छतीसगढ़ में ब्लॉगर सम्मेलन की संभावना के बीच एक छोटी सी ब्लॉगर मीट

पिछले दिनों कर्मनाशा वाले सिद्धेश्वर सिंह जी के साथ भिलाई में हुई मुलाकात का जिक्र जब खेलगढ़ वाले राजकुमार ग्वालानी जी ने पढ़ा तो उन्होंने फोन किया उलाहना देते हुये कहा कि मुझे खबर कर देते तो दौड़ा चला आता रायपुर से। उन्हे वस्तुस्थिति बताते हुये दुबारा ऐसा न करने का वादा भी करना पड़ा। राजकुमार जी से मेरा परिचय उनके ब्लॉग पर टिप्पणी करने से शुरू हुया था। एकाध बार ब्लॉग की रूपरेखा को लेकर मेल का आदानप्रदान हुया तो मोबाईल नम्बर भी पता चले एक दूसरे के।

(भिलाई रायपुर के मध्य टोल प्लाज़ा)

कुछ अरसा पहले एक व्यवसायिक कार्य से जब हमारे सुपुत्र गुरूप्रीत, पंकज अवधिया जी व अन्य दो संस्थानों से मिलने रायपुर जा रहे थे तो हम भी लपक लिये साथ में। राजकुमार जी कई बार रुबरू मिलने की इच्छा जाहिर कर चुके थे। अनिल पुसदकर जी से भी द्विवेदी जी की यात्रा के दौरान मिला था। बहुत दिन हो चुके थे। मिल बैठने का एक और मौका हाथ से जाने नहीं देना चाह रहा था। संजीत त्रिपाठी जी को तो कई बार वादा कर के नहीं मिल पाया था। एक दिन पहले ही मैंने तीनों को अपने पहुँचने के बारे में बता दिया।पंकज अवधिया जी के घर जब दोपहर को पहुँचे तो पता चला कि वे आराम कर रहे हैं। हालांकि सुबह उन्हें ई-मेल से सूचित किया जा चुका था, किन्तू शायद वे देख नहीं पाये थे। हम निकल पड़े प्रेस क्लब की ओर।
राजकुमार जी को समय 1 बजे का बताया हुया था। पंकज जी के न मिल पाने के कारण काफी समय बच रहा था। मैंने अपने रायपुर वासी एक मित्र को फोन किया। वे कई वर्षों से अपने नये घर में आने का आमंत्रण दे रहे थे, सोचा आज यही किया जाये। हम उनके घर के पास पहुँचे ही थे कि पंकज अवधिया जी की कॉल आ गयी। हमने अपने मित्र के घर के बाहर ही खेद प्रकट किया। अब उन्हें भी सेकेंड शिफ्ट में भिलाई पहुँचना था। फिर आने का वादा कर हम उल्टे रोड पंकज जी के घर पहुँच गये।जब व्यवसायिक बातें हो रहीं हों तो समय लग ही जाता है। खाली बैठे, सुपुत्र व पंकज जी की बातें सुनते सुनते, मैं बटर स्कॉच के कई कप खाली कर गया। राजकुमार जी और संजीत जी के फोन बीच में आ गये। मैंने बताया कि पंकज जी के घर पर हूँ तो कहा गया कि उन्हें भी साथ ले आयें। बहुत दिन हो गये मुलाकात किये हुये। पंकज जी के असमर्थता व्यक्त किये जाने पर हम उनसे विदा ले एक बार फिर प्रेस क्लब की ओर रवाना हो गये।

(बांये से संजीत त्रिपाठी, बी एस पाबला, राजकुमार ग्वालानी, अनिल पुसदकर)

