आधी रात हुई कहा-सुनी, हुए लाल पीले हम टोर संग

ब्लॉग जगत के लोकप्रिय और चर्चित ब्लॉगर अजय कुमार झा जी से मेरा परिचय अदालत पर आई एक अजीबोगरीब खबर से हुआ था. बाद में यह परिचय बेहद आत्मीयता में बदल गया और आज वे उन गिने चुने (ब्लॉगर) मित्रों में से एक हैं जिनके सभी पारिवारिक सदस्य हमारे पारिवारिक सदस्यों से घुले मिले हैं. हालांकि हम तो दो बार उनके घर जा धमके हैं लेकिन वे छत्तीसगढ़ आने का वादा कर कर के भी अभी तक पूरा नहीं कर पाए हैं. छोटे बच्चों की जिम्मेदारी का ख्याल कर हम भी उन्हें चेतावनी नहीं दे रहे 😀

पिछले रविवार, कम्प्यूटर का ढ़ेर सारा काम निपटाते निपटाते आधी रात हो चुकी थी. दिन में भी काफी समय दे चुका था कम्प्यूटर के सामने और शाम से तो महफ़िल जमी ही थी 🙂 आँखे भारी होने लगी. शरीर को संकेत मिलने लगे कि बहुत हुआ अब! सब बंद करो और धड़ाम से गिर जाओ बिस्तर पर. फिर क्या था एक जोरदार अंगडाई ली, जम्हाई ली, उठने ही लगा था कि स्क्रीन पर अजय जी का चेहरा और अभिवादन करता संदेश उभरा. अपन दन्न से फिर कुर्स्सी पर 😀

चूंकि आधी रात हो चुकी थी, तारीख बदल कर 14 मई हो गई, इसलिए सीधे काम की बात बताई उन्होंने ‘कुछ साइट्स खुल ही नहीं रही हैं’ उनके पास. ‘कौन कौन सी’ पूछे जाने पर पता चला कि फ़ेसबुक, जागरण जंक्शन ,नवभारत टाइम्स ब्लॉग्स और भी कई साईट्स नहीं खुल रहीं. गूगल, याहू, भास्कर, हिन्दुस्तान टाइम्स, लिंक्डइन वगैरह सब मजे से चल रहे तुरंत ही दूसरा संदेश उभरा ‘अभी ब्लॉग मंच को ही क्लिक किया तो वो भी नहीं खुली’

मेरी सारी नींद गायब 🙂 बाक़ी किसी साईट की चिंता नहीं लेकिन अपने ही सर्वर की नहीं खुली तो गड़बड़ है क्योंकि 10 -15 मिनट ही हुए थे मुझे सर्वर की जांच किए हुए. इसके पहले भी द्विवेदी जी के साथ ऎसी ही समस्या थी, जिसे उन्होंने लिखा भी था. हमने झट से अजय जी को टीम व्यूअर शुरू कर उसका पासवर्ड देने को कहा. चंद सेकेंड्स में ही उनका कम्प्यूटर मेरे कब्जे में था की-बोर्ड माऊस मेरा लेकिन कम्प्यूटर उनका.:-)

‘कब से है यह समस्या’ तो उन्होंने कहा कि ‘अभी शाम को आंधी तूफ़ान आया तब से’ कुछ मिनट तक उनके कम्प्यूटर की जाँच करने पर यह सुनिश्चित हो गया कि समस्या MTNL की है. तब मैंने उन्हें दिलासा दी ‘यह समस्या अपने आप ही ठीक हो जाएगी, हो सकता है कई दिन लग जाएँ’ इतना सुनते ही उनके चेहरे का रंग पीला पड़ गया, ऐसा मुझे लगा!

दिनेशराय द्विवेदी, बी एस पाबला, अजय कुमार झा

दिनेशराय द्विवेदी, बी एस पाबला, अजय कुमार झा

इधर रात के एक बजने लगे थे, मेरी आँखें लाल होने लगी थी नींद के मारे. अजय जी के उदास चेहरे का ख्याल कर मैंने उन्हें हौसला दिया कि तब तक के लिए एक वैकल्पिक व्यवस्था कर देता हूँ. और फिर लगभग 20 MB का एक सौफ्टवेयर डाऊनलोड कर, उनके कम्प्यूटर पर स्थापित कर, फायर फ़ॉक्स पर उनके द्वारा चाही गई सभी साईट्स खोल कर दिखा दीं और बता भी दिया ‘कभी भी साइट्स ना खुलने की ऎसी समस्या आए कि बाक़ी जगह साईट खुल रही लेकिन आपके पास नहीं खुल रही‘ तो केवल एक माऊस क्लिक से कैसे परिस्थितियाँ बदली जा सकती हैं.

