जब अचानकमार बदमाशों ने अँधेरे जंगल में हमारा पीछा किया

नई नई आई कायनेटिक होंडा पर सवार हो  जनवरी 1989 के आखिरी दिनों में श्रीमती जी और ढाई वर्षीया बिटिया संग चाचा जी के परिवार के साथ दो दिन बिता कर और रीवा के चचाई जलप्रपात की यादें लिए हुए हम लौट चले वापस भिलाई की ओर.

राह वही थी जिससे रीवा गए थे लेकिन समय था उलटा जिन जगहों पर पहले हमें रात मिली थी उन जगहों को दिन की रौशनी में देखना एक अलग ही अनुभव था.

दोपहर के बाद भारत की प्रमुख सात नदियों में से एक नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक पहुँचना हुआ तो भोजन पश्चात धूनी पानी, जिसके बारे में कहा जाता है कि यह झरना औषधीय गुणों से संपन्‍न है और इसमें स्‍नान करने शरीर के असाध्‍य रोग ठीक हो जाते हैं का एक चक्कर लगा लिया। नहाना तो हो नहीं पाया लेकिन बाद में आने का इरादा कर दुग्धधारा की ओर चल दिए. यह 50 -60 फीट ऊँचा प्रपात है जो दूध की तरह सफेद दिखाई देता है. हालांकि जल प्रवाह बेहद क्षीण था फिर भी चट्टानों के बीच कूद फांद करते प्रकृति का कुछ लुत्फ़ तो लूट ही लिया गया.

बारिश के दिनों में कपिलधारा का फाईल चित्र

नर्मदा नदी के प्रथम (100 फुट ऊंचे कपिलधारा नामक) जल प्रपात के बारे में बहुत सुना था कि वहां की गुफायों में अभी भी आजकल के कुछ साधू ध्यान मग्न देखे जा सकते हैं. लेकिन या तो हमने कोशिश नहीं की ज़्यादा खोजबीन की या फिर यह केवल सुनी सुनाई बातें होंगी जो हमें ऐसा कुछ मिला नहीं.

हमने पहले ही इरादा कर लिया था अमरकंटक में रूकने का लेकिन उस समय बेहद निराशा हुई जब पता चला कि एक धार्मिक कार्यक्रम के कारण सारे स्थान बुक हो चुके हैं और कहीं कोई जगह नहीं. किसी ने सलाह दी कि गुरूद्वारे चले जाओ काम बन जाएगा. उधर का रूख किया तो बताया गया कि जिस जिम्मेदार व्यक्ति के पास चाबियाँ रहती हैं वह बिलासपुर गए हैं और अगले दिन ही लौटेंगे.

इधर पहाड़ों के पीछे सूरज तेजी से छिपने की तैयारी कर रहा था और मेरा तनाव बढाते जा रहा था. तुरत फुरत निर्णय लिया गया कि अब चला जाए 120 किलोमीटर दूर बिलासपुर की ओर जहाँ किसी होटल में रूक कर रात गुजार सुबह भिलाई जाएँ. दूरी कोई ज़्यादा लगी नहीं क्योंकि भिलाई से अपने जन्मस्थल दल्ली राजहरा हम दो घंटे से भी कम समय में पहुँच जाते थे जो कि 100 किलोमीटर ही है भिलाई से.

ऊँचे ऊँचे घुमावदार पहाड़ी रास्तों से फटाफट गाड़ी दौडाते 22 किलोमीटर दूर केंवची पहुँच, नाश्ता कर जब बिलासपुर की ओर रवाना हुए तो अँधेरे ने रंगत दिखाती शुरू कर दी थी. अभी बमुश्किल 5 किलोमीटर ही चले थे कि एकाएक हम दोनों के बीच दुबकी बिटिया चहकी “डैडी! भालू!!” श्रीमती जी ने उधर नज़रें दौडाई होंगी तो दबी दबी सी उनकी चीख भी निकल पड़ी “भालू!!”

सडक पर नज़र गड़ाए, गाड़ी दौडाते मैं बडबडाया “फिजूल की बात मत किया करो इस चलती राह में भालू कहाँ आएगा? लेकिन वह वर्षों तक दावा करते रही कि उसने उस समय एक भरा पूरा भालू सड़क के किनारे देखा था.

अमरकंटक का एक दृश्य

उम्मीद के विपरीत अँधेरे ने बड़ी तेजी से सारे जंगल पर कब्जा कर लिया था. वैसे सूरज अभी नज़रों से ओझल नहीं हुआ होगा लेकिन जंगल इतना घना था कि सूरज के प्रकाश को भी समय से पहले जाना पड़ रहा था.