प्रेस क्लब के बाहर ही राजकुमार जी और संजीत जी मिल गये। कई साथियों से वे द्विवेदी जी के समय ही मिलवा चुके थे, कुछ और साथियो
ं से इस बार परिचय करवाया। इसी बीच अनिल पुसदकर जी की कॉल भी आ गयी। वे भी प्रदेश के मंत्री राजेश मूणत जी से मुलाकात छोड़कर पहुँच रहे थे। वातानूकूलित सभागार के एक कोने में हमारी बैठक जमी। ब्लॉगिंग के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ का नाम प्रमुखता से उभरता महसूस किये जाने पर प्रसन्नता तो हो रही थी किन्तु कतिपय विवादों को तूल दिये जाने पर निराशा का भाव भी आपसी बातचीत में झलक रहा था। यथासंभव विवाद से बचे जाने पर हम तीनों सहमत थे। अनिल जी आ चुके थे। छतीसगढ़ में एक वृहद ब्लॉगर सम्मेलन की संभावना पर गंभीरतापूर्वक विचार किया गया जाने लगा। संभावित सम्मेलन में शामिल होने वाले ब्लॉगरों की पात्रता मानदंड (Criteria) तय कर, अब तक सैद्धांतिक सहमति दे चुके ब्लॉगरों की सूची भी मैंने सामने रखी। अंत में यह तय किया गया कि एक ऑनलाईन सहमति पत्र बनाया जाये, जिस पर संभावित समय का उल्लेख करते हुये इच्छुक ब्लॉगरों की राय व सहमति ली जाये।
इसके अलावा राजकुमार जी ने कई तकनीकी जिज्ञासायें भी हमारे सुपुत्र के सामने रखीं। ब्लॉगस्पॉट के मुफ्त, सीमित प्लेटफॉर्म से अपने खुद के डोमेन पर जाने की चाहत लिये कई ब्लॉगरों का जिक्र भी उठा। इस बारे में, वहीं बैठे-बैठे क्षेत्र के कई ब्लॉगरों से फोन पर बात भी हुयी। अब तक अनिल जी के पूर्व निर्देशानुसार, जलपान टेबल पर लग चुका था। जलपान के दौरान ही अनिल जी ने मुझसे वादा ले लिया कि अगली बार आना होगा तो राजिम अवश्य चलेंगे। उनके द्वारा बताये गये नदी के बीचों बीच, खालिस रेत पर खड़े मंदिर के वर्णन ने मुझ में भी उत्सुकता जगा दी।

(एकदम बांये मेरे सुपुत्र गुरूप्रीत सिंह, हम सबके साथ)
सुपुत्र के दो क्लाइंट (YashMatrimony तथा ShubhHonda) के फोन आ रहे थे। समय भी हो चुका था। विदा लेने की बारी आयी तो याद आया कि कोई फोटोग्राफ तो लिया ही नहीं गया! हमने अपना कैमरा निकाला और आटो मोड में लगा कर रख दिया। एकाएक ध्यान आया कि, जलपान के पहले आयी, बिना दूध की नींबू चाय के डिस्पोज़ेबल गिलास अनछुये ही भरे रह गये हैं। हंसी के ठहाकों के बीच उन्हें ट्रे सहित टेबल के नीचे छुपाने की कोशिश के तहत रख दिया गया कि किसी को कोई गलतफहमी न हो जाये। अब इसे क्या कहा जाये कि घर आ कर जब फोटो देखे गये तो वही गिलास सबसे ज़्यादा ध्यान खींच रहे थे!

विदा लेते हुये अनिल जी, संजीत जी तथा राजकुमार जी ने भिलाई आ कर मुलाकात करने का आश्वासन दिया। लेकिन हम आज भी उनकी राह तक रहे हैं।

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  1. बहुत अच्‍छी रही, बहुत बड़ी न सही छोटी तो हुई 🙂

  2. छोटी मुलाकात के बाद ही तो बड़ी मुलाकात होती है। अब हम सबको मिलकर ब्लागर सम्मेलन की तैयारी करनी है ताकि एक छोटी मुलाकात बड़ी मुलाकात में बदले और दायरा भी बढ़े ब्लागरों का। यानी छोटी मुलाकात में हम चार ब्लागर थे तो बड़ी मुलाकात में 40 ब्लागर तो हो ही जाए। इंतजार रहेगा उस बड़ी मुलाकात का

  3. पढ़ने से लगा रिपोर्ट कुछ दिन पुरानी है। अब तक तो ब्लागर सम्मेलन की तैयारी जोरों पर होनी चाहिए थी।

  4. आयेंगे पाब्ला जी,ज़रूर आयेंगे।पहले तो हर सप्ताह कालेज से भाग कर भिलाई आते थे।तब हर फ़िल्म भिलाई मे रायपुर से एक दिन पहले लगा करती थी।पुरानी और भी बहुत सी यादें है भिलाई को लेकर कभी अकेले मे बताऊंगा,हा हा हा हा।पुरानी मुलाकात के मज़े को ताज़ा कर दिया आपने।

  5. अच्छा है, ब्लोग्गेरी के बहाने आप लोग मिला- जुला तो करते हैं.

  6. अब जे तो अनिल भैया पे डिपेंड करता है कि वे कब सवारी भिलाई की तरफ बढ़ाते हैं। 😉

  7. अच्छा तो आप लोग टेबिल के निचले हिस्से में छुपा कर 'पी' रहे थे ? मगर कैमरे ने पकड़ लिया ! हा हा हा …!

    ये अच्छी बात नहीं है ! हा हा हा ….

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