अजय जी की तात्कालिक प्रतिक्रिया थी ‘बाप रे बाप! ये है क्या चीज?’ मैंने उन्हें जानकारी दी कि इस वक्त आप दिल्ली में नहीं जर्मनी के हैम्बर्ग शहर में बैठ कर कम्प्यूटर चला रहे हैं, ऐसा सारी दुनिया में दिखेगा. वे फिर हैरान ‘ये क्या है? ‘ .मैंने चुहलबाजी की ‘ये क्या है? अब का बताएं बसंती!’ साथ ही साथ बता भी दिया ‘एकाध मिनट रुकिए, हो सकता है आप चीन पहुँच गए हों!’ उन्होंने भी ठहाका लगाया ‘आपको किसी दिन अमेरिका जर्मनी वाले पकड के ले जाएंगे अपने देश में

हलकी सी जानकारी दी मैंने कि फायर फ़ॉक्स के ऊपरी हिस्से में दिख रहा प्याज का चिन्ह जब तक हरे रंग में दिखेगा तब तक आप सारी दुनिया में घूम घूम कर किसी भी तरह की प्रतिबंधित वेबसाईट्स देख सकेंगे और जब उस प्याज पर कटा हुआ निशान दिखें तो समझ लीजिए आप आपने घर पर अपने इंटरनेट देने वाले की मेहरबानी पर चल रहे हैं. प्रतिक्रिया मिली ‘हरे प्याज के पकौडे और जर्मनी के बने हों तो बात ही क्या!’

बिना टोर के

बिना टोर के

टोर काम पर है

टोर काम पर है

 

रात के सवा एक बज रहे थे. मैंने पूछा कि कोई ‘डांट’ नहीं पड़ी अभी तक? ज़वाब मिला ‘सब घोड़े बेच कर सोए पडे हैं दूसरे कमरे में मैं इधर हूं मजे से’ एक आग्रह भी आया ‘इस सॉफ्टवेयर पर विस्तृत रूप से लिखिए’. मैंने आश्वासन दिया कि इस बारे में किस तरह» पर लिखूँगा. अभिवादन पश्चात जब तक मैं बिस्तर पर पहुंचता रात के 2 बज चुके थे

सुबह 04:30 का स्थाई अलार्म बजते ही उठ गया. थोड़ी देर बाद चैट लिस्ट में अजय जी की हरी बत्ती जली तो उत्सुकता से पूछा ‘सब ठीक?’. हामी भरने के साथ ही उनकी फिर वही जिज्ञासा थी ‘ये है क्या चीज?’

इधर ऑफिस में सहयोगी बार बार पूछ रहे थे कि आपकी आँखे लाल लाल क्यों दिख रही हैं? अब मैं क्या बताता उन्हें! मेरे सामने तो अजय जी का पीला पड़ चुका वो चेहरा नज़र आ रहा था, जो शायद वेबसाईट्स न खुलने के कारण हुआ होगा. 😉

शाम को अजय जी को मैंने बताया ‘मूल तौर इंटरनेट पर अपनी पहचान छुपाने, गोपनीयता बनाए रखने के लिए सर्वोत्तम मुफ़्त औजारों में से एक माना जाता है – टोर (TOR)‘ जैसे प्याज की परतें खोलते जाने के बाद अंत में मिलता कुछ नहीं कुछ वैसा ही होता है इस टोर उपयोग करने वाले के ठिकाने का कोई पता नहीं लगा सकता

इस संबंध में दो वर्ष पहले रवि रतलामी जी के ऑनलाइन पहचान छुपाने और नकली आईपी पते को छुपाने के वाले प्रयोग में तकनीकी सहायता भी की थी मैंने. उसके बाद उन्होंने लिखा था कि इसमें अनाम बने रहने की पूरी गुंजाइश रहती है चूंकि इसके द्वारा नेट गतिविधयों को सैकड़ों टोर क्लाएंटों के जरिए बारंबार, बेतरतीब तरीके से भेजा जाता है और हर टोर क्लाएंट अपने पीछे के निशान मिटाते चले जाते हैं.

