवा दीजिए 🙂

उनकी अकड़ का नतीज़ा यह हुआ कि पांच हजार लिए बिना हमारी टोली हटी नहीं. और यह सब भी एक घंटे के भीतर ही हो गया.

फिर यही क्रम मुझसे जबरन ऐंठी गई रकम की टोली वाले संरक्षक, उपाध्यक्ष, कोषाध्यक्ष, उप सचिव के साथ भी चला और लौटते हुए हमारे पास 21,000 थे. गुरूद्वारे में मत्था टेक कर हम सबने उस चंदे की राशि को दान पेटी में डाला और हँसते हुए लंगर का आनंद उठाया.

वह दिन है और आज का दिन, अब ऐसा कोई समूह, कॉलोनी में चंदा माँगने नहीं आता. साल भर में दो बार छोटे बच्चे आते हैं तो अपना बचपन याद कर यथासंभव सहयोग करता हूँ. इस बार तो बच्चों ने सारी रसीदें मैक के नाम की ही काटीं है. हम तो बस पर्स में हाथ ही डाल निकाल रहे थे.

आपका कोई अनुभव है? इस चंदा धंधा पर!

© बी एस पाबला

अब वो चंदा लेने नहीं आते !
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अब वो चंदा लेने नहीं आते !” पर 33 टिप्पणियाँ

  1. बहुत मस्त पोस्ट है !
    पढ़कर आनंद आ गया !
    तमाम बचपन की यादें ताजा हो गयीं !


    एक बार बचपन में हम लोग बहुत चतुर-सयाने-कंजूस के यहाँ होली का चंदा लेने गए थे ,,,वो महाशय हमें समझाते हुए भाषण देने लगे कि ये सब बेकार है … कुछ भजन-संगीत वगैरह का आयोजन करो तो बात भी है ….हम लोगों का नेता ने एक साथी को आवाज लगाई – अबे वो भगवती जागरण वाली चंदे की रसीद निकाल 🙂

    खैर
    आजकल तो चंदा माँगना धंधा ही बन गया है ,,,,वो भी जबरन उगाही !

    आपकी पोस्ट इतनी ज्यादा मस्त है कि
    एक बढ़िया हास्य टीवी एपिसोड बन सकता है !
    टिप्पणीकर्ता Prakash Govind ने हाल ही में लिखा है: बिल्ली के गले में घटी …My Profile

  2. हा हाहाहाहा
    मज़ा आ गया जी,
    ये आईडिया आप पहले दे देते तो हमारे भी काफी पैसे बच जाते.
    बहुत खूब जी,
    मज़ेदार संस्मरण के लिए थैंक्स.
    चन्द्र कुमार सोनी.
    http://www.chanderksoni.com

  3. आनंद आ गया . बचपन में हम लोग भी चंदा माँगा करते थे . बहुत नसीहतें मिलती थी . जो चंदा काम देते थे वे नसीहत ज्यादा देते थे . जो चंदा नहीं देते थे वे हिसाब मांगते थे . हम कोयलांचल के कालोनी में रहते थे . सरस्वती पूजा मानते थे कालोनी के बच्चे . एक चाचा थे सुनील चाचा . बिल्कुल भी चंदा नहीं देते थे . सरस्वती पूजा के बाद एक एक पाई का हिसाब लेते थे . हम बच्चो के पेरेंट्स तक परेशान होते थे इस से . एक बार हमने तीन सौ का घाटा दिखाया और सब बच्चो ने मिलकर वो घाटा सुनील चाचा से वसूल किया जिसमे हमारे पेरेंट्स की भी सहमति थी . उसके बाद से सुनील चाचा ने चंदा देना तो शुरू नहीं किया लेकिन हिसाब भी नहीं माँगा .

  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (06-09-2014) को “एक दिन शिक्षक होने का अहसास” (चर्चा मंच 1728) पर भी होगी।

    सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन को नमन करते हुए,
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को शिक्षक दिवस की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर…!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

  5. हा हा हा…

    वाकई मान गए आपको.

    इस बार गणेशोत्सव में हमारी कॉलोनी में भी लोग आए. एक रसीद कट्टा और एक नोटिस टाइप कुछ लिख कर. नोटिस में लिखा था कि न्यूनतम १००० रुपए देने हैं. मैं भिड़ गया ये न्यूनतम का क्या चक्कर है. जितनी शक्ति उतनी भक्ति. लेना हो तो लो नहीं तो जाओ. और इस नोटिस में से न्यूनतम का हिसाब भी निकालो. 🙁

    फिर भी, यहाँ राजनांदगांव जैसी चंदा टोलियों से थोड़ी राहत है 🙂
    टिप्पणीकर्ता रवि ने हाल ही में लिखा है: अब अपने कंप्यूटर पर हिंदी में बोलकर सही-सही लिखेंMy Profile

  6. हा हा, बेहतरीन इलाज।

    बस एक बात जमी नहीं।

    “मैंने कहा भी कि हम सिक्ख लोग जब किसी गैर सिक्ख के घर नहीं जाते अपने किसी धार्मिक आयोजन में सहयोग राशि माँगने के लिए!”

    हमारे यहाँ तो ऐसा नहीं है। गुरुद्वारे से लगभग हर सिख पर्व के लिये सभी हिन्दुओं के यहाँ चन्दा माँगने आते हैं। खालसा स्कूल वाले अपने सभी कर्मचारियों को पर्ची वाली बुक पकड़ा देते हैं जाओ अपने रिश्तेदारों-परिचितों की कटवा कर लाओ।

    • :Happy:
      मैंने अपने इलाके की बताई, आपने अपने इलाके की बताई

  7. यहाँ हैदराबाद में तो केवल हाऊसिंग सोसायटी वाले आते हैं त्यौहारों के लिए चंदा मांगने आते हैं किन्तु त्यौहारों पर जो शोर मचता है उसके चलते मैं उन्हें कह देती हूँ कि मैं धार्मिक नहीं हूँ. शोर में मैं योगदान नहीं करना चाहती.
    घुघूती बासूती

  8. हा हा हा …. बहुत सही किया पाबला जी अापने… ऐसी जबर्दस्ती से ऐसे ही निपटना पड़ता है ।

  9. सही हैंडल किया। अब किसी सरदार के घर इस काम के लिये जाने से पहले दस बार सोचते होंगे वो लोग 🙂

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