जंगल की उस ठण्ड में अंधाधुंध गाड़ी दौडाते जा रहा था, सामने से आती इक्का दुक्का गाड़ियों से महसूस होता रहा कि हम गलत राह पर नहीं हैं. बिलासपुर बस 60 किलोमीटर ही दूर रह गया था कि श्रीमती जी ने कान में धीरे से कहा कि पीछे से आ रही जिस बड़ी सी गाड़ी की हैड लाइटें लगातार चमक रही वह एक निश्चित फासला बनाए हुए है हमसे, तो मैंने कंधे उचकाए कि थोड़ी देर में वह हमें ओवरटेक कर ही लेगी.

लेकिन 10 – 15 मिनट बाद मैंने महसूस किया कि वह गाड़ी वाकई में हमसे एक निश्चित दूरी बनाए हुए चल रही . मैं गति बढ़ाता तो उसकी गति भी बढ़ जाती, ख़राब सड़क के बहाने बेहद धीमी गति करता तो वह भी धीमे हो जाती.

अब मेरे दिल की धड़कने बढ़ने लगी. बिटिया सो चुकी थी और हम दोनों के बीच ही धंसी हुई थी. श्रीमती जी ने सूचित किया पौन घंटा हो चुका कैसे भी होता अब तक तो उस गाड़ी को निकल जाना चाहिए था. तब मैंने निर्णय किया कि बहुत हुआ अब या तो आर या तो पार. गाड़ी रोकी जाए और प्रतीक्षा की जाए उस गाड़ी के चले जाने की.

पत्थरो के बड़े बड़े टुकड़ों के पास अपनी कायनेटिक होंडा रोक यह दिखावा करते नीचे उतरा कि टायर पंचर हो गया है. उधर वह पीछा करती बदमाशों की गाड़ी धीरे धीरे पास आती गई इधर हमारे दिल की धड़कने बढ़ती गईं. अरे यह क्या!? वह घरघराती हुई जीप तो बिलकुल पास आ कर थम गई. मेरा तो गला ही सूख गया. श्रीमती जी मुझसे चिपकती हुई छिपने का प्रयास करने लगी

तभी गमछा लपेटे एक महाशय नीचे उतरे, पीछे पीछे सफ़ेद झक्क कुरते पायजामे में एक और प्रकट हुआ. टायर के मुआयने का दिखावा करते मैंने वही पड़ी एक मोटी टहनी थाम ली थी. इससे पहले नज़रें उठा कर कुछ बोलता एक मरदाना आवाज़ आई क्या हुआ? टायर पंचर? कुछ मदद करें? मैंने कहा शायद हवा कम है स्टेपनी से काम चल जाएगा. दूसरे ने कहा हम मदद कर देते हैं तभी हम जायेंगे. मेरा दिल धक्क से रह गया.

उसी समय जीप के भीतर से एक महिला की आवाज आई कि काहे इतनी ठण्ड में छोटी सी बेटी को तकलीफ दे रहे अंदर बैठ जाओ आगे छोड़ देंगे और वह बुज़ुर्ग नीचे भी उतर आईं.

अचानकमार जंगल का फाईल चित्र

 

फिर कुछ ही पलों में सारी बात स्पष्ट हुई कि जब हम केंवची से रवाना हो रहे थे तो वे सभी वहाँ जीप समेत मौजूद थे. रायगढ़ में उनके किसी संबंधी की मौत हो गई थी और वे कटनी से भागे दौड़े चले आ रहे. रास्ता अनजाना था उस पर इतना घना अचानकमार अभ्यारण वाला जंगल और घुप्प अंधेरा! केंवची में पूछताछ करते वक्त होटल वाले ने उन्हें उकसा दिया कि जब एक स्कूटर पर मियाँ बीबी जा सकते है इस घने जंगल से होते हुए तो तुम लोग क्यों डर रहे उनके पीछे पीछे जाते जाओ बिलासपुर पहुँच ही जाओगे. फिर क्या था हमारे भरोसे, डरते हुए पीछे आ रहा सारा परिवार

तब जा कर जान में जान आई और फिर हमने आगे आगे चलते हुए उन्हें बिलासपुर पहुंचाया. विदा लेते हम दोनों पक्ष एक दूसरे से डरने वाली स्थिति को याद कर ठहाके लगा रहे थे.

बिलासपुर में साढ़े नौ बज चुके थे. होटल में रूकने की बात पर श्रीमती जी ने कहा ‘अब तो यह अपना इलाका आ गया है कोई डर नहीं भिलाई चलते हैं वहीं जा कर आराम से सोयेंगे, यहाँ फिर सुबह हड़बड़ी रहेगी भागने की

रात साढ़े बारह बजे टाटीबंध पहुँच एम पी ढाबे पर छक कर भोजन कर आराम से जब भिलाई पहुंचे तो रात के दो बज चुके थे. देर तक सोना ही था कोई जगा ना दे सुबह सुबह इसलिए अगले दरवाज़े पर ताला लगा पिछले दरवाजे अंदर जा जो सोए तो दोपहर को ही नींद खुली

हालांकि एक बार फिर कार द्वारा, दोनों बच्चों के साथ हम अमरकंटक, रीवा, खजुराहो, जबलपुर, कान्हा किसली के यादगार टूर पर गए थे उसकी चर्चा आने वाले दिनों में. लेकिन आज उस अचानकमार जंगल के उन बदमाशों का ख्याल आता है तो मुस्कराहट तैर जाती है हमारे चेहरों पर.