 

 

हलके फुल्के अंदाज़ में उन्होंने अपनी पहचान छुपाकर ब्लॉगिंग या टिप्पणी करने के लिए भी इसे आदर्श बताया था. लेकिन एक गंभीर टिप्पणी में साफ़ कर दिया टोर उन लोगों के लिए है जो शासन, कुशासन, स्थानीय माफिया और बाहुबली के भ्रष्ट तंत्र के विरूद्ध प्रभावी सीटी बजाने के लिए अपनी खुद की पूरी सुरक्षा करते हुए काम में लेते हैं, नहीं तो उनका भी हश्र अनिरूद्ध बहल और आलोक तोमर (सोचिए कि जब ये बड़े पत्रकार हैं, और सीटी बजाने पर इनके विरूद्ध ही मुकदमा ठोंक दिया गया) जैसा होगा. बताईये अदने से ब्लॉगर का क्या हाल होगा.

इसी आधार पर उन्होंने वर्धा विश्वविद्यालय में हुई संगोष्ठी/ कार्यशाला में एक स्लाईड शो प्रस्तुत किया था.


 

विकिलीक्स जैसे दस्तावेज़ लीक करने वालों को गोपनीयता मुहैया कराने का बड़ा ही सरल आधार उनके वेब कनेक्शन के IP address को ज़ाहिर नहीं होने देना है. ये काम करता है The Onion Router या टोर नामक यह सॉफ्टवेयर नेटवर्क. टोर कहीं भेजी गई जानकारी को हज़ारों सर्वरों के एक नेटवर्क के ज़रिए रूट करता है. जानकारियाँ इन सर्वरों में एक से दूसरे में अनियोजित तरीके से कई बार भटकाए जाने के बाद अंतत: उपयोगकर्ता तक पहुंचती है. .

इस तरह उछलकूद मचाते, आवारागर्दी करते हुए अंत में पहुंची जानकारी के स्रोत का पता हर देश की सुरक्षा एजेंसियों के बूते से बाहर की बात है. जैसा कि एक ब्लॉग पोस्ट में बताया गया था “कल्पना करें लोगों से भरे एक बड़े कमरे की. कमरे में मौजूद दसियों लोग लगातार अनेक एक-दूसरे को लिफ़ाफ़े सौंप रहे हैं. भला कैसे पता लगाएँगे कि कौन-सा लिफ़ाफ़ा शुरूआत में किसके हाथ में था?”

टोर तकनीक का विकास अमरीकी नौसैनिक अनुसंधान प्रयोगशाला (U.S. Naval Research Laboratory) में किया गया था. इसके बावजूद भी अमरीकी रक्षा मंत्रालय तक इस नेटवर्क में किसी भी तरह घुसपैठ नहीं कर सकता है. विकिलीक्स के प्रवक्ता ने इस कुछ इस प्रकार बताया था “टोर उन लोगों के हाथ से बाहर निकल चुका है, जो कभी इसके निर्माण में शामिल रहे होंगे.”

आजकल भारत में जो इंटरनेट पर सेंसरशिप की बातें धमाल मचाए हुए हैं उसकी पृष्ठभूमि में पिछले दिनों ऎसी खबरें आईं कि सरकारी संस्थायों की ओर से फेसबुक सहित कुछ वेबसाईट्स को आधी रात को बंद कर कई घंटों तक बंद रखा गया और गाहे बगाहे ऐसा किया जाता है सेंसरशिप की टेस्टिंग के नाम पर. पिछले माह भर में ऎसी कई घटनाएं मेरे सामने आई हैं जिसमे कुछ खास तरह की साइट्स एकाएक इंटरनेट से गायब हो जाती हैं और फिर लौट भी आती हैं. इसमे भी बी एस एन एल/ एम टी एन एल के इंटरनेट वाले कनेक्शन मुख्य हैं

कल 19 मई की सुबह सुबह द्विवेदी जी का संदेश मिला कि कुछ वेबसाईट्स फिर एक बार नहीं खुल रहीं, ऑफिस जाने की भागमभाग के बीच उनके कम्प्यूटर पर भी टीम व्यूअर द्वारा टोर स्थापित किया गया. उस समय तो उन्होंने पूरी तौर पर टोर द्वारा काम किया फिर लगभग 10 बजे संदेश आया कि सब कुछ सामान्य हो गया है, बिना टोर के काम हो रहा. हम भी मुस्कुराए कि सेंसरशिप होगी तो किस किस सर्वर पर बंदिश लगायेंगे? टोर है तो क्या गम है?