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जब अचानकमार बदमाशों ने अँधेरे जंगल में हमारा पीछा किया” पर 24 टिप्पणियाँ

  1. आप ने तो डरा ही दिया था, किस्मत अच्छी थी आप की नहीं तो कुछ भी हो सकता था। रात में ठंडी हवाओं के साथ सफ़र करना जितना लुभावना होता है उतना ही खतरनाक भी…।:)
    ऐसा ही एक अनुभव हमारे साथ भी हुआ था बहुत साल पहले, इंदौर से बम्बई आ रहे थे रात में।

  2. आपकी रचनाधर्मिता व सक्रियता को सलाम। मैने हाल ही एक वेब न्यूज पोर्टल अजमेरनामा के नाम से शुरू किया है। लिंक यह है
    http://www.ajmernama.com
    टिप्पणीकर्ता tejwani girdhar, ajmer ने हाल ही में लिखा है: उमा की बदजुबानी : कभी अभिशाप तो कभी वरदानMy Profile

  3. रहस्य और रोमांच के सौदागर जंगल से बाहर निकले और पिछले दरवाजे से , वीरान पड़े हुए घर में घुस पड़े ! उन तीनों की आमद से घर में अन्धेरा और भी गहरा गया था ! पड़ोसियों को उनकी इस हरकत की कानोकान भी खबर ना हुई और फिर वे …

    …इसके आगे भी रहस्य ही है 🙂

  4. न जी न हमारे साथ ऐसा कभी नहीं हुआ ..इतने हिम्मती और रोमांचकारी नहीं हैं हम.

  5. शिकायत यह कि बड़ी देर लगाता है खुलने में आपका यह ब्लॉग.
    अपनी हिम्मत कभी नहीं हुई. और शादी के बाद इतनी हिम्मत बची रह जाए तो वह बन्दा बी०एस० पाबला ही हों सकता है… 😉 😀
    टिप्पणीकर्ता indian citizen ने हाल ही में लिखा है: १-घण्टे बजाने पर रोक नहीं , २ – कश्मीर से मिशनरी को बाहर जाने के आदेश दिए गये !My Profile

  6. कमाल की रोमांचक यात्रा. मज़ा आ गया पढ के. पूरा संस्मरण जिस रोचकता के साथ लिखा गया है, वो पाठक को दम साध के पढने के लिये विवश करता है 🙂 बधाई.
    टिप्पणीकर्ता वन्दना अवस्थी दुबे ने हाल ही में लिखा है: क्या करें अनुरूप-सागरिका जैसे तमाम प्रवासी?My Profile

  7. बहुत रोमांचक विवरण ।
    ज़वानी में ऐसा दुस्साहस हो ही जाता है ।

    • :Happy-Grin:
      लयो जी, अभी डेढ़ साल पहले हमने जो पंगे लिए थे आपको याद नहीं?
      इसका मतलब -अभी तो मैं जवान हूँ

  8. Aapke vilakshanta se parichit hun par shayd puri tarah nahin.bahut dinon se mile nahin.sugadh lekhan ki badhai,!!!!!!

  9. कई महत्त्वपूर्ण ‘तकनिकी जानकारियों’ सहेजे आज के ब्लॉग बुलेटिन पर आपकी इस पोस्ट को भी लिंक किया गया है, आपसे अनुरोध है कि आप ब्लॉग बुलेटिन पर आए और ब्लॉग जगत पर हमारे प्रयास का विश्लेषण करें…

    आज के दौर में जानकारी ही बचाव है – ब्लॉग बुलेटिन

  10. मै तो शीर्षक पढ़ कर चक्कर मे ही आ गया था। इतने दशको अचानकमार मे घूमा कभी कोई बदमाश नही मिला आपको कहा से मिल गया 🙂 🙂
    टिप्पणीकर्ता Arunesh dave ने हाल ही में लिखा है: कालू गरीब – दवे जी, ये "गे" क्या होता है।My Profile

  11. बी. एस. पाब्ला जी मै अभी (काम के सिलसिले से) अनूपपुर मे निवास कर रहा हूँ
    आप की बताई सारी जगह लगभग घूम चूका हूँ अभी इन जगहों पर कुछ भी नहीं बदला, अगर बदला है तो इन्सान और दुकाने. दोनों पार्ट पढ़ा अच्छा लगा

    संस्मरण लिखने के लिए धन्यवाद
    08966903291

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