तो इस तरह आधी रात अजय झा से कहा (टोर के बारे में) -सुनी (हमने उनकी समस्या) , और सुबह लाल (आँखें लिए) पीले (चेहरे को याद करते) हम

क्या ख्याल है आपका? आपके साथ भी ऐसा कुछ होता है? वेबसाईट्स की लुका-छिपी सेंसरशिप के प्रयोग से हो रही? क्या सेंसरशिप से निपटने के लिए यह टोर तकनीक कारगर नहीं?

आधी रात हुई कहा-सुनी, हुए लाल पीले हम टोर संग
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मेरी वेबसाइट से कुछ और ...

एक ऎसी वेबसाईट www.KisTarah.com जिसमे किसी काम को किस तरह किया जाए इसकी जानकारी हिंदी में दिए जाने का प्रयास होगा. जैसे अंग्रेजी में www.ehow.com है tPowered by Hackadelic Sliding Notes 1.6.5

आधी रात हुई कहा-सुनी, हुए लाल पीले हम टोर संग” पर 25 टिप्पणियाँ

  1. आज फिर ये समस्या आई थी। लेकिन केवल दस मिनट के लिए।
    टिप्पणीकर्ता दिनेशराय द्विवेदी ने हाल ही में लिखा है: फर्जी प्रथम सूचना रिपोर्ट को निरस्त कराने के लिए उच्च न्यायालय में धारा 482 दं.प्र.सं. के अंतर्गत आवेदन करेंMy Profile

  2. मैं भी कुशासन के विरुद्ध लिखने वाले मित्रों को अनाम रहकर टॉर प्रयोग करने की सलाह देता हूँ। टॉर से बेहतर प्रॉक्सी व्यवस्था दूसरी नहीं।
    टिप्पणीकर्ता ePandit ने हाल ही में लिखा है: अमर उजाला के राष्ट्रीय संस्करण में टैबलेट सम्बन्धी लेख में ई-पण्डितMy Profile

  3. हा हा हा ये भी खूब रही सर । जब भी मैं आपको कोई समस्या बताता हूं मुझे पहले ही अंदाज़ा होता है कि अब बहुत जल्दी मेरे चौंकने की बारी आने वाली है । उस दिन भी आधी रात ( बल्कि उससे भी कहीं ज्यादा ही ) आप और हम टॉरम टॉराई (छुपन छुपाई टाईप से ) कर रहे थे तो मैं सोच रहा था और कह ही रहा था कि कोई सुनेगा तो कहेगा सच में ही ये आबला और पाबला हैं । सर इसी बहाने से ब्लॉग जगत को एक नायाब तकनीकी पोस्ट मिल गई , ये भी अच्छा रहा । तकनीक के अलावा जब आपकी ऐसी पोस्टें पढता हूं तो मुझे यकीन हो जाता है कि आप शब्दों और शैली के भी महारथी हैं । बढिया रहा सर ये अनुभव भी ।
    टिप्पणीकर्ता अजय कुमार झा ने हाल ही में लिखा है: रमता जोगी बहता पानी , कुछ बातें नई पुरानीMy Profile

  4. पाबला जी, नमस्कार ! आपकी उपरोक्त पोस्ट तकनिकी रूप से बहुत अधिक जानकारी देने वाली है. मगर इस अनपढ़ और गंवार (अंग्रेजी भाषा का अज्ञान के कारण) को समझ नहीं आई. वैसे फर्जी केसों के कारण मेरा दिमाग इन दिनों ज्यादा ठीक भी नहीं है. क्या पोस्ट में लिखी बात सच हो सकती हैं कि आपका पता या पहचान भी छुप जायेगी और आप काम भी हो जाएगा. क्या मेरे जैसे पागल पत्रकार के लिए संभव है ?

    • Amazed
      रमेश जी, सारी आवश्यक जानकारी हिंदी में ही दी गई है! अंग्रेजी किधर है?
      वैसे यह तकनीक आप जैसे पत्रकार के लिए मुफीद है

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